Wednesday, May 23, 2012

रक्षा पर बढ़ा खर्च विदेश नीति की नाकामी


आजादी के पहले तीन दशकों में भारत वि निरस्त्रीकरण का अभियान चलाता था। तब जवाहरलाल नेहरू अपने को शांतिदूत कहलाने में गर्व महसूस करते थे। द्वितीय वि युद्ध से तबाही के चश्मदीद साक्षी वे रह चुके थे। कोरिया में, वियतनाम में, कांगो में यानी धरती के किसी भी कोने में सिविल युद्ध होता था तो संयुक्त राष्ट्रसंघ तुरंत नेहरू से शांति सेना भेजने का आग्रह करता था। कारण यही था कि भारत कभी भी आक्रामक राष्ट्रों के दज्रे में नहीं रहा। परमाणु बम के उत्पादन के विरुद्ध नेहरू का भारत पुख्ता और अनवरत अभियान चलाता था। हालांकि 1962 में कम्युनिस्ट चीन द्वारा भारत पर हमले के बाद भारतीय रक्षा नीति में आमूल परिवर्तन हो गया। तब तक भारतीय सेना एस्पेसो काफी फिल्टर बनाती रही और वर्दी सिलती थी। जंग लगी बन्दूकें लिए हिमालयी बर्फ पर सूती मोजे पहनकर हिंदुस्तानी फौजी जवान चीन का सामना करते रहे। सैनिक अक्षमता का 1962 वाला वह एक दौर था। अब नये दौर में पांच हजार किलोमीटर की दूरी पर बने किसी भी निशाने पर भारतीय अग्नि प्रक्षेपास्त्र हमला कर सकता है। परमाणु बमों का अम्बार तो लग ही गया है। शुरुआत की थी, उसी शांतिदूत की आत्मजा इंदिरा गांधी ने पोखरण से। शीघ्र ही कवि हृदय वाले अटल बिहारी वाजपेयी भी पीछे- पीछे आ गये। पोखरण द्वितीय बना। इसी संदर्भ में निरस़्त्रीकरण की वैिक आंदोलन में भारत पिछड़ गया। शांति की कथनी और शस्त्र वाली करनी में फासला गहराता गया। भारत की देखा-देखी एशियाई राष्ट्र भी बम बनाने की होड़ में शामिल हो गए। केरल से भी छोटा उत्तरी कोरिया, पड़ोसी भूखा-नंगा पाकिस्तान और अब इस्लामी ईरान भी परमाणु शक्ति की ढैय्या छू चुके हैं।
प्राथमिकता : विकास या विध्वंस? अत: यह राष्ट्रीय बहस अब तेज हो गई है कि भारत की आर्थिक प्राथमिकता क्या हो? विध्वंसक शस्त्र निर्माण की दौड़ के सिरमौर बने अथवा वंचित, शोषित भारतीय आमजन का जीवन सुधारे। संसाधन सीमित हैं। अत: इस्तेमाल भी विवेकपूर्ण हो। कई शांतिवादियों ने शस्त्रों पर हो रहे खर्च और विकास के आवश्यक बजट पर शोधपूर्ण समीक्षा की है। साधारण आदर्श की भाषा में कहा जाए तो एक टैंक बनाने पर खर्च राशि से 30 गांवों में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं। एक बोफोर्स तोप की कीमत के बराबर खर्चा आएगा, यदि 50 गांवों को राजमार्ग से जोड़ने वाली सड़क बनाई जाए। प्रक्षेपास्त्र अग्नि पर हुए खर्च से तो सैकड़ों प्राथमिक स्कूल खोले जा सकते हैं। एक परमाणु बम की लागत से तो हजारों कन्याओं की शादी सरलता से की जा सकती है। फिलहाल, इस तरह के विकास बनाम विध्वंस के आंकड़े कई हैं। अब देशभक्त, राष्ट्रवादी, अधिकतर चुनौती के तेवर में सवाल उठाते हैं कि क्या भारत अहिंसा तथा विकास के नाम पर पलायनवादी और क्लीव बन जाए? फिर से अपनी आजादी खो दे? पड़ोस के विस्तारवादी कम्युनिस्ट चीन और ईष्र्यालु, झगड़ालु इस्लामी पाकिस्तान के सामने नत होकर रहें? तर्क भी है कि चीन में साठ करोड़ जन दो रोटी और एक आलू पर दिन गुजारते हैं, फिर भी चीन वि की तीसरी बड़ी सैन्य शक्ति बना हुआ है। पाकिस्तान की तीन चौथाई आबादी गुरबत और मुफलिसी में बसर कर रही है, फिर भी बम बना चुका है। अत: भारत क्यों इस शक्ति प्रदर्शन की रेस में पिछड़ जाए? बात तो गौरतलब है पर भारत की शांतिवादी संस्कृति और बुद्ध-गांधी की विरासत को कैसे नकारा जाए? यों भी 62 वषोर्ं की स्वाधीनता के बाद भी 60 करोड़ भारतीय को रोज खाना मयस्सर न होता हो, पीने का पानी न मिलता हो, बिजली और घर तो दीगर बात है। ऐसी परिस्थिति में शस्त्र निर्माण पाशविक प्रवृत्ति कहलाएगी।
दो सिरों के बीच सही जवाब यह दो सिरे हैं, जो देश की विपन्नता और शस्त्र की विपुलता के दरमियान दिखते हैं। राष्ट्र की भौगोलिक सार्वभौमिकता और ऐतिहासिक अस्मिता के संरक्षण की बात भी दृष्टि से ओझल नहीं की जा सकती है। सीमा बची रहे, तभी तो विकास की उपादेयता होगी। इस शक्ति बनाम शांति की बहस को लम्बा करना चाहें तो भारतीय इतिहास में कई दृष्टांत मिलेंगे, जो विकास पर सैन्य क्षमता को तरजीह देते हैं। गोरी और गजनवी भारत को लूट पाते यदि सबल राष्ट्रीय केंद्र होता? बाबर अगर बारूद से लैस न होता तो पानीपत का युद्ध भारत के पक्ष में होता। इब्राहीम लोदी की एक लाख वाली सेना के सामने बाबर के 12 हजार सैनिक टिक नहीं पाते। भारतीय रजवाड़ों के पास यूरोपीय स्तर के मारक शस्त्र रहते तो ब्रिटिश राज न आता। टीपू ही भारत का सुल्तान बन जाता। ये तमाम वे संभावनाएं भारतीय इतिहास में दिखती हैं। और पीछे सदियों में चलें। यदि सम्राट अशोक बौद्ध न हो जाते तो माजरा ही अलग होता। अब आज के परिवेश में देखें। स्थिति स्पष्ट है कि परमाणु संग्राम की आशंका नहीं है। सभी ताकतवर देश समझते हैं कि तबाही सबकी होगी। बस परिमाण का फर्क है। कहीं भयावह, तो कहीं सीमित। एक मायने में परमाणु शक्ति ही सबसे बड़ी गारंटी है कि बम विध्वंस में इस्तेमाल नहीं होगा। यह खतरा दीगर है कि तालिबान कभी पाकिस्तानी बम के भंडार कोहाट पर्वत पर कब्जा कर ले और बिना कहे बटन दबाकर भारत पर बम बरसा दें। देर से सही, भारत भी तब जागकर पाकिस्तान को भूगोल से इतिहास के पन्नों में पहुंचा दे। उसे मटियामेट कर डाले।
आत्मरक्षा की वास्तविकता से तय होता है बजट अत: बहस फिर इसी मूल बिंदु पर आ जाती है कि भारत राष्ट्र-राज्य प्रतिरक्षा का बजट कितनी सीमा तक रखे ? यहां महत्त्व का मुद्दा आ जाता है कि पलटन के अतिरिक्त भी कोई आत्मरक्षा का वैकल्पिक उपाय है क्या ? नेहरू ने इसी मकसद से निगरुट राष्ट्र समूह रचा था। दुनिया के कमजोर मगर शांतिप्रिय देश दो साम्राज्यवादी शक्तियों अटलांटिक और सोवियत खेमों से समान दूरी बनाकर तीसरा खेमा स्थापित कर रहे थे। मगर यह निगरुट राष्ट्र समूह सोवियत खेमे का पुछल्ला बनकर रह गया। सुरक्षा के समान मुहैय्या नहीं करा पाया। वस्तुस्थिति से नेहरू अवगत हुए जब चीन ने हिमालयी सीमा पार की तथा अरुणाचल और लद्दाख पर धावा बोल दिया। निगरुट राष्ट्र समूह के संस्थापक नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति को एक संदेश भेजा, जिसका आशय था-त्राहिमाम!
रक्षमाम्! भला हो राष्ट्रपति जॉन कैनेडी का, जिसने तत्काल अमेरिकी वायुसेना को भारत की मदद में भेजी। चीन फौज लौटा ले गया। मगर काफी बड़े भू-भाग पर कब्जा जमा गया। परिणाम अच्छा हुआ कि भारत के रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन जो हमेशा पाकिस्तान को ही शत्रु नम्बर एक करार देते रहे, हटा दिए गए। चीन का वास्तविक खतरा समझ में आ गया। 1962 से भारत की रक्षा संबंधी तैयारियां तेज हो गयीं।ान्नता और शस्त्र
सैन्य जरूरतों को चाहिए संबंधों का सहारा इसी चरण में एक विफलता भारत सरकार की रही कि वह अपनी रक्षा और विदेश नीतियों में सामंजस्य स्थापित न कर सकी, जबकि नेहरू ही दोनों मंत्रालयों को सम्भाल रहे थे। विदेश नीति का एक विशिष्ट पहलू होता है कि वि के देशों से ऐसा तालमेल बैठाये जिससे संकट पर विदेशी सैन्य मदद मिले। इंदिरा गांधी ने यही तरकीब अपनाई थी, जब पूर्वी पाकिस्तान को मुक्त कराने के पहले सोवियत- भारत मैत्री संधि बना ली थी। इसके तहत भारत पर आक्रमण को सोवियत रूस अपने पर हमला मानकर युद्ध में शामिल होता। लिओनेद ब्रेजनेव की इस धमकी से र्रिचड निक्सन डर गये। पाकिस्तान की मदद में आ रहे अमेरिकी जहाजी बेड़ा रुक गया। विदेश नीति की यह अभूतपूर्व सफलता थी। बराक ओबामा के अमेरिका से अथवा ब्लादिमीर पुतिन के रूस के साथ भारत समझौता कर लें तो चीन के आशंकित आक्रमण से बचाव हो सकता है। तब रक्षा का खर्चा भी बच सकता है। आर्थिक विकास हेतु संसाधन भी उपलब्ध होंगे। चीन के दक्षिण एशियाई साम्राज्य का सपना भी झुठलाया जा सकता है। अग्नि प्रक्षेपास्त्र पर खर्च हो रहा धन तब स्कूल, जनस्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि की योजनाओं हेतु आवंटित हो पाएगा।

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