Monday, April 23, 2012

हथियारों का आयात


भारत ने पांच हजार किलोमीटर की दूरी तक मार करने में सक्षम अग्नि-5 अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल का सफल परीक्षण किया। यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि विकसित देशों द्वारा कड़े निर्यात नियम लागू करने के बावजूद हमारे वैज्ञानिकों ने इस मिसाइल को विकसित कर दिखाया। अग्नि-5 में कई तरह की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है और इसे सड़क के किनारे से भी दागा जा सकेगा। अब वैज्ञानिक इस कोशिश में लगे हैं कि अग्नि-5 में एक साथ कई स्वतंत्र लक्ष्य वाले हथियार लगाए जा सकें और उसमें उपग्रहरोधी क्षमता जोड़ी जा सके। एक बार ऐसा हो जाने पर यह श्रेष्ठतम श्रेणी का प्रक्षेपास्त्र हो जाएगा। अग्नि-5 की सफलता ने यह साबित कर दिया कि देश का सार्वजनिक क्षेत्र महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर सकता है, बशर्ते संबंधित संस्थान को आंतरिक शक्ति और संयोजन क्षमता विकसित करने की छूट दी जाए। इसके बावजूद भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश बना हुआ है तो इसे विडंबना ही कहा जाएगा। इसे हाल के बड़े रक्षा सौदों से समझा जा सकता है। भारत ने फ्रांस से 126 लड़ाकू विमान खरीदने का समझौता किया, जिसकी लागत 54 हजार करोड़ रुपये है। इससे पहले भारत ने फ्रांस के लड़ाकू विमान (मिराज-2000) को उन्नत बनाने और उसमें मिसाइल लगाने के लिए करीब 18 हजार करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया था। इस प्रकार एक ही साल में भारत से फ्रांस को 82 हजार करोड़ रुपये के हथियारों के ऑर्डर मिले। फ्रांस से ही नहीं भारत ने रूस से भी 53 हजार करोड़ रुपये के किराये पर दस साल के लिए एक पुरानी परमाणु चालित पनडुब्बी हासिल की। एडमिरल गोर्शकोव नामक एक पुराने विमानवाही जहाज का सौदा करीब 12 हजार करोड़ रुपये का हुआ है, जिसे भारतीय नौसेना ने आइएनएस विक्रमादित्य नाम दिया है। इसी तरह भारत ने इजराइल से लड़ाकू जहाज खरीदने के कई बड़े सौदे किए हैं। स्टॉंकहोम स्थित पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक भारत दुनिया में हथियार और रक्षा सामग्री खरीदने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है। 2006-10 के बीच भारत ने दो लाख करोड़ रुपये के हथियार आयात किए। अगले पांच वषरें में यह राशि दोगुनी से ज्यादा होने का अनुमान है क्योंकि भारत अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है और अगले पांच साल में 100 अरब डॉलर के हथियार खरीदने के लक्ष्य रखा गया है। भारत के रक्षा बजट का 40 फीसदी हथियार, विमान, पनडुब्बिरयां खरीदने में व्यय होता है। 70 फीसदी अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता विदेशी से की जाने वाली खरीद से पूरी की जाती हैं। 2012-13 में देश का रक्षा बजट 17 फीसदी बढ़ाकर 1,93,007 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसमें से 80 हजार करोड़ रुपये हथियारों व उपकरणों की खरीद के लिए निर्धारित किए गए हैं। इस भारी-भरकम खर्च के बावजूद देश के सेनाध्यक्ष की रिपोर्ट से उजागर होता है कि हमारे पास सक्षम तोपों और गोलाबारूद तक का अभाव है। यदि इस विरोधाभासी स्थिति की जड़ तलाशी जाए तो वह भ्रष्टाचार में ही मिलेगी। दरअसल, रक्षा सौदों में दलाली का खेल बड़े पैमाने पर जारी है। इसका ज्वलंत उदाहरण है ट्रेटा ट्रकों की खरीद। भले ही भारत दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा आयातक हो, लेकिन लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, कुपोषण, भुखमरी आदि मानकों में यह दुनिया के सबसे निचले पायदान पर है। कुछ साल पहले तक भारत की भांति चीन हथियार खरीदने में पूरी दुनिया में अव्वल देश था। लेकिन उसने हथियार आयात में कमी के साथ ही अपने हथियार उद्योग में सुधार लाने का निर्णय किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि उसका निर्यात तेजी से बढ़ा। आज चीन दुनिया का छठा बड़ा हथियार निर्यातक देश बन चुका है। यहां सवाल उठता है कि भारत आयातक के बजाय कब हथियार निर्यातक देश बनेगा? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) घूसखोरी को हथियारों के आयात की वजह बता रहे हैं रमेश कुमार दुबे 

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