ठ्ठप्रणय उपाध्याय, नई
दिल्ली कारगिल
युद्ध में ऊंची पहाडि़यों पर दुश्मन की मदद और भारत को नुकसान पहुंचाया
अमेरिका से पाक को मिले रडारों ने, जो भारतीय तोपों की
स्थिति का पता
पाकिस्तानी फौज को दे रहे थे। इस युद्ध के करीब डेढ़ दशक बाद भारत ने सरहद
के पर्वतीय इलाकों में निगरानी का पुख्ता इलाज खोज लिया है। सेना
जम्मू-कश्मीर के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में स्वदेशी स्वाति रडार की पूरी
श्रृंखला लगाने की तैयारी कर रही है जो कहीं अधिक शक्तिशाली है। साथ ही
सीमांत इलाकों में निगरानी के लिए तैनात लोरोस दूरबीनों की ताकत बढ़ाई जा
रही है। सेना के आधुनिकीकरण की कमान संभालने के बाद सेनाध्यक्ष जनरल बिक्रम
सिंह ने जिन परियोजनाओं को फास्ट ट्रैक किया उनमें स्वाति रडार लगाने
की योजना भी शामिल है। सेना सूत्रों के मुताबिक भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड
की बेंगलूर प्रयोगशाला में तैयार स्वाति रडार पाक सेना के पास मौजूद
अमेरिकी रडार एनटीपीक्यू-36 से
ज्यादा ताकतवर है। फेस्ड ऐरे तकनीक से लैस स्वाति दुश्मन के
इलाके में 40 किमी
दूर से रॉकेट, 30 किमी
की दूरी से तोपों
और 20 किमी
की दूरी से मोर्टार का पता बताने में सक्षम है। नए रडार 2014 तक
तैनात किए जाने हैं। कारगिल, द्रास सहित जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय इलाकों
में पहले चरण में 30 स्वाति
रडार लगाने की योजना है। 1600 करोड़ रुपये
की लागत से रडार खरीदने के लिए सेना मुख्यालय जल्द ही प्रस्ताव भेजने की
तैयारी कर रहा है। साथ ही निगरानी नेटवर्क को चाक-चौबंद बनाने के लिए चीन
और पाकिस्तान से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में लगी लोरोस दूरबीनों को उन्नत
करने की तैयारी है। इसके तहत मार्क-4 श्रेणी की लोरोस लगाई
जानी हैं जो
सरहद पार के इलाके में दिन में 20 किमी और रात में 26 किमी
दूर तक की हर हलचल
को कैमरों में कैद कर सकती है। उल्लेखनीय है कि भारत ने सीमा पर संवेदनशील
चौकियों पर लोरोस दूरबीनें तैनात की हैं। लोरोस की तस्वीरों और रडार
से मिली सूचनाओं को कुछ ही मिनटों में दिल्ली के सेना मुख्यालय तक पहुंचाने
के लिए फौज ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क को मुस्तैद कर रही है। उल्लेखनीय
है कि 1999 में
कारगिल में पाकिस्तानी फौज ने घुसपैठियों की शक्ल में
घुसकर कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया था। इस घुसपैठ की खबर भी सेना
को इलाके के गड़रियों से मिली थी। इसके बाद पाकिस्तानी फौज को खदेड़ने के
लिए सेना को दो महीने तक लड़ाई लड़नी पड़ी थी। कारगिल के दौरान भारत के रडार
केवल दुश्मन के इलाके में मोर्टार की ही खबर दे पा रहे थे, जबकि पहाड़ी
चोटियों पर जमी दुश्मन की तोपें खासा नुकसान पहुंचा रही थीं। इसके बाद
ही 2003 में
सरकार ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन को नया रडार विकसित
करने का काम दिया था।
Dainik jagran National Edition 21-11-2012 Suraksha Page -3
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