पंजाब के मानसा में अवैध हथियारों की बरामदगी के बाद से इस कारोबार के कई पहलू सामने आने लगे हैं। अब यह बात जाहिर हो गई है कि मामला केवल नकली हथियारों की खरीद-फरोख्त तक ही सीमित नहीं है। अब तक अकेले पंजाब में ही दो सौ से अधिक नकली हथियार बरामद किए जा चुके हैं। इस धंधे में लगे लोगों के तार नक्सलियों से जुड़े हुए होने की बात तो सामने आ ही चुकी है, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस गिरोह का जुड़ाव आतंकवादियों से भी हो। यह स्थिति केवल जन-धन ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है। इस मामले में जांच की प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, लगातार नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस के एक पूर्व कर्मचारी के इसमें शामिल होने की बात तो बिलकुल शुरुआती दौर में ही सामने आ गई थी, अब इसमें अन्य प्रदेशों के भी कुछ पुलिसकर्मियों के शामिल होने की बात सामने आ रही है। पंजाब पुलिस के कुछ कर्मचारी तो पकड़े भी जा चुके हैं और उनसे पूछताछ भी चल रही है। यह मामला केवल नकली हथियारों के निर्माण और अवैध रूप से खरीदे-बेचे जाने तक ही सीमित नहीं है, विभिन्न राज्यों की पुलिस और उनके प्रशासनिक तंत्र के बीच आपसी विश्वास की स्थिति पर भी सवाल उठाता है। जांच के दौरान पता चला कि पंजाब पुलिस से मिली एनओसी के आधार पर हरियाणा पुलिस ने लाइसेंस जारी कर दिए। लेकिन अब पंजाब पुलिस का कहना है कि वह एनओसी ही गलत है। अब सवाल यह है कि जब पुलिस ने एनओसी जारी नहीं किया तो खरीदार को एनओसी मिल कैसे गई? पंजाब के कई गन हाउसों से फर्जी बिल बुकें तथा कई और दस्तावेज इसी जांच के दौरान पहले ही मिल चुके हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बिलों और अन्य दस्तावेजों की यह गिरोह फर्जी एनओसी भी तैयार कर लेता रहा हो। साथ ही, इस आशंका को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि इसमें पुलिस और प्रशासन के कुछ कर्मचारियों का भी हाथ हो। आखिर जिन कागजात के आधार पर दूसरे कागजात भी जारी किए जाते रहे, इतने दिनों तक उन पर कहीं से कोई सवाल क्यों नहीं उठाया गया? महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि चुनावों के दौरान लाइसेंसी हथियार थानों में जमा कराए जाते हैं। निश्चित रूप से इनमें से भी कुछ असलहे तो जमा कराए ही गए होंगे। क्योंकि असलहों के मालिकों को खुद ही यह पता नहीं है कि उनके हथियार नकली हैं। उन्होंने तो इन्हें असली मानकर ज्यादा दाम देकर खरीदा था। पुलिस हथियार जमा या उसे वापस करते समय कितनी सावधानी बरतती है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तब भी इनके असली या नकली होने तथा इनके कागजात को लेकर पुलिस ने कोई सवाल नहीं उठाया। यह केवल पंजाब में होता हो, ऐसा भी नहीं है। सच तो यह है कि पंजाब पुलिस ने मामला जानकारी में आते ही जिस तरह त्वरित गति से कार्रवाई शुरू की है और इस मामले में जैसी निष्पक्षता के साथ काम किया है, उसके लिए वह बधाई की पात्र है। वस्तुस्थिति यह है कि देश के लगभग सभी प्रदेशों में हथियारों को जमा और वापस करने की खानापूरी ऐसे ही की जाती है। अगर केवल इस प्रक्रिया में पूरी सतर्कता बरती जाती तो भी अब तक इस कारोबार का खुलासा दूसरे प्रदेशों में भी हो चुका होता। इस गिरोह की सक्रियता का जाल पंजाब और हरियाणा ही नहीं, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम और उड़ीसा तक फैले होने की जानकारी मिली है। हरियाणा के एक गन हाउस मालिक के बारे में तो हैरतअंगेज जानकारियां मिली हैं। उसके तार नक्सलियों से भी जुड़े हैं। वह नक्सलियों को तमाम असलहे बेच चुका है। पंजाब में नक्सलियों के पांव पसारने की खबरें काफी पहले ही मिल चुकी हैं। अब हरियाणा से उनको हथियारों की सप्लाई की जानकारी खुलने के बाद तो इस आशंका से भी इनकार करना समझदारी नहीं लगती कि यहां भी चोरी-छिपे नक्सलियों की गतिविधियां चल रही हों। कायदे से हरियाणा में पुलिस प्रशासन को इस मामले में सतर्क हो जाना चाहिए। पंजाब में पिछले दिनों यह बात सामने आई थी कि यहां नक्सली भूमिहीनों, मजदूरों आदि को अपने जाल में फंसा रहे हैं। देश के दूसरे प्रांतों में भी वे यही कर रहे हैं। हालात को देखते हुए इस बात की प्रबल आशंका है कि हरियाणा में भी वे भोले-भाले गरीब लोगों को अपने झांसे में लेने की फिराक में हों। सबसे विकट स्थिति उन जगहों की है जहां ऐसे हथियार बनाए जा रहे हैं। फिलहाल इस सिलसिले में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से कुछ लोग गिरफ्तार किए गए हैं। वहां से भारी मात्रा में अवैध असलहों के अलावा विदेशी कंपनियों के नामों की मुहरें भी बरामद की गई हैं। पुलिस को बिहार में भी कुछ ऐसी जगहों की जानकारी मिली है जहां नकली असलहे बनते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि जिन जगहों के बारे में जानकारी मिली है और जो लोग पकड़े गए हैं, उनकी संख्या असलियत से काफी कम है। इस संबंध में अगर गंभीरता से खोजबीन की जाए तो शायद कई और ऐसे कारखानों के बारे में जानकारी मिले जहां इस तरह के असलहे बनाए जाते हैं। सवाल यह है कि आखिर उन जगहों की पुलिस इतने दिनों तक क्या करती रही जहां ये असलहे बनाए जाते रहे हैं? पुलिस की नाक के नीचे यह खतरनाक खेल होता रहा और पुलिस को इसकी खबर तक न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? इसके मूल में दो ही कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि पुलिस को इन बातों की कोई परवाह ही न हो कि उसके क्षेत्र में कहां क्या हो रहा है, या फिर सारा मामला ले-दे कर निबटा दिया जाता रहा हो। ये दोनों ही स्थितियां गंभीर हैं। अवैध असलहों के धंधे का जिस तरह का यह खुलासा हुआ है उससे यह स्पष्ट है कि यह पूरा प्रकरण अकेले किसी एक राज्य की पुलिस के बस का नहीं है। अन्य संबंधित राज्यों की पुलिस को भी इसमें गंभीरता से सहयोग करना होगा। तभी इस संदर्भ में कोई प्रभावी कार्रवाई संभव होगी। अब जरूरत इस बात की है कि पुलिस द्वारा हथियारों के मामले में किसी भी तरह के कागजात जारी करने से पहले सतर्कता बरती जाए। साथ ही, सभी राज्यों की पुलिस के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान की पुख्ता प्रणाली विकसित की जाए। यह प्रणाली ऐसी होनी चाहिए कि एक राज्य की पुलिस द्वारा जारी किए गए कागजात की असलियत जानने में दूसरे राज्य की पुलिस को कोई समय न लगे। जैसे ही जानकारी मांगी जाए, पुलिस तुरंत उपलब्ध करा सके। ताकि संशय में कोई निर्णय न लिया जाए और अगर किसी भी स्तर से कोई लापरवाही या अनियमितता बरती जाए तो जिम्मेदार व्यक्ति की आसानी से पहचान कर उस पर कार्रवाई की जा सके। इसके लिए पुलिस के सूचना तंत्र का हाइटेक होना तथा समन्वय बहुत जरूरी होगा। (लेखक हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के स्थानीय संपादक हैं)
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