भारत दुनिया में सबसे बड़ा हथियारों का खरीददार क्यों है जबकि देश की दूसरी कई बड़ी जरूरतें भी हैं? सभ्यता मूलक दृष्टि से देखें तो पाएंगे कि भारत कभी भी हमलावर नहीं रहा है। हालांकि, ताकतवर रहा है। यह सचाई है कि कोई हमला न करे, इसके लिए भी शक्तिसंपन्न होना जरूरी है। कहा गया है कि शस्त्र द्वारा राष्ट्र की रक्षा हो जाने पर ही शास्त्र की चिंता में प्रवृत्त होना चाहिए। यही नहीं, दिनकर की पंक्ति है-क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो। ये दोनों पंक्तियां अलग- अलग पर गहरी बात कहती हैं। इसलिए मैं दृढ़ता के साथ कह सकता हूं कि भारत की प्रतिरक्षा योजना हमेशा से ही आत्मरक्षा से प्रेरित रही है। आक्रमण की इसी आधार पर तैयारी भी रही है। ऐतिहासिक अनुभव यही है कि शक्ति के साथ तकनीक का आवश्यंभावी विकास होता रहे तो समान परिस्थिति में सौ सैनिकों की टुकड़ी हजार की फौज का सहजता से मुकाबला कर सकती है। इसलिए प्रतिरक्षा के लिए बेहतर तकनीक व नये हथियार जरूरी होते हैं लेकिन गत हजार वर्षो में यहां हथियार व तकनीक को निरंतर विकसित न कर पाने की समस्या रही है। हालांकि, छत्रपति शिवाजी ने इस दिशा में प्रयास किया था। उन्होंने कान्होजी आंग्रे के सहयोग से पश्चिमी समुद्र तट पर एक मजबूत नौसेना खड़ी की थी पर ऐसे एक-दो प्रयास ही हुए थे। मैं समझता हूं कि तकनीक के इस युग में राष्ट्र रक्षा के लिए वीरता के साथ हथियार भी आवश्यक हैं।
आजादी के बाद भारत ने हर क्षेत्र में अपने पांव पर खड़े होने की कोशिश की है। हथियारों के मामले में ऐसा क्यों नहीं हो पाया?निश्चित तौर पर राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा। हालांकि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी सरकार की ओर से उपेक्षा का भाव रहा पर वहां अवरोध नहीं था। मैंने देखा है कि शांति के पैरोकार किस तरह दूसरी जरूरतों को अहम बताकर प्रतिरक्षा के तकाजों को नजरअंदाज करते रहे हैं। इनसे गत 30 वर्षो में देश के रक्षा संबंधी जो इंतजाम होने थे, वे कम पड़ गए। वे लोग भारत की विदेश नीति पर भी हावी रहे हैं। पहले रूस और फिर अमेरिका की छतछ्राया में भारत को रखने की लगातार कोशिश हुई। तब कई नीतिगत भूलें हुई। बड़ी ताकतों की वकालत करने वाली लॉबी ने सत्ता तंत्र में घुसपैठ कर रक्षा तंत्र को पूरी तरह अपने चंगुल में कर लिया है। ऐसी स्थिति में प्रतिरक्षा क्षेत्र में जो विकास होना था, उसमें हम कम पड़ गए। बार-बार निरस्त्रीकरण और शांति की बात की गई। अन्य जरूरतों को आगे कर प्रतिरक्षा से ध्यान हटाने की कोशिश हुई। एक यूटोपियाई दुनिया की तस्वीर प्रस्तुत की जाने लगी और हम इन चीजों से मुक्त नहीं हो पाए। हमारे पास प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं थी पर शासन तंत्र ही जड़ हो चुका था। जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो साम्यवादियों ने उसे झुठलाने की कोशिश की थी। दरअसल, छद्म बुद्धिजीवी और शांति की बात करने वाले लोग यथार्थ से टकराने का कलेजा नहीं रखते थे। वे दिग्भ्रमित कर रहे थे। वहां सत्ता में बैठे लोगों को जनता की ताकत का भरोसा नहीं था जबकि जरूरत पड़ी थी तो लाल बहादुर शास्त्री जी के समय इसी देश की जनता ने एक वक्त का भोजन छोड़कर उनके हाथ मजबूत किए थे। मेरा कहना यह है कि देश की जनता इस दिशा में अलग तरीके से सोचती है जबकि राजतंत्र और नौकरशाही तो बिल्कुल दूसरी सोच रखती है। वे लोग जनता से पूरी तरह कटे हुए हैं। आज जो स्वाभिमानी लोग सुरक्षा की आवश्यकता पर बल देंगे, उन्हें ये अयथार्थवादी लोग वॉर मॉन्गर यानी युद्ध पिपासु करार देंगे। इससे देश का अहित ही हो रहा है।
क्या हथियारों के सौदे में भी सियासत होती है? आप स्वयं देख लें। चीन के हमले के दौरान भी सैनिकों के ड्रेस, जूते- मौजे के बारे में खूब बातें उठी थीं। बोफोर्स सौदा तो इस मामले में एक क्लासिक केस बन गया है। इसे लेकर अभी-अभी एक खुलासा स्टेन लिंडस्ट्रोम ने किया है। विदेशों में रु पये जमा कराने की बात सामने आई है। रक्षा सौदे से जुड़े ऐसे कई मामले हैं, जहां विवाद उत्पन्न हुए और राजनीतिक स्तर पर तीखी बयानबाजी हुई। दरअसल, समय और जरूरत के हिसाब से जो एक पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए थी, वह नहीं हो पाई, जिसका परिणाम अब सामने आया है। सेना प्रमुख ने भी गोला-बारूद संबंधी जो बातें कही हैं, वह दूसरे संकट की तरफ इशारा करती है। एक समय देश में थोरियम आधारित परमाणु तकनीक की संभावनाओं पर बल दिया गया था लेकिन यूरेनियम आधारित तकनीक को ही बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि,यदि हम थोरियम आधारित परमाणु तकनीक विकसित कर पाते तो आत्मनिर्भर हो सकते थे पर यहां परिस्थितियां दूसरी हैं। यूरेनियम लॉबी के प्रभाव में आकर हमने थोरियम आधारित तकनीक को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
भ्रष्टाचार का पहला मामला जीप घोटाला रक्षा सौदे से जुड़ा था। आज भी रक्षा घोटाले सुर्खियों में है, क्यों? प्रतिरक्षा क्षेत्र की संवेदनशीलता के कारण गलत नीयत वाले लोगों के लिए गोपनीयता के नाम पर यहां भ्रष्टाचार करना सरल हो जाता है। एक और बात है। वह यह कि यहां सौदे में लगने वाला धन भी ज्यादा होता है। ये दोनों ही भ्रष्टाचार के प्रमुख कारण हैं। रक्षा सौदे और प्रतिरक्षा पर के.एन. गोविंदाचार्य से ब्रजेश कुमार झा की बातचीत
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