अग्नि-पांच के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण भारत के लिए उत्साह प्रदर्शन का वास्तविक अवसर था। अंतरवर्त्ती (मध्यम) दूरी की यह बलास्टिक मिसाइल (आईआरबीएम) है जो 5,000 किलोमीटर तक मार कर सकती है। इसके प्रक्षेपण के साथ ही भारत रणनीतिक मिसाइल समुदाय के दशों के क्लब में शामिल हो गया है, भले उसका कोई स्वागत करे या न करे, पर दुनिया को उसके साथ रहना सीखना अवश्य होगा। भारतीय लोगों के विचार में अग्नि-पांच का आख्यान तरोताजा करने वाला और एक स्वागतयोग्य राहत है वरना राजनीतिक घटियापन का अंतहीन धारावाहिक ही चलता रहता, जो अब राष्ट्रीय परिदृश्य का प्राय: स्थायी भाव हो चला है। लेकिन भारत उत्साह से संवर्धित वातावरण को लंबे समय तक जारी नहीं रख सकता। दक्षिण एशिया का पर्यावरण बड़ा ही रुखा-सूखा है और तकनीकी परिष्कार तथा सांगठनिक ढांचे बनाने की दिशा में बहुत कठिन परिश्रम करने की जरूरत अब भी बनी हुई है। यह अपरिहार्य है कि अग्नि-पांच का उत्पादन किया जाए। फिर, एक समेकित और पूरी तरह भारतीय रणनीतिक मिसाइल पण्राली की अभियांत्रिकी के एक कारक में रूप में, उसे जितनी जल्दी हो सके, सेना में शामिल किया जाए। भारत के रणनीतिक हथियारों का जखीरा तो संबद्ध सेना के हवाले रहता है लेकिन किसी अभियान के तहत उनकी तैनाती का मसला रणनीतिक सैन्य बल कमांड से नियंत्रित-संचालित होता है। यह एकीकृत रक्षा स्टाफ (आईडीएस) के तहत काम करता है, जो अपने देश में चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के अधीन होता है, न कि अन्य देशों के जैसे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के तहत। आई डीएस को निर्णय लेने की प्रक्रिया से जोड़ना होगा अत: राष्ट्रीय सुरक्षा के सर्वोच्च प्रबंधन की पण्रालीगत खामियों की ओर संकेत करने के लिए अग्नि-पांच का सफल प्रक्षेपण एक उचित मौका है। आईडीएस को रणनीतिक बल का मुख्य नियंत्रणकारक बनाया जाना चाहिए लेकिन इसकी स्थापना के कई दशकों बाद भी इसे बुरी तरह चोटिल लंगड़ा बत्तख बना कर रखा गया है। आईडीएस को सेना के तीनों अंगों को राष्ट्रीय स्तर पर सामरिक और परिचालन योजना के समन्वयक के मुख्य प्राधिकरण के रूप में स्थापना की गई थी। तीनों सेनाएं दिखावे के लिए भले ही अपनी बहादुर छवि पेश करें लेकिन यह बात छिपी नहीं रही कि सीमित दृष्टि और संकीर्ण सोच के चलते, आईडीएस कमोबेश एक शोभा का संस्थान रह गया है। यह मुख्यधारा के निर्णय की प्रक्रिया से भी लगभग पूरी तरह कटा हुआ है। तर्क और नजीरों को हिसाब से तो अग्नि-पांच को सामरिक तैनाती के लिए भारतीय सेना की रणनीतिक मिसाइल इकाइयों को सौंप दिया जाना ठीक होता। इनमें से कई यह भी तर्क दे सकते हैं कि मानवसहित लड़ाकू विमान वाले वायुसेना को पायलट रहित विमानों में बदला जा सकता है, यह उस संभावित फेरबदल की ओर संकेत करता है। अग्नि-पांच के बारे में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक जब इसे पूरी तरह विकसित कर लिया जाए तब इसे जल-थल और सड़क मार्ग से ले जाने के लिए उसके स्वरूप में बदलाव किया जाएगा। भारत इस पर भी इत्मीनान और न्यायोचित गौरव कर सकता है कि अग्नि-पांच के लिए अन्य जटिल उपकरणों का उत्पादन देश में ही होने जा रहा है, इनमें से कई उत्पादक तो निजी क्षेत्र के हैं। इनमें से अहम अग्नि मिसाइलों के लिए मोबाइल मिसाइल प्लेटफार्म हैं, उसकी डिजाइन परिवहन-लांचर वाहन के जैसे की गई है, जैसा कि गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली में आयोजित होने वाले परेडों में दिखाई देता है। इसलिए यह किसी भी तरह से कोई कमतर उपलब्धि नहीं है। इसी समान कोटि में टोही खुफिया और निगरानी उपग्रह, लक्ष्यवेधक और मिसाइल निर्देशन के साथ अन्य संचार तथा सहायता पण्राली के उपकरण, सभी के सभी भारत में बने हैं। परमाणु आक्रमण की स्थिति में ‘व्यापक प्रतिरोध’ को देखते हुए भारत की ‘पहले मार न करने की’ स्थायी परमाणु नीति के साथ, अग्नि-पांच को आणविक और परंपरागत दूसरी-प्रहार पण्राली के जरिये भी छोड़ा जा सकता है। यह दुश्मन के पहले प्रयोग किए जाने की स्थिति पर निर्भर करता है। इसके लिए अग्नि-पांच और इसके सहायक ढांचे को प्रतिपक्ष के पहले शत्रुतापूर्ण आक्रमण को झेलने लायक होना होगा और तत्पश्चात, दूसरे क्रम में, उसे अपने ‘मूल्यवान लक्ष्य’ जैसे नगर और रणनीतिक महत्त्व के आबादी वाले केंद्र को लक्षित करने अपने जवाबी दंडात्मक अभियान पर निकलना होगा। भारत के लिए कितनी ज्यादा ताकत जवाबी ताकत होने के लिए चाहिए? ये और इससे जुड़े सवाल जवाबी मूल्यों और जवाबी ताकत पर निर्भर करेगा जिसे हम प्रतिक्रिया के लिए चुना जाएगा। इसी हिसाब से संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। मिसाइलों के मामले में पाकिस्तान और चीन अग्नि-पांच के अवतार पर पाकिस्तान से उकसावे की तीव्र प्रतिक्रिया मिली है, जिसने हत्फ-सात मिसाइल दागी है, जो 3000 से 3500 कि.मी. तक मार कर सकती है और जिसकी मारक क्षमता की जद में पूरा उपमहाद्वीप आता है। इसके पहले, भारतीय बालिस्टिक मिसाइल पाकिस्तान के दूरस्थ इलाकों तक मार कर सकती थी लेकिन पूर्वोत्तर के इलाके तब भी उसके दायरे से बाहर थे। हत्फ-सात ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है और भारत-पाकिस्तान के शक्ति संतुलन में, चीन के साथ उसके साझा रणनीतिक संबंधों समेत एक नया तत्व जोड़ दिया है। आठ हजार कि.मी. तक मार करने के दावे के साथ चीन के आईआरबीएम/आईबीसी कोटि की डाँग फेंग (पूर्वी हवा) मिसाइल का मुंह अमेरिका की मुख्य भूमि पश्चिमी तट की तरफ है और वह पूर्वी/दक्षिणी चीन सागर में तैनात अमेरिकी सैन्यबल के ‘जहाजी बेड़े’ ध्वस्त करने लिए तैनात हैं। तिब्बत और पश्चिमी चीन में तैनात डांग फेंग मिसाइल आसानी से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को निशाना बना सकती है। अग्नि- पांच ने अपनी संवर्धित क्षमता के जरिये इस भय से छुटकारा दिला दिया है और एक अर्थ में शक्ति असंतुलन को दूर कर दिया है। डाँग फेंग श्रृंखला की मिसाइलें समुन्नत हथियार पण्राली से निर्मिंत हैं जबकि अग्नि-पांच अब भी प्राथमिक अवस्था की तकनीक का प्रदर्शक है। सेना को सौंपे जाने और उत्पादन की हरी झंडी देने के पहले अग्नि-पांच के लक्ष्यवेधन की अभी जांच-परख बाकी है। चीन और पाकिस्तान जैसे तथाकथित ‘अंतरराष्ट्रीय समुदाय’ उन परीक्षणों को न करने के लिए भारत पर कड़े दबाव डालेंगे। भारत को इनके साथ उन देशों के दबावों के आगे अडिग रहना होगा, जो हमारे मित्र हैं। अग्नि-पांच के दूसरे स्तर के परीक्षणों के दरम्यान पोखरण-दो जैसी कंपकंपी हमारी प्रतिक्रियाओं में नहीं दिखनी चाहिए। अभी संसद में एक राष्ट्रीय नेता ने अग्नि-पांच को ‘शांति का हथियार’ कहा है। संभव है कि उपमा देने में वह थोड़े भ्रमित हुए हों क्योंकि अग्नि-पांच निस्संदेह जंग का हथियार है, जो भारत का ताकतवर ‘शांतिरक्षक’ भी है। (एशियन एज में प्रकाशित आलेख के संपादित अंश)
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