पाकिस्तान ने इस्लामाबाद से 225 किलोमीटर दूर अपने खुशाब परमाणु परिसर में निर्माण गतिविधियां अचानक तेज कर दी हैं। गत अप्रैल में लिए गए उपग्रह-चित्रों के विश्लेषण के बाद पश्चिम के रक्षा विशेषज्ञ इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पाकिस्तान बहुत जल्द प्लुटोनियम उत्पादन के लिए चौथा रिएक्टर हासिल कर लेगा। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की रफ्तार दुनिया के किसी अन्य देश की तुलना में सबसे ज्यादा है। ईरान अभी संवर्धित यूरेनियम तैयार नहीं कर पाया है। उत्तर कोरिया प्लुटोनियम का उत्पादन कर चुका है लेकिन उसके पास परमाणु हथियार निर्माण की वास्तविक क्षमता नहीं है। दूसरी तरफ पकिस्तान चुपचाप अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहा है। खुशाब में नए परमाणु रिएक्टर के 2013 तक बन कर तैयार होने की उम्मीद है। पश्चिमी रक्षा विशेषज्ञों को डर है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम में यदि वर्तमान तेजी बनी रही तो वह बहुत जल्द फ्रांस की बराबरी पर पहुंच जाएगा। परमाणु हथियारों के भंडार के मामले में अभी अमेरिका, रूस और चीन के बाद फ्रांस का चौथा नंबर है। अमेरिकी खुफिया अनुमानों के अनुसार पाकिस्तान के पास इस समय 90 से लेकर 110 के बीच परमाणु हथियार हो सकते हैं। यदि ये अनुमान सही हैं तो पाक के पास भारत से ज्यादा परमाणु हथियार हो सकते हैं। परमाणु क्षेत्र में पाकिस्तान की असाधारण सक्रियता न सिर्फ भारत के लिए चिंता का विषय है बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी खतरनाक है। पाकिस्तान बड़े पैमाने पर बम-ईधन भी जमा कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में न्यूजवीक पत्रिका द्वारा किए गए ताजा रहस्योद्घाटन पर व्हाइट हाउस ने मौन धारण कर रखा है। परमाणु मसलों पर कार्य करने वाले अमेरिकी कांग्रेस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने न्यूजवीक को बताया कि खुफिया आकलनों के मुताबिक पाकिस्तान 100 से अधिक परमाणु हथियारों के उत्पादन के लायक बम सामग्री विकसित कर चुका है। वह साल में 8 से लेकर 20 परमाणु हथियार बना सकता है। इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी के विश्लेषक पाल ब्रेनन का कहना है कि इस साल जनवरी से खुशाब के चौथे रिएक्टर के निर्माण में तेजी आई है। इस संस्थान के मुताबिक पाकिस्तान ने तीसरे रिएक्टर का काम दूसरे रिएक्टर की तुलना में बहुत जल्द पूरा कर लिया था और अब शायद चौथे रिएक्टर का निर्माण तीसरे रिएक्टर से भी जल्दी पूरा कर लेगा। संस्थान ने अमेरिका से कहा है कि वह खुशाब में अतिरिक्त रिएक्टरों का निर्माण रोकने के लिए पाकिस्तान सरकार पर समुचित दवाब डाले। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में नए खुलासे से भारत के सरकारी हलकों में बड़ी हैरानी है। भारत के शीर्ष वैज्ञानिकों का अनुमान था कि पाकिस्तान अपने परमाणु कार्यक्रम का बहुत ज्यादा विस्तार नहीं कर पाएगा क्योंकि उसके पास समुचित यूरेनियम नहीं है। भारतीय अधिकारियों का ख्याल है कि पाकिस्तान जिस तरीके से अपने चौथे रिएक्टर पर काम कर रहा है, उससे स्पष्ट है कि उसे यूरेनियम की सप्लाई समुचित मात्रा में मिल रही है और इसमें उसे चीन की भरपूर मदद मिल रही है। एक बड़ा सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों को सुरक्षित रखने में समर्थ है। कराची के उच्च सुरक्षा वाले मेहरान नौसैनिक अड्डे पर पर तालिबान आतंकवादियों के हमले के बाद पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा का मामला एक बार फिर फोकस में आ गया है। मेहरान पाकिस्तान के मसरूर एयर बेस से सिर्फ 24 किलोमीटर दूर है। समझा जाता है कि मसरूर में परमाणु हथियारों का बड़ा जखीरा है। हालांकि पाक अधिकारी बार-बार यही कह रहे हैं कि उनकी बहुमूल्य परमाणु संपदा एकदम सुरक्षित है लेकिन जिस तरह से आतंकवादी बार-बार पाकिस्तान के सैनिक प्रतिष्ठानों पर हमले कर रहे हैं, उससे चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, May 25, 2011
Wednesday, May 18, 2011
बिहार में सड़कों के साथ हादसे भी बढ़े, दिल्ली में घटे
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विकास के साथ सड़कों पर वाहनों और दुर्घटनाओं की रफ्तार भी बढ़ी है। बिहार में पिछले चार सालों में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। दूसरी ओर दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे अपेक्षाकृत विकसित अथवा पश्चिम बंगाल जैसे अवरुद्ध विकास वाले राज्यों में दुर्घटनाओं में कमी आई है। इन चार सालों में पूरे देश में सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा चाल लाख 60 हजार 920 से बढ़कर चार लाख 86 हजार 384 पर पहंुच गया, जबकि मरने वालों की संख्या एक लाख पांच हजार 749 से बढ़कर एक लाख 25 हजार 660 हो गई। यह रोचक तथ्य सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा सड़क दुर्घनाओं के ट्रेंड पर कराए गए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में सामने आया है। सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में जहां 2006 में 5594 सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं, वहीं 2009 में यह आंकड़ा बढ़कर 10065 पर पहंुच गया। छत्तीसगढ़ में 2006 में 11934 सड़क हादसे हुए थे, जबकि 2009 में यह संख्या 12888 पर पहंुच गई। मध्य प्रदेश का आंकड़ा 38041 से बढ़कर 47267 पर पहंुच गया। वहीं कुछ शहरों तक केंद्रित विकास वाले उत्तर प्रदेश में भी सड़क दुर्घटनाएं खूब बढ़ी हैं। राज्य में वर्ष 2006 में 19489 के मुकाबले 2009 में 28155 सड़क हादसे हुए। इसके विपरीत अपेक्षाकृत विकसित राज्यों में सड़क दुर्घटनाओं में खासी कमी देखने में कमी आई है। सर्वाधिक विकसित दिल्ली में 2006 में जहां 9299 सड़क दुर्घटनाएं हुई थीं, वहीं 2009 में 7516 सड़क हादसे हुए। गुजरात में दुर्घटनाओं की संख्या 31547 से घटकर 31034 और महाराष्ट्र में 75413 से घटकर 71996 पर आ गई है। विकास की दौड़ में पिछड़े पश्चिम बंगाल में भी सड़क हादसे न के बराबर बढ़े हैं। यहां 2006 में 11324 सड़क दुर्घटनाएं हुई थी। वर्ष 2009 में यह संख्या घटकर 11134 रह गई। परिवहन विशेषज्ञों का कहना है कि जिन राज्यों में नई सड़कों का निर्माण तो हुआ है लेकिन मौजूदा सड़कों का चौड़ीकरण तथा यातायात व्यवस्थाओं में सुधार के इंतजाम नहीं हुए हैं, वहां दुर्घटनाओं का ग्राफ बढ़ा है। जिन विकसित राज्यों में अच्छी सड़कें और ज्यादा वाहन हैं और दुर्घटनाएं भी काफी होती हैं, वहां सड़कों के चौड़ीकरण और यातायात व्यवस्थाओं पर ध्यान दिए जाने से दुर्घटनाओं में कमी आई है। दिल्ली इसका सबसे बढि़या उदाहरण है, जहां राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान हुए सड़क चौड़ीकरण, बेहतर बस बेड़े और यातायात नियमों का सख्ती से पालन के कारण दुर्घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। वहीं पश्चिम बंगाल में दुर्घटनाएं घटने का कारण खराब कारोबारी माहौल से यातायात में कमी आना है, न कि यातायात व्यवस्था में सुधार।
Tuesday, May 17, 2011
नौसेना की ताकत बढ़ाने में जुटा भारत
भारत अपनी नौसेना की ताकत में इजाफा करने के मकसद से अगले 20 साल में 101 नए युद्धपोतों पर कुल 4696 करोड़ डॉलर (करीब दो लाख दस हजार करोड़ रुपये) का निवेश करेगा। एक विशेषज्ञ ने यह दावा किया है। नौसेना में युद्धपोतों और अत्याधुनिक हथियारों के अलावा परमाणु पनडुब्बियों को भी शामिल किया जाएगा। अमेरिका की संस्था एएमआइ इंटरनेशनल के उपाध्यक्ष और नौसेना के विशेषज्ञ बॉब नुगेंट का अनुमान है कि इतना बड़ा निवेश करने के बाद भारत परिष्कृत विध्वंसक, नई पीढ़ी और नए रडार के पोत, परमाणु पनडुब्बियां और तेज गति वाले जलयान चाहेगा। नुगेंट यहां 18 से 20 मई तक आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय समुद्री रक्षा प्रदर्शनी एवं सम्मेलन में शिरकत करने आए हैं। उनका कहना है कि नौसेना में भारत का निवेश चीन से भी दोगुना है। फिलहाल चीन 113 युद्धपोतों के लिए 2399 करोड़ डॉलर (करीब एक लाख करोड़ रुपये) का निवेश कर रहा है।भारतीय नौसेना का जोर परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण पर होगा, जबकि चीन की कोशिश विमान वाहक पोत बनाने की होगी। नुगेंट का कहना है कि भारत तेज गति और उच्च तकनीक वाले युद्धक पोत बनाना चाहता है, ताकि मंुबई जैसे आतंकी हमलों को रोका जा सके। 2008 में आतंकवादियों ने समुद्री मार्ग से ही मंुबई में प्रवेश किया था। भारत की महत्वाकांक्षा छह फ्रांसीसी स्कॉर्पियन पनडुब्बी हासिल करने की भी है, लेकिन आगे चलकर सीमित स्थान के कारण इसे छह से तीन भी किया जा सकता है। नौसेना विशेषज्ञों का मानना है कि युद्धपोतों पर भारत का निवेश एशिया- प्रशांत क्षेत्र के निवेश का 27.8 फीसदी होगा। युद्धपोतों को लेकर भारत और चीन का निवेश नाटो एवं रूस के निवेश को भी पीछे छोड़ देगा। नौसेना की ताकत में इजाफा करने के मकसद से आने वाले वर्षो में ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, ताइवान, पाकिस्तान और सिंगापुर भी बड़े पैमाने पर निवेश करेंगे।
Monday, May 16, 2011
Saturday, May 14, 2011
Monday, May 9, 2011
Tuesday, May 3, 2011
मिसाइल बढ़ाएगी धु्रव की ताकत
स्वदेशी धु्रव हेलीकॉप्टरों में दो वर्ष के भीतर मिसाइलें स्थापित करने की संभावना है। यह शस्त्र प्रणाली महत्वाकांक्षी मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत स्थापित होगी। हवा से सतह में वार करने में सक्षम नाग टैंक-रोधी मिसाइल के उन्नत संस्करण हेलीना को रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन विकसित कर रहा है। इसका विकास अंतिम चरण में है। यह 2013 में उपयोगकर्ता के परीक्षण के लिए तैयार हो जाएगी। डीआरडीओ प्रमुख वी. के. सारस्वत ने रविवार को कहा, पहली बार हम ऐसी स्वदेश निर्मित मिसाइल हेलेना विकसित कर रहे हैं जिसे एएलएच धु्रव हेलीकॉप्टर के सशस्त्र संस्करण पर स्थापित किया जाएगा। मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत नाग मिसाइल प्रणाली को उन्नत किया गया है, जिससे दुश्मन के टैंकों पर सात से आठ किलोमीटर की दूरी से भी निशाना साधा जा सकेगा। सारस्वत ने कहा कि सतह आधारित प्रणाली से मिसाइल के शुरुआती परीक्षण सफल रहे और हेलीकॉप्टर के साथ उसके एकीकरण का काम अब शुरू होगा। नाग ऐसी पांच मिसाइल प्रणालियों में से एक है, जिसे समेकित मिसाइल विकास कार्यक्रम के तहत डीआरडीओ ने विकसित किया है। डीआरडीओ कुछ नई मिसाइलों या मौजूदा मिसाइलों की मारक क्षमता बढ़ाने पर भी काम कर रहा है। इस कार्यक्रम के तहत कम दूरी की क्षमता वाली सतह से हवा में वार करने वाली मिसाइल इंटरसेप्शन प्रणाली भी फ्रांस की मिसाइल कंपनी एमबीडीए के सहयोग से विकसित की जानी है जिस पर काम इस वर्ष के अंत से शुरू होगा। सारस्वत ने कहा, सामरिक मिसाइल प्रणाली में हमारा मुख्य मकसद लघु क्षमता वाली सतह से हवा में वार करने वाली प्रणाली है। हम इस कार्यक्रम पर फ्रांस के एमबीडीए के साथ काम करने की कोशिश कर रहे हैं। आठ से नौ किलोमीटर की मारक क्षमता वाली मिसाइलें रूस निर्मित पेचोरा और ओएसए-एके मिसाइल प्रणालियों का स्थान लेंगी जिसका वायुसेना और थलसेना इस्तेमाल कर रही हैं। उन्होंने कहा, हमने इस क्षेत्र में (लघु क्षमता वाली मिसाइल प्रणालियों में) ज्यादा काम नहीं किया है। हमारी (एमबीडीए के साथ) बातचीत चल रही है। उम्मीद है कि इस वर्ष के अंत तक काम शुरू हो जाएगा। भारत सतह से हवा में वार करने वाली आकाश मिसाइल जैसी मध्यम और लंबी मारक क्षमता वाली मिसाइल प्रणालियां विकसित कर चुका है] लेकिन अब तक उसने इसी तरह की लघु क्षमता वाली प्रणालियां विकसित नहीं की थीं। सारस्वत ने इस बारे में कहा, डिजाइन और विकास पूरी तरह स्वदेशी होगा और सिर्फ प्रौद्योगिकी निर्माण जैसी कुछ चीजें भागीदार के जरिए मिलेंगी।
अवैध असलहों का खतरनाक खेल
पंजाब के मानसा में अवैध हथियारों की बरामदगी के बाद से इस कारोबार के कई पहलू सामने आने लगे हैं। अब यह बात जाहिर हो गई है कि मामला केवल नकली हथियारों की खरीद-फरोख्त तक ही सीमित नहीं है। अब तक अकेले पंजाब में ही दो सौ से अधिक नकली हथियार बरामद किए जा चुके हैं। इस धंधे में लगे लोगों के तार नक्सलियों से जुड़े हुए होने की बात तो सामने आ ही चुकी है, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस गिरोह का जुड़ाव आतंकवादियों से भी हो। यह स्थिति केवल जन-धन ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है। इस मामले में जांच की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, लगातार नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस के एक पूर्व कर्मचारी के इसमें शामिल होने की बात तो बिलकुल शुरुआती दौर में ही सामने आ गई थी, अब इसमें अन्य प्रदेशों के भी कुछ पुलिसकर्मियों के शामिल होने की बात सामने आ रही है। पंजाब पुलिस के कुछ कर्मचारी तो पकड़े भी जा चुके हैं और उनसे पूछताछ भी चल रही है। यह मामला केवल नकली हथियारों के निर्माण और अवैध रूप से खरीदे-बेचे जाने तक ही सीमित नहीं है, विभिन्न राज्यों की पुलिस और उनके प्रशासनिक तंत्र के बीच आपसी विश्वास की स्थिति पर भी सवाल उठाता है। जांच के दौरान पता चला कि पंजाब पुलिस से मिली एनओसी के आधार पर हरियाणा पुलिस ने लाइसेंस जारी कर दिए। लेकिन अब पंजाब पुलिस का कहना है कि वह एनओसी ही गलत है। अब सवाल यह है कि जब पुलिस ने एनओसी जारी नहीं किया तो खरीदार को एनओसी मिल कैसे गई? पंजाब के कई गन हाउसों से फर्जी बिल बुकें तथा कई और दस्तावेज इसी जांच के दौरान पहले ही मिल चुके हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बिलों और अन्य दस्तावेजों की यह गिरोह फर्जी एनओसी भी तैयार कर लेता रहा हो। साथ ही, इस आशंका को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि इसमें पुलिस और प्रशासन के कुछ कर्मचारियों का भी हाथ हो। आखिर जिन कागजात के आधार पर दूसरे कागजात भी जारी किए जाते रहे, इतने दिनों तक उन पर कहीं से कोई सवाल क्यों नहीं उठाया गया? महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि चुनावों के दौरान लाइसेंसी हथियार थानों में जमा कराए जाते हैं। निश्चित रूप से इनमें से भी कुछ असलहे तो जमा कराए ही गए होंगे। क्योंकि असलहों के मालिकों को खुद ही यह पता नहीं है कि उनके हथियार नकली हैं। उन्होंने तो इन्हें असली मानकर ज्यादा दाम देकर खरीदा था। पुलिस हथियार जमा या उसे वापस करते समय कितनी सावधानी बरतती है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तब भी इनके असली या नकली होने तथा इनके कागजात को लेकर पुलिस ने कोई सवाल नहीं उठाया। यह केवल पंजाब में होता हो, ऐसा भी नहीं है। सच तो यह है कि पंजाब पुलिस ने मामला जानकारी में आते ही जिस तरह त्वरित गति से कार्रवाई शुरू की है और इस मामले में जैसी निष्पक्षता के साथ काम किया है, उसके लिए वह बधाई की पात्र है। वस्तुस्थिति यह है कि देश के लगभग सभी प्रदेशों में हथियारों को जमा और वापस करने की खानापूरी ऐसे ही की जाती है। अगर केवल इस प्रक्रिया में पूरी सतर्कता बरती जाती तो भी अब तक इस कारोबार का खुलासा दूसरे प्रदेशों में भी हो चुका होता। इस गिरोह की सक्रियता का जाल पंजाब और हरियाणा ही नहीं, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम और उड़ीसा तक फैले होने की जानकारी मिली है। हरियाणा के एक गन हाउस मालिक के बारे में तो हैरतअंगेज जानकारियां मिली हैं। उसके तार नक्सलियों से भी जुड़े हैं। वह नक्सलियों को तमाम असलहे बेच चुका है। पंजाब में नक्सलियों के पांव पसारने की खबरें काफी पहले ही मिल चुकी हैं। अब हरियाणा से उनको हथियारों की सप्लाई की जानकारी खुलने के बाद तो इस आशंका से भी इनकार करना समझदारी नहीं लगती कि यहां भी चोरी-छिपे नक्सलियों की गतिविधियां चल रही हों। कायदे से हरियाणा में पुलिस प्रशासन को इस मामले में सतर्क हो जाना चाहिए। पंजाब में पिछले दिनों यह बात सामने आई थी कि यहां नक्सली भूमिहीनों, मजदूरों आदि को अपने जाल में फंसा रहे हैं। देश के दूसरे प्रांतों में भी वे यही कर रहे हैं। हालात को देखते हुए इस बात की प्रबल आशंका है कि हरियाणा में भी वे भोले-भाले गरीब लोगों को अपने झांसे में लेने की फिराक में हों। सबसे विकट स्थिति उन जगहों की है जहां ऐसे हथियार बनाए जा रहे हैं। फिलहाल इस सिलसिले में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से कुछ लोग गिरफ्तार किए गए हैं। वहां से भारी मात्रा में अवैध असलहों के अलावा विदेशी कंपनियों के नामों की मुहरें भी बरामद की गई हैं। पुलिस को बिहार में भी कुछ ऐसी जगहों की जानकारी मिली है जहां नकली असलहे बनते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जिन जगहों के बारे में जानकारी मिली है और जो लोग पकड़े गए हैं, उनकी संख्या असलियत से काफी कम है। इस संबंध में अगर गंभीरता से खोजबीन की जाए तो शायद कई और ऐसे कारखानों के बारे में जानकारी मिले जहां इस तरह के असलहे बनाए जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर उन जगहों की पुलिस इतने दिनों तक क्या करती रही जहां ये असलहे बनाए जाते रहे हैं? पुलिस की नाक के नीचे यह खतरनाक खेल होता रहा और पुलिस को इसकी खबर तक न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? इसके मूल में दो ही कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि पुलिस को इन बातों की कोई परवाह ही न हो कि उसके क्षेत्र में कहां क्या हो रहा है, या फिर सारा मामला ले-दे कर निबटा दिया जाता रहा हो। ये दोनों ही स्थितियां गंभीर हैं। अवैध असलहों के धंधे का जिस तरह का यह खुलासा हुआ है उससे यह स्पष्ट है कि यह पूरा प्रकरण अकेले किसी एक राज्य की पुलिस के बस का नहीं है। अन्य संबंधित राज्यों की पुलिस को भी इसमें गंभीरता से सहयोग करना होगा। तभी इस संदर्भ में कोई प्रभावी कार्रवाई संभव होगी। अब जरूरत इस बात की है कि पुलिस द्वारा हथियारों के मामले में किसी भी तरह के कागजात जारी करने से पहले सतर्कता बरती जाए। साथ ही, सभी राज्यों की पुलिस के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान की पुख्ता प्रणाली विकसित की जाए। यह प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि एक राज्य की पुलिस द्वारा जारी किए गए कागजात की असलियत जानने में दूसरे राज्य की पुलिस को कोई समय न लगे। जैसे ही जानकारी मांगी जाए, पुलिस तुरंत उपलब्ध करा सके। ताकि संशय में कोई निर्णय न लिया जाए और अगर किसी भी स्तर से कोई लापरवाही या अनियमितता बरती जाए तो जिम्मेदार व्यक्ति की आसानी से पहचान कर उस पर कार्रवाई की जा सके। इसके लिए पुलिस के सूचना तंत्र का हाइटेक होना तथा समन्वय बहुत जरूरी होगा। (लेखक हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
Subscribe to:
Comments (Atom)