Monday, April 23, 2012

हथियारों का आयात


भारत ने पांच हजार किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम अग्नि-5 अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल का सफल परीक्षण किया। यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि विकसित देशों द्वारा कड़े निर्यात नियम लागू करने के बावजूद हमारे वैज्ञानिकों ने इस मिसाइल को विकसित कर दिखाया। अग्नि-5 में कई तरह की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है और इसे सड़क के किनारे से भी दागा जा सकेगा। अब वैज्ञानिक इस कोशिश में लगे हैं कि अग्नि-5 में एक साथ कई स्वतंत्र लक्ष्य वाले हथियार लगाए जा सकें और उसमें उपग्रहरोधी क्षमता जोड़ी जा सके। एक बार ऐसा हो जाने पर यह श्रेष्ठतम श्रेणी का प्रक्षेपास्त्र हो जाएगा। अग्नि-5 की सफलता ने यह साबित कर दिया कि देश का सार्वजनिक क्षेत्र महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर सकता है, बशर्ते संबंधित संस्थान को आंतरिक शक्ति और संयोजन क्षमता विकसित करने की छूट दी जाए। इसके बावजूद भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश बना हुआ है तो इसे विडंबना ही कहा जाएगा। इसे हाल के बड़े रक्षा सौदों से समझा जा सकता है। भारत ने फ्रांस से 126 लड़ाकू विमान खरीदने का समझौता किया, जिसकी लागत 54 हजार करोड़ रुपये है। इससे पहले भारत ने फ्रांस के लड़ाकू विमान (मिराज-2000) को उन्नत बनाने और उसमें मिसाइल लगाने के लिए करीब 18 हजार करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया था। इस प्रकार एक ही साल में भारत से फ्रांस को 82 हजार करोड़ रुपये के हथियारों के ऑर्डर मिले। फ्रांस से ही नहीं भारत ने रूस से भी 53 हजार करोड़ रुपये के किराये पर दस साल के लिए एक पुरानी परमाणु चालित पनडुब्बी हासिल की। एडमिरल गोर्शकोव नामक एक पुराने विमानवाही जहाज का सौदा करीब 12 हजार करोड़ रुपये का हुआ है, जिसे भारतीय नौसेना ने आइएनएस विक्रमादित्य नाम दिया है। इसी तरह भारत ने इजराइल से लड़ाकू जहाज खरीदने के कई बड़े सौदे किए हैं। स्टॉंकहोम स्थित पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक भारत दुनिया में हथियार और रक्षा सामग्री खरीदने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है। 2006-10 के बीच भारत ने दो लाख करोड़ रुपये के हथियार आयात किए। अगले पांच वषरें में यह राशि दोगुनी से ज्यादा होने का अनुमान है क्योंकि भारत अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है और अगले पांच साल में 100 अरब डॉलर के हथियार खरीदने के लक्ष्य रखा गया है। भारत के रक्षा बजट का 40 फीसदी हथियार, विमान, पनडुब्बिरयां खरीदने में व्यय होता है। 70 फीसदी अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता विदेशी से की जाने वाली खरीद से पूरी की जाती हैं। 2012-13 में देश का रक्षा बजट 17 फीसदी बढ़ाकर 1,93,007 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसमें से 80 हजार करोड़ रुपये हथियारों व उपकरणों की खरीद के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस भारी-भरकम खर्च के बावजूद देश के सेनाध्यक्ष की रिपोर्ट से उजागर होता है कि हमारे पास सक्षम तोपों और गोलाबारूद तक का अभाव है। यदि इस विरोधाभासी स्थिति की जड़ तलाशी जाए तो वह भ्रष्टाचार में ही मिलेगी। दरअसल, रक्षा सौदों में दलाली का खेल बड़े पैमाने पर जारी है। इसका ज्वलंत उदाहरण है ट्रेटा ट्रकों की खरीद। भले ही भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक हो, लेकिन लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, कुपोषण, भुखमरी आदि मानकों में यह दुनिया के सबसे निचले पायदान पर है। कुछ साल पहले तक भारत की भांति चीन हथियार खरीदने में पूरी दुनिया में अव्वल देश था। लेकिन उसने हथियार आयात में कमी के साथ ही अपने हथियार उद्योग में सुधार लाने का निर्णय किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि उसका निर्यात तेजी से बढ़ा। आज चीन दुनिया का छठा बड़ा हथियार निर्यातक देश बन चुका है। यहां सवाल उठता है कि भारत आयातक के बजाय कब हथियार निर्यातक देश बनेगा? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) घूसखोरी को हथियारों के आयात की वजह बता रहे हैं रमेश कुमार दुबे 

हाथ ही नहीं, हथियार भी हों अपने

पिछले दिनों रूस निर्मित परमाणु क्षमतायुक्त पनडुब्बी आईएनएस चक्र-2 को नौसेना में शामिल कर लिया गया। आईएनएस चक्र को शामिल करते ही भारत परमाणु क्षमतायुक्त पनडुब्बी से लैस होने वाला दुनिया का छठा देश बन गया है। इससे पहले यह क्षमता सिर्फ अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास थी। मूल रूप से के-152 नेरपा नाम से निर्मित अकुला-2 श्रेणी की इस पनडुब्बी को रूस से एक अरब डॉलर के सौदे पर 10 साल के लिए लिया गया है। आईएनएस चक्र की मौजूदगी से हिंद महासागर में सामरिक स्थिरता के साथ-साथ भारतीय सामरिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। यह देश की सुरक्षा के लिए बेहद सकारात्मक कदम है, लेकिन एक सवाल लगातार उठता आ रहा है कि हमारा देश प्रतिरक्षा के क्षेत्र में कब आत्मनिर्भर होगा क्योंकि सैन्य तकनीकों और हथियार उत्पादन में आत्मनिर्भरता देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। हथियारों के निर्माण और उनसे जुड़ी तकनीकों की खोज क्षमता के बलबूते ही भारत की हथियारों के आयात की मौजूदा प्रवृत्ति पर रोक लग सकेगी। अगर हम एक विकसित देश बनने की इच्छा रखते हैं तो आतंरिक और बाहरी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए हमें दूरगामी रणनीति बनानी पड़ेगी, इस लिहाज से सैन्य आयुधों और तकनीक के मामले में अपने पांव पर खड़े होना जरूरी है। लेकिन भारत पिछले छह दशक के दौरान अपनी अधिकांश सुरक्षा जरूरतों की पूर्ति दूसरे देशों से हथियारों को खरीद कर कर रहा है। वर्तमान में हम अपनी सैन्य जरूरतों का 70 फीसद हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर आयात कर रहे हैं। जहाजों और पनडुब्बियों के वर्तमान और भावी ऑर्डरों को देखते हुए स्पष्ट है कि इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए मजबूत कदम नहीं उठाये गए तो भविष्य में भी हमारी आयात पर निर्भरता बनी रहेगी। पनडुब्बियों के मामले में भारत की स्थिति पड़ोसी देश चीन मुकाबले बहुत अच्छी नहीं है। चीन के पास इस समय 3 परमाणु पनडुब्बियों समेत करीब 50 से 60 पनडुब्बियां हैं जबकि भारत के पास इनकी कुल संख्या मात्र 12 है। देश की पहली परमाणु पनडुब्बी अरिहंत का वर्ष 2013 तक समुद्री परीक्षण शुरू होगा। इसी तरह फ्रांस के सहयोग से बन रही 6 परंपरागत स्कर्पियन पनडुब्बियां वर्ष 2020 तक ही मिल पाएंगी। देश में नौसैनिक ताकत को मजबूत करने के लिए सरकारी रक्षा ढांचा ठीक करने के साथ-साथ पश्चिमी देशों के साथ समन्वय कर नवीनतम तकनीकों का हस्तांतरण तथा रक्षा उपकरणों को खरीदने में व्याप्त लालफीताशाही को खत्म करने की दरकार है। आईएनएस चक्र के मामले में भी काफी देर हुई क्योंकि भारत ने यह पनडुब्बी किराए पर लेने के लिए सन 2004 में रूस के साथ 90 करोड़ डॉलर का करार किया था। इसे कुछ साल पहले ही भारतीय नौसेना में शामिल किए जाने की उम्मीद थी, लेकिन व्यवस्थागत कमियों के कारण इसकी आपूर्ति का समय विलंबित होता चला गया। भविष्य में इन कमियों और गलतियों से सबक लेने की जरूरत है। निश्चित ही भारतीय नौ सेना के हौसले बुलंद हैं और उसकी गिनती दुनिया की श्रेष्ठ नौ सेनाओं में की जाती है। इसके बावजूद सवाल जायज है कि क्या पिछले सालों के दौरान नौ सेना की ताकत बढ़ाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं? रक्षा सौदों में घोटालों और भ्रष्टाचार के मामले सामने आने के बाद सेना के लिए हथियारों तथा अन्य साधनों की खरीद, उत्पादन और उपलब्धता में कमी आई है। सैन्य जरूरतों से संबंधित प्रक्रिया की धीमी गति के कारण सेनाओं के पास संसाधनों की कमी बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि रक्षा बजट में तो हर साल बढ़ोतरी हुई, लेकिन नौ सेना को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाया। हथियारों तथा उपकरणों की खरीद-फरोख्त के लिए पिछले 10 वर्षो में कई नए नियम-कानून बने। इसके तहत स्वदेशी उपकरणों की खरीद और उत्पादन पर जोर दिया जाना तय किया गया लेकिन धरातल पर इस दिशा में भी ठोस प्रयास नहीं हुए। वास्तव में भारत ने समुद्र में दुश्मन को रोकने में बेहद कारगर समझी जाने वाली पनडुब्बियों के विकास और आधुनिकीकरण पर अब तक ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। देश की वर्तमान पनडुब्बियां बहुत पुरानी हैं और उन्हें आधुनिक बनाए जाने की सख्त जरूरत है। 1980 के दशक में जर्मनी के साथ शुरू की गई एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी निर्माण योजना को भारत सरकार ने रद्द करके बड़ी गलती की थी, जबकि उस परियोजना पर करीब 15 करोड़ डॉलर खर्च किए जा चुके थे। पनडुब्बी एक ऐसा हथियार है, जो दुश्मन की नौसेना की निगाह में आए बिना ही उसके जंगी जहाजों, विमानवाहक पोतों और जमीनी ठिकानों को तबाह कर सकता है। मिसाइल और विमान दोनों की हमले के दौरान टोह ली जा सकती है, लेकिन समुद्र के अंदर रहने वाली पनडुब्बी जवाबी हमला करने में बेहद कारगर होती है। भारतीय नौसेना अपनी समुद्री सीमा की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है लेकिन समुद्री क्षेत्र के बढ़ते महत्व के मद्देनजर इसे और सशक्त बनाए जाने की जरूरत है। देश की विशाल समुद्री सीमा को देखते हुए हमें नौसेना पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि हाल के वर्षों में समुद्री क्षेत्र में पड़ोसी देशों और आतंकवादियों की बढ़ती हुई गतिविधियों से हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है। सुरक्षा मामलों में देश को आत्मनिर्भर बनाने में सरकार और एकेडमिक जगत की भी साझेदारी होनी चाहिए। स्वदेशीकरण के साथ-साथ हमें तकनीकी हस्तांतरण पर भी जोर देना चाहिए। इसके लिए मध्यम और लघु उद्योगों की नौसेना के आधुनिकीकरण व स्वदेशीकरण में अहम भूमिका हो सकती है। पिछले साल करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये के रक्षा बजट में से करीब 50 हजार करोड़ रुपये का खर्च हथियारों के आयात और रख-रखाव पर किया गया। इसका ज्यादातर हिस्सा विदेशी हथियार कंपनियों को गया। अब तक भारत के रक्षा खर्च से विदेशों को ही फायदा होता रहा है लेकिन अब यह फायदा भारतीय उद्योग को मिले, इसलिए इस पर स्पष्ट और दूरगामी रणनीति बहुत आवश्यक है । 2008 में मुंबई हमलों से सबक लेते हुए भारतीय नौसेना को देश के तटीय और समुद्री सुरक्षा ढांचे में व्यापक फेरबदल के लिए अत्याधुनिक उपकरणों की जरूरत है। भारत की तटवर्ती सीमा की लंबाई 75166 किलोमीटर है तथा अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में करीब 1200 द्वीप क्षेत्र भी हैं। बिखरे हुए द्वीपों तथा विशाल तटवर्ती क्षेत्र की रक्षा के लिए नौसेना का पूरी तरह सशक्त और सक्षम होना जरूरी है। पिछले दिनों इस पर रामराव समिति ने सिफारिश की थी कि डीआरडीओ को केवल 10 से 12 सामरिक महत्व की प्रौद्योगिकी पर ध्यान देना चाहिए और दूसरे छोटे कामों से बचना चाहिए। देश की रक्षा जरूरतों पर विदेशी निर्भरता खत्म करने के लिए हमें खुद की औद्योगिक सैन्य संस्कृति विकसित करनी होगी। तभी विकसित राष्ट्र बनने का हमारा सपना साकार हो सकता है।

Monday, April 9, 2012

चीन, चिंता और भारत


सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह के प्रधानमंत्री को लिखे गोपनीय पत्र, जिसमें चीन की रक्षा तैयारियों की तुलना में हमारी कमतर क्षमताओं का खुलासा किया गया है, को लेकर देश में भय व्याप्त गया है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि हमें क्यों भयग्रस्त होना चाहिए? जनरल के खत से प्रभावित हमारे बहुत से विश्लेषकों ने चीन से युद्ध का परिदृश्य लगभग अपरिहार्य बना दिया है। अब जरा 2008 में लौटें। तब समझा जाता है कि रक्षा मंत्री एके एंटनी ने दो मोचरे पर संभावित युद्ध की तैयारी के बाबत सेना को औपचारिक निर्देश जारी कर दिया था। इसके बाद नवम्बर 2011 में पूर्व रक्षा मंत्री और सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने संसद में कह दिया था कि चीन हम पर जल्दी ही हमला करने वाला है।
इस भय के तथ्य स्पष्ट हैं। चीन ने अपने रक्षा बजट को 2011 के 91.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 106.4 बिलियन डॉलर कर दिया है। पिछले दशक से हरेक वित्तीय वर्ष में बढ़ोतरी होते-होते यह 12 फीसद तक पहुंच गई है। इस रकम का उपयोग वह क्रूज और बलास्टिक मिसाइल बेड़े को बढ़ाने, नई डेंग फेंग-21डी की तैनाती करने वाला है, जो प्रशांत महासागर में अमेरिका के जंगी जहाजों के लिए पहला गंभीर खतरा होने जा रहा है। इसने पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों के लिए एक प्रतिमान बनाए हैं और एक विमानवाहक जहाज अपनी सेना में शामिल किया है। चीनी सेना के शक्तिशाली होने की तैयारी से यह साफ नहीं होता कि इससे भारतीय को डरने की जरूरत है। यहां समझना होगा कि भारत चीन के मुख्य खतरनाक देशों में शामिल नहीं है। चीन की 18 समूहों वाली सेना के आठ समूह तो दक्षिण-पूर्वी समुद्र सीमा के लिए है, इसमें शामिल सैनिकों को ताईवान से युद्ध के नजरिये से प्रशिक्षित और लैस किया गया है। इस बात की पुष्टि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय भी करता है। कोरियाई देशों में, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) परंपरागत से लेकर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल करने लायक बड़ी जंग के हालात देखता है, जो उसकी सीमा पर लाखों की तादाद में शरणार्थियों की उमड़ी भीड़ का कारण बन सकता है। उसकी सेना को आवश्यक रूप से शिनज्यिांग प्रांत में उग्रवाद और अशांत तिब्बत से जूझना है। उसे चीनी व्यापार के रास्ते को अबाध करना है और हाई सी में ऊर्जा भंडारों की निगरानी करनी है। इनमें से हरेक खतरा प्रमुखता से अमेरिका को है, जो वि की एकमात्र शक्ति है। चीन को भारत से न डरने की जो दूसरी वजह है, वह यह कि खतरा केवल बारूद से नहीं बनता लेकिन उसके प्रचार से भी होता है। चीनी पनडुब्बी से खतरे का हौवा सबक देने वाला है। पांच साल पहले अमेरिकी विश्लेषक 2011 तक पनडुब्बियों के मामले में चीन के आत्मनिर्भर होने की भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन चीन के नौसैनिक शक्ति के मंसूबे से चिंतित रूस ने उसमें उपयोग में आने वाली खास तरह की प्रौद्योगिकी की आपूर्ति ही रोक दी और इस बीच अमेरिका ने अपनी पनडुब्बियों की तादाद दोगुनी कर ली। गत वषर्, अमेरिका ने चीनी सेना के बारे में अनुमान लगाया था कि वह परमाणु मारक क्षमता से लैस पांच पनडुब्बी प्राप्त कर लेगी, उनमें से तीन 091 हॉन-वर्ग के जहाज वष्रात तक बेड़े में शामिल हो जाएंगी। इसके अलावा, डीजल पर चलने वाली 50 पनडुब्बियां हैं, जिनमें से ज्यादातर कबाड़ हो चुकी हैं और कुछ प्रायोगिक बलास्टिक-मिसाइल पनडुब्बियां हैं। अमेरिकी नौ सेना के पास 53 लड़ाकू पनडुब्बियां, चार मिसाइल निर्देशित पनडुब्बियां और 14 बलास्टिक-मिसाइल नौकाएं समेत कुल 71 हैं। इसमें उसके यूरोपीय संघ और जापान, कोरिया और आस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों की नौसैन्य क्षमता शामिल नहीं है।
62 की हार का वेवजह डर इतने के बावजूद, चीन पर अविास में भारतीय आग्रहों के लाल होने की वजह हमेशा ही 1962 की लड़ाई में सद्भावना की कीमत के रूप में मिली पराजय रही है। वास्तव में यह लड़ाई इसका शानदार उदाहरण है कि केवल हथियारों के बलबूते जंग नहीं जीती जा सकती। रक्षा मंत्रालय के दिए ब्योरे पर डॉ पीबी सिन्हा और कर्नल एए अथाले की लिखी किताब हिस्ट्री ऑफ द कनफिलिक्ट विद चाइना, 1962 में कहा गया है, ‘हम जानते हैं कि चीनी हथियारों, उपकरण संयोजन और प्रशिक्षण में भारतीयों से बेहतर पड़ते थे। लेकिन यह सर्वोच्चता केवल आंशिक थी। यह अपने आप में ही विजेता होने की निर्णायक नहीं है।
भारतीय वायुसेना जो चीन के मुकाबले में बेहतर है, उस जंग में पंगु इसलिए हो गई क्योंकि तत्कालीन सोवियत संघ ने अनबन के कारण बिना कल-पुज्रे के ही हमें छोड़ दिया था। हालांकि भारत ने अपनी हवाई क्षमता का विकल्प जिन वजहों से नहीं चुना उनमें एक यह डर भी शामिल था कि ऐसा करने से जवाबी हमले ज्यादा होने लगेंगे। तब भारत में अमेरिकी राजदूत जॉन गॉलब्रिथ भी हवाई हमले के विरुद्ध लॉबिंग कर रहे थे, उन्हें भय था कि उनका देश क्यूबा में परमाणु मिसाइल तैनाती के मुद्दे पर सोवियत संघ से उलझ जाएगा और इस तरह उसे युद्ध में कूदना पड़ जाएगा। हालांकि डॉ सिन्हा और कर्नल अथाले तब वायु मुख्यालय में तैनात अभियान के तत्कालीन निदेशक एस सी दीवान के 1988 में दिए गए तकरे से सहमत नहीं है कि हवाई हमले का सीमित ही उपयोग होता तब उत्तर-पूर्व के जंगलों से बढ़ रही थल सेना को कवर देना पड़ता। पहले दोनों लेखकों का स्पष्ट मानना है कि जंग में वायुसेना के इस्तेमाल से चीन के सैन्य संचालन के डैने टूट जाते और हमारी सेना को पहाड़ों से होकर चीन में घुसने में रास्ता मिल जाता।किसी भी रूप में सबक वही है, बेहतर का मतलब मैदान मारना नहीं होता।
इतिहास दोहराना चीन के लिए क्यों है नामुमकिन जब मुलायम सिंह आसन्न चीनी हमले को देख रहे थे तो अध्येयता डॉ कांति वाजपेयी ने कई ठोस सैन्य कारण गिनाते हुए बताया था कि 1962 क्यों नहीं दोहराया जा सकेगा। उन्होंने कहा, ‘अव्वल तो भारतीय वायुसेना को नेस्तनाबूद करना चीन के लिए संभव नहीं होगा, जो उसके सैन्य तंत्र की जीत के लिए आवश्यक होगा। फिर हिमालय की चोटियों पर आक्रामक मुद्रा में सेना की मौजूदगी, हिन्द महासागर में भारत से मुठभेड़ कर सकने की चीनी नौसेना की सीमित क्षमता, तिब्बत की स्वायत्तता को लेकर आंतरिक उपद्रव छिड़ने के आसार और इन सबसे बढ़कर परमाणु युद्ध की आशंका।वाजपेयी का स्पष्ट निष्कर्ष है कि भारत और चीन के बीच जंग संभव नहीं है जब तक कि दोनों एक दूसरे को भड़काने, वास्तविकताओं के खराब आकलन पर आधारित आचरण करने पर आमादा न हो जाएं; तिस पर भी परमाणु हथियारों और हवाई क्षमता वाले देश के साथ, युद्ध में जाना बेहद जोखिमपूर्ण होगा।
दरअसल, इस शंका से निजात मुश्किल है कि भारत 1962 की लड़ाई लड़ने की कोशिश कर रहा है। हमारी सेना उसी धुरी पर तैनात है और उसकी रणनीतिक जुबान वही की वही है। भारत को अगर चीनी की उभरती सैन्य शक्ति पर गंभीर प्रतिक्रिया देनी है तो उसके अपने खुफिया और सैन्य प्रतिष्ठानों को चीनी को ज्यादा अध्ययन करना है। हमारे विविद्यालय, खुफिया संस्थान और सैन्य प्रतिष्ठान; हर जगह अपने अहम पड़ोसियों तक की भाषाओं को पढ़ने वाले लोगों की कमी है; ऐसे में उनके रणनीतिक दस्तावेजों को समझना तो दूर की बात है। भारत को ज्यादा हार्डवेयर की जरूरत है। यह सोचने की भी कि हमें कैसे हार्डवेयर की जरूरत है और इसका बेहतर उपयोग कैसे किया जाए?
(साभार : दि हिन्दू)

जमीन में हैं सैन्य भ्रष्टाचार की जड़ें


सेना में भ्रष्टाचार के अनेक मामलों की मूल जड़ सेना के नाम पर देश में फैली जमीनें हैं। जमीन के मामले में भारत का रक्षा मंत्रालय सिरमौर है। उसके पास 1.73 मिलियन एकड़ जमीन है। यह जमीन सेना को छावनी, कार्यालय और सैन्यकर्मियों की रिहायश के लिए दी गई है, जिसका बड़ा हिस्सा अनप्रयुक्त पड़ा हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक सेना के पास लगभग 82000 एकड़ जमीन अतिरिक्त है। 2011 जनवरी में पुणो में कल्पतरु नाम के निजी बिल्डर को सेना की जमीन सस्ती दर पर देने का मामला उठा था। इस सौदे में कल्पतरु को कथित तौर पर 9 मिलियन डॉलर का मुनाफा हुआ था। सीबीआई ने सेना के पूर्व उप प्रमुख ले.ज. नोबेल थम्बुराज समेत तीन के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और र्दुव्‍यवहार के आरोपों के साथ चार्जशीट दायर किया था। इसके अलावा, कल्पतरु भवन निर्माता कम्पनी मुंबई के कंडावली-मलाड इलाके में सेना की जमीन खरीदने के मामले में भी आरोपित है। इस मामले में रक्षा उत्पादनों के राज्य मंत्री, राव इंद्रजीत सिंह और पूर्व जनरल दीपक कपूर इस मामले में आरोपित हैं। 2011 श्रीनगर में भी हवाईअड्डे से लगी 39 मिलियन डॉलर की कीमत की जमीन को निजी भवन निर्माता कम्पनी के हाथ अवैध हस्तांतरण का खुलासा हुआ था। सीबीआई ने सैन्य भू प्रबंधन विभाग के कुछ अधिकारियों के खिलाफ जांच कर रही है। 2012 जनवरी में, जोधपुर में सेना की 4.84 एकड़ जमीन को तीन मिलियन डॉलर में एक निजी न्यास को हस्तांतरित करने का मामला उजागर हुआ था। यह जमीन सेना के व्यावसायिक उपयोग के वास्ते रखी गई थी लेकिन रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अफसर ने बिना किसी वैधानिक अनुमति के स्थानीय पूर्व महाराजा मेजर हरि सिंह धमार्थ न्यास को हस्तांतरित कर दी। 2010 मुंबई में आदर्श सोसाइटी घोटाला सुर्खियों में आया था। इसमें करगिल युद्ध शहीदों की विधवाओं और परिजनों की रिहाइश के लिए फ्लैट बनाए जाने थे लेकिन सेना के आलाअफसरों से लेकर राजनीतिकनौक रशाहों तक ने न केवल भवन को 31वीं मंजिल बनवा दी बल्कि ये सारे लोग उसमें नामी-बेनामी फ्लैट भी ले लिए। हालांकि सेना का कहना है कि इतनी ऊंची इमारत से कुलाबा सैन्य केंद्र पर नजर रखी जा सकती है। लिहाजा, यह उसकी सुरक्षा के लिए खतरा है। इस मामले की न्यायपालिका की देखरेख में सीबीआई जांच के दौरान नौ बड़े आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। 2008 में सुकना भूमि घोटाला हुआ था। पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी अवस्थित सेना मुख्यालय की 71 एकड़ जमीन फर्जी तरीके से मायो कॉलेज, अजमेर के फ्रेंचाइजी स्कूल को स्थांतरित कर दिया गया था। बाद में मायो कॉलेज ने इसका खंडन किया कि उसने किसी संस्था को अपने नाम के इस्तेमाल की इजाजत दी है। इस मामले में पूर्व सैन्य सचिव ले.ज. अवधेश प्रकाश समेत सेना के चार बड़े अफसरों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इसी शिक्षण संस्था ने उत्तराखंड के रानीखेत अवस्थित कुमांउ रेजिमेंटल सेंटर की जमीन का सौदा करती पाई गई थी। हालांकि जारी सुका जांच ने डील को स्थगित कर दिया है। सेना की जमीनों के घोटाले को देखते हुए रक्षा मंत्री एंटनी ने स्थानीय सैन्य प्राधिकरणों के अधिकार में संशोधन की जरूरत जताई है। वैसे यह कानून के शासन वाले देश में राहत की बात है कि कार्रवाई में मुंहदेखी नहीं की जा रही है। आरोपितों पर कार्रवाई की जा रही है।

हथियारों का सबसे बड़ा आयातक


महाशक्ति होने के मंसूबे से लबरेज और चीन से होड़ लेकिन चरमराते घरेलू रक्षा उद्योग से उलझा भारत सैन्य साजो-सामान की खरीदारी के दौरे पर है, जिसने इसे वैिक सैन्य सुंदरी का मोहक नाच बना दिया है। भारत के पास रक्षा खरीददारी की लम्बी फेहरिश्त है : इसमें लड़ाकू विमानों के लिए 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर, 1.5 बिलियन डॉलर ईधन भरने वाले विमानों के लिए तथा बिलियंस डॉलर पनडुब्बियों, टैंक, गोला-बारूद, अन्य उपकरणों के सौदों में पांच वर्षो के भीतर 80 बिलियंस डॉलर खरचने का अनुमान है। रक्षा विश्लेषक और सेना के पूर्व कर्नल अजय शुक्ला फरमाते हैं, ‘भारत थोड़ा-थोड़ा उस गंवार की तरह है, जिसकी दोनों जेबें नोटों से भरी हैं और हर कोई उसे काटने की कोशिश कर रहा है।
पहले पाकिस्तान भारत के जनरलों की रात की नींद उड़ाए रखता था लेकिन चीन को लेकर यह मानसिकता बहुत तेजी से बन रही है, जो आर्थिक और सैन्य ताकत है और जिसकी भारत से लगी 2800 मील सीमा को लेकर विवाद का रिसाव है। यह भारत की याददाश्त में 1962 में सीमा पर बीजिंग से लड़ाई में मिली हार की कसक के साथ असुरक्षा का इजाफा करता है। दूसरे, यह स्थिति चीन-पाकिस्तान के घने होते संबंध के चलते भारत के सामने स्वत:स्फूर्त ढंग से दो मोचरे पर जंग की आशंकाएं उत्पन्न करती है। भारतीय सेना पहले से ही नागरिक असंतोष और कश्मीर में सीमा पर घुसपैठ रोकने, घरेलू माओवादियों के उत्पात और कम निगरानी वाले तटवर्ती इलाके से आतंकवादियों के शहरों में आ धमकने से रोकने के लिए, जैसा कि 2008 के मुंबई हमले में हुआ था, भारी जद्दोहद में लगी हुई है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट थिंक टैंक के मुताबिक भारत 2007 में वि के सबसे बड़े हथियारों का आयातक देश था। इसके बाद ही द.कोरिया, पाकिस्तान और चीन का नम्बर था। यद्यपि मिस्र का 106 बिलियन अमेरिकी डॉलर सालाना रक्षा बजट-भारत के रक्षा बजट से तीन गुना अधिक है लेकिन उसने अपने घरेलू रक्षा उद्योग का तेजी से विस्तार करते हुए इस स्तर पर ही 90 फीसद सैन्य-सामानों की आपूर्ति कर लेता है जबकि भारत अपनी जरूरत की मात्र 30 फीसद सैन्य सामग्री घरेलू उत्पादों से हासिल कर पाता है। सीमा पर तीन डिविजन लगभग 90,000 सैनिकों की तैनाती की योजना से भारत असहज दिखता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस चिंता से बीजिंग को कोई सरोकार नहीं है, जो अपनी सैन्य तैयारी भारत के नहीं बल्कि अमेरिका के मुताबिक करता है। तिब्बत के पठार ने-किसी भी जमीनी लड़ाई में लाभदायक पोजिशन- चीन को ऊंची और बेहतर सामरिक स्थिति प्रदान कर दिया है। इसके अलावा, वह हार्डवेयर और सीमा क्षेत्रों तक बेहतर रेल- सड़क सम्पर्क के चलते भी भारत की तुलना में अच्छी स्थिति में है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, चीन सीमा पर एक हफ्ते के भीतर सारा लाव-लश्कर जुटा दे सकता है जबकि भारत को इस काम में 21 दिन लग जाएंगे। एंड्रे लुंडे भारत को चीन के साथ अवश्य और किसी भी कीमत पर जमीनी प्रतिद्वंद्विता से बाज आनेकी सलाह देते हैं क्योंकि इसका परिणाम भला नहीं हो सकता।श्री लुंडे एक रक्षा सलाहकार संस्था आईएसएस जेन से जुड़े विचारक हैं। हालांकि भारत के लिए कुछ चीजें फायदेमंद भी हैं। इसके लड़ाकू विमान भारी मात्रा में गोला-बारूद भर कर काफी कम ऊंचाई पर भी उड़ने और दुश्मनों के विमानों को मार करने में सक्षम हैं। इसके अलावा, भारत को चीन के साथ किसी भी युद्ध की स्थिति में उसे वैिक राजनयिक समर्थन मिलेगा। नई दिल्ली को निश्चित रूप से चीनी नौसेना की बढ़ती ताकत का मुकाबला करना है, जो हिन्द महासागर में उसके पड़ोस की प्राथमिकता को चुनौती दे रही है। चीन ने विमानवाहक पोत का गत अगस्त में परीक्षण किया था जबकि उसके तीन और विमानवाहक जहाज जल्द नौसेना बेड़े में शामिल होने वाले हैं। ताईवान और दक्षिण चीन सागर में अपनी परम्परागत निगरानी के बावजूद श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान और बांग्लादेशों में चीन बंदरगाहों के विकास में धन दे रहा है तो उधर, सोमालिया के जलदस्युओं के विरुद्ध भी अभियान छेड़े हुए है। उधर, भारत ने रूस-निर्मिंत विमानवाहक पोत मांगा है (यह उसे 10 साल की लीज पर मिल भी गया है-सं.) उसका 2007 तक दो और विमानवाहक पोत खरीदने की योजना है। फिलहाल, भारत को 1950 के दशक के ब्रिटिश निर्मित विमानवाहक पोत से काम चलाना है, जो अपनी आखिरी सांसें ले रहा है। गोचर खतरों के पार, भारत यह भी उम्मीद संजोए है कि सेना पर उसका व्यय रक्षा उद्योगों की डिजाइन, इंजीनियरिंग और संघटकों को आधुनिक बनाने में मदद देगा, एक उभरती महाशक्ति के उपयुक्त क्षेत्रीय कद बढ़ाएगा और सैन्य सामानों के घरेलू उत्पादन में विफलता, योजना में देरी और उससे बढ़ती बेशुमार लागत के अपने रिकार्ड को दुरुस्त करने में सहयोग करेगा। विश्लेषकों का मानना है कि वैसे तो पूरे वि के रक्षा उद्योगों का उत्पादन व्यय बढ़ रहा है लेकिन भारत की लागत कहीं ज्यादा है। सरकारी रक्षा उद्योगों के बेशुमार ठेकेदारों का घरेलू उत्पादन पर वर्चस्व है। साजो- सामानों की आपूर्ति की तारीख टलती ही रहती है। बिचौलिए खरीद-बिक्री में बड़ी राशि ऐंठते हैं। हथियार अपनी क्षमता से कमतर प्रदर्शन करते हैं या एकदम ही नहीं करते। स्टॉकहोम थिंक टैंक के सीनियर फैलो साईमन टी. वेजमैन कहते हैं, ‘भारत 1950 के जमाने से इस जतन में लगा है कि वह अपनी रक्षा जरूरतों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा खुद ही उत्पादित कर ले लेकिन इसमें वह बुरी तरफ विफल रहा है। (हालात ये हो गए हैं कि) अगर आप मेधावी इंजीनियर हैं और नाम-यश कमाना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि आप कहीं और चले जाएं।
अभी हाल में ही अजरुनटैंक को परखने के बाद भारत ने गर्वित होकर घोषित किया, ‘यह रूस के टी-90 टैंक से शानदार है।पर लुंडे बताते हैं, ‘टी- 90 की डिजाइन 1980 के दशक के बाद 1990 के पहले वाली है। इसलिए उसकी अजरुनसे तुलना उचित नहीं है। टैंक का चीनी संस्करण रूसी टी-90 के मुकाबले कहीं बेजोड़ है।भारत का कम क्षमता वाला स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजसइसके विकास के 29 साल बाद बेड़े में शामिल नहीं हो सका है। इस तरह, यह भी कई अन्य रक्षा परियोजनाओं की तरह ब्लैक होल
साबित हुआ है। जैसा कि सैन्य सामान की खरीद और उत्पादन क्षेत्र में विलम्बित स्थिति में है, इसके साथ हार्डवेयर की सेवा भी बाधित है और यह समय पर सही नहीं मिलती। भारत उन देशों में शामिल है, जो अब भी लड़ाकू विमान मिगउड़ा रहे हैं। सन् 2008 और 2012 के दौरान इनमें से 27 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। भारतीय मीडिया को इसीलिए मिगको उड़ते ताबूतकहना पड़ा है। भारतीय सेना भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी रही है; चाहे जमीन खरीद मामला हो या हार्डवेयर की खरीद, यहां तक कि ताबूत घोटाले हो रहे हैं। इनकी प्रतिक्रिया में लाए जाने वाले भ्रष्टाचार निरोधक प्रावधान सैन्य सामान खरीद की प्रक्रिया को इस कदर सख्त बना दे सकते हैं कि आलोचकों को कहने के लिए हो जाता है कि भारतीय सुरक्षा को नजरअंदाज किया जा रहा है। अभी पिछले हफ्ते, सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने यह खुलासा कर सियासत में तूफान ला दिया कि उन्हें कमतर गुणवत्ता वाले चेक निर्मित 600 ट्रकों की खरीदारी के लिए 2.8 मिलियन डॉलर घूस की पेशकश की गई थी। दूसरे, जनरल सिंह के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे खत के खुलासे ने भी तूफान बरफा दिया, जिसमें उन्होंने भारतीय सेना के ताजा हालात का ब्योरा देते हुए वायुसेना को ‘90 फीसद कबाड़’, तोपों और पैदल सेना को संकटपूर्णऔर टैंकों को गोला-बारूद विहीन बताया है। यह खबर उस समय आई जब चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ ब्रिक्स शिखर सम्मेलनमें भाग लेने नई दिल्ली आए थे। हालांकि न्यूयार्क अवस्थित हडसन फैयरफैक्स ग्रुप के मनोहर त्यागराज कहते हैं, ‘जनरल का यह खुलासा चीनियों का शायद ही चौंकाएं। इसलिए कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है, जो चीनियों को मालूम नहीं है।नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित रक्षा प्रदर्शनी में भाग लेने आए ब्रिटेन के जनरल डायनॉमिक्स के वरिष्ठ प्रबंधक ऐंड्रयू बोयले कहते हैं,‘भारत को धीरज रखने की जरूरत है। इसका कारोबार थोड़ा कठिन है। वे चीजों को अपने मुताबिक तय करते हैं। वह फैसले लेने में वक्त लेते हैं लेकिन यह बेशुमार क्षमताओं वाला मुल्क है।
(लॉस एंजिल्स टाइम्स की रिपोर्ट)

जनरल की चिंता वाजिब



अपने पड़ोसियों खास कर; चीन और पाकिस्तान के साथ जो हमारे रिश्ते हैं और जैसे समीकरण हैं, उन्हें देखते हुए मुझे लगता है कि हमारे आर्मी चीफ ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में जो चिंताएं जाहिर की हैं, वे बिल्कुल सही हैं। देखिए, चीन के साथ अरु णाचल प्रदेश से लेकर सीमा विवाद है और पाकिस्तान के साथ कश्मीर को लेकर झगड़ा है। फिर इन दोनों देशों की जो सैन्य तैयारी है, आधारभूत ढांचा और उनकी नीयत है, वह चिंतित करने वाली है। दूसरे, हमारी सेना को सैन्य साजो-सामान की काफी कमी झेलनी पड़ रही है। चौतरफा खतरे को देखते हुए हमें सेना की जरूरतें पूरी करने की जरूरत है, नहीं तो यह कमी काफी घातक साबित हो सकती है। इसलिए हमें अपनी फौज को इस काबिल बनाना होगा कि वे इनका मुकाबला कर सकें और किसी कमी के कारण वे ऐन वक्त पर घोखा न खा सकें। इसके लिए दो चीजों की काफी जरूरत है। एक तो सेना में मुकाबले की ताकत होनी चाहिए, चाहे वह वायु सेना, नौसेना या थल सेना हो। उन्हें आधुनिक हथियारों और सैनिक साजो-सामान मुहैया कराने की जरूरत है। ये तो किसी भी सेना की आधारभूत जरूरतें हैं। इसके अलावा उनके लिए प्रशिक्षण और कल्याण कार्यक्रमों के साजो सामान की भी उतनी ही जरूरी है। अगर यह सभी व्यवस्था ठीक है लेकिन फौज के प्रबंधन और सरकारी खरीद में कमी है तो सारी तैयारियां बेमानी हो जाती हैं।
सेना के हर अंग को कम हैं संसाधन थल सेना के पास आज हथियारों की काफी कमी है। बोफोर्स तोपों के बाद उनके पास आज का कोई आधुनिक तोप नहीं है। इसके अलावा दूसरे घातक हथियार भी पुराने जमाने के हैं। आज दुनिया में तकनीक बहुत तेजी से पुरानी होती जा रही है। हमारे पास रडार और रात की लड़ाई में काम आने वाले उपकरणों की कमी है। आर्मी चीफ के मुताबिक हमारे पास आर्टलिरी टैंक और गोला-बारूद की काफी कमी है। मेरे हिसाब से ये बहुत बड़ी कमियां है और इन्हें त्वरित दूर करनी चाहिए। वायु सेना के जहाज पुराने पड़ चुके हैं। हम उन्हें खरीदने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन सालों से यह मामला लटका हुआ है। नौ सेना के लिए पनडुब्बियों की काफी कमी है। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की समुद्री सीमा की निगरानी के लिए जितनी पनडुब्बियां होनी चाहिए उनकी आधी भी हमारे पास नहीं है। नौसेना के पास विमानवाहक जहाज एक ही है और वह भी रूस से पुराना खरीदा हुआ। वह भी एक दो सालों बाद रिटायर होने वाला है। दूसरी तरफ देश के अंदर आतंकवादी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। माओवादियों द्वारा की जा रही वारदातें भी बढ़ती जा रही हैं। इनको दूर करने के लिए फौज का इस्तेमाल कुछ न कुछ होता ही है। इनको देखते हुए खास उपकरणों और हेलीकाप्टरों की जरूरत पड़ती है, जिसकी काफी कमी है। इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा हमारे फौज में अधिकारियों की भी काफी कमी है। आज के युवा फौज में करियर को आकषर्क नहीं मानते हैं। इसके लिए सरकार को इस स्तर पर कुछ करना होगा ताकि युवाओं में फौजी बनने की ललक जग सके। उसे देखना होगा कि हमारे फौजियों का जीवन स्तर भी इतना अच्छा हो कि लोग फौज में आने को प्रेरित हो सकें।
निजी कंपनियां अछूत क्यों? सैन्य साजो सामान के लिए हम विदेशी देशों की कंपनियों पर निर्भर है। इसका नतीजा यह होता है कि सामान मिलने में देर होती है तथा हम उसकी ऊंची कीमत भी चुकाते हैं। डीआरडीओ इस काबिल नहीं है कि वह कुछ बना सके। मुझे समझ में नहीं आता कि सरकार ने निजी क्षेत्र को सरकारी खरीद से दूर क्यों रखा है? आज हमारे देश की कंपनियां इतनी सक्षम हैं कि वे हमारे काम के सैन्य सामान का उत्पादन कर सकती हैं और उनकी क्वालिटी दुनिया के किसी भी देश से कम नहीं होगी। देश में हथियार खरीदने से उनके ट्रायल की प्रक्रिया भी जल्दी होगी और खरीद की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत तेज होगी। सरकारी संस्थान डीआरडीओ नाकाबिल और अक्षम संस्थान है। इसलिए सरकारी खरीद में हमें अपने देश की निजी कंपनियों को बढ़ावा और मौका देना चाहिए। आखिर बाहर से भी सैन्य सामग्री हम निजी कंपनियों से ही खरीदते हैं और उनके ऊपर हम आश्रित भी रहते हैं। उनमें कोई खराबी आने पर हम बाहरवालों के रहमोकरम पर आश्रित हो जाते हैं। लड़ाई के वक्त अगर इन उपकरणों में किसी प्रकार की गड़बड़ी हो गई तो हम उसे खुद ठीक भी नहीं कर सकते।
नौकरशाही के भरोसे न रहे खरीद व्यवस्था इसके अलावा सरकारी खरीद में पारदर्शिता तथा त्वरित गति से काम होगा। रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत नौकरशाहों की व्यवस्था में हथियार खरीद की प्रक्रिया काफी उलझी हुई है। वहां कोई काम जल्दी हो ही नहीं सकता। इसके कारण काफी वक्त जाया होता है। जब तक हमें किसी उपकरण और सामान खरीद की मंजूरी मिलती है, तब तक दुनिया में उससे बेहतर तकनीक आ चुकी होती है। आज कितने ही ऐसे सामान हैं, जिनकी खरीद की प्रक्रिया दशक से ज्यादा समय से चल रही है और उन्हें हम आज तक हासिल नहीं कर पाएं हैं। इसके अलावा वर्तमान प्रक्रिया में बिचौलियों की बहुत बड़ी भूमिका हो जाती है क्योंकि पारदर्शिता की कमी है। हमें लाबिस्ट और बिचौलियों को भी खरीद पण्राली से दूर रखना होगा। इन सबको देखते हुए एक रक्षा खरीद और नीति की ब्लूप्रिंट बनानी होगी जिसमें फौज, रक्षा मंत्रालय और इससे संबंधित सभी विभाग शामिल होकर एक नई पण्राली का गठन करें।

सेना की तै यारी और लाचारी


हमारी सेना में मुख्य तीन कमियां हैं, जो लम्बे समय से बनी हुई हैं और उनका त्वरित निदान करना बहुत ही जरूरी है। एक, तोपखाने में मुख्य तोपों की कमी। बोफोर्स तोपों की खरीद 1986 में हुई थी। उसके बाद से लम्बा अंतराल बीत गया है और नए तोपों की खरीद नहीं हुई है। किसी भी सेना के लिए तोपें उसका मुख्य हथियार होती हैं और उनकी कमी नहीं होने दी जानी चाहिए। दो, भारतीय सेना के पास टैंक का भी अभाव है। पुराने टैंकों के स्थान पर नए टैंक रखे जाने चाहिए। टैंकों की कमी की अनदेखी नहीं की जा सकती। तीसरे, पैदल सेना के पास रात में देख सकने वाले उपकरणों का अभाव। आतंकवादियों से लड़ाई खुले में नहीं बल्कि रिहाइशी इलाकों और जंगल में होती है। वे छिप कर वार करते हैं। जाहिर है इस तरह की लड़ाई के लिए हमारे पैदल सैनिकों के पास रात में दिखने वाला डिवाइस होना बहुत जरूरी है।
सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि सेना की हवाई सुरक्षा पण्राली 97 फीसद बेकार हो चुकी है?
आंकड़ों पर विवाद हो सकता है लेकिन लब्बोलुआब यही है। एयर डिफेंस की तकनीक में भी तत्काल नवीकरण की जरूरत है।
आपने कहा कि बोफोर्स तोपों की खरीद 1986 में हुई थी, फिर सेना की डिमांड के बावजूद तोपों की खरीद नहीं हुई, आखिर ऐसा क्यों? हथियारों की खरीद-फरोख्त में निरंतरता बहुत ही जरूरी है और इसका न हो पाना चिंता का विषय है। हमें यह पता करते रहना जरूरी है कि हमारे विरोधी के पास कौन-कौन से नए हथियार हैं और वह क्या नया करने जा रहा है? आर्मर इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी इंडस्ट्री है। लिहाजा हथियार निर्माता देशों और कम्पनियों के इंटरेक्शन भी बढ़े हैं। तहलकामामले के बाद से सरकारी हथियार खरीद के जिम्मेदार लोगों में सावधानी और चौकन्ना रहने के भाव आ गए हैं। वे इसलिए रक्षा सौदे करने से कतरा रहे हैं कि कहीं उन पर कमीशन लेने के आरोप न लग जाए। यही वजह है कि निर्णय लेने में अनावश्यक देरी होने लगी है। यह चिंता का विषय है। 1986 में बोफोर्स खरीदी गई थी। यह तोप उस वक्त की तकनीक की है। जाहिर है, आज की तकनीकी इससे भी उन्नत होगी।
तो क्या सेना के आधुनिकीकरण की योजना महज एक कल्पना है? सेना की तैयारी में सिविल ब्यूरोक्रेसी भी आड़े आ रही है। पे- कमीशन, पेंशन और अन्य मामलों में इनके रवैये को देखकर तो ऐसा ही लगता है। ये फौजियों पर हावी रहना चाहते हैं। सिविल ब्यूरोक्रेट्स सैन्य कामकाज पर अपना नियंतण्रऔर अंकुश रखना चाहते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि प्रजातंत्र में सरकार सवरेपरि है, न कि असैनिक अधिकारी।
चीन की तुलना में भारतीय सेना को आप किस मुकाम पर पाते हैं? भारतीय सेना अपने दो विरोधी देशों-पाकिस्तान और चीन की तुलना में पर्याप्त रूप से सक्षम है। पर्याप्त से मेरा अभिप्राय तादाद, रणकौशल और हथियारों से है। लेकिन यह एक ऐसा मामला है कि जिसमें निरंतर प्रयास और काम करते रहने की जरूरत है। हम हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रह सकते। हमें अद्यतन तैयारी रखनी जरूरी है। निरंतरता नितांत आवश्यक है।

खरीद नीति बदलें, निजी क्षेत्र को न्यो तें


सेना अध्यक्ष ने अपनी चिट्ठी में जो कमियां बताई है, वह बिल्कुल सही है। यह ऐसी कमी नहीं है कि हमें आज पता चला है। मीडिया और रक्षा विश्लेषक इन बातों को वरसों से उठाते आ रहे हैं लेकिन हमारी सरकार इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। हर सेना अध्यक्ष सेवा निवृत्ति से पहले सरकार को फौज के बारे में अपनी समीक्षा लिखकर भेजते हैं। हमारे वर्तमान सेनाध्यक्ष ने भी ऐसा ही किया है। मुझे लगता है कि यह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि हम अपनी फौज को चुस्त-दुरु स्त रखने पर कभी ध्यान नहीं देते। जब किसी प्रकार का संकट हमारे ऊपर आ जाता है, तब हम बुनियादी समस्याओं को सुलझाने में सक्रियता दिखलाते हैं। जब हमारी फौजों को जंग लड़ने की नौबत आएगी, तब हमारी नींद खुलेगी कि उन्हें किन चीजों की जरूरत है? जब हमें पानी पीना होता है, तभी हम कुंआ खोदते हैं। यह सोचना कि यह सरकार के संज्ञान में नहीं था और सेनाध्यक्ष ने कोई रहस्योद्घाटन किया है, बेबुनियाद है।
गरदन बचाने के फेर में लटकते हैं रक्षा सौदे हमारी तीनों फौजें सैनिक साजो-सामान की कमी से सालों से जूझ रही है। थल सेना को वाहन, तोप और गोला बारूद की कमी है। वायुसेना को लड़ाकू विमानों की कमी है तथा नौसेना को विमानवाहक पोत और पनडुब्बियों की कमी है। यह आधारभूत कमियां हैं। जब यह कमी इतने सालों में दूर नहीं हो पाई है तो उनकी दूसरी कमियों की क्या बात की जाए? इन सामानों की सरकारी खरीद में भी काफी देरी होती है। एक तो जो पण्राली अब तक चल रही है, उसमें निर्णय लेने में देरी स्वाभाविक है। लेकिन जब से बोफोर्स घोटाला सामने आया है, अधिकारी से मंत्री तक अपनी जवाबदेही लेने से बचने लगे हैं। इसलिए निर्णय लेने में देरी होती है और मामला खींचता चला जाता है। उनका सारा ध्यान इस पर रहता है कि कहीं सूचना के अधिकार कानून लागू होने के बाद स्पष्टीकरण देने में उनकी गरदन न फंस जाए। आज हमारे ढांचे में ईमानदारी की कमी है। अगर कोई ईमानदारी से काम भी करता है तो उस पर भी शक की तलवार लटकी होती है। आज रक्षा के लिए सरकारी खरीद से जुड़े लोगों को आपस में किसी पर भरोसा नहीं है। सब अपनी गरदन बचाने में लगे हैं। जब तक भ्रष्टाचार की बात है कि यह तो हरेक विभाग में हरेक सौदे के अंदर बढ़ता ही जा रहा है।
बढ़ती लागत और भ्रष्टाचार के रास्ते बंद हों इसलिए सरकारी खरीद नीति में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है। आज सेना मुख्यालय को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी आवश्यकता की सामग्री सीधे खरीद सकें। वे सरकार को अपनी जरूरत बताते हैं। सरकार उन्हें कुछ विकल्प देती है, जिसे उन्हें पास करना होता है। इसके अलावा खरीदने का निर्णय सरकार और रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक निगम मिलकर लेते हैं। कई बार सरकार बाहर से खरीदने के बजाए अपने सार्वजनिक निगम से खरीदती है, जिसकी क्षमता, क्वालिटी अच्छी नहीं होती। सरकार द्वारा गठित की गई संस्था डीआरडीओ हमारी फौजों के लिए मानक और भरोसेमंद हथियार और वाहन बनाने में नाकाम रही है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह तेजी से खरीद प्रक्रिया बनाने के लिए नियमों में परिवर्तन करे और देश की ही निजी कंपनियों से सरकारी खरीद करे। जहां तक तकनीक की बात है तो हमारे देश की निजी कंपनियां काबिल हैं। अभी तो हाल यह है कि सरकार विदेश से सीधे खरीदने के बजाए रक्षा सार्वजनिक निगम के माध्यम से खरीदती है, जिससे लागत में भी इजाफा होता है और भ्रष्टाचार के नए रास्ते भी खुलते हैं।
टाट्रा ट्रक हम क्यों नहीं बना सकते हमें समीक्षा करनी चाहिए कि आखिर हम टाट्रा ट्रक क्यों नहीं बना पाए? इसका जिम्मेवार कौन है? डीआरडीओ की समीक्षा के लिए सरकार ने रामाराव समिति की रपट तैयार करवाई जिसे काफी मेहनत से बनाया गया था। उसमें इस बात की समीक्षा की गई थी कि डीआरडीओ में क्या कमियां और उसमें क्या सुधार करना चाहिए? लेकिन सरकार ने उस पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की। न ही सरकार ने उस रपट को संसद में रखकर समीक्षा किया है। तो रामाराव समिति और केलकर समिति की रिपोर्टे सरकार के पास हैं, जिनकी सिफारिशों पर सरकार को अविलंब अमल करना चाहिए। लेकिन सरकार न तो उन रिपोटरे का खुलासा करती है और न उन पर चर्चा ही। सरकार देश की निजी कंपनियों को क्यों नहीं रक्षा साजो-सामान बनाने के लिए मौका देती है? डीआरडीओ ने अभी तक एक भी क्वालिटी उत्पाद बनाया नहीं है जिसे हमारी फौजें इस्तेमाल कर सकें। होना तो यह चाहिए था कि डीआरडीओ देश की जरूरत भी पूरी करती और अपने उत्पादों का निर्यात भी। तकनीक और हथियार तो दूर की बात है, हमारा डीआरडीओ और दूसरे रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक निगमें फौज के लिए ढंग के जूते और कपड़े बनाने के लायक भी नहीं हैं। इसलिए हमारे पूरे ढांचे में परिवर्तन लाना जरूरी है। हमारे पड़ोसी चीन में यह दृढ़ता है कि वह अपनी फौज का आधुनिकीकरण कर सके और उनका ध्यान रख सके। हमारे देश में उस प्रकार की राजनीतिक दृढ़ता नहीं है। अगर हमने अपनी फौजों की समस्याओं का निदान नहीं किया और आधुनिकीकरण के दौर में पीछे रह गए तो इसके खतरनाक नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।

कैसे करें किले का जीर्णोद्धार


हमें इस वास्तविकता को अवश्य स्वीकार करना चाहिए कि सेना को लेकर मौजूदा नाटक, जैसा कि हम सबके सामने मंचित हो रहा है, हमारे नीतिगत तंत्र के कैंसरग्रस्त होने केवल लक्षण है, जो अब राष्ट्रीय सुरक्षा पण्राली में भी फैल गया है। हमारे जैसे लोकतांत्रिक देश में इसके सही और सटीक जवाब राजनीतिक प्रतिष्ठान से आने चाहिए न कि टीवी एंकरों के उग्र संवेदनात्मक और बहस में हिस्सा ले रहे असंयमित विशेषज्ञों की तरफ से नहीं। अब जबकि हम जब सर्वरोगनाशक दवा की मांग कर रहे हैं तो पहले हमें सहस्रमुखी मर्ज के कुछ लक्षणों की जांच करनी चाहिए। इस भयानक होते मर्ज का पहला कारण तो राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर राजनीतिक संस्थाओं का अलहदापन और उदासीनता है, क्योंकि यह राजनीतिकों के लिए वोट दिलाने का मसला नहीं है। देश में राजनीतिक गतिविधियों की ऐसी तीव्रता, यहां तक कि नेक इरादे वाले, रक्षा मंत्री तक को रक्षा और रणनीति मामलों पर कुछ करने के लिए कम गुंजाइश छोड़ती है।
जम्हाई लेता शून्य रक्षा मंत्रालय को कुछ इस अर्थ में विचित्र कहेंगे कि वहां रक्षा मंत्री की जरूरत केवल सुरक्षा के समग्र- संश्लिष्ट मामलों पर विचार या त्वरित निर्णय लेने के बाबत नहीं होती बल्कि उन्हें सैन्य प्रमुखों से भी बातचीत करनी पड़ती है। सेना के शीषर्स्थ नेतृत्व के साथ एक हद तक सद्भावनापूर्ण संबंध रक्षा मंत्री दोहरे स्तर पर लाभान्वित करता है। वह इस अनौपचारिक संबंध का लाभ उनकी विशेषज्ञता और सलाह मांगने में कर सकते हैं बल्कि सैन्य हुक्मरानों का मार्गदर्शन और राजनीतिक निगरानी भी मित्रवत किंतु मजबूती से कर सकते हैं। दुर्भाग्य से, सुभीते वाला कामकाजी संबंध साउथ ब्लॉक (रक्षा मंत्रालय) में दुर्लभ हो गया है। सैन्य नेतृत्व और देश के राजनीतिक प्रतिष्ठान; एक दूसरे के प्रति सामान्य नहीं रहते और उन दोनों के बीच जम्हाई लेता शून्य पैदा हो गया है। इस दरार को पाटने का काम नौकरशाहों का है लेकिन जैसा कि हम देख सकते हैं, खाई के और चौड़े होते जाने का रुझान बना हुआ है। राजनीतिकों को अब यह समझ लेना होगा कि वह ब्रिटिश प्रतिक्रियावादी अतिराष्ट्रवादी अथवा अपने को सभी जातियों से श्रेष्ठ और इसके चलते सब पर हुकूमत करने लायक जर्मनी के प्रूस्सियन से उनका वास्ता नहीं है बल्कि उनका साबका श्रमजीवी सेना से है। भारतीय सेना के ज्यादातर अफसर भारतीय मध्यवर्ग के मध्य और निचले स्तर से आते हैं, जिसका पहला संज्ञान नागरिक राजनीतिक प्रतिष्ठान से भिन्न होता है। अगर रक्षा मंत्री और सेना के शीषर्स्थ पारस्परिक आदर और विास का संबंध बनाए होते तो यह ताजा विवाद बंद दरवाजे के पीछे सद्भावना से सुलझ गया होता। अब तो यह साफ हो गया है कि साउथ ब्लॉक में संवाद पहले तो फाइलों में होता है और फिर मीडिया के जरिए। दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक है, रक्षा मंत्री की अपने मंत्रालय के नौकरशाहों पर प्राय: पूरी निर्भरता। चाहे सलाह लेना हो, रोजर्मे के निर्णय की प्रक्रियाएं हों, किसी मसले के हल तलाशने हों या आपदा प्रबंधन; रक्षा मंत्री उन पर पूरी तरह आश्रित हो गए हैं। हालांकि इससे कामकाजी संबंध को और ऊंचे मकाम पर ले जाया जा सकता है, नौकरशाहों पर शिष्टमंडल के नागरिक नियंत्रणकी प्रक्रिया से सैन्य बलों को बाहर रखना, सत्ता प्रतिष्ठानों का अपने उत्तरदायित्व से पल्ला झाड़ना ही है।
बदलाव में अड़ंगेबाज नौकरशाह नौकरशाहों के बारे में एक चीज निश्चियपूर्वक कही जा सकती है कि उन्होंने परिवर्तन के किसी प्रयास में अड़ंगा डालने में महारत हासिल कर ली है। यह लेखक फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा सुधार कार्यबल को अपनी सेवाएं दे रहा है, जिसका पूरा स्वरूप राजग काल में 1999 में गठित कार्यबल जैसा ही है। मुझे इसका बेहद डरावना अनुभव हो रहा है कि सुधार को स्थगित करने के लिए एक बार फिर वही तर्क दिए जा रहे हैं, जिन्हें मैं 13 साल से बुझे मन से सुनता रहा हूं। सैन्य सेवाओं और रक्षा मंत्रालय के बीच बढ़ते मनमुटाव ने न केवल परस्पर कडुवाहट और आरोप-प्रत्यारोपों का महौल रचा है बल्कि इसने व्यवस्थागत तंत्र को भी चौपट बना दिया है। हालिया विवाद के दो उदाहरण ही संकट के गहरे स्तर को बताने के लिए पर्याप्त हैं। टाट्रा ट्रक को लेकर उठे मौजूदा विवाद में किसी को भी रक्षा मंत्रालय से यह सवाल करने की सुध नहीं आई कि हमारे विशाल रक्षा-उद्योग संस्थानों ने 40 सालों से हजारों की तादाद में खरीदे जा रहे इस ट्रक के एक भी स्वदेशी रूपांतरण पेश करने की कोशिश क्यों नहीं की? सेनाध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में गोला-बारूद के खाली भंडार का जिक्र किया है। आम तौर पर 30 से 45 दिनों तक चलने वाले युद्ध को ध्यान में रख कर इसका भंडारण किया जाता है। चूंकि जंग की कोई तय तारीख नहीं होती तो फिर रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव और सैन्य प्रमुख ने इन सालों में गोला-बारूद का इंतजाम कैसे नहीं किया?
दलों के लिए शस्त्र आयात सोने के बत्तख
इस मसले का खास पहलू और ज्यादातर भ्रष्टाचार की जड़ तमाम राजनीतिक पार्टियां हैं, जो शस्त्र आयात कारोबार को चुनाव कोष के लिए यथार्थ में सोने का बत्तखसमझती हैं। इसकी व्याख्या किसी सैन्य सामग्री के स्वदेशीकरण के प्रति उदासीनता और व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के कारण के रूप में की जा सकती है। हम 1980 के दशक से इस गवाह रहे हैं कि कोई भी रक्षा सौदा घपले या भ्रष्टाचार के आरोपों से बेदाग नहीं बचा है और प्राय: ऐसे आरोप सौदे से बाहर रह गई प्रतिद्वंद्वी कम्पनियां लगाती हैं। इन ताजा विवादों का हश्र यह हुआ है कि सेना के आधुनिकीकरण के प्रयास और हथियारों के स्वदेशी रूपांतरण/उत्पादन की क्षमता को धक्का पहुंचा है। क्या हम रक्षा सौदों को पवित्र गायघोषित करने और शोषण की हद तय करने के लिए एक जबर्दस्त राजनीतिक राय बनाने की दिशा में उम्मीद पालने का जोखिम ले सकते हैं? समस्या का अंतिम समाधान यह है कि सैन्य बल के नैतिक स्तर में आई अत्यधिक और अनर्थकारी गिरावट को दूर करने की आवश्यकता है। स्पष्टतया सेना के अफसरों में, भारतीय समाज के अन्य क्षेत्रों में तेजी से धनाढ्य और खुशहाल होते लोगों में अपने को देखने की छिछली चेतना देखी जा सकती है। इसने कुछ वरिष्ठ अफसरों को सरकारी कोष के दुरुपयोग अथवा अन्य अनैतिक संसाधनों के बिना पर तड़क-भड़क वाले रिवाजों और जीवनशैलियों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। रातोंरात घोटाले की शक्ल में आने से पहले इसने बहुतों को काफी पहले से बदल दिया है। शानदार आदर्श सोसाइटी में रहने के अपने रुतबे ने निश्चित रूप से उन लोगों में प्रशंसा के भाव भरे होंगे, जो निम्न बाजार वाले इलाके में तीन बेडरूम वाले फ्लैटों में रहते हैं। इस पतन के लिए हमारी राजनीति और हमारे समाज को दोष देना, पर्याप्त और अच्छी माफी नहीं है; सैन्य बल भारतीय समाज की ईमानदारी, आचार और नैतिकता के उदाहरण होते हैं। आखिरकार, हमने अफसर लायक आचरणऔर एक अफसर तथा एक भद्र व्यक्तिके मुहावरे गढ़े ही हैं। सबसे बढ़कर यह बात कि मौजूदा वेतन, भत्ते, सुविधाएं और पेंशन आदि नौकरी करते या रिटायर सैन्यकर्मियों को सम्मान और आराम से जिंदगी बसर करने के लिए पर्याप्त हैं। यह समय सेना के आला अफसरों के गहरे आत्मनिरीक्षण का है। यह सड़न केवल तभी रोकी जा सकती है, अगर हम अपने युवा अफसरों को उदाहरणों के जरिए यह सीखा सकें कि तड़क-भड़क वाली जीवनशैली का तिरस्कार करते हुए कठोर अनुशासन में मर्यादा के साथ किस तरह जिया जा सकता है!