अपने पड़ोसियों खास कर; चीन और पाकिस्तान के साथ जो हमारे रिश्ते हैं और जैसे समीकरण हैं, उन्हें देखते हुए मुझे लगता है कि हमारे आर्मी चीफ ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में जो चिंताएं जाहिर की हैं, वे बिल्कुल सही हैं। देखिए, चीन के साथ अरु णाचल प्रदेश से लेकर सीमा विवाद है और पाकिस्तान के साथ कश्मीर को लेकर झगड़ा है। फिर इन दोनों देशों की जो सैन्य तैयारी है, आधारभूत ढांचा और उनकी नीयत है, वह चिंतित करने वाली है। दूसरे, हमारी सेना को सैन्य साजो-सामान की काफी कमी झेलनी पड़ रही है। चौतरफा खतरे को देखते हुए हमें सेना की जरूरतें पूरी करने की जरूरत है, नहीं तो यह कमी काफी घातक साबित हो सकती है। इसलिए हमें अपनी फौज को इस काबिल बनाना होगा कि वे इनका मुकाबला कर सकें और किसी कमी के कारण वे ऐन वक्त पर घोखा न खा सकें। इसके लिए दो चीजों की काफी जरूरत है। एक तो सेना में मुकाबले की ताकत होनी चाहिए, चाहे वह वायु सेना, नौसेना या थल सेना हो। उन्हें आधुनिक हथियारों और सैनिक साजो-सामान मुहैया कराने की जरूरत है। ये तो किसी भी सेना की आधारभूत जरूरतें हैं। इसके अलावा उनके लिए प्रशिक्षण और कल्याण कार्यक्रमों के साजो सामान की भी उतनी ही जरूरी है। अगर यह सभी व्यवस्था ठीक है लेकिन फौज के प्रबंधन और सरकारी खरीद में कमी है तो सारी तैयारियां बेमानी हो जाती हैं।
सेना के हर अंग को कम हैं संसाधन थल सेना के पास आज हथियारों की काफी कमी है। बोफोर्स तोपों के बाद उनके पास आज का कोई आधुनिक तोप नहीं है। इसके अलावा दूसरे घातक हथियार भी पुराने जमाने के हैं। आज दुनिया में तकनीक बहुत तेजी से पुरानी होती जा रही है। हमारे पास रडार और रात की लड़ाई में काम आने वाले उपकरणों की कमी है। आर्मी चीफ के मुताबिक हमारे पास आर्टलिरी टैंक और गोला-बारूद की काफी कमी है। मेरे हिसाब से ये बहुत बड़ी कमियां है और इन्हें त्वरित दूर करनी चाहिए। वायु सेना के जहाज पुराने पड़ चुके हैं। हम उन्हें खरीदने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन सालों से यह मामला लटका हुआ है। नौ सेना के लिए पनडुब्बियों की काफी कमी है। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की समुद्री सीमा की निगरानी के लिए जितनी पनडुब्बियां होनी चाहिए उनकी आधी भी हमारे पास नहीं है। नौसेना के पास विमानवाहक जहाज एक ही है और वह भी रूस से पुराना खरीदा हुआ। वह भी एक दो सालों बाद रिटायर होने वाला है। दूसरी तरफ देश के अंदर आतंकवादी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। माओवादियों द्वारा की जा रही वारदातें भी बढ़ती जा रही हैं। इनको दूर करने के लिए फौज का इस्तेमाल कुछ न कुछ होता ही है। इनको देखते हुए खास उपकरणों और हेलीकाप्टरों की जरूरत पड़ती है, जिसकी काफी कमी है। इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा हमारे फौज में अधिकारियों की भी काफी कमी है। आज के युवा फौज में करियर को आकषर्क नहीं मानते हैं। इसके लिए सरकार को इस स्तर पर कुछ करना होगा ताकि युवाओं में फौजी बनने की ललक जग सके। उसे देखना होगा कि हमारे फौजियों का जीवन स्तर भी इतना अच्छा हो कि लोग फौज में आने को प्रेरित हो सकें।
निजी कंपनियां अछूत क्यों? सैन्य साजो सामान के लिए हम विदेशी देशों की कंपनियों पर निर्भर है। इसका नतीजा यह होता है कि सामान मिलने में देर होती है तथा हम उसकी ऊंची कीमत भी चुकाते हैं। डीआरडीओ इस काबिल नहीं है कि वह कुछ बना सके। मुझे समझ में नहीं आता कि सरकार ने निजी क्षेत्र को सरकारी खरीद से दूर क्यों रखा है? आज हमारे देश की कंपनियां इतनी सक्षम हैं कि वे हमारे काम के सैन्य सामान का उत्पादन कर सकती हैं और उनकी क्वालिटी दुनिया के किसी भी देश से कम नहीं होगी। देश में हथियार खरीदने से उनके ट्रायल की प्रक्रिया भी जल्दी होगी और खरीद की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत तेज होगी। सरकारी संस्थान डीआरडीओ नाकाबिल और अक्षम संस्थान है। इसलिए सरकारी खरीद में हमें अपने देश की निजी कंपनियों को बढ़ावा और मौका देना चाहिए। आखिर बाहर से भी सैन्य सामग्री हम निजी कंपनियों से ही खरीदते हैं और उनके ऊपर हम आश्रित भी रहते हैं। उनमें कोई खराबी आने पर हम बाहरवालों के रहमोकरम पर आश्रित हो जाते हैं। लड़ाई के वक्त अगर इन उपकरणों में किसी प्रकार की गड़बड़ी हो गई तो हम उसे खुद ठीक भी नहीं कर सकते।
नौकरशाही के भरोसे न रहे खरीद व्यवस्था इसके अलावा सरकारी खरीद में पारदर्शिता तथा त्वरित गति से काम होगा। रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत नौकरशाहों की व्यवस्था में हथियार खरीद की प्रक्रिया काफी उलझी हुई है। वहां कोई काम जल्दी हो ही नहीं सकता। इसके कारण काफी वक्त जाया होता है। जब तक हमें किसी उपकरण और सामान खरीद की मंजूरी मिलती है, तब तक दुनिया में उससे बेहतर तकनीक आ चुकी होती है। आज कितने ही ऐसे सामान हैं, जिनकी खरीद की प्रक्रिया दशक से ज्यादा समय से चल रही है और उन्हें हम आज तक हासिल नहीं कर पाएं हैं। इसके अलावा वर्तमान प्रक्रिया में बिचौलियों की बहुत बड़ी भूमिका हो जाती है क्योंकि पारदर्शिता की कमी है। हमें लाबिस्ट और बिचौलियों को भी खरीद पण्राली से दूर रखना होगा। इन सबको देखते हुए एक रक्षा खरीद और नीति की ब्लूप्रिंट बनानी होगी जिसमें फौज, रक्षा मंत्रालय और इससे संबंधित सभी विभाग शामिल होकर एक नई पण्राली का गठन करें।
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