Wednesday, May 23, 2012

गलत नहीं रक्षा पर भारी खर्च



भारत ने जब भी प्रतिरक्षा के प्रति लापरवाही बरती हमले एवं पराजय झेलने पड़े
केंद्रीय बजट पेश किए जाने के ठीक तीन दिनों बाद स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टीच्यूट सिप्री ने वि भर में हथियारों की खरीद का आकलन करते हुए बताया कि भारत चीन को पीछे छोड़कर वि का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। इसके अनुसार, 2007 से 2011 के बीच विदेशों से इसने 12.7 अरब डालर के हथियार और साजो सामान खरीदे जो वि की कुल खरीदारी का 10 प्रतिशत है। जेन्स डिफेंस वीकली का आकलन है कि यह 2011 से 2015 के बीच 100 अरब डॉलर के करीब हथियार खरीदेगा। यह तब का आकलन है, जब सेनाध्यक्ष वीपी सिंह के हथियार और साजो-सामान कम होने संबंधी पत्र को लेकर बावेला नहीं मचा था। संसदीय समिति द्वारा इस पर मुहर लगाने के बाद रक्षा खरीदारी में तेजी दिखाई दे रही है। यह सवाल हमेशा उठाया जाता है कि आखिर हमारे भारी भरकम रक्षा खर्च का औचित्य क्या है? अत्यधिक रक्षा व्यय तो शांति की जगह सैन्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा, जिससे भू-राजनीतिक परिस्थितियां तनावपूर्ण होंगी, देशों के बीच एक दूसरे के प्रति आशंकाएं और वैर भाव पैदा लेगा। तो क्या रक्षा खर्च का बढ़ना अनौचित्यपूर्ण है? सबसे पहले अपने रक्षा खर्च पर संक्षिप्त नजर डालें। इस वर्ष का हमारा रक्षा बजट है 1 लाख 93 हजार 407 करोड़ रुपये। यह अमेरिकी डॉलर में 38.5 अरब डॉलर है। पिछले साल का हमारा संशोधित बजट था, एक लाख 70 हजार 937 करोड़ यानी 34 अरब डॉलर। इस तरह कुल वृद्धि 13 प्रतिशत है। भारत दुनिया का अकेला देश है जिसका रक्षा बजट 2009-2010 में एकाएक 34 प्रतिशत बढ़ा। यह तथ्य कम लोगों को पता है कि भारत के रक्षा बजट में अधिकतम हिस्सा राजस्व खर्च यानी वेतन, भत्ते पेंशन सहित अन्य मदों में जाता है। उस वर्ष छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के कारण बजट में वृद्धि करनी पड़ी थी। पूंजीगत खर्च यानी हथियार खरीद, हथियार उन्नयन, रख-रखाव और उन्नयन का सेवा शुल्क आदि पर 40 प्रतिशत खर्च होता है। इस वर्ष इसके लिए 17 अरब डॉलर की राशि तय है जो पिछले वर्ष से 15.7 प्रतिशत अधिक है। राफेल विमान, पीसी 7 प्रशिक्षण विमान खरीदने को हरी झंडी मिल चुकी है। इसके अलावा बोफोर्स होवित्जर तोपों का स्थानापन्न, उसके गोला बारूद, वाहक वाहनों... की लंबी सूची सामने आ चुकी है। अगले वर्ष की भी खरीदसूची बन रही है। जाहिर है, अगले वर्ष का बजट और बढ़ेगा।
रक्षा नहीं, सामाजिक-आर्थिक खच्रे बढ़ाने की भारत को सलाह
इस प्रसंग में भारत के मंसूबों को लेकर कई प्रकार के आकलन आ रहे हैं। कुछ इसे अनुचित बता रहे हैं। उनका मानना है कि भारत रक्षा खर्च के बजाय सामाजिक-आर्थिक विकास पर खर्च बढ़ाए। किंतु जरा अपने पड़ोसी चीन का रक्षा बजट देखिए, यह 106.39 अरब है। यानी भारत के तीन गुने से ज्यादा। पिछले वर्ष की तुलना में 11.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। चीन ने पिछले वर्ष भी 12.7 प्रतिशत की वृद्धि की थी। इसका रक्षा बजट था, 91 अब डॉलर। पिछले वर्ष भी हमारे बजट से तीन गुना था। अनेक वर्षों से इसकी वृद्धि दो अंकों में हो रही है। अगर समूची अर्थव्यवस्था के अनुपात में देखा जाए तो सिप्री के अनुसार 2010 तक भारत का रक्षा व्यय सकल अर्थव्यवस्था के 2.4 प्रतिशत, पाकिस्तान का 3.2 प्रतिशत एवं चीन का 2 प्रतिशत के आसपास था। चीन की समूची अर्थव्यवस्था का आकार हमसे साढ़े तीन गुना ज्यादा है। एक सच यह भी है पाकिस्तान का रक्षा व्यय 1988 में सकल अर्थव्यवस्था के 6.2 प्रतिशत था। इसके समानांतर भारत का रक्षा व्यय 3.6 प्रतिशत था। भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार तब से चार गुना से ज्यादा हो गई है, लेकिन रक्षा बजट उसके अनुपात में घटा है। यह बात अलग है कि कुल बजट का करीब 15 प्रतिशत रक्षा पर खर्च हो रहा है।
क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय सैन्य संतुलन के मुताबिक चलना होगा दुनिया के हालात ऐसे हों जिनमें रक्षा पर न्यूनतम खर्च करना पड़े तो फिर अनेक मानवीय-प्राकृतिक समस्याएं अपने-आप समाप्त हो जाएंगी। महात्मा गांधी की तो कल्पना ही भारत को सत्य और अहिंसा का पालन करने वाले ऐसा देश बनाने की थी, जो शस्त्रास्त्रों का खर्च उठाए बिना ही अपने को सुरक्षित अनुभव करता। वे एकदूसरे से लड़ने वाले नहीं वरन मित्रभाव रखने वाले अन्योन्याश्रित राज्यों के वि संघ की कल्पना करते थे। पं. नेहरू ने भी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को नीतियों में उतारने की कोशिश की। परिणाम 1962 का हमला और पराजय। जिस देश को आजादी के 52 वर्ष के अंदर पांच प्रत्यक्ष युद्ध में उतरना पड़ा हो, जिसे दो दशक तक छद्म युद्ध लड़ना पड़ा हो, जिसकी सुरक्षा पर हर क्षण छोटे-बड़े खतरे मंडरा रहे हों, उसे इच्छा या अनिच्छापूर्वक भी अपनी रक्षा की सशक्त तैयारी रखनी होगी। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में राष्ट्रों को क्षेत्रीय-अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन का अनुसरण करना पड़ता है। चीन के पास 22 लाख 50 हजार की सबसे बड़ी सेना है। चीन का 4057 कि. मी. सीमा पर जो रवैया है उसे देखते हुए भारत के पास चारा क्या है? अमेरिका का रक्षा बजट तो 600 अरब डॉलर के आसपास हैं। जब चीन की सेना अदन खाड़ी और उसके आगे तक तैनात हो रही है तो फिर भारत के सामने विकल्प क्या रह जाता है?
विसैन्यीकरण हमले का न्योता देना होगा चीन का यह तर्क हम मान भी लें कि उसकी रक्षा तैयारियों में कोई देश लक्ष्य नहीं है, फिर भी एक चौकस राष्ट्र के नाते साकार- सजगता हमारी विवशता है। शीतयुद्ध के बाद सैन्य और अर्थ पर आधारित शक्ति-संतुलन के परंपरागत सिद्धांत में परिवर्तन की जो कामना की गई थी, स्थिति उसके उलट है। इस समय दुनिया का रक्षा खर्च शीतयुद्ध काल से आगे बढ़ चुका है। बढ़ते क्षेत्रीय- अंतरराष्ट्रीय द्वंद्व, देशों के बीच एवं देशों के अंदर बढ़ते अविास और तनाव, आतंकवाद, आर्थिक संसाधन बढ़ाने के लिए प्रभाव शक्ति विस्तार की सतत कोशिशों..वाली वि- व्यवस्था में आप विसैन्यीकरण की ओर अग्रसर होकर दूसरे देशों को अपने पर हमला करने या ताकत की धौंस से परेशान करने के लिए प्रेरित करेंगे। इससे संतुलन भंग होगा और शांति की जगह अशांति पैदा होगी। भारत के प्राचीन चिंतकों भीष्म, शुक्र, कौटिल्य सबने राज्य के सात अंगों में दण्ड या सेना को विशेष महत्त्व दिया है। कौटिल्य ने कहा है कि जिस राजा के पास अच्छा सैन्य बल होता है, उसके मित्र तो मित्र बने ही रहते हैं, शत्रु तक भी मित्र बन जाते हैं। ध्यान रखिए कि कौटिल्य या किसी भारतीय चिंतक ने अनावश्यक हमला, युद्ध ये दूसरे राज्यों को डराने-धमकाने की कतई अनुमति नहीं दी है और न ही संपन्नता अभिवृद्धि को बाधित करने की बात कही है। कोष एवं सेना दोनों को महत्त्व दिया गया है। यह सिद्धांत आज भी लागू होता है। भीष्म ने तो महाभारतके शांतिपर्वमें ऐसी राज व्यवस्था को आदर्श माना जिसमें न कोई दंड देने वाला हो न दंड लेने वाला, लेकिन राष्ट्र की रक्षा हो, प्रजा निर्भय होकर अपना कर्त्तव्य निभाए तथा भीतर एवं सीमा के चारों ओर शांति का संतुलन कायम रहे इसके लिए प्रशिक्षित, वीर, स्वाभिमानी, राष्ट्रप्रेमी सेना के समूह को अपरिहार्य बताया है। ज्ञात इतिहास में भारत के साथ यह त्रासदी रही है कि जब-जब इसने भावुकता में इस सिद्धांत की अनदेखी की हमले एवं पराजय झेलने पड़े। शीतयुद्ध काल में जब दुनिया दो शक्तियों के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा और गुटों में बंटी थी, भारत ने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का नारा दिया, निगरुट संगठन खड़ा किया। जिन देशों के हाथों दुनिया का नेतृत्त्व था, उनने न तब इस पर अमल किया और न आज कर रहे हैं। इसमें भारत के अपने उदात्त सिद्धांतों को साकार करने की गुंजाइश कहां बचती है? हां, हम अपने आसपास एवं वि की सुरक्षा स्थिति का तात्कालिक एवं दीर्घकालिक आकलन करते हुए रक्षा तैयारियों की अपनी एक सीमा बनाएं और उस पर अमल करें। उसमें बदले हालात में संशोधन हों पर हम शस्त्र प्रतिस्पर्धा में न पड़ें, यही यथेष्ट होगा।

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