अग्नि-पांच मिसाइल के परीक्षण पर आनंद से फूले न समाने का कारण नहीं है; एक परवाह करने वाला समाज इसके विपरीत इसे लेकर चिंतित ही होगा कि आखिर भारत किस तरफ जा रहा है। रणनीतिक मामलों के प्रतिष्ठान और एक राष्ट्रवादी मीडिया जब तब छाती पीटने के अवसर ढूंढता है और भारत की परमाणु क्षमता के प्रदर्शन पर उत्सव मनाता है और भारतीय राज्य इस सीमित दृष्टिकोण वाले कट्टर सैन्य राष्ट्रवाद को चुपचाप प्रोत्साहित करता है। इसी तरह, 2009 में आक्रामक राष्ट्रवाद का तब परचम लहराया गया था, जब भारत ने पहली स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत को समुद्र में परीक्षण के लिए उतारा था। भारत की पहली अंतरमहाद्वीपीय बलास्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) अग्नि-पांच की कामयाबी के मौके पर इसी तरह की नासमझी की प्रशंसा हिलोरे मारती रही है। अरिहंत और अग्नि-पांच के जांच/परीक्षण की प्रक्रिया की शुरुआत दरअसल, आठवें दशक के मध्य में हो गई थी और भारतीय परमाणु सिद्धांत (के प्रारूप) के 1999 में बनने और पूरा होने के साथ इस कार्यक्रम को सरकारी आशीर्वाद भी प्राप्त हो गया था। भारतीय राज्य की सेना के तीनों अंग-वायु, नौसेना और थल-चीन को विरुद्ध प्रतिरोधक क्षमता हासिल करने की गरज से परमाणु हथियारों और साजो-सामान के लिए लालायित हो रहे हैं। परीक्षणों का यह मतलब नहीं है कि भारत की यह ‘त्रयी’ महज सामरिक है लेकिन इसमें कोई भूल नहीं होनी चाहिए कि भारत ने एशिया में परमाणु पल्रय लाने की दिशा में एक और रसातली कदम उठा लिया है। यह वह तथ्य है, जिसको हमारे टिप्पणीकारों और आनंद-उमंग फैलाने वाले नेताओं ने नजरअंदाज कर दिया है। रणनीतिक मामलों के प्रतिष्ठान में बैठे धुरंधर बाल की खाल निकालते हुए कहेंगे कि अग्नि-पांच अंतरवर्त्ती (मध्यम) दूरी की बलास्टिक मिसाइल (आईआरबीएम) है, आईसीबीएम नहीं। (चूंकि अग्नि-पांच की मारक क्षमता महज 5,000 किलोमीटर है जबकि आईसीबीएम की कोटि में आने के लिए यह क्षमता 5,500/6,000 कि.मी. होनी चाहिए) ; और यह भी कि इसकी मोबाइल लाँच और तैनाती के लिए रेल से ले जाना आसान नहीं होगा। यह भी कि अरिहंत के पास अभी तक पनडुब्बी को दागने वाली परमाणु मिसाइल नहीं है। लेकिन ये सभी तुच्छ आपत्तियां हैं। असल बात यह है कि भारत ने जो रास्ता अख्तियार किया है और ‘त्रयी’ को क्षमतावान बनाने के लिए तरक्की के जिस मील पत्थर से गुजरा है-वह विलंबित, खर्चीला और अंतत: खतरनाक है। साल 2006 में अग्नि-तीन (आईआरबीएम कोटि की मिसाइल जिसकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर तक है) के सफल प्रक्षेपण के साथ ही भारत दक्षिणी चीन को अपनी मारक जद में ले सकता है। लेकिन आईसीबीएम के साथ-और जिसे दुनिया के मात्र छह देश ही अंजाम दे सकते हैं-रणनीतिक मामलों में बोलने वाली ताकत की महत्त्वपूर्ण वैधता है। अग्नि- पांच का सफल परीक्षण (जिसकी मारक जद में पूर्वी और मध्य यूरोप है) इसीलिए आत्मविध्वंस की यात्रा में महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है। हमारा लगातार आग्रह रहा है कि भारत के परमाणु हथियार और उसकी निष्पादन क्षमता रणनीतिक रूप से विध्वंसकारी है, राजनीतिक लिहाज से खतरनाक है और नैतिक दृष्टि से असमर्थनीय है। भारत के रक्षा महारथी कहते हैं कि परमाणु बम और उन्हें दागने की पण्राली तो महज राजनीतिक हथियार हैं, जिनका मूल्य महज धमकी देने के उपयोग में है; उनकी वास्तविक तैनाती करने में नहीं। अग्नि मिसाइल कार्यक्रम के बढ़ते चरण भारत की 21 सदी में होने वाले बड़े खेल में महत्ती भूमिका निभाने की उसकी गंभीर इच्छा की स्थापना है। पिछले दो दशकों में भारत ने अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन धीमे किंतु लगातार किए हैं, जो आठवें दशक में मालदीव में तख्तापलट को रोकने के लिए किए गए कामयाब सैन्य अभियान और इसी दशक में श्रीलंका में (अपने लिए विनाशक) सैन्य हस्तक्षेप की कार्रवाइयों में देखा जा सकता है। भारतीय नौसेना इस दरम्यान धीरे-धीरे अपने लिए हार्डवेयर के निर्माण के साथ हिंद महासागर पर सही अथरे में अपने वर्चस्व जताने तथा अदेन से लेकर दक्षिणी चीन तक अपनी मौजूदगी दिखाती रही है। वहीं भारतीय वायुसेना लंबी दूरी तक अचूक मार करने की अपनी हवाई क्षमता में बढ़ोतरी करती रही है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की सूचनाएं इशारा करती हैं कि अंतत: 10,000 कि.मी. यानी अमेरिका तक मार करने वाली मिसाइल,सूर्य/अग्नि- छह, के विकास पर काम चल रहा है। इस पर ‘गौर’ करना लाजिमी है कि अग्नि-पांच के परीक्षण पर वि की प्रतिक्रियाएं आठवें और नौंवे दशक की शुरुआत जैसी दबावकारी और निंदा से बहुत दूर थीं। एक अमेरिकी अधिकारी ने तो भारत के ‘परमाणु अप्रसार में जवाबदेही के रिकार्ड’ को रेखांकित किया और आलोचना में एक शब्द नहीं कहा। जब अमेरिकी सरकार का प्रवक्ता आपका जनसंपर्क अधिकारी हो जाए तो इसका मतलब है कि कई लक्ष्यों पर मार करने वाली अग्नि-पांच मिसाइल को, कम से कम राजनीतिक रूप से, पहले ही मंजूरी मिल चुकी है, जिसकी मारक जद में केवल चीन है। भारत को परमाणु सैन्य क्षमता अर्जित करने के इस अंगार भरे रास्तों पर चलने को बढ़ावा देने वाले यह तर्क दे सकते हैं कि देश की नाभिकीय ताकत में इजाफा पाकिस्तान के साथ कथित ‘रणनीतिक गतिरोध’ को खत्म करने में मदद देगा। लेकिन उनके लिए यह संकोच का विषय है, ऐसा पहली बार नहीं है, कि अग्नि-पांच के परीक्षण के हफ्ते के भीतर ही पाकिस्तान ने हफ्त-चार का परीक्षण कर डाला जिसकी जद में पूरा भारत आता है। वैिक ताकत होने की भारत की महत्त्वाकांक्षा, चाहे जैसी हो, शांति की संभावना हमेशा पाकिस्तान के साथ संवाद में ही रहेगी। हम इसे कभी भुला नहीं सकते कि परमाणु हथियारों के निर्माण से अधिक महत्त्व पाकिस्तान के साथ बातचीत की मेज पर मसलों का हल निकालना है। ताजा अग्नि-पांच मिसाइल कार्यक्रम के चलते उन सभी एशियाई देशों का ध्यान भारत की ओर जाएगा, जो चीन की आर्थिक व सैन्य शक्ति से खतरा महसूस करते हैं जबकि इसने अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के पुराने प्रशांत सहयोगियों को अपने आप उपयोगी बना दिया है। यह खुला सवाल फिर भी रह जाता है; और जैसा कि कई रणनीतिकार पूछते हैं; क्या इससे एशिया- प्रशांत क्षेत्र को ‘स्थिरता’ में मदद मिलेगी? निश्चित रूप से यह उस दोहराव को सहन करता नहीं लगता कि कोई सैन्यशक्ति स्थिरता नहीं लाती बल्कि इसके विपरीत स्थिति को ही जन्म देती है। इसे भी बार-बार कहने की आवश्यकता है कि भारत के परमाणु सैन्य कार्यक्रम का विस्तार शांति में कोई योगदान नहीं दे सकता। परमाणु प्रतिरोधक की अक्षमता विवाद को खत्म करती है, स्थिरता तथा शांति कायम करती है, यह सर्वविदित तथ्य है लेकिन भारत ने अपने को एक ऐसे खेल तक सीमित कर लिया है, जिसमें कोई विजेता नहीं है। यह दुखद है कि भारत उन राष्ट्र राज्यों में शामिल है, जिनमें घरेलू सवाल और उसके परमाणु, सैन्य और रणनीतिक नीतियों को लेकर किसी सवाल की मुकम्मल गैरहाजिरी है। अग्नि-पांच को लेकर एक ही रंग की घरेलू प्रतिक्रिया यह जाहिर करती है कि नागरिक और परमाणु सैन्य ताकत के लिए समर्थन तथा नागरिक और अंतरिक्ष कार्यक्रम में सैन्य उपयोगिता में संभाव्य अंतर एक पहेली है। स्वदेशी आलोचकों का यह अभाव, जिसे अब सफलता की चकाचौंध में भुला दिया गया है, गणतंत्र के लिए महंगी साबित होगी। इतिहास बताता है कि सैन्य विस्तार पर ऐसे बिना सवालिया समर्थन के, कोई राजनीति अपनी लोकतांत्रिक और नागरिक स्वतंत्रता को लंबे समय तक के लिए सुरक्षित नहीं रखती। (ईपीडब्ल्यू के विचार)
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