Wednesday, May 23, 2012

मिसाइल और मसाइल


एशियाई नेताओं की परिकल्पना वसंत में मिसाइलों के दागने के विचार में तब्दील हो गई है। 12 अप्रैल को उत्तर कोरिया के उन्हा-3 राकेट का प्रक्षेपण उसके अनाड़ीपन के कारण विफल हो गया हो लेकिन भारत ने, 19 अप्रैल को देशवासियों के उत्साह के ज्वार के बीच, लंबी दूरी तक मार करने वाली अग्नि- पांच मिसाइल बंगाल की खाड़ी में सफलतापूर्वक दाग दी। इस होड़ में पाकिस्तान भी कहां पीछे रहने वाला था, उसने भी परमाणु हथियार से लैस दो मिसाइलों का कारगर परीक्षण किया : पांच अप्रैल को कम दूरी तक निशाना बनाने वाली अब्दाली का और फिर 25 अप्रैल को लंबी दूरी तक लक्ष्य वेधने वाली शहीन-1 ए मिसाइल का प्रक्षेपण किया। सैन्य हार्डवेयर रूपों का यह प्रदर्शन कम से कम दक्षिण एशिया में, पुरानी दुश्मनी का ही दंगल कहा जाएगा। भारत और पाकिस्तान के बीच, एक जैसी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के दायरे में उपमहाद्वीप में सैन्य सर्वोच्चता को लेकर पुरानी प्रतिद्वंद्विता रही है। यद्यपि उनकी मिसाइलों की मारक क्षमता और गुणवत्ता संभवत: कम मायने रखती है : चूंकि पड़ोसी देशों की राजधानियां 700 किलोमीटर (435 मील) से भी कम है, जिस कारण दोनों एक दूसरे को आसानी से अपना निशाना बना सकते हैं। यहां तक कि परमाणु हथियारों से लदी एक बैलगाड़ी भी भारत पर चोट कर सकती है,’ यह कहना है रक्षा विशेषज्ञ उदय भास्कर का। पाकिस्तान के बारे में यह कहा जाता है कि वह पहले से विकसित अपने परमाणु हथियार के जखीरे को अब भी विस्तार देने के काम में लगा हुआ है। संभवत: पाकिस्तान के पास 100 के लगभग मुख्य परमाणु बम हैं और इनके साथ, उन्हें लक्ष्य तक ले जाने वाली मिसाइलें भी हैं। यह इसलिए है कि उसके प्रतिपक्षी भारत का कद, उसकी बड़ी अर्थव्यवस्था के चलते, बहुत बड़ा है। भारत के पास विमानवाहक जहाज हैं और उसने हाल ही में परमाणु क्षमता संपन्न एक पनडुब्बी भी खरीदी है। अब यह छह देशों के उस प्रतिष्ठित क्लब में शामिल हो सकता है : इसकी अग्नि-पांच मिसाइल के प्रक्षेपण ने भारत को अंतरमहादेशीय बलास्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) की सम्मानजनक हैसियत दिला दी है, जिसकी मारक क्षमता 5,500 कि.मी.या इससे भी ज्यादा है। विदेशी विश्लेषकों का मानना है कि अग्नि-पांच 8,000 कि.मी. की दूरी तक अपना निशाना साध सकती है। भारत के रॉकेट वैज्ञानिक दोनों स्तर पर बेहतर कर रहे हैं-वह अपनी मिसाइल में आधुनिकतम तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं और 50 मीटर के दायरे में लक्ष्य पर निशाना साध रहे हैं। उनकी अग्नि परियोजना स्वदेश निर्मित है (यद्यपि इसके लिए पहले रूस ने मदद की थी)। भारत मिलिटरी हार्डवेयर निर्माण के क्षेत्र में अपने हाशिये के रिकार्ड को सुधारने का प्रयास कर रहा है। वह भारी टैंक तथा हल्के युद्धक विमान बनाने की जद्दोजहद में लगा है। वि में हथियारों के सबसे बड़े आयातक देश के रूप में भारत हरेक वर्ष करोड़ों डालर विदेशी सैन्य साजो-सामान पर खर्च करता है। अग्नि की उड़ान, इसलिए ही, स्वदेशी अनुसंधानकत्र्ताओं और उसके निर्माताओं के लिए आनंदातिरेक का विषय है। अग्नि की जद और क्षमता का मामला ज्यादातर चीन से ताल्लुक रखता है। इसमें ठोस ईधन लगता है। साथ ही इसे बेहद कम समय की सूचना पर लक्ष्य पर दागा सकता है और यह एक साथ कई लक्ष्यों पर हमले करने के लिए अपने साथ कई युद्धक सामग्री ले जा सकता है। इसलिए भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने वैज्ञानिकों की तारीफ में यह जोड़ा कि यह हमारी सुरक्षा और तैयारी की विसनीयता है। मोटे तौर पर उनका मतलब था कि भारत पहली बार पेइचिंग और शंघाई की परमाणु प्रतिरोध क्षमता के लिए जल्दी ही खतरा बनने जा रहा है। चीन के पास अब भी सैन्य बल का जखीरा है और इस रूप में भारत के लिए पहले से खतरा बना हुआ है। लेकिन प्रतिरोधक क्षमता का यह साझा विकास वास्तव में द्विपक्षीय संबंधों में सुधार ला सकता है। विदेश मामलों के जानकार सी. राजामोहन ऐसा मानते हैं। उदाहरण के लिए, भारत के बढ़े आत्मविास का मतलब है कि वह चीन से सीमा विवाद में किसी समझौते पर पहुंचने के लिए कोई छूट देने का साहस कर सकता है। इसलिए दक्षिण एशिया में मिसाइलें दागे जाने को लेकर अपेक्षाकृत नरम प्रतिक्रिया को सुनना अपने आप में दिलचस्प है। हथियारों की होड़ पर होने वाली बात पर मौन पसरा है। भारत के लिए पाकिस्तान की लंबी दूरी की मिसाइल के परीक्षण में कुछ भी नया नहीं है। दरअसल, यह सुधरे राजनीतिक और व्यापारिक संबंध को पटरी से बिना उतारे हुए (भारत जल्दी ही अपने पड़ोसी को तेल के निर्यात का प्रस्ताव दे सकता है) जैसे को तैसा का व्यवहार है। चीन ने भी, भारत की नई मिसाइल की किसी गंभीर आलोचना से परहेज किया है। उसका कहना है कि एशिया दो बड़े देश भारत और चीन एक दूसरे के साझीदार
हैं। हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि इसके आगे क्या होने जा रहा है। भारत चीन को ध्यान में रखकर अपने सैन्य सामान बना-जुटा रहा है। लेकिन भारत का अमेरिका के साथ संबंध अत्यंत घनिष्ठ हो सकते हैं। इसलिए कि अमेरिका ने भारत के मिसाइल छोड़े जाने पर असाधारण रूप से कोई चिंता नहीं जताई है। उसने भारत के परमाणु अप्रसार संधि से अब तक बाहर रहने पर धमकाने के बजाय उसके परमाणु अप्रसार के बेहतर रिकार्डकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। संभवत: यह दृष्टिकोण उसकी इस उम्मीद के चलते है, चीन को अगर कोई जवाब दे सकता है तो भारत ही। ओसलो के शांति अनुसंधान संस्थान के जॉसन मिलियान इसे भारत को अमेरिकी साझेदार मानने की सरकारी स्वीकृति के स्पष्ट संकेतके रूप में देखते हैं। (इकोनॉमिस्ट से साभार)

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