Wednesday, May 23, 2012

विकास के लिए जरूरी है सुरक्षा


किसी भी देश के लिए रक्षा पर किया गया खर्च मजबूरी का खर्च है। अगर इस पर खर्च नहीं किया जाएगा तो सारा विकास भी खतरे में रहेगा। चाहे वे कारण आंतरिक समस्याओं के हों या बाहरी समस्याओं के। इसिलए मेरा मानना है कि रक्षा पर किया जाने वाला खर्चे अपने देश की रक्षा करने के लिए और विकास करने के लिए चुकाई जाने वाली कीमत है। इसे एक किस्म का बीमा भी समझ सकते हैं, जो अपने देश को बचाने के लिए किया जाता है। अगर देश खतरे में पड़ गया तो न तो उद्योग-धंधे चलेंगे और न ही देश की जीडीपी कुलांचे भरेगी। अब सवाल पैदा होता है कि रक्षा पर किया जाने वाला खर्च कितना हो? हमें किन चीजों पर खर्च करना चाहिए और किन चीजों को नहीं। यह सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है। हमें देखना पड़ेगा कि हमारे आसपास के देशों के पास कौन-से हथियार हैं। उनकी रणनीति और मंशा क्या है? इसका आकलन कर ही हमें अपनी जरूरतों के लिए निष्कर्ष निकालना चाहिए। हमारे देश का तो यह हाल है कि पड़ोसी अक्सर दुश्मनी पर तुल जाते हैं और जंग का ख़्ातरा मंडराता रहता है। एक तरफ चीन है और दूसरी तरफ पाकिस्तान। किन्हीं-किन्हीं जगहों पर दोनों मिलकर हमारे लिए खतरा बन जाते हैं। तो हमें अपने रक्षा संसाधनों में इतनी बढ़ोतरी करनी होगी कि वे हम पर हमला करने की हिम्मत न करें। यह तभी हो सकता है, जब हमारे पास भी मिसाइल, तोपखाना, लड़ाकू हवाई जहाज और पनडुब्बियां जैसे सामरिक महत्त्व के हथियार और संसाधन हों। इनके अलावा परमाणु हथियारों की भी जरूरत है ताकि उनको मुंहतोड़ जवाब मिलने का डर हो। खर्च घटाने के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करना होगा यह जज करना बहुत मुश्किल है कि हमें कौन-से हथियार कब और कितनी मात्रा/तादाद में खरीदनी चाहिए। इसका निर्णय सेनाध्यक्ष, रक्षा मंत्री और विशेषज्ञ मिलकर करते हैं। हालांकि कई बार उनके निर्णयों पर सवाल उठते हैं कि अमुक देश से या अमुक कंपनी से साजो-सामान क्यों खरीदे गए? बाहरी देशों से अक्सर हमें हथियार महंगे दामों पर मिलते हैं, जिनसे रक्षा पर किए जाने वाले खर्च में बढ़ोतरी होती है। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि अधिक से अधिक हथियारों का उत्पादन हम देश में ही करें ताकि उनकी लागत कम से कम हो। अभी तो यह हाल है कि नई तकनीक का विकास नहीं होता और डीआरडीओ जैसी संस्था दस साल में एक हथियार बनाती है जो हमारी जरूरतों के लिए नाकाफी है। स्वदेशी तकनीक से हम एक प्रभावी बैटल टैंक तक नहीं बना पाए हैं। लड़ाकू विमान और रडार तो हम बना ही नहीं रहे हैं। ये सब चीजें बाहर से हमें खरीदनी पड़ती है, जिसकी कीमत काफी अधिक होती है। हथियारों पर किए जाने वाले खर्च को घटाने के लिए बहुत जरूरी है कि हम अपनी तकनीक विकसित करें। अगर सरकारी संस्थाओं में पर्याप्त क्षमता नहीं है तो हमें निजी क्षेत्र को साथ लेना चाहिए। देश की कई निजी कंपनियों के शोध एवं तकनीक इस लायक हैं कि वे वैिक स्तर के हथियारों का निर्माण कर सकें। हम उन्हें मौका दें। अमेरिका वगैरह देशों में सरकार निजी उद्योग घरानों को अपनी जरूरत के हथियारों की किस्म बता देती है। उसके बाद वे उन मानकों के अनुरूप हथियारों का विकास और निर्माण करती हैं। यहां यह हाल है कि सरकार केवल सरकारी महकमों और हथियार कारखानों से काम कराना चाहती है। कमजोर होने का मतलब हमलावर को बुलाना होगा यह सवाल पूरी तरह से गलत है कि देश का पैसा रक्षा में खर्च किया जाए कि विकास में? हमें एक संतुलन बनाकर चलना होगा। आज के वैिक परिदृश्य को देखें तो जिन देशों की सामरिक शक्ति कम है, उन पर दूसरे देश हमला कर रहे हैं। अमेरिका भी भूल कर चीन या ईरान पर हमला नहीं करता, बल्कि उन्हीं देशों को निशाना बनाता है जिनकी सैन्यशक्ति कमजोर है। इस लिहाजन, हमें कमजोर बनकर उस दिन का इंतजार नहीं करना चाहिए कि जब कोई देश हम पर हमला बोल दे। इसके अलावा किसी को भी अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए क्योंकि आंतरिक राजनीति हो या वैिक राजनीति वह हमेशा बदलती रहती है। इसलिए हमें न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता तो रखनी ही चाहिए कि कोई हमें तबाह न कर सके। पूरक हैं परमाणु और मूलभूत हथियार यह दलील भी फिजूल की है कि परमाणु हथियार के बाद छोटे हथियारों की क्या जरूरत है? मेरा मानना है कि लड़ाई में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। यह क्षमता केवल अपने विरोधियों के डराने के लिए है कि आपातस्थिति में हम परमाणु हमला करने में सक्षम हैं। परमाणु हथियारों से जंग नहीं लड़ी जा सकती। इसका इस्तेमाल हम दूसरों को तबाह करने के लिए तो कर सकते हैं लेकिन इससे अपनी जमीन को तबाही से नहीं बचाया जा सकता है। जिन बड़े-बड़े देशों के पास परमाणु हथियार हैं, उनके पास दूसरे हथियारों की ताकत उतनी ही ज्यादा है। बिना मूलभूत हथियारों के परमाणु हथियार की ताकत भी कोई काम नहीं कर सकती। अत: सरकार को कटौती करनी हो तो फिजूलखर्ची पर लगाम लगाए। हजारों ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार फिजूल में पैसे बरबाद करती है। इसके अलावा, भ्रष्टाचार विकास में सबसे बड़ा अड़ंगा है। भ्रष्टाचार की वजह से ही विकास के धन का चौथाई हिस्सा भी सही इस्तेमाल नहीं हो पाता है। हमें उन्हें रोकने की जरूरत है न कि रक्षा पर किए जाने वाले खर्च में कटौती करने की। गरीबी और विकास के कार्यक्रमों को रक्षा से जोड़ना गलत है। एक किसान भी अपनी फसल की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाता है। नहीं तो उसकी फसल खतरे में रहेगी। उसी प्रकार, अगर रक्षा पर खर्च नहीं करेंगे तो देश खतरे में रहेगा और फिर सारा विकास बेमानी होगा। अत: सरकार को रक्षा और विकास में एक संतुलन बनाकर चलना होगा।

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