Friday, October 14, 2011

हथियारों के जरिये शांति खोजने का छद्म


संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस बार 21 सितंबर की थीम रखी थी पीस एंड डेमोके्रसी: मेक योर वॉइस हर्ड यानी शांति और लोकतंत्र: अपनी आवाज सुनाओ या सुनने योग्य बनाओ। लेकिन कैसे? हथियारों की शक्ति के जरिये या लोगों की शक्ति के माध्यम से। जिस तरह की विशेषता आज दिख रही है, उससे तो उत्तर हथियारों की शक्ति के जरिये ज्यादा सटीक लगता है। लेकिन उस स्थिति में यह वाक्य केवल आदर्श की सीमाओं तक ही सीमित रहेगा या फिर उसका अर्थ कुछ भिन्न होगा। मानव मूल्यों की रक्षा करने के लिए दुनिया में शांति और लोकतंत्र की जरूरत है, लेकिन कटु सत्य तो यह है कि ये दोनों ही खतरे की ओर खिसकते जा रहे हैं? वैश्विक हथियारों के हस्तांतरण समझौते संबंधी वर्ष 2003-2010 के लिए अमेरिकी कांग्रेस द्वारा जारी एक रिपोर्ट को देखकर एक बात तो स्पष्ट हो गई कि विकासशील देश परंपरागत हथियारों को जमा करने की तीव्र प्रतिस्पद्र्धा से गुजर रहे हैं। इसलिए संभव है कि वे उन मूलभूत आवश्यकताओं से मुंह मोड़ रहे हों, जो लोकतंत्र का स्वस्थ रखने के लिए जरूरी हैं। यह भी संभव है कि इस होड़ में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांत को भी नुकसान पहुंच रहा हो। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका, रूस और यूरोपीय देश विकासशील दुनिया में हथियारों की बाजारों पर कब्जा करने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा में हैं, जो बीच-बीच में शांति के पैरोकार होने का एहसास दिलाने कोशिश करते रहते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर ये सब चाहते क्या हैं। अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2003 से 2010 के बीच विकासशील देशों में हथियार खरीद के मामले में सऊदी अरब ने सबको पीछे छोड़ दिया। इस दौर में उसने 29 अरब डॉलर के हथियार खरीदे और भारत दूसरे स्थान पर रहा। इसके बाद फिर चीन, मिस्त्र और इजराइल जैसे देशों का स्थान आता है। हालांकि चीन और इजराइल केवल खरीददार ही नहीं रहे, बल्कि विक्रेता की भूमिका में भी हैं। इसलिए उनकी स्थिति और भी जटिल है। अगर केवल 2010 की बात की जाए तो फिर इस वर्ष पारंपरिक हथियारों की खरीद के मामले में विकासशील देशों में भारत पहले स्थान पर रहा, क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक भारत के साथ हथियारों के 5.8 अरब डॉलर के समझौते के लिए कई देश कोशिश कर रहे थे। दूसरे स्थान पर ताइवान रहा, जिसने इस वर्ष 2.7 अरब डॉलर के हथियारों की खरीद की। इसके बाद सऊदी अरब का नंबर आता है, जिसने 2.2 अरब डॉलर कीमत के हथियार खरीदे। भारत के पड़ोसी और सर्वाधिक प्रतिस्प‌र्द्धी राष्ट्रों में से एक पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब के बराबर ही हथियारों का सौदा संपन्न किया। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2003-2010 में विकासशील दुनिया में निकट पूर्व सबसे बड़ा हथियार बाजार रहा। यद्यपि 2003-2006 में यह क्षेत्र कुल मूल्य के 42.3 प्रतिशत (49.4 अरब डॉलर) के साथ दूसरे स्थान पर रहा था और एशिया क्षेत्र 47.2 प्रतिशत (55.1 अरब डॉलर) के साथ पहले स्थान पर रहा, लेकिन 2007 से 2010 के लिए यह स्थिति बदल गई और निकट पूर्व क्षेत्र 51.1 प्रतिशत (91.3 अरब डॉलर) के साथ पहले स्थान पर पहुंच गया। इस रिपोर्ट में निकट पूर्व के देशों में अल्जीरिया, बहरीन, मिस्त्र, ईरान, इजराइल, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, लीबिया, मोरक्को, ओमान, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, ट्यूनीशिया, यूनाइटेड अरब अमीरात और यमन को शामिल किया गया है। इसमें ट्यूनीशिया, सीरिया, लीबिया आदि वे देश हैं, जहां जनआंदोलनों के जरिये सत्ताधारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है और कुछ देश ऐसे हैं, जहां या तो सत्ता के खिलाफ संघर्ष जारी है या फिर ऐसे आंदोलनों की सुगबुगाहट है। एशिया में कुछ विकासशील देश अपने रक्षा बलों को आधुनिकीकृत करने में लगे हुए हंै। इस कारण से इस क्षेत्र में परंपरागत हथियारों की मांग लगतार बढ़ रही है। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया भी इस मामले में पीछे नहीं है। वर्ष 2007 से 2010 तक संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस विकासशील दुनिया के हथियार बाजार पर हावी रहे और हथियार हस्तांतरण के मामले में इन चार वर्षो के प्रत्येक वर्ष में पहले या दूसरे स्थान पर बने रहे। वर्ष 2007-10 में अमेरिका ने लगभग 72 अरब डॉलर के हथियार सौदे संपन्न किए और रूस ने 37.1 अरब डॉलर के। दोनों ने कुल हथियार सौदों के 60.8 प्रतिशत पर कब्जा किया। वर्ष 2010 में तो अमेरिका ने अकेले ही वैश्विक हथियार हस्तांतरण के 52.7 पर कब्जा करने में सफलता प्राप्त की, जबकि रूस 19.3 प्रतिशत पर ही कब्जा कर पाया। लेकिन फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और इटली का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रहा। लेकिन इस दौरान एक बात देखने को मिली, जिससे भविष्य में खेमेबंदी या फिर अस्वस्थ प्रतियोगिता शुरू होने की आशंका बनती है। उदाहरण के तौर पर भारत, चीन या फिर कुछ अन्य एशियाई देशों को लिया जा सकता है। रूस 1990 के दशक के मध्य से चीन के लिए एक दशक तक फाइटर्स, विध्वंसक और मिसाइलों की आपूर्ति के साथ-साथ आधुनिकीकृत परंपरागत हथियारों का आपूर्तिकर्ता बना रहा, जबकि भारत के लिए यह प्रमुख आपूर्तिकर्ता था। इन देशों को ही आपूर्ति करने से रूस एशिया में हथियार आपूर्तिकर्ता के मामले में प्रथम श्रेणी में बना रहा, लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है। चीन कमोबेश हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर हो रहा है और भारत ने अपनी वरीयता को बदल दिया है। उल्लेखनीय है कि भारत ने 2004 में इजराइल के साथ फॉल्कन सौदा किया और 2005 में फ्रांस से कुछ हथियार खासकर छह स्कॉपेन डीजल अटैक सबमैरिन खरीदे। वर्ष 2008 में उसने ने छह सी130 जे कार्गो एयरक्रॉफ्ट अमेरिका से खरीदे। वर्ष 2010 में उसने ब्रिटेन के साथ 57 हॉक जेट ट्रेनर्स का 1 अरब डॉलर में सौदा किया। इसी वर्ष इटली ने भारत को 12 एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर बेचे। भारत द्वारा हथियारों की खरीद का यह तरीका और उसकी बदली हुई वरीयता बताती है कि भारतीय हथियार बाजार में अब रूस अपनी परंपरा से बाहर हो चुका है। जो भी हो, अब यह सोचना होगा कि शांति और लोकतंत्र के लिए जरूरी क्या है? क्या परंपरागत हथियारों का ढेर लोगों को पूरी सुरक्षा दे पाने सक्षम है? आज कितने लोग इस तरह की असुरक्षा में दम तोड़ते हैं और कितने मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं के उपलब्ध न होने के कारण। भारत सहित दुनिया भर के विकासशील देश इस समय परंपरागत हथियार जिनमें कॉम्बैट फाइटर एअरक्रॉफ्ट, सबमैरिन, डेस्ट्रॉयर, मिसाइलें, हॉक जेट ट्रेनर्स, कार्गो एयरक्रॉफ्ट, अवॉक्स एयरबोर्न राडार सिस्टम तथा उनकी अपग्रेडिंग तकनीक आदि को प्राप्त करने के लिए जेहादी रुख अपनाए हुए हैं। क्या इससे शांति प्राप्त हो सकती है? मजे की बात यह है कि दुनिया भर में आर्थिक मंदी और स्टैगफ्लेशन जैसी स्थिति के बावजूद वर्ष 2007-2010 में वर्ष 2003-2006 के मुकाबले हथियारों के बाजार में 15.2 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। क्या यह रास्ता उचित है? जहां तक विक्रेताओं का सवाल है तो उनकी स्थिति बहुत जटिल है, जिसमें वे किसी भी तरह से अपनी आंतरिक व्यवस्था के साथ साम्य बनाए रखना चाहते हैं। दरअसल कुछ भू-राजनीतिक या भू-सामरिक रणनीतियों ने भी शस्त्रों की प्रतिस्पद्र्धा को बढ़ाया। उदाहरण के तौर पर भारत के लिए चीन और पाकिस्तान ने ये स्थितियां पैदा कीं। ताइवान के लिए चीन पूरी तरह से जिम्मेदार बना। सऊदी अरब के लिए ईरान को उत्तरदायी माना जा सकता है। हालांकि निकट-पूर्व के देशों में स्थिति इससे भिन्न है, क्योंकि उन्हें हमेशा ही भू-क्षेत्रीय या भू-सामरिक संकट पैदा होने का संदेह बना रहता है। ऐसी परंपरा, जो हथियारों की खरीद-बिक्री का कार्य कर रही हो, उससे आखिर किस तरह से शांति लाई जा सकती है? अब संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया के तमाम देशों को इस पर विचार करने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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