Monday, April 11, 2011

सीमा पर सड़कों का जाल


भारत-चीन सीमा पर बढ़ते तनाव पर लेखक की टिप्पणी
यह चिंता का विषय है कि चीन भारत के साथ लगने वाली अपनी सीमाओं पर बड़े पैमाने पर सड़कों का जाल बिछा रहा है। पिछले दशक में ही चीन ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) में छह हजार किलोमीटर से भी अधिक की सड़कें बनाई हैं। चीन ने तिब्बत में ल्हासा और पश्चिम में अक्सई चिन के बीच 3,105 किलोमीटर लंबा, गोरमो से ल्हासा तक 1,154 किलोमीटर लंबा और चेंगडू व लिंझी के बीच 1,715 किलोमीटर लंबा राजमार्ग तैयार कर लिया है। इनके अलावा इस अवधि में टीएआर में 52 दूसरी सड़कें, गोंगार, लिंची, पांगटा, होपिंग और गार गुंसा में पांच हवाईअड्डे और एक रेल नेटवर्क भी काम करने लगे हैं। नियंत्रण रेखा से सटा कराकोरम हाईवे चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। चीन म्यांमार को भी एक सड़क नेटवर्क बनाने में मदद कर रहा है। इस दिशा में भारत ने काम देर से शुरू किया था, लेकिन अब वह चीन की बराबरी की ओर बढ़ रहा है। भारत 2030 तक 500 अरब रुपये की लागत से 558 सीमा सड़कें बनाने की योजना बना रहा है। इस निर्माण परियोजना के तहत बीआरओ को पहले चरण में 248.86 अरब रुपये की लागत से कुल 277 सड़कें बनाने का जिम्मा दिया गया है। दूसरे चरण में 252.68 अरब रुपये की लागत से 281 सड़कें बनाई जाएंगी। यहां बता दें कि मूल योजना के अनुसार पहला चरण 2012 तक पूरा करना था, लेकिन काम निर्धारित रफ्तार से आगे नहीं बढ़ा और अब यह 2015 में जाकर पूरा हो पाएगा। दूसरे चरण का लक्ष्य अब 2022 के बजाय 2030 तक पूरा हो सकेगा। वैसे तो चीन का फैलता सड़क तंत्र पूरे टीएआर में मौजूद है, लेकिन वह भारत के अरुणाचल प्रदेश के साथ लगने वाली अपनी सीमा पर विशेष रूप से ध्यान दे रहा है। अरुणाचल प्रदेश को चीन दक्षिणी तिब्बत कहता है। चीन ने इस पर कब्जा जमाने के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं पहले ही तैयार कर ली हैं। अरुणाचल प्रदेश वाले पूर्वी सेक्टर में अब वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ-साथ प्रमुख दर्रो के लिए 37 सड़कें और मिलिटरी यूनिटें मौजूद हैं। अरुणाचल प्रदेश में अपनी सीमा की रक्षा करने के लिए भारत ने अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है। अब दो नई माउंटेन डिवीजनें वहां तैनात हैं। इसके अलावा, भारतीय वायुसेना वहां सुखोई अड्डे भी बनाएगी। इस क्षेत्र में हल्की हाउत्जिर तोपों की तैनाती की भी योजना है। सीमा पर शांति बनाए रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे आगे क्या हो रहा है, उस पर भी नजर रखना जरूरी है। एक प्रभुसत्ता-संपन्न देश होने के नाते भारत के लिए न केवल पूर्वी सीमाओं बल्कि मध्यवर्ती तथा पश्चिमी सीमाओं पर भी चीन के मुकाबले तैयारी बनाए रखना जरूरी है। बराबर की क्षमता के निर्माण से ही वह चीन के उद्दंड रवैये से निपट पाएगा। इसका उदाहरण नवंबर 2009 में देखने को मिला था, जब चीन ने भारतीय अधिकारियों से दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश में तवांग मठ न जाने देने को कहा था। यह भारत के अंदरूनी मामलों में सीधा दखल ही था। इसके अलावा चीन के सामरिक विश्लेषकों की दी जाने वाली राय भी खीज का कारण बनती है। पार्टी-नियंत्रित ग्लोबल टाइम्स में प्रकाशित जाओ आन की टिप्पणी के अनुसार, दक्षिणी तिब्बत में भारतीय प्रवेश से निपटने के लिए चीन के सामने तीन विकल्प मौजूद हैं। पहला, भारत के साथ कम तीव्रता वाले युद्ध की स्थिति बनाए रखना। दूसरा, भारत के खिलाफ कम तीव्रता वाला युद्ध शुरू करना और तीसरा भारत के साथ लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहना, जिसका परिणति भारत के विभाजन में हो सकती है। इससे जाहिर है कि चीन की नीयत में खोट है और भारत को किसी भी स्थिति से निपटने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

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