Tuesday, June 14, 2011

रडार गैप के खतरे से चौकसी जरूरी


लादेन को खत्म करने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान में जिस तरह गुपचुप कमांडो ऑपरेशन को अंजाम दिया, उससे भारत कई सबक ले सकता है। यहां सवाल अपनी सरहदों को और सुरक्षित बनाने का भी है। इस मामले में चिंता उन हवाई क्षेत्रों की है जो रडार की पकड़ से बाहर होते हैं और दुश्मन ऐसे क्षेत्र में घुसकर मनमानी गतिविधि को अंजाम दे सकता है। रडार गैप कितनी बड़ी समस्या है इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि अमेरिकी हलकों में भी इसे लेकर बवाल हो चुका है, जब युद्धाभ्यास के दौरान रूसी ब्लैकजैक बॉम्बर अमेरिकी हवाई क्षेत्र में घुस गया था और अमेरिका को इसकी खबर तक नहीं हुई। ऑपरेशन ओसामा के कुछ दिनों बाद ही अपने रक्षा मंत्री के एंटनी ने तीनों सैन्य प्रमुखों के साथ बैठक में तटीय सुरक्षा को लेकर र्चचा की। रडार गैप को लेकर सरकार कितनी चौकन्नी है और इस बैठक में क्या इस मुद्दे पर भी बात हुई, कहना मुश्किल है लेकिन 2008 में सीएजी सरकार को चेता चुकी है कि दक्षिण भारत के कई इलाके रडार गैप की श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा नयी तकनीक से लैस रडार की जरूरत पर भी बल दिया गया था। पाकिस्तान और चीन को केंद्र में रखते हुए एयर डिफेंस का अधिकतर जोर परंपरागत तौर पर उत्तरी भारत पर रहा है। राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर तक आधुनिक रडार स्थापित किये गये हैं लेकिन दक्षिण भारत में आज भी ऐसे हवाई क्षेत्र हैं जहां वायुसेना को आसमान पर निगाह रखने के लिए नागरिक उड्डयन क्षेत्र के रडार जिन्हें एटीसी नाम से जाना जाता है, से काम चलाना पड़ता है। ऐसे में स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है क्योंकि ध्वनि की गति से दोगुनी रफ्तार से उड़ने वाले लड़ाकू विमान की तुलना आम यात्री विमान से करना बेमानी है। भारतीय एयर डिफेंस का सेंसर नेटवर्क तीन स्तर पर काम करता है। पहला है मोबाइल ऑब्जर्वेशन पोस्ट। दूसरी दीवार उन रडारों की है जो फ्रांस और रूस से 70 और 80 के दशक में लिये गये थे। तीसरी दीवार जो सबसे मजबूत है, उसे बेस एयर डिफेंस जोन कहा जाता है। रडार की यह श्रेणी राष्ट्रीय महत्व के प्रमुख ठिकानों की हिफाजत करती है। पिछले दो दशकों में इस श्रेणी में आने वाले रडार भारत में ही बनाए जा रहे हैं लेकिन रडार गैप की चुनौती बनी हुई है। बंगाल की खाड़ी, उत्तर श्रीलंका से लगा समुद्र और अरब महासागर से लगे हवाई क्षेत्र में इतने छेद हैं, जिसकी खबर दुश्मन को लग सकती है। पाकिस्तान के पास अमेरिकी और फ्रांस के बने ऐसे अत्याधुनिक टोही विमान हैं जो भारतीय हवाई क्षेत्र में दाखिल हुए बिना इन रडार गैप की जानकारी जुटा सकते हैं। मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद तटीय सुरक्षा पर तो जोर दिया गया है लेकिन हवाई क्षेत्र अब भी पूरी तरह महफूज नहीं है। हालांकि अब रडार गैप भरने के लिए एयरोस्टेट रडार का इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तर भारत में एयरोस्टेट रडार कई प्रमुख ठिकानों पर लगाए गए हैं। एयरोस्टेट एक किस्म का विशाल गुब्बारा होता है जो पांच हजार मीटर तक की ऊंचाई पर स्थापित किया जा सकता है। यह गुब्बारा नये सर्विलांस और रडार से लैस होता है और करीब पांच सौ किलोमीटर की रेंज में किसी भी हवाई गतिविधि को पकड़ने में सक्षम है। फिलहाल भारत इस्रइल से 6 एयरोस्टेट रडार लेने की योजना बना रहा है जबकि उत्तर भारत से लगी सीमाओं पर ही 13 एयरोस्टेट की आवश्यकता है। दक्षिण भारत में एयरोस्टेट ऐसे ही रडार गैप को भरने में सहायक साबित हो सकते हैं। लागत कम होने की वजह से इनको बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। खतरा इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि अब पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों से उत्तरी सीमा की तरफ से ही हमले की आशंका नहीं रह गई है। अब चीन और पाकिस्तान की वायु सेना ऐसे लड़ाकू विमानों से लैस हो रही है जिनकी रेंज कई हजार किलोमीटर है। ऐसे में दक्षिण भारत के रडार गैप बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, एबटाबाद ऑपरेशन को लिया जा सकता है। पाकिस्तान ने भारत को नजर में रखते हुए अपनी एयर डिफेंस की तमाम ताकत पूर्वी सीमा पर झोंकी हुई है। उसे अफगानिस्तान से लगी सीमा से कभी हमले की आशंका नहीं रही। पाकिस्तान की इसी कमी का फायदा अमेरिकी हेलिकॉप्टरों ने उठाया। रडार गैप के साथ कई और कमियां भी जुड़ी हुई हैं जिनको पूरा किये बगैर एक पूर्व एयर डिफेंस पण्राली कामयाब नहीं कही जाएगी। भारत के आसमान की सुरक्षा अब भी जमीन से हवा पर मार करने वाली एसए-3 पेचोरा मिसाइल पर निर्भर है जबकि यह मिसाइल बूढ़ी हो चुकी है। इसके अलावा ओसा-एके एम एयर डिफेंस सिस्टम भी पुराना पड़ चुका है। नये रडार आने और रडार गैप भरने के बावजूद भारतीय एयर डिफेंस पण्राली पूरी तरह सुरक्षित नहीं कही जा सकती है। अत: इस मामले में कई बारीक पहलुओं पर गौर करने की आवश्यकता है। भारतीय हवाई क्षेत्र को तब तक फूलप्रूफ नहीं कहा जा सकता जब तक एक इंच हिस्सा भी रडार की पकड़ से बाहर रहेगा।

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