Friday, June 17, 2011

सेना में शामिल होंगे १६ हजार अफसर


अमेरिकी 3डी प्रौद्यौगिकी से लैस होगी हमारी पुलिस


भारत में पुलिस के आधुनिकीकरण के प्रयासों की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। अमेरिका ने पुलिस के लिए भारत को 3डी प्रौद्यौगिकी उपलब्ध कराने का वादा किया है। पिछले महीने गृह मंत्री पी. चिदंबरम और अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा मंत्री जैनेट नेपोलिटानो के बीच सुरक्षा के संबंध में हुई बातचीत के दौरान इस बारे में सहमति बनी थी। इसके प्रयोग से पुलिस के लिए लक्ष्य तक पहंुचना आसान हो जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अमेरिका से प्राप्त होने वाली इस प्रौद्यौगिकी को सरदार वल्लभभाई पटेल नेशनल पुलिस एकेडमी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे युवा अधिकारियों को उपलब्ध कराया जाएगा। इस नवीनतम प्रौद्यौगिकी को प्राप्त करने के बाद एकेडमी में आतंकी हमलों की आशंका वाले महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के 3डी चित्रों वाला पुस्तकालय स्थापित किया जाएगा। इससे इमारत में लोगों को बंधक बनाए जाने के मामले से निपटने के लिए पुलिस को प्रशिक्षण देने में मदद मिलेगी। एक अधिकारी का कहना है कि नवंबर 2008 में मुंबई के ताज होटल पर हुए हमले के दौरान यदि पुलिस को इसके 3डी चित्र उपलब्ध रहते तो वह आसानी से इसमें छिपे आतंकियों तक पहंुच सकती थी। इसके अभाव में पुलिस बहुत देर तक होटल के बरामदे पर घूमती रही।


Thursday, June 16, 2011

अमेरिकी 3डी प्रौद्यौगिकी से लैस होगी हमारी पुलिस


भारत में पुलिस के आधुनिकीकरण के प्रयासों की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। अमेरिका ने पुलिस के लिए भारत को 3डी प्रौद्यौगिकी उपलब्ध कराने का वादा किया है। पिछले महीने गृह मंत्री पी. चिदंबरम और अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा मंत्री जैनेट नेपोलिटानो के बीच सुरक्षा के संबंध में हुई बातचीत के दौरान इस बारे में सहमति बनी थी। इसके प्रयोग से पुलिस के लिए लक्ष्य तक पहंुचना आसान हो जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अमेरिका से प्राप्त होने वाली इस प्रौद्यौगिकी को सरदार वल्लभभाई पटेल नेशनल पुलिस एकेडमी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे युवा अधिकारियों को उपलब्ध कराया जाएगा। इस नवीनतम प्रौद्यौगिकी को प्राप्त करने के बाद एकेडमी में आतंकी हमलों की आशंका वाले महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के 3डी चित्रों वाला पुस्तकालय स्थापित किया जाएगा। इससे इमारत में लोगों को बंधक बनाए जाने के मामले से निपटने के लिए पुलिस को प्रशिक्षण देने में मदद मिलेगी। एक अधिकारी का कहना है कि नवंबर 2008 में मुंबई के ताज होटल पर हुए हमले के दौरान यदि पुलिस को इसके 3डी चित्र उपलब्ध रहते तो वह आसानी से इसमें छिपे आतंकियों तक पहंुच सकती थी। इसके अभाव में पुलिस बहुत देर तक होटल के बरामदे पर घूमती रही।

Wednesday, June 15, 2011

पहले पुख्ता हो सरहदों की चौकसी


ऊपरी तौर पर अमेरिका भले वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ जंग की बात करे या इस मुहिम में साथ होने का दावा करे, लेकिन वास्तव उसे सिर्फ अपने घर की फिक्र है। इस मामले में चीन की भूमिका तो शुरू से ही संदेह के घेरे में है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आतंकवाद से लड़ाई की मुहिम में भारत अकेला है। भारत का दर्द उसका अपना है। ऐसे हालात में उपाय भी उसके अपने होंगे। इस कड़ी में भारत को पाकिस्तान और चीन से लगी सरहदों पर सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रखनी होगी। नापाक इरादों वाले पड़ोसी देशों से घिरे भारत में सेंध लगाने के कई ठिकाने हैं। लूप-होल्स हैं, जहां हमारी सुरक्षा ढांचा और सुरक्षा नीति में कई महत्वपूर्ण खामियां दिखाई देती हैं। भारत की जमीनी सीमाएं 15,000 किलोमीटर की दूरी तक फैली हुई हैं। समुद्री सीमाओं का विस्तार 7,683 किलोमीटर तक का है। सीमाएं मुख्यत: सात महत्वपूर्ण पड़ोसी देशों के साथ मिलती हैं। इनमें से तकरीबन हर देश में भारत विरोधी दस्ते अपनी क्षमता के अनुसार सक्रिय हैं। भारत के भीतर सीमाओं की सुरक्षा का बंदोबस्त विकेंद्रित सोच पर आधारित है। कई मंत्रालय और अनेक सैन्य टुकडि़यां इस काम में जुटी हुई हैं। दुखद स्थिति यह है कि सैन्य और अ‌र्द्ध सैन्य बलों की टुकडि़यों को एक सूत्र में बांधने का काम नहीं हो पाता। संकट की स्थिति में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस असमंजस का भुक्तभोगी होता है राष्ट्र। मुंबई हमला इस ढांचे का ज्वलंत उदाहरण है। अंदरूनी हकीकत यह है कि हमारी लंबी और दूर तक फैली सरहदों की सुरक्षा कई क्षेत्रों में सामूहिक उत्तरदायित्व के तहत बंधी हुई है। इस सामूहिक ढांचे में सेना, अ‌र्द्धसैनिक बल, पुलिस व्यवस्था और अन्य कई सुरक्षादल सम्मिलित हैं। दरअसल, हर सेना का संचालन और दिशा-निर्देश अलग-अलग मंत्रालयों के द्वारा किया जाता है। मसलन, चीन के साथ हमारी बहुआयामी सीमाओं की सुरक्षा व्यवस्था इस ढांचे में मौजूद खामियों को बखूबी दर्शाती है। वास्तविक सीमा नियंत्रण रेखा के पश्चिमी हिस्से में सियाचिन ग्लैशियर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश का हिस्सा आया है। मध्य रेखा उत्तराखंड के हिस्से में पड़ती है। इन सीमाओं की सुरक्षा का जिम्मा एक विशेष सीमा सुरक्षा फ्रंटियर फोर्स के द्वारा किया जाता है। यह टुकड़ी कैबिनेट सचिव द्वारा संचालित होती है यानी इसका माई-बाप कैबिनेट सचिव होता है। दूसरी ओर भारत-चीन सीमा पर चौकसी का जिम्मा आइटीबीपी के हाथों में होता है। यह टुकड़ी गृह मंत्रालय द्वारा संचालित होती है। सिक्किम के मुहाने पर सुरक्षा की देखभाल भारतीय सेना द्वारा होती है, जिसका कमांडर रक्षामंत्री होता है। दरअसल, चीन की सीमा के अलग-अलग कोणों पर भारत के विभिन्न अ‌र्द्धसैनिक बल, राज्य पुलिस और सेना तीनों भिन्न-भिन्न ढंग से लगे हुए हैं। असम राइफल्स और अन्य अ‌र्द्धसैनिक बल गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं। ये अ‌र्द्धसैनिक बल सीमाओं पर सेना की मदद के लिए तैनात हैं, लेकिन आधिकारिक रूप से ये सेना के अधीन नहीं हैं। यही कारण है कि विखंडित और विकेंद्रित सेनाओं के बीच कोई तारतम्य नहीं है। आपातकालीन परिस्थितियों में ये अपने-अपने आकाओं के आदेश के इंतजार में शिथिल पड़ जाते हैं। लिहाजा, दुश्मन बाजी मार ले जाता है। मुंबई पर हमला इस बेतरतीब सैन्य सुरक्षा बल का ही नतीजा था। जहां भारत-चीन सीमा पर चौकसी के लिए भारत की तरफ से कई अलग-अलग दस्ते हैं, वहीं चीन ने अपनी सीमा की चौकसी का जिम्मा केवल एक दस्ते पीएलसी को सौंपा है। यही स्थिति पाकिस्तान की सीमा के साथ भी है। लाइन ऑफ कंट्रोल के छोड़कर सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सीमा सुरक्षा बल के कंधे पर डाल दी गई है। एलओसी की सुरक्षा सेना के अंतर्गत है। पाकिस्तान के साथ 2003 संधि के बावजूद आतंकी और जिहादी गुटों का प्रवेश भारत में चोरी छिपे होता रहा है और हमारी चौकसी में खामियां देखी जाती रही हैं। नेपाल और बांग्लादेश की सीमाएं भी भारत के लिए मुसीबत बनती जा रही हैं। बांग्लादेश और हमारे अ‌र्द्धसैनिक बलों के बीच हिंसक मुठभेड़ संबंधों में खटास भी पैदा कर रही है। सच्चाई यह है कि भारत की सुरक्षा नीति और ढांचा दोनों में बदलाव की जरूरत है। नीति में कहीं न कहीं हम अत्यंत भावुक और दूरदृष्टि से कोसों दूर हैं। इसका फायदा हमारे पड़ोसी देश बखूबी उठाते हैं। ढांचे में समन्वय की जरूरत है, जो विकेंद्रित कमांड की वजह से हो नहीं पाती। जब तक इस खामी को दूर नहीं कर लिया जाता, हमारी सीमाओं में सेंध लगने की आशंका बनी रहेगी।


Tuesday, June 14, 2011

रडार गैप के खतरे से चौकसी जरूरी


लादेन को खत्म करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान में जिस तरह गुपचुप कमांडो ऑपरेशन को अंजाम दिया, उससे भारत कई सबक ले सकता है। यहां सवाल अपनी सरहदों को और सुरक्षित बनाने का भी है। इस मामले में चिंता उन हवाई क्षेत्रों की है जो रडार की पकड़ से बाहर होते हैं और दुश्मन ऐसे क्षेत्र में घुसकर मनमानी गतिविधि को अंजाम दे सकता है। रडार गैप कितनी बड़ी समस्या है इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि अमेरिकी हलकों में भी इसे लेकर बवाल हो चुका है, जब युद्धाभ्यास के दौरान रूसी ब्लैकजैक बॉम्बर अमेरिकी हवाई क्षेत्र में घुस गया था और अमेरिका को इसकी खबर तक नहीं हुई। ऑपरेशन ओसामा के कुछ दिनों बाद ही अपने रक्षा मंत्री के एंटनी ने तीनों सैन्य प्रमुखों के साथ बैठक में तटीय सुरक्षा को लेकर र्चचा की। रडार गैप को लेकर सरकार कितनी चौकन्नी है और इस बैठक में क्या इस मुद्दे पर भी बात हुई, कहना मुश्किल है लेकिन 2008 में सीएजी सरकार को चेता चुकी है कि दक्षिण भारत के कई इलाके रडार गैप की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा नयी तकनीक से लैस रडार की जरूरत पर भी बल दिया गया था। पाकिस्तान और चीन को केंद्र में रखते हुए एयर डिफेंस का अधिकतर जोर परंपरागत तौर पर उत्तरी भारत पर रहा है। राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक आधुनिक रडार स्थापित किये गये हैं लेकिन दक्षिण भारत में आज भी ऐसे हवाई क्षेत्र हैं जहां वायुसेना को आसमान पर निगाह रखने के लिए नागरिक उड्डयन क्षेत्र के रडार जिन्हें एटीसी नाम से जाना जाता है, से काम चलाना पड़ता है। ऐसे में स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि ध्वनि की गति से दोगुनी रफ्तार से उड़ने वाले लड़ाकू विमान की तुलना आम यात्री विमान से करना बेमानी है। भारतीय एयर डिफेंस का सेंसर नेटवर्क तीन स्तर पर काम करता है। पहला है मोबाइल ऑब्जर्वेशन पोस्ट। दूसरी दीवार उन रडारों की है जो फ्रांस और रूस से 70 और 80 के दशक में लिये गये थे। तीसरी दीवार जो सबसे मजबूत है, उसे बेस एयर डिफेंस जोन कहा जाता है। रडार की यह श्रेणी राष्ट्रीय महत्व के प्रमुख ठिकानों की हिफाजत करती है। पिछले दो दशकों में इस श्रेणी में आने वाले रडार भारत में ही बनाए जा रहे हैं लेकिन रडार गैप की चुनौती बनी हुई है। बंगाल की खाड़ी, उत्तर श्रीलंका से लगा समुद्र और अरब महासागर से लगे हवाई क्षेत्र में इतने छेद हैं, जिसकी खबर दुश्मन को लग सकती है। पाकिस्तान के पास अमेरिकी और फ्रांस के बने ऐसे अत्याधुनिक टोही विमान हैं जो भारतीय हवाई क्षेत्र में दाखिल हुए बिना इन रडार गैप की जानकारी जुटा सकते हैं। मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद तटीय सुरक्षा पर तो जोर दिया गया है लेकिन हवाई क्षेत्र अब भी पूरी तरह महफूज नहीं है। हालांकि अब रडार गैप भरने के लिए एयरोस्टेट रडार का इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तर भारत में एयरोस्टेट रडार कई प्रमुख ठिकानों पर लगाए गए हैं। एयरोस्टेट एक किस्म का विशाल गुब्बारा होता है जो पांच हजार मीटर तक की ऊंचाई पर स्थापित किया जा सकता है। यह गुब्बारा नये सर्विलांस और रडार से लैस होता है और करीब पांच सौ किलोमीटर की रेंज में किसी भी हवाई गतिविधि को पकड़ने में सक्षम है। फिलहाल भारत इस्रइल से 6 एयरोस्टेट रडार लेने की योजना बना रहा है जबकि उत्तर भारत से लगी सीमाओं पर ही 13 एयरोस्टेट की आवश्यकता है। दक्षिण भारत में एयरोस्टेट ऐसे ही रडार गैप को भरने में सहायक साबित हो सकते हैं। लागत कम होने की वजह से इनको बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। खतरा इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि अब पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों से उत्तरी सीमा की तरफ से ही हमले की आशंका नहीं रह गई है। अब चीन और पाकिस्तान की वायु सेना ऐसे लड़ाकू विमानों से लैस हो रही है जिनकी रेंज कई हजार किलोमीटर है। ऐसे में दक्षिण भारत के रडार गैप बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, एबटाबाद ऑपरेशन को लिया जा सकता है। पाकिस्तान ने भारत को नजर में रखते हुए अपनी एयर डिफेंस की तमाम ताकत पूर्वी सीमा पर झोंकी हुई है। उसे अफगानिस्तान से लगी सीमा से कभी हमले की आशंका नहीं रही। पाकिस्तान की इसी कमी का फायदा अमेरिकी हेलिकॉप्टरों ने उठाया। रडार गैप के साथ कई और कमियां भी जुड़ी हुई हैं जिनको पूरा किये बगैर एक पूर्व एयर डिफेंस पण्राली कामयाब नहीं कही जाएगी। भारत के आसमान की सुरक्षा अब भी जमीन से हवा पर मार करने वाली एसए-3 पेचोरा मिसाइल पर निर्भर है जबकि यह मिसाइल बूढ़ी हो चुकी है। इसके अलावा ओसा-एके एम एयर डिफेंस सिस्टम भी पुराना पड़ चुका है। नये रडार आने और रडार गैप भरने के बावजूद भारतीय एयर डिफेंस पण्राली पूरी तरह सुरक्षित नहीं कही जा सकती है। अत: इस मामले में कई बारीक पहलुओं पर गौर करने की आवश्यकता है। भारतीय हवाई क्षेत्र को तब तक फूलप्रूफ नहीं कहा जा सकता जब तक एक इंच हिस्सा भी रडार की पकड़ से बाहर रहेगा।