Friday, November 30, 2012

408 करोड़ का गोला-बारूद बिना जांच बेकार घोषित





कैग का खुलासा
रक्षा मंत्रालय के एकीकृत मुख्यालय दक्षिणी कमान ने 2009-10 में 1,35,608 गोलों को अनुपयोगी घोषित कर दिया
यह गोला-बारूद 10 वर्ष की निर्धारित उपयोग अवधि को पूरा नहीं कर पाया था
नई दिल्ली (एजेंसी)। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने कहा है कि स्वदेशी डिजाइन से तैयार 408.06 करोड़ रुपए मूल्य का गोला बारूद बिना आंतरिक सव्रेक्षण किए बेकार घोषित कर दिया गया। थल सेना एवं आयुध फैक्टरी पर संसद में बृहस्पतिवार को पेश कैग रिपोर्ट के अनुसार, स्वदेशी गोला- बारूद को इस तरह से अनुपयोगी घोषित करने के कारण सेना की मांग को पूरा करने के लिए 278.88 करोड़ रुपए का गोला-बारूद आयात किया गया। कैग ने कहा कि हमारी जांच में यह बात आई है कि रक्षा मंत्रालय के एकीकृत मुख्यालय दक्षिणी कमान द्वारा 2009-10 में गोला-बारूद के भंडार के निरीक्षण के आधार पर 1,35,608 गोलों को अनुपयोगी घोषित कर दिया गया। 408.06 करोड़ रुपए मूल्य का गोला बारूद 10 वर्ष की निर्धारित उपयोग अवधि को पूरा नहीं कर पाए थे। सेना ने दोषों का कारण अनुपयुक्त गुणवत्ता नियंतण्रबताया जबकि आयुध फैक्टरी ने डिजाइन में कमी की ओर इशारा किया। गोला-बारूद का डिजाइन बनाने वाले रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने कहा कि यदि गोला-बारूद में डिजाइन दोष था तब 1997- 2005 के दौरान निर्मित एवं आपूर्ति किए गए गोला-बारूद (शेष पेज 2)
Rashtirya sahara National Edition 30-11-2012 Page -1 Suhraksha

Wednesday, November 21, 2012

डेढ़ दशक बाद दूर होंगी कारगिल की कमजोरियां



ठ्ठप्रणय उपाध्याय, नई दिल्ली कारगिल युद्ध में ऊंची पहाडि़यों पर दुश्मन की मदद और भारत को नुकसान पहुंचाया अमेरिका से पाक को मिले रडारों ने, जो भारतीय तोपों की स्थिति का पता पाकिस्तानी फौज को दे रहे थे। इस युद्ध के करीब डेढ़ दशक बाद भारत ने सरहद के पर्वतीय इलाकों में निगरानी का पुख्ता इलाज खोज लिया है। सेना जम्मू-कश्मीर के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में स्वदेशी स्वाति रडार की पूरी श्रृंखला लगाने की तैयारी कर रही है जो कहीं अधिक शक्तिशाली है। साथ ही सीमांत इलाकों में निगरानी के लिए तैनात लोरोस दूरबीनों की ताकत बढ़ाई जा रही है। सेना के आधुनिकीकरण की कमान संभालने के बाद सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह ने जिन परियोजनाओं को फास्ट ट्रैक किया उनमें स्वाति रडार लगाने की योजना भी शामिल है। सेना सूत्रों के मुताबिक भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड की बेंगलूर प्रयोगशाला में तैयार स्वाति रडार पाक सेना के पास मौजूद अमेरिकी रडार एनटीपीक्यू-36 से ज्यादा ताकतवर है। फेस्ड ऐरे तकनीक से लैस स्वाति दुश्मन के इलाके में 40 किमी दूर से रॉकेट, 30 किमी की दूरी से तोपों और 20 किमी की दूरी से मोर्टार का पता बताने में सक्षम है। नए रडार 2014 तक तैनात किए जाने हैं। कारगिल, द्रास सहित जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय इलाकों में पहले चरण में 30 स्वाति रडार लगाने की योजना है। 1600 करोड़ रुपये की लागत से रडार खरीदने के लिए सेना मुख्यालय जल्द ही प्रस्ताव भेजने की तैयारी कर रहा है। साथ ही निगरानी नेटवर्क को चाक-चौबंद बनाने के लिए चीन और पाकिस्तान से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में लगी लोरोस दूरबीनों को उन्नत करने की तैयारी है। इसके तहत मार्क-4 श्रेणी की लोरोस लगाई जानी हैं जो सरहद पार के इलाके में दिन में 20 किमी और रात में 26 किमी दूर तक की हर हलचल को कैमरों में कैद कर सकती है। उल्लेखनीय है कि भारत ने सीमा पर संवेदनशील चौकियों पर लोरोस दूरबीनें तैनात की हैं। लोरोस की तस्वीरों और रडार से मिली सूचनाओं को कुछ ही मिनटों में दिल्ली के सेना मुख्यालय तक पहुंचाने के लिए फौज ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क को मुस्तैद कर रही है। उल्लेखनीय है कि 1999 में कारगिल में पाकिस्तानी फौज ने घुसपैठियों की शक्ल में घुसकर कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया था। इस घुसपैठ की खबर भी सेना को इलाके के गड़रियों से मिली थी। इसके बाद पाकिस्तानी फौज को खदेड़ने के लिए सेना को दो महीने तक लड़ाई लड़नी पड़ी थी। कारगिल के दौरान भारत के रडार केवल दुश्मन के इलाके में मोर्टार की ही खबर दे पा रहे थे, जबकि पहाड़ी चोटियों पर जमी दुश्मन की तोपें खासा नुकसान पहुंचा रही थीं। इसके बाद ही 2003 में सरकार ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन को नया रडार विकसित करने का काम दिया था।
Dainik jagran National Edition 21-11-2012 Suraksha Page -3

Monday, November 19, 2012

बढ़ाए जाएं बारूदी सुरंग रोधी वाहनों में सुरक्षा मानक

बढ़ाए जाएं बारूदी सुरंग रोधी वाहनों में सुरक्षा मानक
नई दिल्ली, प्रेट्र : नक्सल विरोधी अभियानों में लगी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने बारूदी सुरंग रोधी वाहनों को बेहतर बनाने की मांग की है। माओवादियों द्वारा लगाए जाने वाले आइईडी विस्फोटों में मरने वाले जवानों की बढ़ती तादात को देखते हुए इन वाहनों को पहियों पर चलते ताबूत (कॉफिन ऑन व्हील्स) कहा जाने लगा है। सीआरपीएफ ने आयुध फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) को अपनी इस समस्या से अवगत करा दिया है। नक्सल प्रभावित इलाकों में काम कर रहे सीआरपीएफ कमांडरों ने ओएफबी के विशेषज्ञों से हाल ही में मुलाकात की थी। इनमें वाहन फैक्ट्री, जबलपुर के विशेषज्ञ भी थे। अ‌र्द्धसैनिक बलों के वाहन जबलपुर में ही बनाए जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक, सीआरपीएफ ने विशेषज्ञों को बताया कि ज्यादातर मामलों में आइईडी विस्फोट के बाद वाहन के अंदर मची हलचल से जवानों को गंभीर चोटें आती हैं। इन वाहनों के अंदर सख्त धातुओं का इस्तेमाल किया गया है। पुलिस बल ने मांग की है कि वाहनों के अंदर की डिजाइन को ऐसा बनाया जाए कि जवानों को चोट न आए। पिछले साल तत्कालीन सीआरपीएफ प्रमुख के. विजय कुमार ने इन वाहनों को कॉफिन ऑन व्हील्स का तमगा दिया था। कुमार का कहना था कि इन वाहनों को हमारी जरूरतों के हिसाब से डिजाइन नहीं किया गया है। सीआरपीएफ ने नाटो द्वारा अफगानिस्तान में इस्तेमाल किए जा रहे वाहनों के डिजायन के बारे में ओएफबी से चर्चा की है। नक्सलवादियों द्वारा गया के जंगलों में 18 अक्टूबर को लगाए गए आइईडी से 6 जवानों की मौत हो गई थी। सीआरपीएफ ने जवानों को निर्देश दिया है कि वे इन वाहनों का इस्तेमाल करने की बजाय पैदल जाया करें।
Dainik Jagran National Edition 19-11-2012 Page -5 lqj{kk)


भारत-चीन रिश्ते में गर्मजोशी की उम्मीद





प्रतीक मिश्र/एसएनबी नई दिल्ली। चीन में सत्ता परिवर्तन के साथ ही कूटनयिक क्षेत्रों में उम्मीद की जा रही है कि अब भारत के साथ उसके रिश्ते में गर्मजोशी आएगी। वहां सत्तरूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी में शी जिनपिंग की अगुवाई में पांचवीं पीढ़ी को नेतृत्व की कमान सौंपे जाने के बाद माना जा रहा है कि एशिया में इन दोनों देशों के बीच नजदीकियां बढ़ेंगी क्योंकि नया नेतृत्व कमोवेश उदारवादी रुख वाला है। कूटनयिक विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को चीन ज्यादा समय तक नजरंदाज नहीं कर सकता। तेजी से बदल रहे वैश्विक माहौल में अमेरिका न केवल लगातार इस क्षेत्र में अपनी दिलचस्पी को बढ़ा रहा है बल्कि तेजी से उभर रहे भारत के साथ अपनी नजदीकियों को और बढ़ाने की रणनीति की राह पर भी चल रहा है। अमेरिका की भारत के साथ बढ़ती नजदीकी चीन के लिए एक ऐसी कूटनीतिक मजबूरी है, जिसके चलते उसे भारत के साथ नये सिरे से अपने रिश्तों की इबारत लिखनी होगी। माना जा रहा है कि चीन का नया नेतृत्व इस दिशा में सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ेगा। चीन और भारत दोनों ही दुनिया की सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं। उनकी यह समानता भी उन्हें और नजदीक आने में मददगार हो सकती है। विदेश मंत्रालय के सूत्रों का भी मानना है कि आने वाले समय में चीन को भारत के साथ अपने नजरिए में बदलाव लाना ही होगा। भारत को घेरने की बजाय उसके साथ मिलकर चलना न केवल दोनों देशों के हित में होगा बल्कि दक्षिण एशिया में स्थिरता के लिए भी यह समय की जरूरत है। हालांकि पिछले कुछ समय से चीन और भारत के रिश्तों में पर पड़ी बर्फ कुछ पिघली है लेकिन अब भी दोनों के बीच अविश्वास की जो खाई है उसे पाटना चीन के नये नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होगी। बहरहाल, भारतीय नेतृत्व यह उम्मीद करके चल रहा है कि हू जिंताओ और वेन जियाबाओ ने जो बुनियाद डाली है उसे चीन का नया उदारवादी नेतृत्व शी जिनपिंग की अगुवाई में और मजबूत आधार प्रदान करेगा। चीन में नया नेतृत्व मार्च में सत्ता संभालेगा। वैसे इस माह भारत व चीन के बीच उच्चस्तरीय संबंध बहाल होने हैं। यह संबंध सामारिक-आर्थिक वार्ता के जरिए बहाल होंगे और इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की चीन जाने की तैयारी है। मेनन चीन में भारत के राजदूत रह चुके हैं और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के बीच उनकी छवि काफी अच्छी है। उनकी यात्रा से संबंधों में नई गति आ सकती है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया और उनके चीनी समकक्ष एवं चीन के राष्ट्रीय विकास सुधार आयोग के प्रमुख झांग पिंग के बीच 26 नवम्बर को वार्ता होगी।
1.       Rashtirya Sahara National Edition 19-11-2012Page -2 lqj{kk)