Wednesday, May 23, 2012

शांति, सुरक्षा और शक्ति


अग्नि-पांच मिसाइल को हमारी वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक माना जाए तो फिर भी कबूल है लेकिन हमारी सुरक्षा का उससे कोई खास नाता नहीं है
कुछ लोग हैं कि जिन्हें बात-बात पर अपने देश पर गर्व होता है। यह उचित भी है क्योंकि अपने देश में शर्माने लायक, पछताने लायक तो कई बातें हैं लेकिन गर्व करने लायक बातें भी कम नहीं हैं। देश है तो दोनों तरह की बातें होंगी ही लेकिन कहीं एक लकीर विवेक की भी ¨खचती है कि आप जिस पर शर्माते हैं, उसकी जड़ में क्या है और आप जिस पर अभिमान से फूले नहीं समाते हैं उसके पीछे क्या है? आपके पड़ोस में खाली पड़ा एक मैदान है जिसमें सिर उठा रहा है एक आलीशान मॉल। आप इसे गर्व से देख और सराह सकते हैं क्योंकि यह हमारे यहां विकास का और आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक माना जाता है। हमारे समाज के शब्दकोष में विकास और आधुनिकता दो ऐसे शब्द हैं, जिनका मतलब स्थिर नहीं है। इसका मतलब समाज के वर्ग और व्यक्ति-समूह के मुताबिक बदलता रहता है। जैसे इस मॉल को ही लीजिए। आप जिसे आधुनिकता और विकास का प्रतीक मान रहे हैं, वह मॉल इस बात की घोषणा करता हुआ खड़ा हो रहा है कि यह बहुत सारे छोटे, सामथ्र्यहीन कारोबारियों के हाथ से उनकी जीविका के साधन छीनने वाला है और जहां बहुत सारी पूंजी एकत्रित हुई पड़ी है, वहीं और ज्यादा पूंजी का केंद्रीकरण करने वाला है। अगर मॉल का एक मतलब यह भी होता है, इसकी पहचान आपको है तो आप गर्व और शर्म के बीच की रेखा पहचान सकेंगे। अभी गर्व का एक सैलाब सारे देश में उमड़ रहा है कि हमने सतह से सतह पर मार कर सकने वाली अपनी मिसाइल अग्नि-पांच का सफल परीक्षण कर लिया है। इसकी सफलता के साथ ही हम दुनिया के उन चुने ( छंटे? ) पांच देशों के क्लब में शुमार हो गए हैं कि जिनके पास ऐसी क्षमता है। अग्नि श्रृंखला की यह पांचवीं पीढ़ी है। इससे पहले की चार पीढ़ियां भी हमने ही बनाई हैं। फिर इस पाचवीं की जरूरत क्यों पड़ी? इसलिए कि अपने हथियारों की मारक क्षमता बढ़ाते रहने की जरूरत होती है। अग्नि-पांच अपने 5,000 हजार किलोमीटर के दायरे में विनाश कर सकती है। सारे राज्याधिकारी बाग-बाग हैं और सभी कह रहे हैं कि जब सवाल देश की सुरक्षा का हो तब कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
सुरक्षा हथियारों में या हाथों में?
बस, बात यहीं आ कर ठहरती है, हथियारों के दम पर सुरक्षा? जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी थी, तब उसने प्राथमिकता का पहला काम यह किया था कि अपना परमाणु बम फोड़ा था। पोखरण को तब हमारा तीर्थ बनाया गया था। कितनी गवरेक्तियां सुनीं थीं हमने। दुनिया में शक्ति और सुरक्षा का अंतिम पैमाना यह है कि आपके पास परमाणु बम है या नहीं। कभी राष्ट्रकवि दिनकर गाया करते थे-एक हाथ में कमल, एक में धर्मदीप्त विज्ञान लेकर उठने वाला है धरती पर ¨हदुस्तान। राष्ट्रकवि के उस सपने की धज्जियां उड़ाते हुए, राजकवि अटल जी ने उसके एक हाथ में बम थमा दिया। उस बम से कितनी ताकत आई देश में, कितनी पुख्ता हुई हमारी सुरक्षा? पाकिस्तान ने हमें मुंहतोड़ जवाब देते हुए तभी-के-तभी हमसे ज्यादा बम फोड़े और इस बम विस्फोट के साथ ही वह मौका बन गया, जिसके आधार पर अमेरिकी व दूसरी पश्चिमी ताकतों ने हम दोनों मुल्कों के हाथ जिस हद तक मरोड़े, वैसी हिम्मत इनकी पहले कभी नहीं हुई थी। अब आप हिसाब लगाएं कि बम से हमें कितनी ताकत मिली और कितनी ताकत गई। यह हिसाब सीधा है। आप शांति, ¨हसा, महात्मा गांधी आदि-आदि सबको कुछ पल के लिए एक किनारे रख दीजिए और फिर इस पर सोचिए कि सुरक्षा हथियारों में है या हाथों में? 1962 में चीनी हमले के दिनों के दो प्रसंग याद आते हैं। आचार्य विनोबा भावे अपनी भूदान यात्रा के क्रम में तब हिमालय के अंदरूनी हिस्सों में घूम रहे थे, और चीनी हमले के संकट से वहां के लोगों को अवगत भी करा रहे थे। किसी गांव की छोटी-सी सभा में उन्होंने इसका पूरा जिक्र किया और पूछा कि भारत मां पर संकट आया है तो उसकी रक्षा में आप सब आगे आएंगे न? अपनी हथेली पर टिके कपाल को थोड़ा ऊपर उठा कर एक बूढ़ा धीमी आवाज में बोला-कौन-सी भारत मां हमने तो कभी एक धूर भी अपनी भारत मां देखी नहीं है। जो हमारी है ही नहीं उस पर चीन से संकट आए कि कहीं और से, हमको क्या फर्क पड़ता है? विनोबा ने बाद में कहा कि उसकी बात सुन कर मैं हतप्रभ रह गया। मुझे लगा कि देश की उसकी परिभाषा ही एकदम अलग है और एकदम सच्ची है। और यह भी लगा कि इस भूदान-ग्रामदान के आंदोलन को सब मिल कर सफल नहीं बनाएंगे तो अपना देश बचाना भी मुश्किल हो जाएगा। उन्हीं दिनों जयप्रकाश नारायण भी सारे देश में घूम-घूम कर इस हमले का सच देश को समझा रहे थे। तब पटना की एक गोष्ठी में उन्होंने थोड़ी तल्खी से पूछा था, सुनता हूं कि सब तरफ लोग यही कह रहे हैं कि चीन से लड़ाई जारी रखनी चाहिए और हमें तब तक लड़ना चाहिए कि जब तक हम अपनी जमीन उनसे वापस छीन नहीं लेते हैं। कहने में भी और सुनने में भी यह अच्छा लगता होगा लेकिन इसका मतलब समझते हैं आप? इसका मतलब है कि आप यह मानते हैं कि युद्ध का जवाब युद्ध है। हथियार का जवाब हथियार है और भारत-चीन के बीच युद्धों और हथियारों की होड़ चलती रहनी चाहिए। अगर ऐसा हो तो क्या भारत सुरक्षित रहेगा? अभी तक हम सेना पर 400 करोड़ रुपया खर्च कर रहे थे। अब 900 करोड़ रुपयों का बजट पेश हुआ है। यह तो प्रारंभ है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि हमें हजारों करोड़ रुपये हर साल खर्च करने होंगे, अपनी सुरक्षा पक्की करने के लिए। तो हमें सोचना चाहिए कि सैनिक तैयारी से, चाहे वह तैयारी कितनी ही बड़ी क्यों न हो, क्या हम अपनी रक्षा कर सकते हैं? हथियारों से देश की सुरक्षा हो सकती है? ये सब सन् 62 की बातें हैं ! क्या देश उस तुलना में आज ज्यादा शक्तिशाली हुआ है? हथियारों व सेना के रूप में देखें तो जवाब हां होगा शायद लेकिन समाज के रूप देखें तो जवाब देते जुबान हिलती नहीं है। देश भीतर-भीतर बहुत खोखला हुआ है। सामाजिक तौर पर असंतोष गहराता जा रहा है और आर्थिक तौर पर विपन्नता बढ़ती जा रही है। आप औसत के अवैज्ञानिक आंकड़ों वाला वह अर्थशास्त्र किनारे रख दीजिए जिसके अर्थहीन विश्लेषणों से हमें समझाया जाता है कि देश कहां, कितनी प्रगति कर रहा है। और सोचिए कि जिस बूढ़े ने विनोबा से कहा था कि उसने एक धुर भी अपनी भारत माता कभी देखी नहीं है, वैसे लोगों की संख्या बढ़ी है या घटी है? हमारा रक्षा बजट तब 900 करोड़ रुपये हुआ था तो जयप्रकाश की आवाज कांप गई थी, आज वह कितना है? 1.93 लाख करोड़ रुपये !!!! तो क्या हम पहले से ज्यादा शक्तिशाली व सुरक्षित हो गए हैं? हमारी सुरक्षा का हाल तो यह है कि देश की हर सीमा को तस्कर भेद देते हैं और हथियारों से लेकर नशीली दवाएं तक लाते, ले जाते हैं। रक्षा सौदों में दलाली ही हथियारों की गुणवत्ता तय करती है। हमारा सेना प्रमुख, देश-प्रमुख को लिखता है कि ऊपर से साधनसंपन्न दिखाई देने वाली हमारी फौज भीतर से कितनी खोखली होती जा रही है? उसके पास गोलियां व गोले भी नहीं हैं। कहां से आए इतना पैसा कि हथियारों की निरंतर बढ़ने वाली फौज की भूख मिटा सके? सारी दुनिया में तो हम खेल देख रहे हैं कि हथियार बनाने वाली कंपनियां और उन कंपनियों के आका देश हथियारों के बाजार में छोटे देशों को किस तरह परेशान भी कर रहे हैं और लूट भी रहे हैं। दूसरी तरफ यह भी देखिए तो कि आज यहां तो कल वहां मुट्ठी भर नक्सली, इसे या उसे अगवा कर लेते हैं और सारा राज्यतंत्र लकवाग्रस्त हो जाता है। फिर पर्दे के पीछे सौदे होते हैं। जेलों में बंद उग्रवादी/आतंकियों की गुपचुप रिहाई होती है। पैसों की उनकी मांगें पूरी की जाती हैं। तीखे-से-तीखे कानूनों से रोज-रोज खुद को लैस करने वाला राज्य इतना जर्जर और निरुपाय क्यों हो जाता है? जिन्हें हमने अपनी सुरक्षा का जिम्मा दे रखा है और हथियार भी जिन्हें सौंप रखे हैं, वे खुद कितने सुरक्षित हैं? इसका भी आकलन किया जाना चाहिए।
नहीं, हथियारों की होड़ और असुरक्षा की मानसिकता का कोई
अंत नहीं है हमारी अंतरराष्ट्रीय सीमारेखा के पीछे जो आदमी खड़ा है उसका पेट कितना भरा है, उसका मन कितना संतुष्ट है, वह अपने पारिवारिक व सामाजिक संदर्भ में स्वयं को कितना मजबूत पाता है, इनसे फैसला होता है कि हमारे देश की सुरक्षा कितनी पुख्ता है? तब साधारण हथियार भी ब्रम्हास्त्र बन जाते हैं। दरअसल, ताकत तो उस फौजी में है जो हमारी बंदूकों के पीछे खड़ा है, हमारे युद्धक विमान उड़ा रहा है। हमारे टैंक चला रहा है। इससे भी आगे देखें तो हम पाएंगे कि असली ताकत तो उस सामान्य भारतीय में है जो यहां के खेतों-खलिहानों, मिलों-कारखानों, दफ्तरों-प्रतिष्ठानों में काम कर रहा है। वह यदि संतुष्ट है व सार्थक जीवन बिताने के आनंद से भरा है तो हमारी सुरक्षा पुख्ता है। अगर वह रोज-रोज कुआं खोद के पानी पीने के लिए अभिशप्त है, अगर वह रोज-ब-रोज सड़क पर उतर रहा है, पुलिस की लाठियां-गोलियां झेल रहा है ताकि जो उसकी जमीन छीन रहे हैं, उन्हें भगाए। जो उसका पानी गटके जा रहे हैं, उनसे दोदो हाथ करे, जो उसका जंगल काटे जा रहे हैं, उनकी कुल्हाड़ी पकड़े तो देश की सुरक्षा किसकी चिंता का विषय बन सकता है? देश को देश तो बनाओ। राजा की प्रजा और लोकतंत्र के लोक की हैसियत में जो फर्क है, उसे जमीन पर बोओ और उसकी फसल पैदा तो होने दो फिर देखना कितनी अग्नि मिसाइलें हर गांव-नगर में उभर आएंगी। तब तुम्हारी इस अग्नि-पांच मिसाइल की मारक क्षमता किलोमीटर में नहीं नापी जा सकेगी, करोड़ों के संकल्प से जुड़ कर वह जमीन-आसमान, सागर-पर्वत सबको बांध लेगी। हथियार के पीछे के आदमी को जगाओ, बनाओ और सुरक्षा की अभेद्य व्यवस्था खड़ी करो। अग्नि-पांच हमारी वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक माना जाए तो फिर भी कबूल है, हमारी सुरक्षा का उससे कोई खास नाता नहीं है।

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