Wednesday, May 23, 2012

परमाणु पाखंड के दौर में हम


राममनोहर लोहिया ने कहा था कि 20 वीं सदी की दो बड़ी उपलब्धियां हैं- एक एटम बम और दूसरा महात्मा गांधी। सदी के अंत तक दोनों में से एक ही बचेगा। लेकिन विडंबना देखिए कि 21वीं सदी का एक दशक बीत जाने के बाद भी दुनिया में दोनों बचे हुए हैं। यही इस दौर का सबसे बड़ा पाखंड है। हम परमाणु बम भी बनाते हैं और समय-समय पर महात्मा गांधी को भी याद कर लेते हैं। इसके लिए वह समय उतना दोषी नहीं है, जब इन दो विचारों का आविष्कार हो रहा था। इसके लिए वह समय ज्यादा दोषी है, जब मानव सभ्यता के लिए दोनों की अहमियत शीशे की तरह साफ हो चुकी है। महात्मा गांधी और उनका अहिंसा का दर्शन उस समय पैदा हुआ था जब मानव सभ्यता वि युद्ध के रूप में अपने जीवन से सबसे विनाशकारी दौर से गुजर रही थी। गांधी ने दोनों वियुद्धों का हश्र देखने के बाद ही अपने अहिंसा के सिद्धांत में दृढ़ता प्रकट की थी। उन्होंने प्रथम वि युद्ध में ब्रिटिश साम्राज्य की सेवा की थी और दूसरे वि युद्ध में अपने देश की आजादी के लिए उनके खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ दिया था। संयोग से वे उस समय जीवित थे जब अमेरिका ने जापान से हिरोशिमा और नागासाकी नाम के शहरों पर पहली बार परमाणु बमों से हमला किया था। अगस्त 1945 में हुए उस हमले के बाद महात्मा गांधी की टिप्पणी थी, जब मैंने पहली बार सुना एटम बम ने हिरोशिमा को मिटा दिया है तो मेरे शरीर में कोई हरकत ही नहीं हुई। उल्टे मैंने खुद से कहा- अब अगर दुनिया अहिंसा को नहीं अपनाती तो मानव जाति की खुदकुशी सुनिश्चित है।
गांधी का जिक्र : परमाणु बम का निर्माण विडंबना है कि आज गांधी का हवाला देते हुए परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयास भी किए जाते हैं और बम बनाने के भी। यही वजह है कि उस समय की तुलना में परमाणु हथियारों का जखीरा आज हजारों गुना हो चुका है। इस पाखंड में पूरी दुनिया के साथ गांधी का देश भारत भी शामिल है। फर्क यही है कि भारत गांधी का नाम कुछ ज्यादा जोर से लेता है। हमारी सरकार एक तरफ कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ आंदोलन कर रही जनता को चौतरफा घेर कर उनका दमन करती है तो दूसरी तरफ परमाणु हथियारों से सुसज्जित पनडुब्बी आईएनएस चक्र के सफल जलावतरण के बाद अग्नि-पांच का सफल परीक्षण करती है। यह सभी हमारे लिए जश्न के विषय हैं। कहीं प्रशासन तो कहीं वैज्ञानिकों के लिए। दावा किया जाता है कि हमारी परमाणु मिसाइल की जद में अब चीन की राजधानी पेइचिंग ही नहीं यूरोप भी आ गया है। अपने को पहले से अधिक सुरक्षित और पड़ोसी को पहले से ज्यादा असुरक्षित बताने वाला यह आत्मविास उस समय फुस्स हो जाता है, जब बताया जाता है कि हमारी मिसाइल की मारक क्षमता महज 5,000 किलोमीटर (जो अपने में कम नहीं है) जबकि पाकिस्तान और चीन की क्षमताएं तो 10,000 हजार से भी ऊपर हैं। तकनीकी शब्दावली में बताया जाता है कि अरे यह तो आईसीबीएम यानी अंतरमहाद्वीपीय नहीं मध्यम रेंज की मिसाइल है। फिर इस फिसलते आत्मविास को रोकने के लिए दावा किया जाता है कि हमारी अगली पीढ़ी की मिसाइल वही होगी। आखिर हम अग्नि-एक की 700 किलोमीटर की मारक क्षमता से अग्नि-पांच में 5000 तक आए तो हैं।
निरस्त्रीकरण से शस्त्रीकरण की तरफ पाखंड का यह माहौल एक देश से दूसरे देश, परमाणु हथियारों वाले देश से लेकर गैर परमाणु हथियारों वाले देशों और राष्ट्रीय संस्थाओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तक फैला हुआ है। यह वैसा ही सिलसिला है जैसे जातिवाद को खत्म करते-करते तमाम जातियां जातिवादी हो जाती हैं और उन्हीं की तरह आचरण करने लगती हैं, जिनके खिलाफ वे आंदोलन करती हैं। या, फिर सांप्रदायिकता को मिटाने के बहाने तमाम समुदाय उन्हीं की तरह सांप्रदायिक हो जाते हैं, जिनके खिलाफ वे जंग लड़ने का एलान करते हैं। या, कुछ वैसा ही होता है, जैसे रंगभेद से लड़ने का दावा करने वाली राष्ट्रीयताएं गोरों की ही संस्कृति और व्यवस्था अपना लेती हैं।
भारत को अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सहमति दुनिया के पांच परमाणु हथियार संपन्न देशों के परमाणु पाखंड से लड़ते- लड़ते भारत ने पहले 1975 फिर 1998 में परमाणु विस्फोट कर अपने दोहरेपन को प्रदर्शित किया और बाद में 2009 में अमेरिका से परमाणु करार कर एक चक्र पूरा कर दिया। उसके बाद दुनिया में भारत के परमाणु हथियारों को सुरक्षित मानना, इस्रइल के डिमोना संयंत्र की चर्चा न करना और उत्तरी कोरिया और ईरान पर दुनिया भर में शोर मचाने की अंतरराष्ट्रीय राजनीति शुरू हो गई है। उसी नजरिए का नतीजा है कि उत्तर कोरिया के उपग्रह छोड़े जाने पर तो काफी हल्ला मचा था और भारत के सफल मिसाइल परीक्षण को ज्यादा तूल नहीं दिया गया। यहां यह बताना प्रासंगिक है कि मोदाराकी बनूनू नाम के जिस इस्रइली ने अपने देश के डिमोना परमाणु संयंत्र का चित्र लेकर प्रकाशित करना चाहा, उसे देशद्रोही बताकर जेल में ठूंस दिया गया। जबकि इस्रइल अपने को लोकतांत्रिक देश होने का दावा करता है।
छद्म छेदते ईरान के सवाल उधर, अपने परमाणु कार्यक्रम के कारण चौतरफा दबावों में घिरा ईरान लगातार पांच परमाणु हथियार सम्पन्न देशों के पाखंड को उजागर करता रहता है। वह साफ तौर पर पूछता है कि आखिर फ्रांस और ब्रिटेन को परमाणु हथियारों की क्या जरूरत है? उनकी सुरक्षा को किससे खतरा है। वह अमेरिका की कथनी-करनी के फर्क को जाहिर करता है। परमाणु हथियार वाले देशों के इस पाखंड के परमाणु अप्रसार संधि के बाकी हस्ताक्षरी देश भी समय-समय पर आलोचना करते रहते हैं। ब्राजील के नेतृत्व में काम करने वाले सात देशों के न्यू एजेंडा कोएलिशन का कहना है कि एनपीटी के कारण अप्रसार भले रु का है लेकिन निरस्त्रीकरण संभव नहीं हो पा रहा है। दरअसल, दुनिया एलएस़डी और एमएसडी जैसे दो सिद्धांतों के बीच फंसी है। संयुक्त राष्ट्र की आईसीजे जैसी संस्था भी तमाम देशों की तरह लॉजिक ऑफ सेल्फ डिटरेंस के सिद्धांत में यकीन करती है। यानी परमाणु हथियारों का जखीरा जमा करते जाने वाले देश एक दूसरे पर हमले नहीं करते। आखिर अगस्त 1945 के बाद दुनिया पर कहां एटमी हमला हुआ। दूसरी तरफ म्यूचुअल सेल्फ डिस्ट्रक्शन का सिद्धांत है, जिस पर अमेरिका और रूस चल रहे हैं। यह सिलसिला दो दशक पहले शुरू हुआ था और अब नए संदर्भ अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच चल रहा है। एक तरफ अमेरिका के तमाम विशेषज्ञ कहते हैं कि स्टार्टनाम की यह संधि तो रूस के पक्ष में झुकी हुई है तो दूसरी तरफ ओबामा मानते हैं कि अमेरिका भी संधि की भावना पर खरा नहीं उतरा है। अमेरिका के पास 1950 परमाणु मिसाइलें बताई जाती हैं तो रूस के पास 2430
गांधी देते हैं वैिक समझदारी का जंतर एलएसडी और एमएसडी के बीच फंसी दुनिया में उन देशों का भी पक्ष है, जिन्हें परमाणु मिसाइलों की सुरक्षा छतरी मिली हुई है। ऐसे देशों की संख्या करीब 30 है। वे नहीं चाहते कि यह सुरक्षा कम हो क्योंकि एक तरफ दुनिया में परमाणु आतंकवाद का खतरा है तो दूसरी तरफ क्षेत्रीय टकराव अब भी खत्म नहीं हुए हैं। दुनिया के संसाधनों को लूटने की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति क्षेत्रीय टकराव को खत्म नहीं होने देना चाहती और आतंकवाद के लिए नया माहौल बनाती है। इसी हकीकत और पाखंड के बीच वैिकसंस्थाओं की अहमियत और वैिक स्तर पर परमाणु हथियारों और ऊर्जा के खिलाफ समझ और आंदोलन की अहमियत बढ़ रही है। जहां अमेरिका परमाणु हथियार घटाने का वादा कर रहा है और बी-53 जैसे परमाणु बम को समाप्त किया है। वहीं परमाणु प्रौद्योगिकी का आधुनिकीकरण भी कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिकी हथियारों के खतरे पहले से ज्यादा बढ़े हैं। यहीं गांधी का वह कथन फिर मौजू हो जाता है जो उन्होंने नागासाकी हिरोशिमा के बाद कहा था, परमाणु बम की इस विकराल त्रासदी का उचित अर्थ यही है कि इसे उसी तरह जवाबी बम से नहीं खत्म किया जा सकता, जिस तरह हिंसा को प्रति हिंसा से नहीं मिटाया जा सकता। मनुष्य जाति को सिर्फ अहिंसा के माध्यम से हिंसा के चक्र से बाहर आना होगा। हिंसा को सिर्फ प्रेम से जीता जा सकता है। जवाबी घृणा, न सिर्फ घृणा की सतह बल्कि उसकी गहराई को भी बढ़ाती है। भारत के आजाद होने के कुछ महीने बाद 16 नवम्बर 1947 को फिर वे फिर कहते हैं, परमाणु बम के इस युग में विशुद्ध अहिंसा ही हिंसा की चालाकियों को नाकाम कर सकती है। हम परमाणु पाखंड के युग में जरूर हैं लेकिन पाखंड में भी थोड़ा- बहुत आदर्श होता है। उम्मीद की जाती है, वह आदर्श बढ़ेगा, गांधी बचेंगे और परमाणु बम मिटेगा।

रक्षा पर बढ़ा खर्च विदेश नीति की नाकामी


आजादी के पहले तीन दशकों में भारत वि निरस्त्रीकरण का अभियान चलाता था। तब जवाहरलाल नेहरू अपने को शांतिदूत कहलाने में गर्व महसूस करते थे। द्वितीय वि युद्ध से तबाही के चश्मदीद साक्षी वे रह चुके थे। कोरिया में, वियतनाम में, कांगो में यानी धरती के किसी भी कोने में सिविल युद्ध होता था तो संयुक्त राष्ट्रसंघ तुरंत नेहरू से शांति सेना भेजने का आग्रह करता था। कारण यही था कि भारत कभी भी आक्रामक राष्ट्रों के दज्रे में नहीं रहा। परमाणु बम के उत्पादन के विरुद्ध नेहरू का भारत पुख्ता और अनवरत अभियान चलाता था। हालांकि 1962 में कम्युनिस्ट चीन द्वारा भारत पर हमले के बाद भारतीय रक्षा नीति में आमूल परिवर्तन हो गया। तब तक भारतीय सेना एस्पेसो काफी फिल्टर बनाती रही और वर्दी सिलती थी। जंग लगी बन्दूकें लिए हिमालयी बर्फ पर सूती मोजे पहनकर हिंदुस्तानी फौजी जवान चीन का सामना करते रहे। सैनिक अक्षमता का 1962 वाला वह एक दौर था। अब नये दौर में पांच हजार किलोमीटर की दूरी पर बने किसी भी निशाने पर भारतीय अग्नि प्रक्षेपास्त्र हमला कर सकता है। परमाणु बमों का अम्बार तो लग ही गया है। शुरुआत की थी, उसी शांतिदूत की आत्मजा इंदिरा गांधी ने पोखरण से। शीघ्र ही कवि हृदय वाले अटल बिहारी वाजपेयी भी पीछे- पीछे आ गये। पोखरण द्वितीय बना। इसी संदर्भ में निरस़्त्रीकरण की वैिक आंदोलन में भारत पिछड़ गया। शांति की कथनी और शस्त्र वाली करनी में फासला गहराता गया। भारत की देखा-देखी एशियाई राष्ट्र भी बम बनाने की होड़ में शामिल हो गए। केरल से भी छोटा उत्तरी कोरिया, पड़ोसी भूखा-नंगा पाकिस्तान और अब इस्लामी ईरान भी परमाणु शक्ति की ढैय्या छू चुके हैं।
प्राथमिकता : विकास या विध्वंस? अत: यह राष्ट्रीय बहस अब तेज हो गई है कि भारत की आर्थिक प्राथमिकता क्या हो? विध्वंसक शस्त्र निर्माण की दौड़ के सिरमौर बने अथवा वंचित, शोषित भारतीय आमजन का जीवन सुधारे। संसाधन सीमित हैं। अत: इस्तेमाल भी विवेकपूर्ण हो। कई शांतिवादियों ने शस्त्रों पर हो रहे खर्च और विकास के आवश्यक बजट पर शोधपूर्ण समीक्षा की है। साधारण आदर्श की भाषा में कहा जाए तो एक टैंक बनाने पर खर्च राशि से 30 गांवों में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं। एक बोफोर्स तोप की कीमत के बराबर खर्चा आएगा, यदि 50 गांवों को राजमार्ग से जोड़ने वाली सड़क बनाई जाए। प्रक्षेपास्त्र अग्नि पर हुए खर्च से तो सैकड़ों प्राथमिक स्कूल खोले जा सकते हैं। एक परमाणु बम की लागत से तो हजारों कन्याओं की शादी सरलता से की जा सकती है। फिलहाल, इस तरह के विकास बनाम विध्वंस के आंकड़े कई हैं। अब देशभक्त, राष्ट्रवादी, अधिकतर चुनौती के तेवर में सवाल उठाते हैं कि क्या भारत अहिंसा तथा विकास के नाम पर पलायनवादी और क्लीव बन जाए? फिर से अपनी आजादी खो दे? पड़ोस के विस्तारवादी कम्युनिस्ट चीन और ईष्र्यालु, झगड़ालु इस्लामी पाकिस्तान के सामने नत होकर रहें? तर्क भी है कि चीन में साठ करोड़ जन दो रोटी और एक आलू पर दिन गुजारते हैं, फिर भी चीन वि की तीसरी बड़ी सैन्य शक्ति बना हुआ है। पाकिस्तान की तीन चौथाई आबादी गुरबत और मुफलिसी में बसर कर रही है, फिर भी बम बना चुका है। अत: भारत क्यों इस शक्ति प्रदर्शन की रेस में पिछड़ जाए? बात तो गौरतलब है पर भारत की शांतिवादी संस्कृति और बुद्ध-गांधी की विरासत को कैसे नकारा जाए? यों भी 62 वषोर्ं की स्वाधीनता के बाद भी 60 करोड़ भारतीय को रोज खाना मयस्सर न होता हो, पीने का पानी न मिलता हो, बिजली और घर तो दीगर बात है। ऐसी परिस्थिति में शस्त्र निर्माण पाशविक प्रवृत्ति कहलाएगी।
दो सिरों के बीच सही जवाब यह दो सिरे हैं, जो देश की विपन्नता और शस्त्र की विपुलता के दरमियान दिखते हैं। राष्ट्र की भौगोलिक सार्वभौमिकता और ऐतिहासिक अस्मिता के संरक्षण की बात भी दृष्टि से ओझल नहीं की जा सकती है। सीमा बची रहे, तभी तो विकास की उपादेयता होगी। इस शक्ति बनाम शांति की बहस को लम्बा करना चाहें तो भारतीय इतिहास में कई दृष्टांत मिलेंगे, जो विकास पर सैन्य क्षमता को तरजीह देते हैं। गोरी और गजनवी भारत को लूट पाते यदि सबल राष्ट्रीय केंद्र होता? बाबर अगर बारूद से लैस न होता तो पानीपत का युद्ध भारत के पक्ष में होता। इब्राहीम लोदी की एक लाख वाली सेना के सामने बाबर के 12 हजार सैनिक टिक नहीं पाते। भारतीय रजवाड़ों के पास यूरोपीय स्तर के मारक शस्त्र रहते तो ब्रिटिश राज न आता। टीपू ही भारत का सुल्तान बन जाता। ये तमाम वे संभावनाएं भारतीय इतिहास में दिखती हैं। और पीछे सदियों में चलें। यदि सम्राट अशोक बौद्ध न हो जाते तो माजरा ही अलग होता। अब आज के परिवेश में देखें। स्थिति स्पष्ट है कि परमाणु संग्राम की आशंका नहीं है। सभी ताकतवर देश समझते हैं कि तबाही सबकी होगी। बस परिमाण का फर्क है। कहीं भयावह, तो कहीं सीमित। एक मायने में परमाणु शक्ति ही सबसे बड़ी गारंटी है कि बम विध्वंस में इस्तेमाल नहीं होगा। यह खतरा दीगर है कि तालिबान कभी पाकिस्तानी बम के भंडार कोहाट पर्वत पर कब्जा कर ले और बिना कहे बटन दबाकर भारत पर बम बरसा दें। देर से सही, भारत भी तब जागकर पाकिस्तान को भूगोल से इतिहास के पन्नों में पहुंचा दे। उसे मटियामेट कर डाले।
आत्मरक्षा की वास्तविकता से तय होता है बजट अत: बहस फिर इसी मूल बिंदु पर आ जाती है कि भारत राष्ट्र-राज्य प्रतिरक्षा का बजट कितनी सीमा तक रखे ? यहां महत्त्व का मुद्दा आ जाता है कि पलटन के अतिरिक्त भी कोई आत्मरक्षा का वैकल्पिक उपाय है क्या ? नेहरू ने इसी मकसद से निगरुट राष्ट्र समूह रचा था। दुनिया के कमजोर मगर शांतिप्रिय देश दो साम्राज्यवादी शक्तियों अटलांटिक और सोवियत खेमों से समान दूरी बनाकर तीसरा खेमा स्थापित कर रहे थे। मगर यह निगरुट राष्ट्र समूह सोवियत खेमे का पुछल्ला बनकर रह गया। सुरक्षा के समान मुहैय्या नहीं करा पाया। वस्तुस्थिति से नेहरू अवगत हुए जब चीन ने हिमालयी सीमा पार की तथा अरुणाचल और लद्दाख पर धावा बोल दिया। निगरुट राष्ट्र समूह के संस्थापक नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति को एक संदेश भेजा, जिसका आशय था-त्राहिमाम!
रक्षमाम्! भला हो राष्ट्रपति जॉन कैनेडी का, जिसने तत्काल अमेरिकी वायुसेना को भारत की मदद में भेजी। चीन फौज लौटा ले गया। मगर काफी बड़े भू-भाग पर कब्जा जमा गया। परिणाम अच्छा हुआ कि भारत के रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन जो हमेशा पाकिस्तान को ही शत्रु नम्बर एक करार देते रहे, हटा दिए गए। चीन का वास्तविक खतरा समझ में आ गया। 1962 से भारत की रक्षा संबंधी तैयारियां तेज हो गयीं।ान्नता और शस्त्र
सैन्य जरूरतों को चाहिए संबंधों का सहारा इसी चरण में एक विफलता भारत सरकार की रही कि वह अपनी रक्षा और विदेश नीतियों में सामंजस्य स्थापित न कर सकी, जबकि नेहरू ही दोनों मंत्रालयों को सम्भाल रहे थे। विदेश नीति का एक विशिष्ट पहलू होता है कि वि के देशों से ऐसा तालमेल बैठाये जिससे संकट पर विदेशी सैन्य मदद मिले। इंदिरा गांधी ने यही तरकीब अपनाई थी, जब पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त कराने के पहले सोवियत- भारत मैत्री संधि बना ली थी। इसके तहत भारत पर आक्रमण को सोवियत रूस अपने पर हमला मानकर युद्ध में शामिल होता। लिओनेद ब्रेजनेव की इस धमकी से र्रिचड निक्सन डर गये। पाकिस्तान की मदद में आ रहे अमेरिकी जहाजी बेड़ा रुक गया। विदेश नीति की यह अभूतपूर्व सफलता थी। बराक ओबामा के अमेरिका से अथवा ब्लादिमीर पुतिन के रूस के साथ भारत समझौता कर लें तो चीन के आशंकित आक्रमण से बचाव हो सकता है। तब रक्षा का खर्चा भी बच सकता है। आर्थिक विकास हेतु संसाधन भी उपलब्ध होंगे। चीन के दक्षिण एशियाई साम्राज्य का सपना भी झुठलाया जा सकता है। अग्नि प्रक्षेपास्त्र पर खर्च हो रहा धन तब स्कूल, जनस्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि की योजनाओं हेतु आवंटित हो पाएगा।

यह प्रति-पहल भी करे भारत



हम भारतीय होने के नाते थोड़ा और प्रसन्न हो लेते हैं, अपने सीने को थोड़ा और फुला लेते हैं, अपनी गर्दन को गर्व से थोड़ा और अकड़ा लेते हैं कि हमारे प्यारे महान भारत ने अपनी प्रक्षेपास्त्र क्षमता का मारक-प्रहारक विस्तार थोड़ा और अधिक कर लिया है। अब हम पड़ोसी देशों के भीतर अपनी अग्नि को 5,000 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर तक बरपा कर सकते हैं। अपने दुश्मनों को थोड़े और कड़े तेवर दिखा सकते हैं और उन्हें हमारे साथ युद्ध में संलग्न होने से थोड़ा और दूर रख सकते हैं।
सभी शामिल हैं परमाणु दौड़ में यह दीगर बात है कि पूरी दुनिया में यही सब हो रहा है। अमेरिका-यूरोप से लेकर एशिया में पाकिस्तान तक और ईरान से लेकर उत्तर कोरिया तक परमाणु या उससे आगे के हथियारों की दौड़ चल रही है। धरती से धरती पर, धरती से सागर, धरती से आकाश पर प्रहार करने वाले, आकाश से धरती और सागर पर प्रहार करने वाले, आकाश से आकाश पर प्रहार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों, अंतरद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों का भंडार बढ़ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई इस दौड़ में हमसे बहुत पीछे है और कोई बहुत आगे। लेकिन यह विनाश की ऐसी अंधी दौड़ है जिसमें पीछे वाला आगे वाले से कभी भी बहुत ज्यादा पीछे नहीं होता। आगे वाले दौड़ की इस हकीकत को अच्छी तरह पहचानते हैं और अपने पीछे किसी भी परमाणु धावक की पदचाप सुनते ही बौखलाने लगते हैं। मगर इस दौड़ की वर्तमान स्थिति यह है कि हमारी धरती के चल-जल-नभ को कोई भी कोना आज ऐसा नहीं है जो परमाणु प्रक्षेपास्त्रों की जद से बाहर हो। यानी आज की पूरी दुनिया प्रक्षेपास्त्रों की मार के साये में सांस ले रही है। पर दौड़ निर्बाध जारी है और हम इसमें सांगोपांग शामिल हैं। यह दुनिया की वह दौड़ है जो जितनी ज्यादा दौड़ी जाती है उतनी ही ज्यादा डराती है, और जितनी डराती है उतनी ही ज्यादा दौड़ी जाती है। इसके निकटवर्त्ती और दूरवर्त्ती विनाशक परिणामों की परिकल्पना की पृष्ठभूमि में इस पर लगाम लगाने, इसे नियंत्रित करने, इसे सीमित रखने के प्रयास भी कम नहीं हुए हैं- न जाने कितने करार, कितनी संधियां, कितने प्रस्ताव। हो सकता है, इनसे कहीं कुछ रुकावट जैसी कोई चीज पैदा हुई हो परंतु व्यावहारिक तौर पर कोई भी रुकने और पीछे छूटने को तैयार नहीं है। परमाणु हथियार संपन्नता आज केवल ईरान या कोरिया का ही नहीं, हर उस मुल्क का सपना है जो इसे पूरा करने के लिए थोड़ी बहुत भी संसाधन जुटाने की स्थिति में हैं।
सबक है तो जापान इस दौड़ को रोकने के लिए हिरोशिमा, नागासाकी के बजाय जापान की ही परमाणु सुनामी को नये निरोधक उदाहरण के तौर पर सामने रखा जाने लगा है लेकिन कोई संप्रभु राष्ट्र इस उदाहरण को सबक के तौर पर याद रखना चाहता हो, ऐसा कहीं से भी दिखाई नहीं देता। उल्टे आशंकाएं ये जताई जाने लगी हैं कि कहीं यह विनाशक शक्ति राज्यों की सुसंगठित शक्ति का हिस्सा होने के बजाय अराजक तत्वों की आतंकी शक्ति का हिस्सा न बन जाए। यानी विनाश की नियंत्रणशील क्षमता के मध्य ही और अधिक व्यापक विनाश की नियंत्रणहीन संभावना भी पूरी तरह मौजूद हैं। यानी मनुष्य जाति अस्तित्व विनाश के दुहरे-तिहरे खतरे होने के लिए अभिशप्त है और यह बात भी दुनिया के हर कोने में हर रोज दुहराई जाती है कि दुनिया में जितना धन अधुनातन विनाशकिवध्वंसक हथियारों के अनुसंधान, निर्माण, रख-रखाव तथा उनके नियंतण्रपर व्यय किया जाता है, उससे दुनिया की आधी निर्धन आबादी को मनुष्यबल जीवनस्तर प्रदान किया जा सकता है। लेकिन इस तर्क ने भी हथियारों की भूख कम की हो, ऐसा कभी नहीं दिखा। दिखाने के टोने-टोटके जरूर होते रहे हैं, वे आगे भी होते रहेंगे।
शक्ति के वैिक मानदंड का मोह किसी भी आधुनिक राष्ट्र का राष्ट्रभक्त, प्रतिबद्ध और समर्पित नागरिक जब अपने राष्ट्र के सामरिक क्षेत्र में सुदृढ़, शक्तिशाली और सुरक्षासंपन्न होते देखता है तो स्वाभाविक तौर पर प्रसन्नता और गर्व का अनुभव करता है। उसकी राष्ट्रीय दृष्टि उन्हीं मानकों से निर्धारित होती है जो समूची दुनिया पर लागू हैं। वह देखता है कि उसका पड़ोसी देश, या सात समंदर पार का कोई प्रक्षेपास्त्रधारी देश उसके राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है या पैदा कर सकता है, तो उसकी स्वयं की आकांक्षा अपने देश को समुचित सामरिक प्रत्युत्तर देने में सक्षम देश के रूप में देखने की होती है। उसकी इसी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व उसके देश का राजनीतिक नेतृत्त्व करता है।राजनीतिक नेतृत्त्व सामरिक क्षमता संबंधी उपलब्धियों को गर्व के साथ अपनी जनता के सामने प्रस्तुत करता है और जनता उतने ही गर्व के साथ उसे स्वीकार करती है और राजनीतिक नेतृत्त्व को वैद्यता भी प्रदान करती है। जनता की इस गर्वानुभूति से यह तथ्य सिरे से गायब रहता है कि स्वयं उसे इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है। वह लगातार उस मिथ्या युयुत्सा की शिकार बनी रहती है जिसके चलते युद्ध और हथियारों के व्यवसायी खरबों के वारे-न्यारे करते हैं और पूरी दुनिया में षड्यांत्रिक युद्ध लिप्सा या युयुत्सा को सुलगाए रखते हैं, साथ ही दुनिया को विनाश की ओर धकेलते रहते हैं।
पर सोचें कब तक मोहरे रहेंगे हम भारत इस स्थिति का अपवाद नहीं है। फिर भी भारतीय जनता के सामने सवाल यह होना चाहिए कि दुनिया के कथित शक्ति संपन्न प्रक्षेपास्त्रधारी देशों द्वारा बिछाई गई वैिक बिसात पर भारत आखिर कब तक एक मोहरे की भूमिका में बना रहेगा? कब तक वह उसी हथियार प्रक्रिया का हिस्सा बना रहेगा, जो आज सिर्फ विनाश की भविष्यवाणी कर रही है? जब भारत हजारों किलोमीटर तक मार करने वाले स्वनिर्मित प्रक्षेपास्त्र के सफल निर्माण की घोषणा करता है तो दरअसल वही उसी कतार का एक सिपाही होता है, जो अरबों लोगों के वास्तविक हितों की कीमत पर दूसरों ने जबरन लगवाई है। उसकी प्रक्षेपास्त्र या परमाणु हथियार संपन्नता संबंधी कोई भी पहल मौलिक पहल नहीं है। भौतिक पहल तभी हो सकती है, जब वह स्वयं को इस कतार से निकाल कर बाहर खड़ा करे और युयुत्सा के तुमुलनाद के बीच दृढ़ता से अपनी हथियार विरोधी आवाज बुलंद करे। आज की दुनिया को सबसे ज्यादा इसी की जरूरत है। जब जरूरत है तो इसकी ठोस पहल यूरोप-अमेरिका की ओर से ही हो, इस अपेक्षा का कोई औचित्य नहीं है। यह पहल भारत की ओर से क्यों नहीं हो सकती? समूचे वि को खतरे में पड़ जाने देने के बजाय इस प्रति पहल के खतरे उठाने में कम खतरा है।

विकास के लिए जरूरी है सुरक्षा


किसी भी देश के लिए रक्षा पर किया गया खर्च मजबूरी का खर्च है। अगर इस पर खर्च नहीं किया जाएगा तो सारा विकास भी खतरे में रहेगा। चाहे वे कारण आंतरिक समस्याओं के हों या बाहरी समस्याओं के। इसिलए मेरा मानना है कि रक्षा पर किया जाने वाला खर्चे अपने देश की रक्षा करने के लिए और विकास करने के लिए चुकाई जाने वाली कीमत है। इसे एक किस्म का बीमा भी समझ सकते हैं, जो अपने देश को बचाने के लिए किया जाता है। अगर देश खतरे में पड़ गया तो न तो उद्योग-धंधे चलेंगे और न ही देश की जीडीपी कुलांचे भरेगी। अब सवाल पैदा होता है कि रक्षा पर किया जाने वाला खर्च कितना हो? हमें किन चीजों पर खर्च करना चाहिए और किन चीजों को नहीं। यह सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है। हमें देखना पड़ेगा कि हमारे आसपास के देशों के पास कौन-से हथियार हैं। उनकी रणनीति और मंशा क्या है? इसका आकलन कर ही हमें अपनी जरूरतों के लिए निष्कर्ष निकालना चाहिए। हमारे देश का तो यह हाल है कि पड़ोसी अक्सर दुश्मनी पर तुल जाते हैं और जंग का ख़्ातरा मंडराता रहता है। एक तरफ चीन है और दूसरी तरफ पाकिस्तान। किन्हीं-किन्हीं जगहों पर दोनों मिलकर हमारे लिए खतरा बन जाते हैं। तो हमें अपने रक्षा संसाधनों में इतनी बढ़ोतरी करनी होगी कि वे हम पर हमला करने की हिम्मत न करें। यह तभी हो सकता है, जब हमारे पास भी मिसाइल, तोपखाना, लड़ाकू हवाई जहाज और पनडुब्बियां जैसे सामरिक महत्त्व के हथियार और संसाधन हों। इनके अलावा परमाणु हथियारों की भी जरूरत है ताकि उनको मुंहतोड़ जवाब मिलने का डर हो। खर्च घटाने के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करना होगा यह जज करना बहुत मुश्किल है कि हमें कौन-से हथियार कब और कितनी मात्रा/तादाद में खरीदनी चाहिए। इसका निर्णय सेनाध्यक्ष, रक्षा मंत्री और विशेषज्ञ मिलकर करते हैं। हालांकि कई बार उनके निर्णयों पर सवाल उठते हैं कि अमुक देश से या अमुक कंपनी से साजो-सामान क्यों खरीदे गए? बाहरी देशों से अक्सर हमें हथियार महंगे दामों पर मिलते हैं, जिनसे रक्षा पर किए जाने वाले खर्च में बढ़ोतरी होती है। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि अधिक से अधिक हथियारों का उत्पादन हम देश में ही करें ताकि उनकी लागत कम से कम हो। अभी तो यह हाल है कि नई तकनीक का विकास नहीं होता और डीआरडीओ जैसी संस्था दस साल में एक हथियार बनाती है जो हमारी जरूरतों के लिए नाकाफी है। स्वदेशी तकनीक से हम एक प्रभावी बैटल टैंक तक नहीं बना पाए हैं। लड़ाकू विमान और रडार तो हम बना ही नहीं रहे हैं। ये सब चीजें बाहर से हमें खरीदनी पड़ती है, जिसकी कीमत काफी अधिक होती है। हथियारों पर किए जाने वाले खर्च को घटाने के लिए बहुत जरूरी है कि हम अपनी तकनीक विकसित करें। अगर सरकारी संस्थाओं में पर्याप्त क्षमता नहीं है तो हमें निजी क्षेत्र को साथ लेना चाहिए। देश की कई निजी कंपनियों के शोध एवं तकनीक इस लायक हैं कि वे वैिक स्तर के हथियारों का निर्माण कर सकें। हम उन्हें मौका दें। अमेरिका वगैरह देशों में सरकार निजी उद्योग घरानों को अपनी जरूरत के हथियारों की किस्म बता देती है। उसके बाद वे उन मानकों के अनुरूप हथियारों का विकास और निर्माण करती हैं। यहां यह हाल है कि सरकार केवल सरकारी महकमों और हथियार कारखानों से काम कराना चाहती है। कमजोर होने का मतलब हमलावर को बुलाना होगा यह सवाल पूरी तरह से गलत है कि देश का पैसा रक्षा में खर्च किया जाए कि विकास में? हमें एक संतुलन बनाकर चलना होगा। आज के वैिक परिदृश्य को देखें तो जिन देशों की सामरिक शक्ति कम है, उन पर दूसरे देश हमला कर रहे हैं। अमेरिका भी भूल कर चीन या ईरान पर हमला नहीं करता, बल्कि उन्हीं देशों को निशाना बनाता है जिनकी सैन्यशक्ति कमजोर है। इस लिहाजन, हमें कमजोर बनकर उस दिन का इंतजार नहीं करना चाहिए कि जब कोई देश हम पर हमला बोल दे। इसके अलावा किसी को भी अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए क्योंकि आंतरिक राजनीति हो या वैिक राजनीति वह हमेशा बदलती रहती है। इसलिए हमें न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता तो रखनी ही चाहिए कि कोई हमें तबाह न कर सके। पूरक हैं परमाणु और मूलभूत हथियार यह दलील भी फिजूल की है कि परमाणु हथियार के बाद छोटे हथियारों की क्या जरूरत है? मेरा मानना है कि लड़ाई में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। यह क्षमता केवल अपने विरोधियों के डराने के लिए है कि आपातस्थिति में हम परमाणु हमला करने में सक्षम हैं। परमाणु हथियारों से जंग नहीं लड़ी जा सकती। इसका इस्तेमाल हम दूसरों को तबाह करने के लिए तो कर सकते हैं लेकिन इससे अपनी जमीन को तबाही से नहीं बचाया जा सकता है। जिन बड़े-बड़े देशों के पास परमाणु हथियार हैं, उनके पास दूसरे हथियारों की ताकत उतनी ही ज्यादा है। बिना मूलभूत हथियारों के परमाणु हथियार की ताकत भी कोई काम नहीं कर सकती। अत: सरकार को कटौती करनी हो तो फिजूलखर्ची पर लगाम लगाए। हजारों ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार फिजूल में पैसे बरबाद करती है। इसके अलावा, भ्रष्टाचार विकास में सबसे बड़ा अड़ंगा है। भ्रष्टाचार की वजह से ही विकास के धन का चौथाई हिस्सा भी सही इस्तेमाल नहीं हो पाता है। हमें उन्हें रोकने की जरूरत है न कि रक्षा पर किए जाने वाले खर्च में कटौती करने की। गरीबी और विकास के कार्यक्रमों को रक्षा से जोड़ना गलत है। एक किसान भी अपनी फसल की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाता है। नहीं तो उसकी फसल खतरे में रहेगी। उसी प्रकार, अगर रक्षा पर खर्च नहीं करेंगे तो देश खतरे में रहेगा और फिर सारा विकास बेमानी होगा। अत: सरकार को रक्षा और विकास में एक संतुलन बनाकर चलना होगा।

शांति रक्षक हथियार

अग्नि-पांच के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण भारत के लिए उत्साह प्रदर्शन का वास्तविक अवसर था। अंतरवर्त्ती (मध्यम) दूरी की यह बलास्टिक मिसाइल (आईआरबीएम) है जो 5,000 किलोमीटर तक मार कर सकती है। इसके प्रक्षेपण के साथ ही भारत रणनीतिक मिसाइल समुदाय के दशों के क्लब में शामिल हो गया है, भले उसका कोई स्वागत करे या न करे, पर दुनिया को उसके साथ रहना सीखना अवश्य होगा। भारतीय लोगों के विचार में अग्नि-पांच का आख्यान तरोताजा करने वाला और एक स्वागतयोग्य राहत है वरना राजनीतिक घटियापन का अंतहीन धारावाहिक ही चलता रहता, जो अब राष्ट्रीय परिदृश्य का प्राय: स्थायी भाव हो चला है। लेकिन भारत उत्साह से संवर्धित वातावरण को लंबे समय तक जारी नहीं रख सकता। दक्षिण एशिया का पर्यावरण बड़ा ही रुखा-सूखा है और तकनीकी परिष्कार तथा सांगठनिक ढांचे बनाने की दिशा में बहुत कठिन परिश्रम करने की जरूरत अब भी बनी हुई है। यह अपरिहार्य है कि अग्नि-पांच का उत्पादन किया जाए। फिर, एक समेकित और पूरी तरह भारतीय रणनीतिक मिसाइल पण्राली की अभियांत्रिकी के एक कारक में रूप में, उसे जितनी जल्दी हो सके, सेना में शामिल किया जाए। भारत के रणनीतिक हथियारों का जखीरा तो संबद्ध सेना के हवाले रहता है लेकिन किसी अभियान के तहत उनकी तैनाती का मसला रणनीतिक सैन्य बल कमांड से नियंत्रित-संचालित होता है। यह एकीकृत रक्षा स्टाफ (आईडीएस) के तहत काम करता है, जो अपने देश में चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अधीन होता है, न कि अन्य देशों के जैसे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के तहत। आई डीएस को निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़ना होगा अत: राष्ट्रीय सुरक्षा के सर्वोच्च प्रबंधन की पण्रालीगत खामियों की ओर संकेत करने के लिए अग्नि-पांच का सफल प्रक्षेपण एक उचित मौका है। आईडीएस को रणनीतिक बल का मुख्य नियंत्रणकारक बनाया जाना चाहिए लेकिन इसकी स्थापना के कई दशकों बाद भी इसे बुरी तरह चोटिल लंगड़ा बत्तख बना कर रखा गया है। आईडीएस को सेना के तीनों अंगों को राष्ट्रीय स्तर पर सामरिक और परिचालन योजना के समन्वयक के मुख्य प्राधिकरण के रूप में स्थापना की गई थी। तीनों सेनाएं दिखावे के लिए भले ही अपनी बहादुर छवि पेश करें लेकिन यह बात छिपी नहीं रही कि सीमित दृष्टि और संकीर्ण सोच के चलते, आईडीएस कमोबेश एक शोभा का संस्थान रह गया है। यह मुख्यधारा के निर्णय की प्रक्रिया से भी लगभग पूरी तरह कटा हुआ है। तर्क और नजीरों को हिसाब से तो अग्नि-पांच को सामरिक तैनाती के लिए भारतीय सेना की रणनीतिक मिसाइल इकाइयों को सौंप दिया जाना ठीक होता। इनमें से कई यह भी तर्क दे सकते हैं कि मानवसहित लड़ाकू विमान वाले वायुसेना को पायलट रहित विमानों में बदला जा सकता है, यह उस संभावित फेरबदल की ओर संकेत करता है। अग्नि-पांच के बारे में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक जब इसे पूरी तरह विकसित कर लिया जाए तब इसे जल-थल और सड़क मार्ग से ले जाने के लिए उसके स्वरूप में बदलाव किया जाएगा। भारत इस पर भी इत्मीनान और न्यायोचित गौरव कर सकता है कि अग्नि-पांच के लिए अन्य जटिल उपकरणों का उत्पादन देश में ही होने जा रहा है, इनमें से कई उत्पादक तो निजी क्षेत्र के हैं। इनमें से अहम अग्नि मिसाइलों के लिए मोबाइल मिसाइल प्लेटफार्म हैं, उसकी डिजाइन परिवहन-लांचर वाहन के जैसे की गई है, जैसा कि गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली में आयोजित होने वाले परेडों में दिखाई देता है। इसलिए यह किसी भी तरह से कोई कमतर उपलब्धि नहीं है। इसी समान कोटि में टोही खुफिया और निगरानी उपग्रह, लक्ष्यवेधक और मिसाइल निर्देशन के साथ अन्य संचार तथा सहायता पण्राली के उपकरण, सभी के सभी भारत में बने हैं। परमाणु आक्रमण की स्थिति में व्यापक प्रतिरोधको देखते हुए भारत की पहले मार न करने कीस्थायी परमाणु नीति के साथ, अग्नि-पांच को आणविक और परंपरागत दूसरी-प्रहार पण्राली के जरिये भी छोड़ा जा सकता है। यह दुश्मन के पहले प्रयोग किए जाने की स्थिति पर निर्भर करता है। इसके लिए अग्नि-पांच और इसके सहायक ढांचे को प्रतिपक्ष के पहले शत्रुतापूर्ण आक्रमण को झेलने लायक होना होगा और तत्पश्चात, दूसरे क्रम में, उसे अपने मूल्यवान लक्ष्यजैसे नगर और रणनीतिक महत्त्व के आबादी वाले केंद्र को लक्षित करने अपने जवाबी दंडात्मक अभियान पर निकलना होगा। भारत के लिए कितनी ज्यादा ताकत जवाबी ताकत होने के लिए चाहिए? ये और इससे जुड़े सवाल जवाबी मूल्यों और जवाबी ताकत पर निर्भर करेगा जिसे हम प्रतिक्रिया के लिए चुना जाएगा। इसी हिसाब से संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। मिसाइलों के मामले में पाकिस्तान और चीन अग्नि-पांच के अवतार पर पाकिस्तान से उकसावे की तीव्र प्रतिक्रिया मिली है, जिसने हत्फ-सात मिसाइल दागी है, जो 3000 से 3500 कि.मी. तक मार कर सकती है और जिसकी मारक क्षमता की जद में पूरा उपमहाद्वीप आता है। इसके पहले, भारतीय बालिस्टिक मिसाइल पाकिस्तान के दूरस्थ इलाकों तक मार कर सकती थी लेकिन पूर्वोत्तर के इलाके तब भी उसके दायरे से बाहर थे। हत्फ-सात ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है और भारत-पाकिस्तान के शक्ति संतुलन में, चीन के साथ उसके साझा रणनीतिक संबंधों समेत एक नया तत्व जोड़ दिया है। आठ हजार कि.मी. तक मार करने के दावे के साथ चीन के आईआरबीएम/आईबीसी कोटि की डाँग फेंग (पूर्वी हवा) मिसाइल का मुंह अमेरिका की मुख्य भूमि पश्चिमी तट की तरफ है और वह पूर्वी/दक्षिणी चीन सागर में तैनात अमेरिकी सैन्यबल के जहाजी बेड़ेध्वस्त करने लिए तैनात हैं। तिब्बत और पश्चिमी चीन में तैनात डांग फेंग मिसाइल आसानी से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को निशाना बना सकती है। अग्नि- पांच ने अपनी संवर्धित क्षमता के जरिये इस भय से छुटकारा दिला दिया है और एक अर्थ में शक्ति असंतुलन को दूर कर दिया है। डाँग फेंग श्रृंखला की मिसाइलें समुन्नत हथियार पण्राली से निर्मिंत हैं जबकि अग्नि-पांच अब भी प्राथमिक अवस्था की तकनीक का प्रदर्शक है। सेना को सौंपे जाने और उत्पादन की हरी झंडी देने के पहले अग्नि-पांच के लक्ष्यवेधन की अभी जांच-परख बाकी है। चीन और पाकिस्तान जैसे तथाकथित अंतरराष्ट्रीय समुदायउन परीक्षणों को न करने के लिए भारत पर कड़े दबाव डालेंगे। भारत को इनके साथ उन देशों के दबावों के आगे अडिग रहना होगा, जो हमारे मित्र हैं। अग्नि-पांच के दूसरे स्तर के परीक्षणों के दरम्यान पोखरण-दो जैसी कंपकंपी हमारी प्रतिक्रियाओं में नहीं दिखनी चाहिए। अभी संसद में एक राष्ट्रीय नेता ने अग्नि-पांच को शांति का हथियारकहा है। संभव है कि उपमा देने में वह थोड़े भ्रमित हुए हों क्योंकि अग्नि-पांच निस्संदेह जंग का हथियार है, जो भारत का ताकतवर शांतिरक्षकभी है। (एशियन एज में प्रकाशित आलेख के संपादित अंश)

गलत नहीं रक्षा पर भारी खर्च



भारत ने जब भी प्रतिरक्षा के प्रति लापरवाही बरती हमले एवं पराजय झेलने पड़े
केंद्रीय बजट पेश किए जाने के ठीक तीन दिनों बाद स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टीच्यूट सिप्री ने वि भर में हथियारों की खरीद का आकलन करते हुए बताया कि भारत चीन को पीछे छोड़कर वि का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। इसके अनुसार, 2007 से 2011 के बीच विदेशों से इसने 12.7 अरब डालर के हथियार और साजो सामान खरीदे जो वि की कुल खरीदारी का 10 प्रतिशत है। जेन्स डिफेंस वीकली का आकलन है कि यह 2011 से 2015 के बीच 100 अरब डॉलर के करीब हथियार खरीदेगा। यह तब का आकलन है, जब सेनाध्यक्ष वीपी सिंह के हथियार और साजो-सामान कम होने संबंधी पत्र को लेकर बावेला नहीं मचा था। संसदीय समिति द्वारा इस पर मुहर लगाने के बाद रक्षा खरीदारी में तेजी दिखाई दे रही है। यह सवाल हमेशा उठाया जाता है कि आखिर हमारे भारी भरकम रक्षा खर्च का औचित्य क्या है? अत्यधिक रक्षा व्यय तो शांति की जगह सैन्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा, जिससे भू-राजनीतिक परिस्थितियां तनावपूर्ण होंगी, देशों के बीच एक दूसरे के प्रति आशंकाएं और वैर भाव पैदा लेगा। तो क्या रक्षा खर्च का बढ़ना अनौचित्यपूर्ण है? सबसे पहले अपने रक्षा खर्च पर संक्षिप्त नजर डालें। इस वर्ष का हमारा रक्षा बजट है 1 लाख 93 हजार 407 करोड़ रुपये। यह अमेरिकी डॉलर में 38.5 अरब डॉलर है। पिछले साल का हमारा संशोधित बजट था, एक लाख 70 हजार 937 करोड़ यानी 34 अरब डॉलर। इस तरह कुल वृद्धि 13 प्रतिशत है। भारत दुनिया का अकेला देश है जिसका रक्षा बजट 2009-2010 में एकाएक 34 प्रतिशत बढ़ा। यह तथ्य कम लोगों को पता है कि भारत के रक्षा बजट में अधिकतम हिस्सा राजस्व खर्च यानी वेतन, भत्ते पेंशन सहित अन्य मदों में जाता है। उस वर्ष छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के कारण बजट में वृद्धि करनी पड़ी थी। पूंजीगत खर्च यानी हथियार खरीद, हथियार उन्नयन, रख-रखाव और उन्नयन का सेवा शुल्क आदि पर 40 प्रतिशत खर्च होता है। इस वर्ष इसके लिए 17 अरब डॉलर की राशि तय है जो पिछले वर्ष से 15.7 प्रतिशत अधिक है। राफेल विमान, पीसी 7 प्रशिक्षण विमान खरीदने को हरी झंडी मिल चुकी है। इसके अलावा बोफोर्स होवित्जर तोपों का स्थानापन्न, उसके गोला बारूद, वाहक वाहनों... की लंबी सूची सामने आ चुकी है। अगले वर्ष की भी खरीदसूची बन रही है। जाहिर है, अगले वर्ष का बजट और बढ़ेगा।
रक्षा नहीं, सामाजिक-आर्थिक खच्रे बढ़ाने की भारत को सलाह
इस प्रसंग में भारत के मंसूबों को लेकर कई प्रकार के आकलन आ रहे हैं। कुछ इसे अनुचित बता रहे हैं। उनका मानना है कि भारत रक्षा खर्च के बजाय सामाजिक-आर्थिक विकास पर खर्च बढ़ाए। किंतु जरा अपने पड़ोसी चीन का रक्षा बजट देखिए, यह 106.39 अरब है। यानी भारत के तीन गुने से ज्यादा। पिछले वर्ष की तुलना में 11.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। चीन ने पिछले वर्ष भी 12.7 प्रतिशत की वृद्धि की थी। इसका रक्षा बजट था, 91 अब डॉलर। पिछले वर्ष भी हमारे बजट से तीन गुना था। अनेक वर्षों से इसकी वृद्धि दो अंकों में हो रही है। अगर समूची अर्थव्यवस्था के अनुपात में देखा जाए तो सिप्री के अनुसार 2010 तक भारत का रक्षा व्यय सकल अर्थव्यवस्था के 2.4 प्रतिशत, पाकिस्तान का 3.2 प्रतिशत एवं चीन का 2 प्रतिशत के आसपास था। चीन की समूची अर्थव्यवस्था का आकार हमसे साढ़े तीन गुना ज्यादा है। एक सच यह भी है पाकिस्तान का रक्षा व्यय 1988 में सकल अर्थव्यवस्था के 6.2 प्रतिशत था। इसके समानांतर भारत का रक्षा व्यय 3.6 प्रतिशत था। भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार तब से चार गुना से ज्यादा हो गई है, लेकिन रक्षा बजट उसके अनुपात में घटा है। यह बात अलग है कि कुल बजट का करीब 15 प्रतिशत रक्षा पर खर्च हो रहा है।
क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय सैन्य संतुलन के मुताबिक चलना होगा दुनिया के हालात ऐसे हों जिनमें रक्षा पर न्यूनतम खर्च करना पड़े तो फिर अनेक मानवीय-प्राकृतिक समस्याएं अपने-आप समाप्त हो जाएंगी। महात्मा गांधी की तो कल्पना ही भारत को सत्य और अहिंसा का पालन करने वाले ऐसा देश बनाने की थी, जो शस्त्रास्त्रों का खर्च उठाए बिना ही अपने को सुरक्षित अनुभव करता। वे एकदूसरे से लड़ने वाले नहीं वरन मित्रभाव रखने वाले अन्योन्याश्रित राज्यों के वि संघ की कल्पना करते थे। पं. नेहरू ने भी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को नीतियों में उतारने की कोशिश की। परिणाम 1962 का हमला और पराजय। जिस देश को आजादी के 52 वर्ष के अंदर पांच प्रत्यक्ष युद्ध में उतरना पड़ा हो, जिसे दो दशक तक छद्म युद्ध लड़ना पड़ा हो, जिसकी सुरक्षा पर हर क्षण छोटे-बड़े खतरे मंडरा रहे हों, उसे इच्छा या अनिच्छापूर्वक भी अपनी रक्षा की सशक्त तैयारी रखनी होगी। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में राष्ट्रों को क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन का अनुसरण करना पड़ता है। चीन के पास 22 लाख 50 हजार की सबसे बड़ी सेना है। चीन का 4057 कि. मी. सीमा पर जो रवैया है उसे देखते हुए भारत के पास चारा क्या है? अमेरिका का रक्षा बजट तो 600 अरब डॉलर के आसपास हैं। जब चीन की सेना अदन खाड़ी और उसके आगे तक तैनात हो रही है तो फिर भारत के सामने विकल्प क्या रह जाता है?
विसैन्यीकरण हमले का न्योता देना होगा चीन का यह तर्क हम मान भी लें कि उसकी रक्षा तैयारियों में कोई देश लक्ष्य नहीं है, फिर भी एक चौकस राष्ट्र के नाते साकार- सजगता हमारी विवशता है। शीतयुद्ध के बाद सैन्य और अर्थ पर आधारित शक्ति-संतुलन के परंपरागत सिद्धांत में परिवर्तन की जो कामना की गई थी, स्थिति उसके उलट है। इस समय दुनिया का रक्षा खर्च शीतयुद्ध काल से आगे बढ़ चुका है। बढ़ते क्षेत्रीय- अंतरराष्ट्रीय द्वंद्व, देशों के बीच एवं देशों के अंदर बढ़ते अविास और तनाव, आतंकवाद, आर्थिक संसाधन बढ़ाने के लिए प्रभाव शक्ति विस्तार की सतत कोशिशों..वाली वि- व्यवस्था में आप विसैन्यीकरण की ओर अग्रसर होकर दूसरे देशों को अपने पर हमला करने या ताकत की धौंस से परेशान करने के लिए प्रेरित करेंगे। इससे संतुलन भंग होगा और शांति की जगह अशांति पैदा होगी। भारत के प्राचीन चिंतकों भीष्म, शुक्र, कौटिल्य सबने राज्य के सात अंगों में दण्ड या सेना को विशेष महत्त्व दिया है। कौटिल्य ने कहा है कि जिस राजा के पास अच्छा सैन्य बल होता है, उसके मित्र तो मित्र बने ही रहते हैं, शत्रु तक भी मित्र बन जाते हैं। ध्यान रखिए कि कौटिल्य या किसी भारतीय चिंतक ने अनावश्यक हमला, युद्ध ये दूसरे राज्यों को डराने-धमकाने की कतई अनुमति नहीं दी है और न ही संपन्नता अभिवृद्धि को बाधित करने की बात कही है। कोष एवं सेना दोनों को महत्त्व दिया गया है। यह सिद्धांत आज भी लागू होता है। भीष्म ने तो महाभारतके शांतिपर्वमें ऐसी राज व्यवस्था को आदर्श माना जिसमें न कोई दंड देने वाला हो न दंड लेने वाला, लेकिन राष्ट्र की रक्षा हो, प्रजा निर्भय होकर अपना कर्त्तव्य निभाए तथा भीतर एवं सीमा के चारों ओर शांति का संतुलन कायम रहे इसके लिए प्रशिक्षित, वीर, स्वाभिमानी, राष्ट्रप्रेमी सेना के समूह को अपरिहार्य बताया है। ज्ञात इतिहास में भारत के साथ यह त्रासदी रही है कि जब-जब इसने भावुकता में इस सिद्धांत की अनदेखी की हमले एवं पराजय झेलने पड़े। शीतयुद्ध काल में जब दुनिया दो शक्तियों के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा और गुटों में बंटी थी, भारत ने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का नारा दिया, निगरुट संगठन खड़ा किया। जिन देशों के हाथों दुनिया का नेतृत्त्व था, उनने न तब इस पर अमल किया और न आज कर रहे हैं। इसमें भारत के अपने उदात्त सिद्धांतों को साकार करने की गुंजाइश कहां बचती है? हां, हम अपने आसपास एवं वि की सुरक्षा स्थिति का तात्कालिक एवं दीर्घकालिक आकलन करते हुए रक्षा तैयारियों की अपनी एक सीमा बनाएं और उस पर अमल करें। उसमें बदले हालात में संशोधन हों पर हम शस्त्र प्रतिस्पर्धा में न पड़ें, यही यथेष्ट होगा।

ताकतवर हैं हम हमलावर नहीं


भारत दुनिया में सबसे बड़ा हथियारों का खरीददार क्यों है जबकि देश की दूसरी कई बड़ी जरूरतें भी हैं? सभ्यता मूलक दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि भारत कभी भी हमलावर नहीं रहा है। हालांकि, ताकतवर रहा है। यह सचाई है कि कोई हमला न करे, इसके लिए भी शक्तिसंपन्न होना जरूरी है। कहा गया है कि शस्त्र द्वारा राष्ट्र की रक्षा हो जाने पर ही शास्त्र की चिंता में प्रवृत्त होना चाहिए। यही नहीं, दिनकर की पंक्ति है-क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो। ये दोनों पंक्तियां अलग- अलग पर गहरी बात कहती हैं। इसलिए मैं दृढ़ता के साथ कह सकता हूं कि भारत की प्रतिरक्षा योजना हमेशा से ही आत्मरक्षा से प्रेरित रही है। आक्रमण की इसी आधार पर तैयारी भी रही है। ऐतिहासिक अनुभव यही है कि शक्ति के साथ तकनीक का आवश्यंभावी विकास होता रहे तो समान परिस्थिति में सौ सैनिकों की टुकड़ी हजार की फौज का सहजता से मुकाबला कर सकती है। इसलिए प्रतिरक्षा के लिए बेहतर तकनीक व नये हथियार जरूरी होते हैं लेकिन गत हजार वर्षो में यहां हथियार व तकनीक को निरंतर विकसित न कर पाने की समस्या रही है। हालांकि, छत्रपति शिवाजी ने इस दिशा में प्रयास किया था। उन्होंने कान्होजी आंग्रे के सहयोग से पश्चिमी समुद्र तट पर एक मजबूत नौसेना खड़ी की थी पर ऐसे एक-दो प्रयास ही हुए थे। मैं समझता हूं कि तकनीक के इस युग में राष्ट्र रक्षा के लिए वीरता के साथ हथियार भी आवश्यक हैं।
आजादी के बाद भारत ने हर क्षेत्र में अपने पांव पर खड़े होने की कोशिश की है। हथियारों के मामले में ऐसा क्यों नहीं हो पाया?निश्चित तौर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा। हालांकि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी सरकार की ओर से उपेक्षा का भाव रहा पर वहां अवरोध नहीं था। मैंने देखा है कि शांति के पैरोकार किस तरह दूसरी जरूरतों को अहम बताकर प्रतिरक्षा के तकाजों को नजरअंदाज करते रहे हैं। इनसे गत 30 वर्षो में देश के रक्षा संबंधी जो इंतजाम होने थे, वे कम पड़ गए। वे लोग भारत की विदेश नीति पर भी हावी रहे हैं। पहले रूस और फिर अमेरिका की छतछ्राया में भारत को रखने की लगातार कोशिश हुई। तब कई नीतिगत भूलें हुई। बड़ी ताकतों की वकालत करने वाली लॉबी ने सत्ता तंत्र में घुसपैठ कर रक्षा तंत्र को पूरी तरह अपने चंगुल में कर लिया है। ऐसी स्थिति में प्रतिरक्षा क्षेत्र में जो विकास होना था, उसमें हम कम पड़ गए। बार-बार निरस्त्रीकरण और शांति की बात की गई। अन्य जरूरतों को आगे कर प्रतिरक्षा से ध्यान हटाने की कोशिश हुई। एक यूटोपियाई दुनिया की तस्वीर प्रस्तुत की जाने लगी और हम इन चीजों से मुक्त नहीं हो पाए। हमारे पास प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं थी पर शासन तंत्र ही जड़ हो चुका था। जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो साम्यवादियों ने उसे झुठलाने की कोशिश की थी। दरअसल, छद्म बुद्धिजीवी और शांति की बात करने वाले लोग यथार्थ से टकराने का कलेजा नहीं रखते थे। वे दिग्भ्रमित कर रहे थे। वहां सत्ता में बैठे लोगों को जनता की ताकत का भरोसा नहीं था जबकि जरूरत पड़ी थी तो लाल बहादुर शास्त्री जी के समय इसी देश की जनता ने एक वक्त का भोजन छोड़कर उनके हाथ मजबूत किए थे। मेरा कहना यह है कि देश की जनता इस दिशा में अलग तरीके से सोचती है जबकि राजतंत्र और नौकरशाही तो बिल्कुल दूसरी सोच रखती है। वे लोग जनता से पूरी तरह कटे हुए हैं। आज जो स्वाभिमानी लोग सुरक्षा की आवश्यकता पर बल देंगे, उन्हें ये अयथार्थवादी लोग वॉर मॉन्गर यानी युद्ध पिपासु करार देंगे। इससे देश का अहित ही हो रहा है।
क्या हथियारों के सौदे में भी सियासत होती है? आप स्वयं देख लें। चीन के हमले के दौरान भी सैनिकों के ड्रेस, जूते- मौजे के बारे में खूब बातें उठी थीं। बोफोर्स सौदा तो इस मामले में एक क्लासिक केस बन गया है। इसे लेकर अभी-अभी एक खुलासा स्टेन लिंडस्ट्रोम ने किया है। विदेशों में रु पये जमा कराने की बात सामने आई है। रक्षा सौदे से जुड़े ऐसे कई मामले हैं, जहां विवाद उत्पन्न हुए और राजनीतिक स्तर पर तीखी बयानबाजी हुई। दरअसल, समय और जरूरत के हिसाब से जो एक पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई, जिसका परिणाम अब सामने आया है। सेना प्रमुख ने भी गोला-बारूद संबंधी जो बातें कही हैं, वह दूसरे संकट की तरफ इशारा करती है। एक समय देश में थोरियम आधारित परमाणु तकनीक की संभावनाओं पर बल दिया गया था लेकिन यूरेनियम आधारित तकनीक को ही बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि,यदि हम थोरियम आधारित परमाणु तकनीक विकसित कर पाते तो आत्मनिर्भर हो सकते थे पर यहां परिस्थितियां दूसरी हैं। यूरेनियम लॉबी के प्रभाव में आकर हमने थोरियम आधारित तकनीक को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
भ्रष्टाचार का पहला मामला जीप घोटाला रक्षा सौदे से जुड़ा था। आज भी रक्षा घोटाले सुर्खियों में है, क्यों? प्रतिरक्षा क्षेत्र की संवेदनशीलता के कारण गलत नीयत वाले लोगों के लिए गोपनीयता के नाम पर यहां भ्रष्टाचार करना सरल हो जाता है। एक और बात है। वह यह कि यहां सौदे में लगने वाला धन भी ज्यादा होता है। ये दोनों ही भ्रष्टाचार के प्रमुख कारण हैं। रक्षा सौदे और प्रतिरक्षा पर के.एन. गोविंदाचार्य से ब्रजेश कुमार झा की बातचीत

जनसंहार के हथियार

अग्नि-पांच मिसाइल के परीक्षण पर आनंद से फूले न समाने का कारण नहीं है; एक परवाह करने वाला समाज इसके विपरीत इसे लेकर चिंतित ही होगा कि आखिर भारत किस तरफ जा रहा है। रणनीतिक मामलों के प्रतिष्ठान और एक राष्ट्रवादी मीडिया जब तब छाती पीटने के अवसर ढूंढता है और भारत की परमाणु क्षमता के प्रदर्शन पर उत्सव मनाता है और भारतीय राज्य इस सीमित दृष्टिकोण वाले कट्टर सैन्य राष्ट्रवाद को चुपचाप प्रोत्साहित करता है। इसी तरह, 2009 में आक्रामक राष्ट्रवाद का तब परचम लहराया गया था, जब भारत ने पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत को समुद्र में परीक्षण के लिए उतारा था। भारत की पहली अंतरमहाद्वीपीय बलास्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) अग्नि-पांच की कामयाबी के मौके पर इसी तरह की नासमझी की प्रशंसा हिलोरे मारती रही है। अरिहंत और अग्नि-पांच के जांच/परीक्षण की प्रक्रिया की शुरुआत दरअसल, आठवें दशक के मध्य में हो गई थी और भारतीय परमाणु सिद्धांत (के प्रारूप) के 1999 में बनने और पूरा होने के साथ इस कार्यक्रम को सरकारी आशीर्वाद भी प्राप्त हो गया था। भारतीय राज्य की सेना के तीनों अंग-वायु, नौसेना और थल-चीन को विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता हासिल करने की गरज से परमाणु हथियारों और साजो-सामान के लिए लालायित हो रहे हैं। परीक्षणों का यह मतलब नहीं है कि भारत की यह त्रयीमहज सामरिक है लेकिन इसमें कोई भूल नहीं होनी चाहिए कि भारत ने एशिया में परमाणु पल्रय लाने की दिशा में एक और रसातली कदम उठा लिया है। यह वह तथ्य है, जिसको हमारे टिप्पणीकारों और आनंद-उमंग फैलाने वाले नेताओं ने नजरअंदाज कर दिया है। रणनीतिक मामलों के प्रतिष्ठान में बैठे धुरंधर बाल की खाल निकालते हुए कहेंगे कि अग्नि-पांच अंतरवर्त्ती (मध्यम) दूरी की बलास्टिक मिसाइल (आईआरबीएम) है, आईसीबीएम नहीं। (चूंकि अग्नि-पांच की मारक क्षमता महज 5,000 किलोमीटर है जबकि आईसीबीएम की कोटि में आने के लिए यह क्षमता 5,500/6,000 कि.मी. होनी चाहिए) ; और यह भी कि इसकी मोबाइल लाँच और तैनाती के लिए रेल से ले जाना आसान नहीं होगा। यह भी कि अरिहंत के पास अभी तक पनडुब्बी को दागने वाली परमाणु मिसाइल नहीं है। लेकिन ये सभी तुच्छ आपत्तियां हैं। असल बात यह है कि भारत ने जो रास्ता अख्तियार किया है और त्रयीको क्षमतावान बनाने के लिए तरक्की के जिस मील पत्थर से गुजरा है-वह विलंबित, खर्चीला और अंतत: खतरनाक है। साल 2006 में अग्नि-तीन (आईआरबीएम कोटि की मिसाइल जिसकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर तक है) के सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत दक्षिणी चीन को अपनी मारक जद में ले सकता है। लेकिन आईसीबीएम के साथ-और जिसे दुनिया के मात्र छह देश ही अंजाम दे सकते हैं-रणनीतिक मामलों में बोलने वाली ताकत की महत्त्वपूर्ण वैधता है। अग्नि- पांच का सफल परीक्षण (जिसकी मारक जद में पूर्वी और मध्य यूरोप है) इसीलिए आत्मविध्वंस की यात्रा में महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है। हमारा लगातार आग्रह रहा है कि भारत के परमाणु हथियार और उसकी निष्पादन क्षमता रणनीतिक रूप से विध्वंसकारी है, राजनीतिक लिहाज से खतरनाक है और नैतिक दृष्टि से असमर्थनीय है। भारत के रक्षा महारथी कहते हैं कि परमाणु बम और उन्हें दागने की पण्राली तो महज राजनीतिक हथियार हैं, जिनका मूल्य महज धमकी देने के उपयोग में है; उनकी वास्तविक तैनाती करने में नहीं। अग्नि मिसाइल कार्यक्रम के बढ़ते चरण भारत की 21 सदी में होने वाले बड़े खेल में महत्ती भूमिका निभाने की उसकी गंभीर इच्छा की स्थापना है। पिछले दो दशकों में भारत ने अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन धीमे किंतु लगातार किए हैं, जो आठवें दशक में मालदीव में तख्तापलट को रोकने के लिए किए गए कामयाब सैन्य अभियान और इसी दशक में श्रीलंका में (अपने लिए विनाशक) सैन्य हस्तक्षेप की कार्रवाइयों में देखा जा सकता है। भारतीय नौसेना इस दरम्यान धीरे-धीरे अपने लिए हार्डवेयर के निर्माण के साथ हिंद महासागर पर सही अथरे में अपने वर्चस्व जताने तथा अदेन से लेकर दक्षिणी चीन तक अपनी मौजूदगी दिखाती रही है। वहीं भारतीय वायुसेना लंबी दूरी तक अचूक मार करने की अपनी हवाई क्षमता में बढ़ोतरी करती रही है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की सूचनाएं इशारा करती हैं कि अंतत: 10,000 कि.मी. यानी अमेरिका तक मार करने वाली मिसाइल,सूर्य/अग्नि- छह, के विकास पर काम चल रहा है। इस पर गौरकरना लाजिमी है कि अग्नि-पांच के परीक्षण पर वि की प्रतिक्रियाएं आठवें और नौंवे दशक की शुरुआत जैसी दबावकारी और निंदा से बहुत दूर थीं। एक अमेरिकी अधिकारी ने तो भारत के परमाणु अप्रसार में जवाबदेही के रिकार्डको रेखांकित किया और आलोचना में एक शब्द नहीं कहा। जब अमेरिकी सरकार का प्रवक्ता आपका जनसंपर्क अधिकारी हो जाए तो इसका मतलब है कि कई लक्ष्यों पर मार करने वाली अग्नि-पांच मिसाइल को, कम से कम राजनीतिक रूप से, पहले ही मंजूरी मिल चुकी है, जिसकी मारक जद में केवल चीन है। भारत को परमाणु सैन्य क्षमता अर्जित करने के इस अंगार भरे रास्तों पर चलने को बढ़ावा देने वाले यह तर्क दे सकते हैं कि देश की नाभिकीय ताकत में इजाफा पाकिस्तान के साथ कथित रणनीतिक गतिरोधको खत्म करने में मदद देगा। लेकिन उनके लिए यह संकोच का विषय है, ऐसा पहली बार नहीं है, कि अग्नि-पांच के परीक्षण के हफ्ते के भीतर ही पाकिस्तान ने हफ्त-चार का परीक्षण कर डाला जिसकी जद में पूरा भारत आता है। वैिक ताकत होने की भारत की महत्त्वाकांक्षा, चाहे जैसी हो, शांति की संभावना हमेशा पाकिस्तान के साथ संवाद में ही रहेगी। हम इसे कभी भुला नहीं सकते कि परमाणु हथियारों के निर्माण से अधिक महत्त्व पाकिस्तान के साथ बातचीत की मेज पर मसलों का हल निकालना है। ताजा अग्नि-पांच मिसाइल कार्यक्रम के चलते उन सभी एशियाई देशों का ध्यान भारत की ओर जाएगा, जो चीन की आर्थिक व सैन्य शक्ति से खतरा महसूस करते हैं जबकि इसने अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के पुराने प्रशांत सहयोगियों को अपने आप उपयोगी बना दिया है। यह खुला सवाल फिर भी रह जाता है; और जैसा कि कई रणनीतिकार पूछते हैं; क्या इससे एशिया- प्रशांत क्षेत्र को स्थिरतामें मदद मिलेगी? निश्चित रूप से यह उस दोहराव को सहन करता नहीं लगता कि कोई सैन्यशक्ति स्थिरता नहीं लाती बल्कि इसके विपरीत स्थिति को ही जन्म देती है। इसे भी बार-बार कहने की आवश्यकता है कि भारत के परमाणु सैन्य कार्यक्रम का विस्तार शांति में कोई योगदान नहीं दे सकता। परमाणु प्रतिरोधक की अक्षमता विवाद को खत्म करती है, स्थिरता तथा शांति कायम करती है, यह सर्वविदित तथ्य है लेकिन भारत ने अपने को एक ऐसे खेल तक सीमित कर लिया है, जिसमें कोई विजेता नहीं है। यह दुखद है कि भारत उन राष्ट्र राज्यों में शामिल है, जिनमें घरेलू सवाल और उसके परमाणु, सैन्य और रणनीतिक नीतियों को लेकर किसी सवाल की मुकम्मल गैरहाजिरी है। अग्नि-पांच को लेकर एक ही रंग की घरेलू प्रतिक्रिया यह जाहिर करती है कि नागरिक और परमाणु सैन्य ताकत के लिए समर्थन तथा नागरिक और अंतरिक्ष कार्यक्रम में सैन्य उपयोगिता में संभाव्य अंतर एक पहेली है। स्वदेशी आलोचकों का यह अभाव, जिसे अब सफलता की चकाचौंध में भुला दिया गया है, गणतंत्र के लिए महंगी साबित होगी। इतिहास बताता है कि सैन्य विस्तार पर ऐसे बिना सवालिया समर्थन के, कोई राजनीति अपनी लोकतांत्रिक और नागरिक स्वतंत्रता को लंबे समय तक के लिए सुरक्षित नहीं रखती। (ईपीडब्ल्यू के विचार)