वर्तमान समय में दुनिया का शस्त्र बाजार तेजी से फल-फूल रहा है और हर देश अपनी सुरक्षा को चाक-चौबंद बनाने के उद्देश्य से हथियारों का भंडारण करने में लगा हुआ है। इस प्रक्रिया का दूसरा पहलू यह है कि दुनिया के अधिकांश विकसित देश हथियारों की बिक्री करके अपने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रहे हैं। इससे उनके देश के हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा है। हाल ही में स्वीडन के सुरक्षा मामलों के एक थिंक टैंक ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वर्ष 2007 से 2011 तक की अवधि में भारत ने दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले सबसे ज्यादा हथियारों का आयात किया। इस अवधि में भारत द्वारा खरीदे जाने वाले हथियारों में 38 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा जारी की गई इस रिपोर्ट की विशेष बात यह है कि 2007 से 2011 के दौरान मुख्य पांच शीर्ष हथियार आयातक देश एशिया के ही हैं। रिपोर्ट की मानें तो भारत के बाद दूसरा स्थान दक्षिण कोरिया, तीसरा स्थान पाकिस्तान व चौथा चीन का है जिन्होंने विश्व की कुल हथियार बिक्री का पांच प्रतिशत खरीदा है। चौथे नंबर पर पहुंचने वाला चीन वर्ष 2006 से 2008 के दौरान दुनिया का सबसे बड़ा आयातक देश था। पूरी दुनिया में इन पांच वर्षो में जितने हथियार आयात किए गए उनमें दस फीसदी की हथियार हिस्सेदारी भारत की रही। इसके बाद दक्षिण कोरिया ने छह फीसदी, पाकिस्तान व चीन ने पांच-पांच फीसदी हथियारों का आयात किया जबकि सिंगापुर ने कुल चार फीसदी हथियार आयात किए। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत, पाकिस्तान व चीन हथियारों की होड़ में आगे बढ़ रहे हैं। दुनिया भर में इस अवधि में जितने हथियारों की बिक्री हुई और दुनिया के किन क्षेत्रों में हुई, उसके आंकड़े देखें तो पता चलता है कि 44 प्रतिशत हथियार एशियाई तथा ओशिनियाई देशों, 19 प्रतिशत यूरोपीय देशों, 17 प्रतिशत मध्य पूर्व के देशों और 11 प्रतिशत अमेरिका व सबसे कम 9 प्रतिशत अफ्रीकी देशों ने खरीदे। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2002 से 2006 की अवधि के पांच वर्षो की तुलना वर्ष 2007 से 2011 की पांच वर्ष की अवधि से की जाए तो पता चलता है कि वैश्विक हथियारों की खरीद-बिक्री 24 प्रतिशत अधिक हुई है। इस बारे में सिप्री के सीनियर शस्त्र शोधार्थी पीटर वेजमैन का कहना है कि प्रमुख हथियार आयातक देश ऐसा करके अपना हथियार उद्योग बढ़ाना चाहते है जिससे वे दूसरे Fोतों पर अपनी निर्भरता कम कर सकें। वर्ष 1985 से 2008 तक भारत को सर्वाधिक हथियार निर्यात करने वाले देशों में यूएसएसआर पहले स्थान पर था और उसका प्रतिशत 73 था। इसके बाद ब्रिटेन ने 8 प्रतिशत, फ्रांस ने 5 प्रतिशत, नीदरलैंड ने 3 प्रतिशत , जर्मनी ने भी 3 प्रतिशत व अन्य देशों ने 8 प्रतिशत हथियार भारत को निर्यात किए। वर्ष 2004-05 से लेकर 2009-10 के पांच वित्तीय वर्षो में अमेरिका से सैन्य साजो सामान की खरीद पर भारत ने कुल 1.75 लाख करोड़ डॉलर खर्च किए, क्योंकि उसकी रक्षा चुनौतियां काफी बढ़ गई थीं। 26/11 के मुंबई हमले के बाद ये चुनौतियां और बढ़ीं तब भारत ने अमेरिका से हथियार खरीदने के कई समझौते किए। इनमें उन्नत किस्म के पी-8 विमानों की खरीद का सौदा शामिल है। सैन्य परिवहन के लिए भारत एक अरब डॉलर से अधिक की कीमत के सी-130जे विमान खरीद रहा है इसके अलावा भारत को सी-17 ग्लोबमास्टर विमान अमेरिका से खरीदने पड़े। स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान तेजस के लिए अमेरिका से जीई इंजन, सी-130जे विमानों की अतिरिक्त खेप, चार अतिरिक्त टोही विमान एवं 155 मिमी-52 कैलिबर तोपें भारत खरीद रहा है। अमेरिका भारत को एजीएम-84एल हारपून ब्लॉक-2 मिसाइलें दे रहा है। अभी कुछ समय पहले भारत ने लगभग 52 हजार करोड़ रुपये में फ्रांस की विमान निर्माता कंपनी दसाल्ट राफेल से 126 बहुउद्देश्यीय लड़ाकू विमान खरीदने का समझौता किया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)