Wednesday, May 23, 2012

यह प्रति-पहल भी करे भारत



हम भारतीय होने के नाते थोड़ा और प्रसन्न हो लेते हैं, अपने सीने को थोड़ा और फुला लेते हैं, अपनी गर्दन को गर्व से थोड़ा और अकड़ा लेते हैं कि हमारे प्यारे महान भारत ने अपनी प्रक्षेपास्त्र क्षमता का मारक-प्रहारक विस्तार थोड़ा और अधिक कर लिया है। अब हम पड़ोसी देशों के भीतर अपनी अग्नि को 5,000 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर तक बरपा कर सकते हैं। अपने दुश्मनों को थोड़े और कड़े तेवर दिखा सकते हैं और उन्हें हमारे साथ युद्ध में संलग्न होने से थोड़ा और दूर रख सकते हैं।
सभी शामिल हैं परमाणु दौड़ में यह दीगर बात है कि पूरी दुनिया में यही सब हो रहा है। अमेरिका-यूरोप से लेकर एशिया में पाकिस्तान तक और ईरान से लेकर उत्तर कोरिया तक परमाणु या उससे आगे के हथियारों की दौड़ चल रही है। धरती से धरती पर, धरती से सागर, धरती से आकाश पर प्रहार करने वाले, आकाश से धरती और सागर पर प्रहार करने वाले, आकाश से आकाश पर प्रहार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों, अंतरद्वीपीय प्रक्षेपास्त्रों का भंडार बढ़ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई इस दौड़ में हमसे बहुत पीछे है और कोई बहुत आगे। लेकिन यह विनाश की ऐसी अंधी दौड़ है जिसमें पीछे वाला आगे वाले से कभी भी बहुत ज्यादा पीछे नहीं होता। आगे वाले दौड़ की इस हकीकत को अच्छी तरह पहचानते हैं और अपने पीछे किसी भी परमाणु धावक की पदचाप सुनते ही बौखलाने लगते हैं। मगर इस दौड़ की वर्तमान स्थिति यह है कि हमारी धरती के चल-जल-नभ को कोई भी कोना आज ऐसा नहीं है जो परमाणु प्रक्षेपास्त्रों की जद से बाहर हो। यानी आज की पूरी दुनिया प्रक्षेपास्त्रों की मार के साये में सांस ले रही है। पर दौड़ निर्बाध जारी है और हम इसमें सांगोपांग शामिल हैं। यह दुनिया की वह दौड़ है जो जितनी ज्यादा दौड़ी जाती है उतनी ही ज्यादा डराती है, और जितनी डराती है उतनी ही ज्यादा दौड़ी जाती है। इसके निकटवर्त्ती और दूरवर्त्ती विनाशक परिणामों की परिकल्पना की पृष्ठभूमि में इस पर लगाम लगाने, इसे नियंत्रित करने, इसे सीमित रखने के प्रयास भी कम नहीं हुए हैं- न जाने कितने करार, कितनी संधियां, कितने प्रस्ताव। हो सकता है, इनसे कहीं कुछ रुकावट जैसी कोई चीज पैदा हुई हो परंतु व्यावहारिक तौर पर कोई भी रुकने और पीछे छूटने को तैयार नहीं है। परमाणु हथियार संपन्नता आज केवल ईरान या कोरिया का ही नहीं, हर उस मुल्क का सपना है जो इसे पूरा करने के लिए थोड़ी बहुत भी संसाधन जुटाने की स्थिति में हैं।
सबक है तो जापान इस दौड़ को रोकने के लिए हिरोशिमा, नागासाकी के बजाय जापान की ही परमाणु सुनामी को नये निरोधक उदाहरण के तौर पर सामने रखा जाने लगा है लेकिन कोई संप्रभु राष्ट्र इस उदाहरण को सबक के तौर पर याद रखना चाहता हो, ऐसा कहीं से भी दिखाई नहीं देता। उल्टे आशंकाएं ये जताई जाने लगी हैं कि कहीं यह विनाशक शक्ति राज्यों की सुसंगठित शक्ति का हिस्सा होने के बजाय अराजक तत्वों की आतंकी शक्ति का हिस्सा न बन जाए। यानी विनाश की नियंत्रणशील क्षमता के मध्य ही और अधिक व्यापक विनाश की नियंत्रणहीन संभावना भी पूरी तरह मौजूद हैं। यानी मनुष्य जाति अस्तित्व विनाश के दुहरे-तिहरे खतरे होने के लिए अभिशप्त है और यह बात भी दुनिया के हर कोने में हर रोज दुहराई जाती है कि दुनिया में जितना धन अधुनातन विनाशकिवध्वंसक हथियारों के अनुसंधान, निर्माण, रख-रखाव तथा उनके नियंतण्रपर व्यय किया जाता है, उससे दुनिया की आधी निर्धन आबादी को मनुष्यबल जीवनस्तर प्रदान किया जा सकता है। लेकिन इस तर्क ने भी हथियारों की भूख कम की हो, ऐसा कभी नहीं दिखा। दिखाने के टोने-टोटके जरूर होते रहे हैं, वे आगे भी होते रहेंगे।
शक्ति के वैिक मानदंड का मोह किसी भी आधुनिक राष्ट्र का राष्ट्रभक्त, प्रतिबद्ध और समर्पित नागरिक जब अपने राष्ट्र के सामरिक क्षेत्र में सुदृढ़, शक्तिशाली और सुरक्षासंपन्न होते देखता है तो स्वाभाविक तौर पर प्रसन्नता और गर्व का अनुभव करता है। उसकी राष्ट्रीय दृष्टि उन्हीं मानकों से निर्धारित होती है जो समूची दुनिया पर लागू हैं। वह देखता है कि उसका पड़ोसी देश, या सात समंदर पार का कोई प्रक्षेपास्त्रधारी देश उसके राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है या पैदा कर सकता है, तो उसकी स्वयं की आकांक्षा अपने देश को समुचित सामरिक प्रत्युत्तर देने में सक्षम देश के रूप में देखने की होती है। उसकी इसी आकांक्षा का प्रतिनिधित्व उसके देश का राजनीतिक नेतृत्त्व करता है।राजनीतिक नेतृत्त्व सामरिक क्षमता संबंधी उपलब्धियों को गर्व के साथ अपनी जनता के सामने प्रस्तुत करता है और जनता उतने ही गर्व के साथ उसे स्वीकार करती है और राजनीतिक नेतृत्त्व को वैद्यता भी प्रदान करती है। जनता की इस गर्वानुभूति से यह तथ्य सिरे से गायब रहता है कि स्वयं उसे इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ रही है। वह लगातार उस मिथ्या युयुत्सा की शिकार बनी रहती है जिसके चलते युद्ध और हथियारों के व्यवसायी खरबों के वारे-न्यारे करते हैं और पूरी दुनिया में षड्यांत्रिक युद्ध लिप्सा या युयुत्सा को सुलगाए रखते हैं, साथ ही दुनिया को विनाश की ओर धकेलते रहते हैं।
पर सोचें कब तक मोहरे रहेंगे हम भारत इस स्थिति का अपवाद नहीं है। फिर भी भारतीय जनता के सामने सवाल यह होना चाहिए कि दुनिया के कथित शक्ति संपन्न प्रक्षेपास्त्रधारी देशों द्वारा बिछाई गई वैिक बिसात पर भारत आखिर कब तक एक मोहरे की भूमिका में बना रहेगा? कब तक वह उसी हथियार प्रक्रिया का हिस्सा बना रहेगा, जो आज सिर्फ विनाश की भविष्यवाणी कर रही है? जब भारत हजारों किलोमीटर तक मार करने वाले स्वनिर्मित प्रक्षेपास्त्र के सफल निर्माण की घोषणा करता है तो दरअसल वही उसी कतार का एक सिपाही होता है, जो अरबों लोगों के वास्तविक हितों की कीमत पर दूसरों ने जबरन लगवाई है। उसकी प्रक्षेपास्त्र या परमाणु हथियार संपन्नता संबंधी कोई भी पहल मौलिक पहल नहीं है। भौतिक पहल तभी हो सकती है, जब वह स्वयं को इस कतार से निकाल कर बाहर खड़ा करे और युयुत्सा के तुमुलनाद के बीच दृढ़ता से अपनी हथियार विरोधी आवाज बुलंद करे। आज की दुनिया को सबसे ज्यादा इसी की जरूरत है। जब जरूरत है तो इसकी ठोस पहल यूरोप-अमेरिका की ओर से ही हो, इस अपेक्षा का कोई औचित्य नहीं है। यह पहल भारत की ओर से क्यों नहीं हो सकती? समूचे वि को खतरे में पड़ जाने देने के बजाय इस प्रति पहल के खतरे उठाने में कम खतरा है।

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