भारत के लिए आंतरिक सुरक्षा का प्रश्न सीमा पर गंभीर हो रही रक्षा चुनौती के बराबर महत्त्वपूर्ण हो गया है। एक तरफ देश के आदिवासी इलाकों में नक्सलवादी गुटों द्वारा जगह-जगह सत्ता सामथ्र्य को बंधक घटनाओं से आंतकित किया जा रहा है। जैसे असंतोष का ज्वालामुखी फूट रहा हो। आंतरिक सुरक्षा के अन्य आयामों में स्त्रियों का व्यापार, बच्चों की मजदूरी, किसानों की आत्महत्या और दस्तकारों-बुनकरों की बदहाली की चौतरफा चर्चा है। बाल कुपोषण और प्रसव के दौरान माताओं की मृत्यु की अत्यंत ऊंची दर की तरफ तो स्वयं प्रधानमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री भी इशारा करते रहते हैं। सच्चर आयोग से लेकर अर्जुनसेन गुप्ता आयोग का यह निष्कर्ष है कि देश के संसाधनों का विस्तार हुआ है लेकिन उसमें ज्यादा हिस्सा अतिसंपन्न तीन प्रतिशत लोगों के नाम जा रहा है। बाकी 97 प्रतिशत के साथ न्याय करने की जरूरत है। यह वोट से मुमिकन हो तो बहुत अच्छा नहीं तो धरना-प्रदशर्न का रास्ता भी सामने है। अगर मजबूरी बढ़ी तो बंदूक की बात को बढ़ाने वाले गिरोहों से भी संबंध बनाने में इन्हें कोई बुराई नहीं दिखती। इस प्रसंग में सुझाव यही है कि आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अगर एक कदम पुलिस की मदद से नियंतण्रका होना चाहिए तो तत्काल दूसरा कदम रोजी-रोटी-मकान-दवाई-पढ़ाई और सामाजिक न्याय का भी होना चाहिए। पुलिस बल को मजबूत करना और प्रगति के प्रतिमानों को साकार करना दोनों ही साधन की मांग करता है। इसलिए यह प्रश्न वाजिब है कि क्या ऐसे हालात में हमारे देश को यूरोप और अमेरिका से महंगे हथियार; जैसे अरबों रुपये की लागत से पनडुब्बियों और बमवषर्क वायुयानों का खरीदना या फिर 5,000 किलोमीटर तक की मार करने वाले यानी चीन की दबंगई को काबू में लाने वाली मिसाइलों में पैसा लगाना जबकि पिछली आधी शताब्दी में हमारा और चीन का कोई सैनिक मुकाबला नहीं रहा है, उचित है? चीन की तरफ से कश्मीर से लेकर लद्दाख, तिब्बत और अंडमान निकोबार के द्वीप समूहों तक में अपनी तरफ से सैनिकों और फौजी साजो सामान का भयावह भंडार बनाया जा चुका है। इसे सभी भारत की घेरेबंदी के रूप में जानते हैं, सिवाय कुछ चीनपरस्तों के। कोई भी भारतीय या विदेशी रक्षा विशेषज्ञ इसकी अनदेखी का सुझाव कैसे दे सकता है? लेकिन देश की सुरक्षा को गोपनीय रहना और बगैर रोकटोक के हर साल खर्चे के बढ़ाते जाने के बावजूद हमारी सामरिक जरूरतों का कोई अंत दिखाई नहीं पड़ रहा है। परमाणु बम बनाने के महंगे लक्ष्य पाने से भी हमारा रक्षा बोझ नहीं घट पाया। फिर हमने समुद्री तटों की रक्षा के लिए महंगी पनडुब्बियां आयात कीं। इससे कितनी मजबूती आई है, नहीं मालूम। देश को तो इतना ही पता है कि मुंबई में आतंकी हमला समुद्र की तरफ से हुआ था। अब हम कुछ अरब रु पये की कीमत वाली दूरमारक प्रक्षेपास्त्र का सफल प्रयोग कर रहे हैं। इसी के तुरंत बाद यह भी तो खुलासा हुआ है कि हमारे शस्त्रागार में कुछ हफ्तों से ज्यादा सुरक्षा लायक गोलियां ही नहीं है। इसे कैग की रपट में पिछले वर्ष ही रेखांकित किया गया। इस साल स्वयं थलसेनाध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस कमी का प्रश्न उठाया है। ऐसे मोड़ पर दोनों तरफ से नई पहल की जरूरत है। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर विकास के नाम पर दिए जा रहे साधनों को भ्रष्टाचार से बचाना है। अनाज, दवा, पढ़ाई, सिंचाई, भवन निर्माण और पंचायती राज के स्तर की योजनाओं की राशि लूटने वाले को बगैर समय गंवाए जेल पहुंचाना होगा। शिक्षा के अधिकार और ग्रामीण राष्ट्रीय रोजगार गारंटी को भ्रष्टाचारियों के चंगुल से निकालना होगा। दूसरी तरफ, पीने के पानी की व्यवस्था, छोटी सिंचाई की व्यवस्था और नदियों की सफाई और प्राकृतिक जल संरक्षण। ये चार कदम एकदम उचित धनराशि की व्यवस्था कर के पूरा करना चाहिए। शासकीय क्षेत्र में सरकारी व्यवस्था के अधूरेपन और निजी पूंजी से त्रस्त चिकित्सा व्यवस्था और दवा उद्योग की अंधाधुंध मुनाफाखोरी पर सरकार और उद्यमियों को मिलकर समाज की परीक्षा पर खड़ा उतरना होगा। दूसरी तरफ हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा का मौजूदा स्तर मूल्यांकन की मांग करता है। बिना तात्कालिक जरूरतों को पूरा किए हम दीर्घकालीन समस्याओं से मुक्ति नहीं पा सकते। चूंकि भारत को हथियारों के बल पर क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की न जरूरत है और न गलतफहमी। इसलिए हम चीन के हथियारों के जखीरे से अपनी होड़ नहीं करना चाहते। इसके बावजूद, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और चीन की तरफ से जारी जल, थल और आकाश की नाकेबंदी से उत्पन्न खर्च के लिए साधन देना होगा। चीन और पाकिस्तान शुभ और लाभ की भाषा समझ सकें, इसके लिए हर प्रकार का शांतिपूर्ण प्रयास हमारे ही हित में है। फिर भी, अगर इनके तेवर बने रहे तो हम अपने आत्मसम्मान और आत्मविास की रक्षा के लिए न्यूनतम और प्रभावशाली प्रतिरोध की क्षमता बनाने के लिए विवश हैं। सारांशत: आंतरिक विकासमूलक सुरक्षा और सीमा की सैनिक निगरानी की जरूरतों के बीच में कोई अंतर्विरोध नहीं हो सकता है। विकास बनाम सुरक्षा की बहस नकली है। बिना सुरक्षा के विकास नहीं हो सकता है और बिना टिकाऊ विकास के स्थायी सुरक्षा कहां संभव हुई है? सोवियत संघ ने विकास की उपेक्षा करके हथियारों में अपना अधिकांश साधन झोंक दिया था। सीमा तो सुरिक्षत रही लेकिन समूचा ढांचा अंदरूनी विषमताओं के दवाब से ढह-ढहा गया। 70 बरस के अतिसुरक्षित राष्ट्र-राज्य का पेट चीरकर 12 नये देशों का जन्म कोई रोक नहीं सका। दूसरी तरफ, यूरोप के सेनापरस्त राष्ट्रों विशेषकर जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन ने एक पूरी शताब्दी सेना के भरोसे राष्ट्र निर्माण में लगाकर अब अंदरूनी विकास को प्राथमिकता देने का महत्त्व समझा है। जर्मनी और फ्रांस ने राष्ट्रीय अस्मिता और क्षेत्रीय महाद्वीपीय वास्तविकताओं को एक दूसरे का परिपूरक बनाने का रास्ता तलाशा। इससे यूरोप में हथियारों पर होने वाला खर्चा अब समग्र और टिकाऊ विकास की तरफ समूचे महाद्वीप को ले जा रहा है। क्या भारत अपने पड़ोसियों के साथ प्राकृतिक रूप से स्थापित परस्पर निर्भरता और भौगोलिक-सांस्कृतिक और आर्थिक निकटता के सच को सामने रखकर एक तरफ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय विकास और दूसरी तरफ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा की परस्पर संबद्ध अल्पकालीन रणनीति और दीर्घकालीन योजना नहीं प्रस्तुत कर सकता है? आज का समय हम सबसे इस प्रश्न का उत्तर मांग रहा है।
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