Friday, December 9, 2011

ऐसे हो रही तटों की हिफाजत !

भारतीय तटरक्षक बल के पास मौजूद पोत, नौका, टोही विमान और हेलीकाप्टरों की आधी संख्या एक्सपायरहो चुकी है। उनका येन-केन प्रकार से मरम्मत कर काम चलाया जा रहा है। बल की यह स्थिति तब है, जब वर्ष 2008 में मुंबई पर हुए आंतकी हमले के बाद सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे। बल के पास इस समय 45 पोत, 27 नौकाएं, 28 डोर्नियर टोही विमान, 20 चीता और चार ध्रुव हेलीकाप्टर हैं। मुंबई हमलों के बाद तटीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने के प्रयासों की धीमी गति पर चिंता जाहिर करते हुए संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने कहा कि तटरक्षक बल का ढांचा पर्याप्त रूप से शक्तिशाली नहीं है। समिति के अध्यक्ष सतपाल महराज ने बृहस्पतिवार को संसद में रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में कहा गया कि मुंबई हमले के बाद तटरक्षक संगठन की क्षमता को उन्नत बनाने की प्रगति काफी धीमी है जबकि इसे काफी तेज गति से होना चाहिए था। तटरक्षक बल में अपेक्षित और मौजूदा बल स्तर में काफी अंतर है। 26/11 हमलों के बाद की अनुमानित आवश्यकता 154 पोत और 93 नौकाओं की थी जबकि तटरक्षक बल के पास वर्तमान में 45 पोत और 27 नौकाएं ही हैं। समिति ने यह भी कहा कि तटरक्षक संगठन को आवश्यक आवंटन उपलब्ध कराया जाए ताकि अपेक्षित और मौजूदा क्षमता के बीच अंतर को पाटा जा सके। समिति ने डॉनियर टोही विमानों और चेतक हेलीकाप्टरों के मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए रक्षा मंत्रालय से जानना चाहा कि क्या उसने इनके बेकार पड़े होने के कारणों का पता लगाने का प्रयास किया है। रिपोर्ट में कहा गया कि तटरक्षक बल के पोतों समर और संग्राम का सुपर रैपिड गन माउंटिंग पांच साल से काम नहीं कर रहा है और इस बल के विमानों और हेलीकाप्टरों का एक चौथाई बेड़ा भारी मरम्मत के दौर से गुजर रहा है। समिति ने इस पर भी खेद जाहिर किया है कि तटरक्षक बल के पास बड़ी संख्या में उपकरण, हेलिकाप्टर और वायुयान बेकार पड़े हैं और उनकी मरम्मत की प्रक्रि या बहुत ही धीमी है। डॉनियर औरचेतक हेलिकाप्टरों की मौजूदा संख्या क्र मश: 28 और 20 है जिसमें से बेड़े के एक चौथाई हिस्से की प्रमुख रूप से मरम्मत चल रही है। तटीय सुरक्षा के पहले और दूसरे चरण की परियोजनाएं देरी से चल रही हैं। ऐसे में तटवर्ती इलाकों की गश्त और निगरानी बढ़ाने की सख्त जरूरत है। यह खेदजनक ही है कि पिछले चार साल में तटरक्षक बल में महज दो जहाज और छह नौकाएं ही नई आई हैं। बांग्लादेशियों को रोकने के लिए कोलकाता में तटरक्षक मुख्यालय खोलने की सिफारिश बांग्लादेश से शरणार्थियों का तांता रोकने और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के मकसद से समिति ने भारतीय तटरक्षक बल का नया पूर्वोत्तर मुख्यालय खोलने की पुरजोर सिफारिश की है। समिति ने रिपोर्ट में कहा कि समुद्र से जुड़े ओडिशा और पश्चिम बंगाल के लिए कोलकाता में तटरक्षक बल का क्षेत्रीय मुख्यालय खोलने की सख्त जरूरत है और सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए। समिति ने कहा कि इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर शरणार्थियों की घुसपैठ हो रही है और राष्ट्र विरोधी गतिविधियां भी फल फूल रही हैं। इसके अलावा इन दो समुद्र तटीय राज्यों में समुद्री संपदा का खजाना है। उड़ीसा के तटवर्ती इलाके में विलुप्त प्राय कछुओं का बसेरा भी है। इस इलाके में तेल रिसाव का भी जोखिम बना रहता है और दोनों राज्यों के आसपास के समुद्र में दोहन की गतिविधियां भी बड़े पैमाने पर चलती हैं। ऐसे में तटरक्षक बल का क्षेत्रीय मुख्यालय कोलकाता में खोलने की सख्त जरूरत महसूस की जा रही है।

Wednesday, November 30, 2011

पाक से आधी रह गई घुसपैठ


अफगान-पाकिस्तान सीमा पर बढ़ी तपिश का प्रभाव भारत-पाकिस्तान सीमा पर साफ दिखने लगा है। पिछले एक साल में भारत-पाकिस्तान सीमा पर गोलीबारी, घुसपैठ से लेकर नकली भारतीय नोटों और मादक पदार्थो की तस्करी की घटनाएं लगभग आधी रह गई हैं। एक साल के भीतर इन घटनाओं में यह सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है। सीमा सुरक्षा बल द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2010 में पाकिस्तानी सेना की ओर से गोलीबारी की 87 वारदात हुई थीं, जो 2011 में घटकर मात्र 32 रह गई। आतंकी घुसपैठ की घटनाएं भी पिछले साल के 119 के मुकाबले मात्र 65 ही रिकॉर्ड की गई हैं। सीमा पर लगे बाड़ तोड़कर घुसपैठ की कोशिश हर साल की जाती है। 2010 में ऐसी पांच कोशिशें हुई थीं, पर 2011 में केवल दो ही हुर्ई। सीमा पर वारदातों में यह कमी सिर्फ सीमा पर गोलीबारी और आतंकियों की घुसपैठ तक सीमित नहीं है। मादक पदार्थो और नकली भारतीय नोटों की तस्करी की घटनाओं में भी अहम गिरावट दर्ज की गई है। पिछले साल के दौरान जहां बीएसएफ ने 105 किलो हीरोइन जब्त की थी, वहीं 2011 में केवल 59 किलो जब्त हुई है। इसी तरह 2010 में एक करोड़ 38 लाख रुपये के नकली भारतीय नोट पकड़े गए थे, जो 2011 में 25 लाख रुपये से भी कम रह गए हैं। सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े अधिकारी भारत-पाकिस्तान सीमा पर इन वारदात में जबरदस्त कमी के पीछे पाकिस्तान की अफगानिस्तान सीमा पर बढ़ी मुश्किलों को मान रहे हैं। अंदरूनी परेशानियों और पाकिस्तानी तालिबानियों से मिल रही चुनौतियों के कारण पाक सेना की भारत विरोधी मुहिम कमजोर पड़ी है। वैसे 2011 के उपलब्ध आंकड़े 31 अक्टूबर तक के हैं, पर अगले दो महीने में इसमें ज्यादा बदलाव की उम्मीद नहीं है। सर्दी के मौसम में वैसे भी भारत-पाक सीमा पर अपेक्षाकृत शांति रहती है। इस दौरान भारतीय सेना ने भी घुसपैठ की कई कोशिशें नाकाम की हैं।

Friday, October 14, 2011

हथियारों के जरिये शांति खोजने का छद्म


संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस बार 21 सितंबर की थीम रखी थी पीस एंड डेमोके्रसी: मेक योर वॉइस हर्ड यानी शांति और लोकतंत्र: अपनी आवाज सुनाओ या सुनने योग्य बनाओ। लेकिन कैसे? हथियारों की शक्ति के जरिये या लोगों की शक्ति के माध्यम से। जिस तरह की विशेषता आज दिख रही है, उससे तो उत्तर हथियारों की शक्ति के जरिये ज्यादा सटीक लगता है। लेकिन उस स्थिति में यह वाक्य केवल आदर्श की सीमाओं तक ही सीमित रहेगा या फिर उसका अर्थ कुछ भिन्न होगा। मानव मूल्यों की रक्षा करने के लिए दुनिया में शांति और लोकतंत्र की जरूरत है, लेकिन कटु सत्य तो यह है कि ये दोनों ही खतरे की ओर खिसकते जा रहे हैं? वैश्विक हथियारों के हस्तांतरण समझौते संबंधी वर्ष 2003-2010 के लिए अमेरिकी कांग्रेस द्वारा जारी एक रिपोर्ट को देखकर एक बात तो स्पष्ट हो गई कि विकासशील देश परंपरागत हथियारों को जमा करने की तीव्र प्रतिस्पद्र्धा से गुजर रहे हैं। इसलिए संभव है कि वे उन मूलभूत आवश्यकताओं से मुंह मोड़ रहे हों, जो लोकतंत्र का स्वस्थ रखने के लिए जरूरी हैं। यह भी संभव है कि इस होड़ में शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के सिद्धांत को भी नुकसान पहुंच रहा हो। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका, रूस और यूरोपीय देश विकासशील दुनिया में हथियारों की बाजारों पर कब्जा करने के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा में हैं, जो बीच-बीच में शांति के पैरोकार होने का एहसास दिलाने कोशिश करते रहते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर ये सब चाहते क्या हैं। अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2003 से 2010 के बीच विकासशील देशों में हथियार खरीद के मामले में सऊदी अरब ने सबको पीछे छोड़ दिया। इस दौर में उसने 29 अरब डॉलर के हथियार खरीदे और भारत दूसरे स्थान पर रहा। इसके बाद फिर चीन, मिस्त्र और इजराइल जैसे देशों का स्थान आता है। हालांकि चीन और इजराइल केवल खरीददार ही नहीं रहे, बल्कि विक्रेता की भूमिका में भी हैं। इसलिए उनकी स्थिति और भी जटिल है। अगर केवल 2010 की बात की जाए तो फिर इस वर्ष पारंपरिक हथियारों की खरीद के मामले में विकासशील देशों में भारत पहले स्थान पर रहा, क्योंकि रिपोर्ट के मुताबिक भारत के साथ हथियारों के 5.8 अरब डॉलर के समझौते के लिए कई देश कोशिश कर रहे थे। दूसरे स्थान पर ताइवान रहा, जिसने इस वर्ष 2.7 अरब डॉलर के हथियारों की खरीद की। इसके बाद सऊदी अरब का नंबर आता है, जिसने 2.2 अरब डॉलर कीमत के हथियार खरीदे। भारत के पड़ोसी और सर्वाधिक प्रतिस्प‌र्द्धी राष्ट्रों में से एक पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब के बराबर ही हथियारों का सौदा संपन्न किया। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2003-2010 में विकासशील दुनिया में निकट पूर्व सबसे बड़ा हथियार बाजार रहा। यद्यपि 2003-2006 में यह क्षेत्र कुल मूल्य के 42.3 प्रतिशत (49.4 अरब डॉलर) के साथ दूसरे स्थान पर रहा था और एशिया क्षेत्र 47.2 प्रतिशत (55.1 अरब डॉलर) के साथ पहले स्थान पर रहा, लेकिन 2007 से 2010 के लिए यह स्थिति बदल गई और निकट पूर्व क्षेत्र 51.1 प्रतिशत (91.3 अरब डॉलर) के साथ पहले स्थान पर पहुंच गया। इस रिपोर्ट में निकट पूर्व के देशों में अल्जीरिया, बहरीन, मिस्त्र, ईरान, इजराइल, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, लीबिया, मोरक्को, ओमान, कतर, सऊदी अरब, सीरिया, ट्यूनीशिया, यूनाइटेड अरब अमीरात और यमन को शामिल किया गया है। इसमें ट्यूनीशिया, सीरिया, लीबिया आदि वे देश हैं, जहां जनआंदोलनों के जरिये सत्ताधारियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है और कुछ देश ऐसे हैं, जहां या तो सत्ता के खिलाफ संघर्ष जारी है या फिर ऐसे आंदोलनों की सुगबुगाहट है। एशिया में कुछ विकासशील देश अपने रक्षा बलों को आधुनिकीकृत करने में लगे हुए हंै। इस कारण से इस क्षेत्र में परंपरागत हथियारों की मांग लगतार बढ़ रही है। पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया भी इस मामले में पीछे नहीं है। वर्ष 2007 से 2010 तक संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस विकासशील दुनिया के हथियार बाजार पर हावी रहे और हथियार हस्तांतरण के मामले में इन चार वर्षो के प्रत्येक वर्ष में पहले या दूसरे स्थान पर बने रहे। वर्ष 2007-10 में अमेरिका ने लगभग 72 अरब डॉलर के हथियार सौदे संपन्न किए और रूस ने 37.1 अरब डॉलर के। दोनों ने कुल हथियार सौदों के 60.8 प्रतिशत पर कब्जा किया। वर्ष 2010 में तो अमेरिका ने अकेले ही वैश्विक हथियार हस्तांतरण के 52.7 पर कब्जा करने में सफलता प्राप्त की, जबकि रूस 19.3 प्रतिशत पर ही कब्जा कर पाया। लेकिन फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और इटली का हिस्सा अपेक्षाकृत कम रहा। लेकिन इस दौरान एक बात देखने को मिली, जिससे भविष्य में खेमेबंदी या फिर अस्वस्थ प्रतियोगिता शुरू होने की आशंका बनती है। उदाहरण के तौर पर भारत, चीन या फिर कुछ अन्य एशियाई देशों को लिया जा सकता है। रूस 1990 के दशक के मध्य से चीन के लिए एक दशक तक फाइटर्स, विध्वंसक और मिसाइलों की आपूर्ति के साथ-साथ आधुनिकीकृत परंपरागत हथियारों का आपूर्तिकर्ता बना रहा, जबकि भारत के लिए यह प्रमुख आपूर्तिकर्ता था। इन देशों को ही आपूर्ति करने से रूस एशिया में हथियार आपूर्तिकर्ता के मामले में प्रथम श्रेणी में बना रहा, लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है। चीन कमोबेश हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर हो रहा है और भारत ने अपनी वरीयता को बदल दिया है। उल्लेखनीय है कि भारत ने 2004 में इजराइल के साथ फॉल्कन सौदा किया और 2005 में फ्रांस से कुछ हथियार खासकर छह स्कॉपेन डीजल अटैक सबमैरिन खरीदे। वर्ष 2008 में उसने ने छह सी130 जे कार्गो एयरक्रॉफ्ट अमेरिका से खरीदे। वर्ष 2010 में उसने ब्रिटेन के साथ 57 हॉक जेट ट्रेनर्स का 1 अरब डॉलर में सौदा किया। इसी वर्ष इटली ने भारत को 12 एडब्ल्यू 101 हेलीकॉप्टर बेचे। भारत द्वारा हथियारों की खरीद का यह तरीका और उसकी बदली हुई वरीयता बताती है कि भारतीय हथियार बाजार में अब रूस अपनी परंपरा से बाहर हो चुका है। जो भी हो, अब यह सोचना होगा कि शांति और लोकतंत्र के लिए जरूरी क्या है? क्या परंपरागत हथियारों का ढेर लोगों को पूरी सुरक्षा दे पाने सक्षम है? आज कितने लोग इस तरह की असुरक्षा में दम तोड़ते हैं और कितने मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं के उपलब्ध न होने के कारण। भारत सहित दुनिया भर के विकासशील देश इस समय परंपरागत हथियार जिनमें कॉम्बैट फाइटर एअरक्रॉफ्ट, सबमैरिन, डेस्ट्रॉयर, मिसाइलें, हॉक जेट ट्रेनर्स, कार्गो एयरक्रॉफ्ट, अवॉक्स एयरबोर्न राडार सिस्टम तथा उनकी अपग्रेडिंग तकनीक आदि को प्राप्त करने के लिए जेहादी रुख अपनाए हुए हैं। क्या इससे शांति प्राप्त हो सकती है? मजे की बात यह है कि दुनिया भर में आर्थिक मंदी और स्टैगफ्लेशन जैसी स्थिति के बावजूद वर्ष 2007-2010 में वर्ष 2003-2006 के मुकाबले हथियारों के बाजार में 15.2 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। क्या यह रास्ता उचित है? जहां तक विक्रेताओं का सवाल है तो उनकी स्थिति बहुत जटिल है, जिसमें वे किसी भी तरह से अपनी आंतरिक व्यवस्था के साथ साम्य बनाए रखना चाहते हैं। दरअसल कुछ भू-राजनीतिक या भू-सामरिक रणनीतियों ने भी शस्त्रों की प्रतिस्पद्र्धा को बढ़ाया। उदाहरण के तौर पर भारत के लिए चीन और पाकिस्तान ने ये स्थितियां पैदा कीं। ताइवान के लिए चीन पूरी तरह से जिम्मेदार बना। सऊदी अरब के लिए ईरान को उत्तरदायी माना जा सकता है। हालांकि निकट-पूर्व के देशों में स्थिति इससे भिन्न है, क्योंकि उन्हें हमेशा ही भू-क्षेत्रीय या भू-सामरिक संकट पैदा होने का संदेह बना रहता है। ऐसी परंपरा, जो हथियारों की खरीद-बिक्री का कार्य कर रही हो, उससे आखिर किस तरह से शांति लाई जा सकती है? अब संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया के तमाम देशों को इस पर विचार करने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Wednesday, August 17, 2011

To get Kim Davy extradited, Delhi puts Denmark ties in deep freeze


Save for diplomatic presence, India has decided to shun all relations with Denmark to put pressure on Copenhagen to pursue the extradition of Purulia armsdrop mastermind Kim Davy.
Sources said a decision has been taken to “stall” economic activities with Copenhagen and even decline meeting its officials following an advisory from Secretary (West) Vivek Katju in the Ministry of External Affairs.
While the Home Ministry has sent a circular to all sections to collate “pending references with Denmark”, the Finance Ministry has issued a communiqué on “MEA’s instructions relating to Danish projects” with the directive that all agreements and projects with that country be conducted only after “prior consultations with the MEA”.
Katju’s letter to select ministries on August 3 says that Denmark’s relationship with India was at its lowest ebb following its refusal to pursue Davy’s extradition and that India must reciprocate by not entertaining that country at any level. His letter says that India must reciprocate Denmark’s non-cooperation in refusing to contest its high court’s verdict in the country’s Supreme Court.
As a result of strenuous diplomatic efforts by the Government, the Danish Government agreed to extradite Davy in April 2010 even though the two do not have an extradition treaty between them.
Davy appealed against the decision in the City Court which ruled against the extradition on November 1, 2010. The City Court’s decision was immediately appealed against by the Danish Government but the Eastern Court ruled on June 30 upholding the judgment of the City Court against the extradition.
The grounds cited by the Danish Court were possible violation of human rights in police and prison custody in India and the fact that India has not ratified the UN Convention against torture and inhuman punishment.
Home Minister P Chidambaram termed the verdict “disappointing.” He said the apprehensions were completely unfounded and that if Davy was extradited, he would be tried in an open court and would be produced before the court every day where he could complain to the judge if he needed to be medically examined or if there was any violation of human rights.
On July 6, Chidambaram had said that he wrote to External Affairs Minister S M Krishna requesting him to impress upon Denmark in the “strongest terms” that they must file an appeal and try to get a verdict which would enable Davy’s extradition to India. However, a day later, Danish Director of Public Prosecution announced the decision not to appeal.
Davy is accused of dropping sophisticated arms, including AK-47 assault rifles, anti-tank grenades, from a foreign plane on the fields of Purulia in West Bengal on the night of December 17, 1995. An Interpol Red Corner Notice was issued against him in 1996 on the CBI’s request.



Friday, August 12, 2011

रक्षामंत्री ने कसे तटीय सुरक्षा इंतजामों के तार


नई दिल्ली सुरक्षा इंतजामों को ठेंगा दिखा भारत की समुद्री सीमा में हो रही सेंध की घटनाओं से हरकत में आए रक्षा मंत्रालय ने अब कील-कांटे कसने शुरू किए हैं। तटीय सुरक्षा इंतजामों की समीक्षा बैठक में बुधवार को नौसेना और तटरक्षक बल के आला अफसर रक्षामंत्री एके एंटनी के सवालों से मुखातिब थे। रक्षामंत्री ने तटरेखा की हिफाजत के लिए नौसेना व तटरक्षक बल को हर उपलब्ध उपाय के जरिये लोगों का भरोसा कायम रखने की हिदायत दी। साथ ही ताकीद की कि किसी भी सूरत में एमवी पावित के मुंबई तट पहुंचने जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो। इस कड़ी में एक महीने के भीतर तटरेखा पर रडार नेटवर्क स्थापित करने की योजना को भी हरी झंडी मिल गई है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक भारत के समुद्र तट पर 46 रडार लगाने की इस परियोजना पर एक महीने के भीतर काम शुरू हो जाएगा और साल भर के भीतर यह पूरा हो जाएगा। मंत्रालय प्रवक्ता सितांशु कार के अनुसार इस योजना के तहत मुख्य भूमि पर 36, लक्षद्वीप व मिनिकॉय में छह और अंडमान-निकोबार में चार रडार लगाए जाएंगे। साथ ही नौसेना और तटरक्षक बल को 51 केंद्रों को जोड़ने वाली योजना के भी अगले साल तक पूरा होने की उम्मीद है। रक्षामंत्री द्वारा बुलाई गई इस बैठक में 26/11 आतंकी हमले के बाद तटीय सुरक्षा के किए जा रहे इंतजामों की समीक्षा की गई। नौसेना प्रमुख एडमिरल निर्मल वर्मा, तटरक्षक बल के मुखिया वाइस एडमिरल अनिल चोपड़ा, रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा समेत अनेक आला अधिकारी के साथ हुई इस बैठक में नौ अतिरिक्त तट रक्षक स्टेशनों की स्थापना की परियोजना को रफ्तार देते हुए अगले साल तक चार स्टेशन बनाने का भी निर्णय हुआ। सूत्रों के मुताबिक बैठक में नौसेना और तटरक्षक बल ने एमवी पावित जहाज के भारतीय समुद्री सीमा में दाखिल होने के पूरे घटनाक्रम पर भी रक्षामंत्री को स्पष्टीकरण दिया। सूत्र बताते हैं कि सामान्य जहाज के मुकाबले इस पोत की बेहद धीमी रफ्तार ने जहां इसके मछुआरा नौका होने का भ्रम पैदा किया, वहीं खराब मौसम के कारण कुछ निगरानी उड़ानों के निरस्त होने ने इस मानव विहीन और खाली जहाज को मुंबई तक पहुंचने का मौका दे दिया। वहीं मछुआरों से भारतीय सीमा में इस जहाज के होने की सूचना मिलने पर भी 12 घंटे तक कार्रवाई नहीं हो सकी। उल्लेखनीय है कि गत सप्ताह नियंत्रक महालेखा परीक्षक कैग ने भी अपनी एक रिपोर्ट में तटीय सुरक्षा चुनौतियों के मुकाबले तटरक्षक बल की तैयारियों पर सवाल उठाए थे। बैठक में नौसेना और तटरक्षक बल की ओर से समुद्र तट की सुरक्षा के लिए अपनी तैनाती का भी ब्योरा दिया गया। रक्षा मंत्रालय के अनुसार फरवरी 2009 के बाद तटरक्षा में नौसेना पोतों की तैनाती में 60 से 80 फीसदी और हवाई उड़ानों में 100 प्रतिशत बढ़ोतरी की गई है।


ब्लैकबेरी ने बढ़ाई भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता


नई दिल्ली लंदन दंगों को भड़काने में हुए ब्लैकबेरी फोन के इस्तेमाल को देख भारत की सुरक्षा एजेंसियों के कान एक बार फिर खड़े हो गए हैं। कई तरह के आंतरिक और बाहरी खतरों से जूझ रहे भारत जैसे देश में राष्ट्र विरोधी ताकतों की ओर से इसके इस्तेमाल के खतरे को देखते हुए दूरसंचार विभाग पर इसके खिलाफ कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है। खुफिया ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, भारत में कम से कम 11 लाख लोगों के पास ऐसा आधुनिक संचार उपकरण है, जिस पर देश की कोई एजेंसी किसी तरह की निगरानी नहीं कर सकती। यह हमारे देश की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा हो सकता है। वे आश्चर्य जताते हैं कि आखिर ऐसे गंभीर मामले से निपटने में इतनी देरी क्यों हो रही है। खुफिया एजेंसियों की शिकायत पर पिछले साल जुलाई से ही गृह मंत्रालय कई बार ब्लैकबेरी सेवा देने वाली कनाडा की कंपनी रिसर्च इन मोशन (रिम) को संपर्क कर चुका है। इसके बाद पिछले साल के अंत में इन मोबाइल के जरिए भेजे जाने वाले सामान्य ई-मेल को तो खुफिया एजेंसियों की निगरानी के लिए उपलब्ध करवा दिया गया है, लेकिन ब्लैकबेरी फोन पर उपलब्ध ब्लैकबेरी मैसेंजर और ब्लैकबेरी एंटरप्राइज सैल्यूशन सेवा अब भी पूरी तरह से निगरानी के बाहर हैं। यानी इनके जरिए क्या संदेश भेजे जा रहे हैं, उन्हें कोई एजेंसी नहीं पकड़ सकती। खास बात है कि संसद के इसी सत्र में पेश की गई सूचना तकनीकी स्तर पर स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी दूरसंचार विभाग की इस कोताही के लिए उसकी जमकर खिंचाई की गई है। संसदीय समिति ने देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर इस कनाडाई कंपनी को इतनी बार मोहलत दिए जाने पर सख्त एतराज दर्ज किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दूरसंचार विभाग ने रिम को तीन बार नोटिस जारी किया। लेकिन हर नोटिस की समय सीमा खत्म होने से पहले ही इसे आगे बढ़ाया जाता रहा। आखिरी नोटिस पर भी रिम की ओर से कोई कदम नहीं उठाए जाने के बावजूद दूरसंचार विभाग ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। बल्कि एनक्रिप्शन के मामले पर विचार करने के लिए एक समिति गठित कर दी। संसदीय समिति ने इसे भी सिर्फ टालने का तरीका भर माना है।



Thursday, August 4, 2011

अमेरिका की एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पूरी दुनिया में भारत सरकार


:, संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका की रक्षा कंपनियों के नेटवर्क अब तक सबसे ज्यादा साइबर हमलों के शिकार हुए हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों ने इसके लिए चीन की तरफ इशारा किया है। उल्लेखनीय है कि इसके अलावा भी हैकिंग मामलों में अक्सर चीनी हैकरों का हाथ होने की बात सामने आती है। अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने एंटी वायरस सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी मैक एफी की रिपोर्ट के हवाले से यह जानकारी दी है। उसने बताया है कि पांच साल की अवधि में हुए इन हमलों में मुख्य रूप से शिकार बनी 72 संस्थाओं की जानकारी जुटाई गई है। इनमें भारत सरकार, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों के संघ आसियान और आइओसी भी शामिल हैं। जिन संस्थानों और कंपनियों के नेटवर्क में सेंध लगाई गई है, उनमें जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ का सचिवालय, अमेरिका के ऊर्जा विभाग की प्रयोगशाला और नई हथियार प्रणाली तैयार करने में लगी 12 प्रमुख अमेरिकी रक्षा कंपनियां हैं। कंपनियों के नाम नहीं बताए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि साइबर हमलों के पीछे किसी एक देश के हैकर जिम्मेदार हो सकते हैं। हालांकि इसमें किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। उधर, सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार सबूत चीन की तरफ इशारा करते हैं। मैक एफी के उपाध्यक्ष दिमित्री एल्परोवित्च ने 14 पन्नों की रिपोर्ट में कहा है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि साइबर हमले से जुटाए गए आंकड़ों का हैकरों ने क्या किया? इसके गलत हाथों में पड़ने से बड़ा खतरा उत्पन्न हो सकता है। हालांकि पश्चिमी देश इस ओर कवायद शुरू कर रहे हैं, लेकिन अभी तक उन्हें कोई ठोस सफलता नहीं मिल सकी है।