ऊपरी तौर पर अमेरिका भले वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ जंग की बात करे या इस मुहिम में साथ होने का दावा करे, लेकिन वास्तव उसे सिर्फ अपने घर की फिक्र है। इस मामले में चीन की भूमिका तो शुरू से ही संदेह के घेरे में है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि आतंकवाद से लड़ाई की मुहिम में भारत अकेला है। भारत का दर्द उसका अपना है। ऐसे हालात में उपाय भी उसके अपने होंगे। इस कड़ी में भारत को पाकिस्तान और चीन से लगी सरहदों पर सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद रखनी होगी। नापाक इरादों वाले पड़ोसी देशों से घिरे भारत में सेंध लगाने के कई ठिकाने हैं। लूप-होल्स हैं, जहां हमारी सुरक्षा ढांचा और सुरक्षा नीति में कई महत्वपूर्ण खामियां दिखाई देती हैं। भारत की जमीनी सीमाएं 15,000 किलोमीटर की दूरी तक फैली हुई हैं। समुद्री सीमाओं का विस्तार 7,683 किलोमीटर तक का है। सीमाएं मुख्यत: सात महत्वपूर्ण पड़ोसी देशों के साथ मिलती हैं। इनमें से तकरीबन हर देश में भारत विरोधी दस्ते अपनी क्षमता के अनुसार सक्रिय हैं। भारत के भीतर सीमाओं की सुरक्षा का बंदोबस्त विकेंद्रित सोच पर आधारित है। कई मंत्रालय और अनेक सैन्य टुकडि़यां इस काम में जुटी हुई हैं। दुखद स्थिति यह है कि सैन्य और अर्द्ध सैन्य बलों की टुकडि़यों को एक सूत्र में बांधने का काम नहीं हो पाता। संकट की स्थिति में आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस असमंजस का भुक्तभोगी होता है राष्ट्र। मुंबई हमला इस ढांचे का ज्वलंत उदाहरण है। अंदरूनी हकीकत यह है कि हमारी लंबी और दूर तक फैली सरहदों की सुरक्षा कई क्षेत्रों में सामूहिक उत्तरदायित्व के तहत बंधी हुई है। इस सामूहिक ढांचे में सेना, अर्द्धसैनिक बल, पुलिस व्यवस्था और अन्य कई सुरक्षादल सम्मिलित हैं। दरअसल, हर सेना का संचालन और दिशा-निर्देश अलग-अलग मंत्रालयों के द्वारा किया जाता है। मसलन, चीन के साथ हमारी बहुआयामी सीमाओं की सुरक्षा व्यवस्था इस ढांचे में मौजूद खामियों को बखूबी दर्शाती है। वास्तविक सीमा नियंत्रण रेखा के पश्चिमी हिस्से में सियाचिन ग्लैशियर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश का हिस्सा आया है। मध्य रेखा उत्तराखंड के हिस्से में पड़ती है। इन सीमाओं की सुरक्षा का जिम्मा एक विशेष सीमा सुरक्षा फ्रंटियर फोर्स के द्वारा किया जाता है। यह टुकड़ी कैबिनेट सचिव द्वारा संचालित होती है यानी इसका माई-बाप कैबिनेट सचिव होता है। दूसरी ओर भारत-चीन सीमा पर चौकसी का जिम्मा आइटीबीपी के हाथों में होता है। यह टुकड़ी गृह मंत्रालय द्वारा संचालित होती है। सिक्किम के मुहाने पर सुरक्षा की देखभाल भारतीय सेना द्वारा होती है, जिसका कमांडर रक्षामंत्री होता है। दरअसल, चीन की सीमा के अलग-अलग कोणों पर भारत के विभिन्न अर्द्धसैनिक बल, राज्य पुलिस और सेना तीनों भिन्न-भिन्न ढंग से लगे हुए हैं। असम राइफल्स और अन्य अर्द्धसैनिक बल गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं। ये अर्द्धसैनिक बल सीमाओं पर सेना की मदद के लिए तैनात हैं, लेकिन आधिकारिक रूप से ये सेना के अधीन नहीं हैं। यही कारण है कि विखंडित और विकेंद्रित सेनाओं के बीच कोई तारतम्य नहीं है। आपातकालीन परिस्थितियों में ये अपने-अपने आकाओं के आदेश के इंतजार में शिथिल पड़ जाते हैं। लिहाजा, दुश्मन बाजी मार ले जाता है। मुंबई पर हमला इस बेतरतीब सैन्य सुरक्षा बल का ही नतीजा था। जहां भारत-चीन सीमा पर चौकसी के लिए भारत की तरफ से कई अलग-अलग दस्ते हैं, वहीं चीन ने अपनी सीमा की चौकसी का जिम्मा केवल एक दस्ते पीएलसी को सौंपा है। यही स्थिति पाकिस्तान की सीमा के साथ भी है। लाइन ऑफ कंट्रोल के छोड़कर सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सीमा सुरक्षा बल के कंधे पर डाल दी गई है। एलओसी की सुरक्षा सेना के अंतर्गत है। पाकिस्तान के साथ 2003 संधि के बावजूद आतंकी और जिहादी गुटों का प्रवेश भारत में चोरी छिपे होता रहा है और हमारी चौकसी में खामियां देखी जाती रही हैं। नेपाल और बांग्लादेश की सीमाएं भी भारत के लिए मुसीबत बनती जा रही हैं। बांग्लादेश और हमारे अर्द्धसैनिक बलों के बीच हिंसक मुठभेड़ संबंधों में खटास भी पैदा कर रही है। सच्चाई यह है कि भारत की सुरक्षा नीति और ढांचा दोनों में बदलाव की जरूरत है। नीति में कहीं न कहीं हम अत्यंत भावुक और दूरदृष्टि से कोसों दूर हैं। इसका फायदा हमारे पड़ोसी देश बखूबी उठाते हैं। ढांचे में समन्वय की जरूरत है, जो विकेंद्रित कमांड की वजह से हो नहीं पाती। जब तक इस खामी को दूर नहीं कर लिया जाता, हमारी सीमाओं में सेंध लगने की आशंका बनी रहेगी।
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