Friday, August 12, 2011

ब्लैकबेरी ने बढ़ाई भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता


नई दिल्ली लंदन दंगों को भड़काने में हुए ब्लैकबेरी फोन के इस्तेमाल को देख भारत की सुरक्षा एजेंसियों के कान एक बार फिर खड़े हो गए हैं। कई तरह के आंतरिक और बाहरी खतरों से जूझ रहे भारत जैसे देश में राष्ट्र विरोधी ताकतों की ओर से इसके इस्तेमाल के खतरे को देखते हुए दूरसंचार विभाग पर इसके खिलाफ कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है। खुफिया ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, भारत में कम से कम 11 लाख लोगों के पास ऐसा आधुनिक संचार उपकरण है, जिस पर देश की कोई एजेंसी किसी तरह की निगरानी नहीं कर सकती। यह हमारे देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा हो सकता है। वे आश्चर्य जताते हैं कि आखिर ऐसे गंभीर मामले से निपटने में इतनी देरी क्यों हो रही है। खुफिया एजेंसियों की शिकायत पर पिछले साल जुलाई से ही गृह मंत्रालय कई बार ब्लैकबेरी सेवा देने वाली कनाडा की कंपनी रिसर्च इन मोशन (रिम) को संपर्क कर चुका है। इसके बाद पिछले साल के अंत में इन मोबाइल के जरिए भेजे जाने वाले सामान्य ई-मेल को तो खुफिया एजेंसियों की निगरानी के लिए उपलब्ध करवा दिया गया है, लेकिन ब्लैकबेरी फोन पर उपलब्ध ब्लैकबेरी मैसेंजर और ब्लैकबेरी एंटरप्राइज सैल्यूशन सेवा अब भी पूरी तरह से निगरानी के बाहर हैं। यानी इनके जरिए क्या संदेश भेजे जा रहे हैं, उन्हें कोई एजेंसी नहीं पकड़ सकती। खास बात है कि संसद के इसी सत्र में पेश की गई सूचना तकनीकी स्तर पर स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी दूरसंचार विभाग की इस कोताही के लिए उसकी जमकर खिंचाई की गई है। संसदीय समिति ने देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर इस कनाडाई कंपनी को इतनी बार मोहलत दिए जाने पर सख्त एतराज दर्ज किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दूरसंचार विभाग ने रिम को तीन बार नोटिस जारी किया। लेकिन हर नोटिस की समय सीमा खत्म होने से पहले ही इसे आगे बढ़ाया जाता रहा। आखिरी नोटिस पर भी रिम की ओर से कोई कदम नहीं उठाए जाने के बावजूद दूरसंचार विभाग ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। बल्कि एनक्रिप्शन के मामले पर विचार करने के लिए एक समिति गठित कर दी। संसदीय समिति ने इसे भी सिर्फ टालने का तरीका भर माना है।



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