हमें इस वास्तविकता को अवश्य स्वीकार करना चाहिए कि सेना को लेकर मौजूदा नाटक, जैसा कि हम सबके सामने मंचित हो रहा है, हमारे नीतिगत तंत्र के कैंसरग्रस्त होने केवल लक्षण है, जो अब राष्ट्रीय सुरक्षा पण्राली में भी फैल गया है। हमारे जैसे लोकतांत्रिक देश में इसके सही और सटीक जवाब राजनीतिक प्रतिष्ठान से आने चाहिए न कि टीवी एंकरों के उग्र संवेदनात्मक और बहस में हिस्सा ले रहे असंयमित विशेषज्ञों की तरफ से नहीं। अब जबकि हम जब सर्वरोगनाशक दवा की मांग कर रहे हैं तो पहले हमें सहस्रमुखी मर्ज के कुछ लक्षणों की जांच करनी चाहिए। इस भयानक होते मर्ज का पहला कारण तो राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर राजनीतिक संस्थाओं का अलहदापन और उदासीनता है, क्योंकि यह राजनीतिकों के लिए वोट दिलाने का मसला नहीं है। देश में राजनीतिक गतिविधियों की ऐसी तीव्रता, यहां तक कि नेक इरादे वाले, रक्षा मंत्री तक को रक्षा और रणनीति मामलों पर कुछ करने के लिए कम गुंजाइश छोड़ती है।
जम्हाई लेता शून्य रक्षा मंत्रालय को कुछ इस अर्थ में विचित्र कहेंगे कि वहां रक्षा मंत्री की जरूरत केवल सुरक्षा के समग्र- संश्लिष्ट मामलों पर विचार या त्वरित निर्णय लेने के बाबत नहीं होती बल्कि उन्हें सैन्य प्रमुखों से भी बातचीत करनी पड़ती है। सेना के शीषर्स्थ नेतृत्व के साथ एक हद तक सद्भावनापूर्ण संबंध रक्षा मंत्री दोहरे स्तर पर लाभान्वित करता है। वह इस अनौपचारिक संबंध का लाभ उनकी विशेषज्ञता और सलाह मांगने में कर सकते हैं बल्कि सैन्य हुक्मरानों का मार्गदर्शन और राजनीतिक निगरानी भी मित्रवत किंतु मजबूती से कर सकते हैं। दुर्भाग्य से, सुभीते वाला कामकाजी संबंध साउथ ब्लॉक (रक्षा मंत्रालय) में दुर्लभ हो गया है। सैन्य नेतृत्व और देश के राजनीतिक प्रतिष्ठान; एक दूसरे के प्रति सामान्य नहीं रहते और उन दोनों के बीच जम्हाई लेता शून्य पैदा हो गया है। इस दरार को पाटने का काम नौकरशाहों का है लेकिन जैसा कि हम देख सकते हैं, खाई के और चौड़े होते जाने का रुझान बना हुआ है। राजनीतिकों को अब यह समझ लेना होगा कि वह ब्रिटिश प्रतिक्रियावादी अतिराष्ट्रवादी अथवा अपने को सभी जातियों से श्रेष्ठ और इसके चलते सब पर हुकूमत करने लायक जर्मनी के प्रूस्सियन से उनका वास्ता नहीं है बल्कि उनका साबका श्रमजीवी सेना से है। भारतीय सेना के ज्यादातर अफसर भारतीय मध्यवर्ग के मध्य और निचले स्तर से आते हैं, जिसका पहला संज्ञान नागरिक राजनीतिक प्रतिष्ठान से भिन्न होता है। अगर रक्षा मंत्री और सेना के शीषर्स्थ पारस्परिक आदर और विास का संबंध बनाए होते तो यह ताजा विवाद बंद दरवाजे के पीछे सद्भावना से सुलझ गया होता। अब तो यह साफ हो गया है कि साउथ ब्लॉक में संवाद पहले तो फाइलों में होता है और फिर मीडिया के जरिए। दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक है, रक्षा मंत्री की अपने मंत्रालय के नौकरशाहों पर प्राय: पूरी निर्भरता। चाहे सलाह लेना हो, रोजर्मे के निर्णय की प्रक्रियाएं हों, किसी मसले के हल तलाशने हों या आपदा प्रबंधन; रक्षा मंत्री उन पर पूरी तरह आश्रित हो गए हैं। हालांकि इससे कामकाजी संबंध को और ऊंचे मकाम पर ले जाया जा सकता है, नौकरशाहों पर शिष्टमंडल के ‘नागरिक नियंत्रण’ की प्रक्रिया से सैन्य बलों को बाहर रखना, सत्ता प्रतिष्ठानों का अपने उत्तरदायित्व से पल्ला झाड़ना ही है।
बदलाव में अड़ंगेबाज नौकरशाह नौकरशाहों के बारे में एक चीज निश्चियपूर्वक कही जा सकती है कि उन्होंने परिवर्तन के किसी प्रयास में अड़ंगा डालने में महारत हासिल कर ली है। यह लेखक फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा सुधार कार्यबल को अपनी सेवाएं दे रहा है, जिसका पूरा स्वरूप राजग काल में 1999 में गठित कार्यबल जैसा ही है। मुझे इसका बेहद डरावना अनुभव हो रहा है कि सुधार को स्थगित करने के लिए एक बार फिर वही तर्क दिए जा रहे हैं, जिन्हें मैं 13 साल से बुझे मन से सुनता रहा हूं। सैन्य सेवाओं और रक्षा मंत्रालय के बीच बढ़ते मनमुटाव ने न केवल परस्पर कडुवाहट और आरोप-प्रत्यारोपों का महौल रचा है बल्कि इसने व्यवस्थागत तंत्र को भी चौपट बना दिया है। हालिया विवाद के दो उदाहरण ही संकट के गहरे स्तर को बताने के लिए पर्याप्त हैं। टाट्रा ट्रक को लेकर उठे मौजूदा विवाद में किसी को भी रक्षा मंत्रालय से यह सवाल करने की सुध नहीं आई कि हमारे विशाल रक्षा-उद्योग संस्थानों ने 40 सालों से हजारों की तादाद में खरीदे जा रहे इस ट्रक के एक भी स्वदेशी रूपांतरण पेश करने की कोशिश क्यों नहीं की? सेनाध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में गोला-बारूद के खाली भंडार का जिक्र किया है। आम तौर पर 30 से 45 दिनों तक चलने वाले युद्ध को ध्यान में रख कर इसका भंडारण किया जाता है। चूंकि जंग की कोई तय तारीख नहीं होती तो फिर रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव और सैन्य प्रमुख ने इन सालों में गोला-बारूद का इंतजाम कैसे नहीं किया?
दलों के लिए शस्त्र आयात ‘सोने के बत्तख’
इस मसले का खास पहलू और ज्यादातर भ्रष्टाचार की जड़ तमाम राजनीतिक पार्टियां हैं, जो शस्त्र आयात कारोबार को चुनाव कोष के लिए यथार्थ में ‘सोने का बत्तख’ समझती हैं। इसकी व्याख्या किसी सैन्य सामग्री के स्वदेशीकरण के प्रति उदासीनता और व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के कारण के रूप में की जा सकती है। हम 1980 के दशक से इस गवाह रहे हैं कि कोई भी रक्षा सौदा घपले या भ्रष्टाचार के आरोपों से बेदाग नहीं बचा है और प्राय: ऐसे आरोप सौदे से बाहर रह गई प्रतिद्वंद्वी कम्पनियां लगाती हैं। इन ताजा विवादों का हश्र यह हुआ है कि सेना के आधुनिकीकरण के प्रयास और हथियारों के स्वदेशी रूपांतरण/उत्पादन की क्षमता को धक्का पहुंचा है। क्या हम रक्षा सौदों को ‘पवित्र गाय’ घोषित करने और शोषण की हद तय करने के लिए एक जबर्दस्त राजनीतिक राय बनाने की दिशा में उम्मीद पालने का जोखिम ले सकते हैं? समस्या का अंतिम समाधान यह है कि सैन्य बल के नैतिक स्तर में आई अत्यधिक और अनर्थकारी गिरावट को दूर करने की आवश्यकता है। स्पष्टतया सेना के अफसरों में, भारतीय समाज के अन्य क्षेत्रों में तेजी से धनाढ्य और खुशहाल होते लोगों में अपने को देखने की छिछली चेतना देखी जा सकती है। इसने कुछ वरिष्ठ अफसरों को सरकारी कोष के दुरुपयोग अथवा अन्य अनैतिक संसाधनों के बिना पर तड़क-भड़क वाले रिवाजों और जीवनशैलियों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। रातोंरात घोटाले की शक्ल में आने से पहले इसने बहुतों को काफी पहले से बदल दिया है। शानदार आदर्श सोसाइटी में रहने के अपने रुतबे ने निश्चित रूप से उन लोगों में प्रशंसा के भाव भरे होंगे, जो निम्न बाजार वाले इलाके में तीन बेडरूम वाले फ्लैटों में रहते हैं। इस पतन के लिए हमारी राजनीति और हमारे समाज को दोष देना, पर्याप्त और अच्छी माफी नहीं है; सैन्य बल भारतीय समाज की ईमानदारी, आचार और नैतिकता के उदाहरण होते हैं। आखिरकार, हमने ‘अफसर लायक आचरण’ और ‘एक अफसर तथा एक भद्र व्यक्ति’ के मुहावरे गढ़े ही हैं। सबसे बढ़कर यह बात कि मौजूदा वेतन, भत्ते, सुविधाएं और पेंशन आदि नौकरी करते या रिटायर सैन्यकर्मियों को सम्मान और आराम से जिंदगी बसर करने के लिए पर्याप्त हैं। यह समय सेना के आला अफसरों के गहरे आत्मनिरीक्षण का है। यह सड़न केवल तभी रोकी जा सकती है, अगर हम अपने युवा अफसरों को उदाहरणों के जरिए यह सीखा सकें कि तड़क-भड़क वाली जीवनशैली का तिरस्कार करते हुए कठोर अनुशासन में मर्यादा के साथ किस तरह जिया जा सकता है!
No comments:
Post a Comment