Monday, April 9, 2012

समाचार और सवाल फौज की साख


इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को सेना की छवि को धूमिल करने का षड्यंत्र कहा जा सकता है। दरअसल, रिपोर्ट के कई विरोधाभासी पहलू उसके दमदार होने को खारिज कर देते हैं। इन पहलुओं को समझना आवश्यक है। पहली बात तो यही है कि गणतंत्र दिवस के आसपास दिल्ली में ही जब इतने टैंक मौजूद होते हैं कि तो तख्तापलट के लिए हिसार से 1000 जवानों की टुकड़ी को अलग से बुलाने की जरूरत क्यों होगी? इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 के समय से ही दिल्ली के आसपास सेना के करीब 25 से 30 हजार जवान को मौजूद रखा गया है। वे महज एक घंटे के अंदर देश के अहम ठिकानों तक पहुंच सकते हैं। इसी पहली ठोस वजह से अखबार की रिपोर्ट पर सवालिया निशान लग जाता है।
चार कमांडिंग अफसरों का समर्थन हो ना चाहिए कू के लिए एक और अहम पहलू है कि फौज कोई सिविलियन महकमा नहीं है। यहां एक प्रक्रिया के तहत कोई भी काम होता है। एक आदमी या फिर एक कुर्सी के लिए उस प्रक्रिया में फेरबदल नहीं किया जा सकता। जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताने की कोशिश की है कि सेना का यह कदम सेनाध्यक्ष के संकेत पर हो सकता है। लेकिन हमें समझना होगा कि सेना में ऐसा नहीं होता है कि सेनाध्यक्ष एक फोन कर दे तो पूरा महकमा उनके इशारों पर नाचने लगेगा। अगर किसी यूनिट का कमांडिंग अफसर सेनाध्यक्ष का बेटा हो तो वह भी तय प्रक्रिया के विपरीत कदम नहीं उठा सकता। दरअसल, हमें समझना होगा भारतीय सेना छह ऑपरेशनल कमांडिंग जोन में बंटी हुई है। इन कमांडिंग जोन के कमांडर सेनाध्यक्ष के किसी भी असंवैधानिक फैसले को मानने से इनकार के लिए स्वतंत्र हैं। किसी भी तरह के असंवैधानिक निर्देश का पालन कराने के लिए सेनाध्यक्ष को अपने पक्ष में कम से कम चार कमांडरों को तो लाना ही होगा। इसके बिना कोई भी बात नहीं हो सकती। इतना ही नहीं, हिसार यूनिट की जिन दो कम्पनियों के मूवमेंट की बात हो रही है तो हमें यह भी देखना होगा कि इसके लिए कई प्रक्रियाएं हैं। आपको 48 टाट्रा ट्रकों को बाहर निकालने के लिए मंजूरी लेनी होती है और यह ली गई होगी। यह काम चुपके-चुपके नहीं हो सकता है। जब ये ट्रक साथ-साथ सड़कों पर होंगे तो रास्ते के ही नहीं बल्कि उसके आसपास के लोगों को भी इनकी आवाजें सुनाई दी होंगी। इसके कोई साक्ष्य उस रिपोर्ट में नहीं मिलते।
मूवमेंट को सुप्रीम कोर्ट जाने की तारीख से जोड़ना गलत एक और बात इस घटना के समय को लेकर उठ रही है कि सेना की ओर से यह कदम सेनाध्यक्ष के उम्र विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के दिन 16 जनवरी को ही क्यों उठाया गया? लोगों को यह मालूम होना चाहिए कि सेनाध्यक्ष अपने उम्र विवाद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे, यह किसी को मालूम नहीं था। इसके बारे में उन्होंने अपने नजदीकी सलाहकारों तक से कोई बात नहीं की थी। वह जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, तब हर किसी को अचरज हो रहा था। अगर आप इस मामले पर बाद में सुप्रीम कोर्ट के दिए फैसले पर न जाएं तो भी यह साफ होता है कि सेनाध्यक्ष वीके सिंह का कदम किसी सरप्राइज से कम नहीं था। ऐसे में सवाल उठता है कि जब उनके इस कदम की जानकारी उनके नजदीकी सलाहकारों तक को नहीं थी तो वे अपने अन्य अधीनस्थों को सेना के कूच करने का कदम उठाने के लिए कैसे कह सकते हैं?
सामान्य आवाजाही को तख्तापलट बताना सही नहीं इनके इतर जो एक बात अहम है, वह यह कि फौज में उस दिन हरकत हुई थी। यह सच है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस उस हरकत को जिस नजरिये से पेश करने में जुटी है, वह गलत है। वैसे भी यह खबर पहले इंटरनेट पर आ चुकी थी। हमें यह समझना होगा कि सेना की तमाम यूनिटों में इस तरह की गतिविधियां होती रहती हैं। अगर आप उनके इन मूवमेंट्स को पहले पन्ने पर सनसनीखेज रिपोर्ट बना कर पेश करेंगे, तब तो देश की हर यूनिट और हर हिस्से से तख्तापलट की साजिश की बात उठती रहेगी। लिहाजा, हमें समझना होगा कि यह खबर एक तरह से प्लांटेड है।
सेनाध्यक्ष और रक्षामंत्री में दरार बढ़ाने की साजिश दरअसल, पिछले कुछ महीनों से सेनाध्यक्ष और केंद्रीय रक्षा मंत्री को दो खेमों के तौर पर बांटने की कोशिश हो रही है। इसमें सेना के मौजूदा कुछ अफसर से लेकर रिटार्यड अफसर भी शामिल हैं, जो यह साबित करना चाहते हैं कि सेनाध्यक्ष और रक्षा मंत्री में तीखे मतभेद हैं और ये बढ़ते जा रहे हैं। इनमें से कुछ सेनाध्यक्ष के साथ हैं तो कुछ रक्षा मंत्री के। इनमें से कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो अपना मतलब साध रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि यह सेनाध्यक्ष उनकी गलत कमाई पर अंकुश लगा रहा है तो हालात ऐसे कर दो कि सरकार को उन्हें हटाना पड़ जाए। सेनाध्यक्ष वीके सिंह पर जो भी आरोप लग रहे हों लेकिन सबसे बड़ी हकीकत यह है कि उन्होंने सेना में फैली गंदगी को साफ करने की कोशिश की है। उन्होंने भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को कानूनन लटकाने का काम किया है, जिसके कारण सेना के अंदर-बाहर उनके दुश्मनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अब तक तो सिर्फ उन पर निशाना साधा जा रहा था लेकिन इस बार उनके साथ- साथ सेना की उस छवि को दागदार बनाने की कोशिश की गई है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्देशों को पालन करने वाली साफ-सुथरी अनुशासित सेना की रही है। दुनिया भर के विकसित देशों में भारतीय सेना की इस बात के लिए मिसाल दी जाती है कि वहां की सेना को राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। हमारी सेना को सरकार में शामिल होने का कोई शौक नहीं है। भारतीय सेना को दुनिया भर में सबसे पेशेवर सेना के तौर पर आंका जाता है। भारतीय सेना जिसका काम देश की रक्षा करना और रक्षा करते हुए जान देने का है, वह सत्ता पर काबिज होने की सोच रही है; यह ऐसा आरोप है जो सेना की अब तक की बनाई छवि को नुकसान पहुंचाने वाला है। लेकिन ऐसे आरोप लगाने वालों की असलियत जल्दी ही सामने आ जाएगी। श्री वर्मा और श्री रजा से प्रदीप कुमार ने की बातचीत

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