Monday, April 9, 2012

हथियारों का सबसे बड़ा आयातक


महाशक्ति होने के मंसूबे से लबरेज और चीन से होड़ लेकिन चरमराते घरेलू रक्षा उद्योग से उलझा भारत सैन्य साजो-सामान की खरीदारी के दौरे पर है, जिसने इसे वैिक सैन्य सुंदरी का मोहक नाच बना दिया है। भारत के पास रक्षा खरीददारी की लम्बी फेहरिश्त है : इसमें लड़ाकू विमानों के लिए 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर, 1.5 बिलियन डॉलर ईधन भरने वाले विमानों के लिए तथा बिलियंस डॉलर पनडुब्बियों, टैंक, गोला-बारूद, अन्य उपकरणों के सौदों में पांच वर्षो के भीतर 80 बिलियंस डॉलर खरचने का अनुमान है। रक्षा विश्लेषक और सेना के पूर्व कर्नल अजय शुक्ला फरमाते हैं, ‘भारत थोड़ा-थोड़ा उस गंवार की तरह है, जिसकी दोनों जेबें नोटों से भरी हैं और हर कोई उसे काटने की कोशिश कर रहा है।
पहले पाकिस्तान भारत के जनरलों की रात की नींद उड़ाए रखता था लेकिन चीन को लेकर यह मानसिकता बहुत तेजी से बन रही है, जो आर्थिक और सैन्य ताकत है और जिसकी भारत से लगी 2800 मील सीमा को लेकर विवाद का रिसाव है। यह भारत की याददाश्त में 1962 में सीमा पर बीजिंग से लड़ाई में मिली हार की कसक के साथ असुरक्षा का इजाफा करता है। दूसरे, यह स्थिति चीन-पाकिस्तान के घने होते संबंध के चलते भारत के सामने स्वत:स्फूर्त ढंग से दो मोचरे पर जंग की आशंकाएं उत्पन्न करती है। भारतीय सेना पहले से ही नागरिक असंतोष और कश्मीर में सीमा पर घुसपैठ रोकने, घरेलू माओवादियों के उत्पात और कम निगरानी वाले तटवर्ती इलाके से आतंकवादियों के शहरों में आ धमकने से रोकने के लिए, जैसा कि 2008 के मुंबई हमले में हुआ था, भारी जद्दोहद में लगी हुई है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट थिंक टैंक के मुताबिक भारत 2007 में वि के सबसे बड़े हथियारों का आयातक देश था। इसके बाद ही द.कोरिया, पाकिस्तान और चीन का नम्बर था। यद्यपि मिस्र का 106 बिलियन अमेरिकी डॉलर सालाना रक्षा बजट-भारत के रक्षा बजट से तीन गुना अधिक है लेकिन उसने अपने घरेलू रक्षा उद्योग का तेजी से विस्तार करते हुए इस स्तर पर ही 90 फीसद सैन्य-सामानों की आपूर्ति कर लेता है जबकि भारत अपनी जरूरत की मात्र 30 फीसद सैन्य सामग्री घरेलू उत्पादों से हासिल कर पाता है। सीमा पर तीन डिविजन लगभग 90,000 सैनिकों की तैनाती की योजना से भारत असहज दिखता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस चिंता से बीजिंग को कोई सरोकार नहीं है, जो अपनी सैन्य तैयारी भारत के नहीं बल्कि अमेरिका के मुताबिक करता है। तिब्बत के पठार ने-किसी भी जमीनी लड़ाई में लाभदायक पोजिशन- चीन को ऊंची और बेहतर सामरिक स्थिति प्रदान कर दिया है। इसके अलावा, वह हार्डवेयर और सीमा क्षेत्रों तक बेहतर रेल- सड़क सम्पर्क के चलते भी भारत की तुलना में अच्छी स्थिति में है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, चीन सीमा पर एक हफ्ते के भीतर सारा लाव-लश्कर जुटा दे सकता है जबकि भारत को इस काम में 21 दिन लग जाएंगे। एंड्रे लुंडे भारत को चीन के साथ अवश्य और किसी भी कीमत पर जमीनी प्रतिद्वंद्विता से बाज आनेकी सलाह देते हैं क्योंकि इसका परिणाम भला नहीं हो सकता।श्री लुंडे एक रक्षा सलाहकार संस्था आईएसएस जेन से जुड़े विचारक हैं। हालांकि भारत के लिए कुछ चीजें फायदेमंद भी हैं। इसके लड़ाकू विमान भारी मात्रा में गोला-बारूद भर कर काफी कम ऊंचाई पर भी उड़ने और दुश्मनों के विमानों को मार करने में सक्षम हैं। इसके अलावा, भारत को चीन के साथ किसी भी युद्ध की स्थिति में उसे वैिक राजनयिक समर्थन मिलेगा। नई दिल्ली को निश्चित रूप से चीनी नौसेना की बढ़ती ताकत का मुकाबला करना है, जो हिन्द महासागर में उसके पड़ोस की प्राथमिकता को चुनौती दे रही है। चीन ने विमानवाहक पोत का गत अगस्त में परीक्षण किया था जबकि उसके तीन और विमानवाहक जहाज जल्द नौसेना बेड़े में शामिल होने वाले हैं। ताईवान और दक्षिण चीन सागर में अपनी परम्परागत निगरानी के बावजूद श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान और बांग्लादेशों में चीन बंदरगाहों के विकास में धन दे रहा है तो उधर, सोमालिया के जलदस्युओं के विरुद्ध भी अभियान छेड़े हुए है। उधर, भारत ने रूस-निर्मिंत विमानवाहक पोत मांगा है (यह उसे 10 साल की लीज पर मिल भी गया है-सं.) उसका 2007 तक दो और विमानवाहक पोत खरीदने की योजना है। फिलहाल, भारत को 1950 के दशक के ब्रिटिश निर्मित विमानवाहक पोत से काम चलाना है, जो अपनी आखिरी सांसें ले रहा है। गोचर खतरों के पार, भारत यह भी उम्मीद संजोए है कि सेना पर उसका व्यय रक्षा उद्योगों की डिजाइन, इंजीनियरिंग और संघटकों को आधुनिक बनाने में मदद देगा, एक उभरती महाशक्ति के उपयुक्त क्षेत्रीय कद बढ़ाएगा और सैन्य सामानों के घरेलू उत्पादन में विफलता, योजना में देरी और उससे बढ़ती बेशुमार लागत के अपने रिकार्ड को दुरुस्त करने में सहयोग करेगा। विश्लेषकों का मानना है कि वैसे तो पूरे वि के रक्षा उद्योगों का उत्पादन व्यय बढ़ रहा है लेकिन भारत की लागत कहीं ज्यादा है। सरकारी रक्षा उद्योगों के बेशुमार ठेकेदारों का घरेलू उत्पादन पर वर्चस्व है। साजो- सामानों की आपूर्ति की तारीख टलती ही रहती है। बिचौलिए खरीद-बिक्री में बड़ी राशि ऐंठते हैं। हथियार अपनी क्षमता से कमतर प्रदर्शन करते हैं या एकदम ही नहीं करते। स्टॉकहोम थिंक टैंक के सीनियर फैलो साईमन टी. वेजमैन कहते हैं, ‘भारत 1950 के जमाने से इस जतन में लगा है कि वह अपनी रक्षा जरूरतों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा खुद ही उत्पादित कर ले लेकिन इसमें वह बुरी तरफ विफल रहा है। (हालात ये हो गए हैं कि) अगर आप मेधावी इंजीनियर हैं और नाम-यश कमाना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि आप कहीं और चले जाएं।
अभी हाल में ही अजरुनटैंक को परखने के बाद भारत ने गर्वित होकर घोषित किया, ‘यह रूस के टी-90 टैंक से शानदार है।पर लुंडे बताते हैं, ‘टी- 90 की डिजाइन 1980 के दशक के बाद 1990 के पहले वाली है। इसलिए उसकी अजरुनसे तुलना उचित नहीं है। टैंक का चीनी संस्करण रूसी टी-90 के मुकाबले कहीं बेजोड़ है।भारत का कम क्षमता वाला स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजसइसके विकास के 29 साल बाद बेड़े में शामिल नहीं हो सका है। इस तरह, यह भी कई अन्य रक्षा परियोजनाओं की तरह ब्लैक होल
साबित हुआ है। जैसा कि सैन्य सामान की खरीद और उत्पादन क्षेत्र में विलम्बित स्थिति में है, इसके साथ हार्डवेयर की सेवा भी बाधित है और यह समय पर सही नहीं मिलती। भारत उन देशों में शामिल है, जो अब भी लड़ाकू विमान मिगउड़ा रहे हैं। सन् 2008 और 2012 के दौरान इनमें से 27 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। भारतीय मीडिया को इसीलिए मिगको उड़ते ताबूतकहना पड़ा है। भारतीय सेना भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी रही है; चाहे जमीन खरीद मामला हो या हार्डवेयर की खरीद, यहां तक कि ताबूत घोटाले हो रहे हैं। इनकी प्रतिक्रिया में लाए जाने वाले भ्रष्टाचार निरोधक प्रावधान सैन्य सामान खरीद की प्रक्रिया को इस कदर सख्त बना दे सकते हैं कि आलोचकों को कहने के लिए हो जाता है कि भारतीय सुरक्षा को नजरअंदाज किया जा रहा है। अभी पिछले हफ्ते, सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने यह खुलासा कर सियासत में तूफान ला दिया कि उन्हें कमतर गुणवत्ता वाले चेक निर्मित 600 ट्रकों की खरीदारी के लिए 2.8 मिलियन डॉलर घूस की पेशकश की गई थी। दूसरे, जनरल सिंह के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे खत के खुलासे ने भी तूफान बरफा दिया, जिसमें उन्होंने भारतीय सेना के ताजा हालात का ब्योरा देते हुए वायुसेना को ‘90 फीसद कबाड़’, तोपों और पैदल सेना को संकटपूर्णऔर टैंकों को गोला-बारूद विहीन बताया है। यह खबर उस समय आई जब चीन के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ ब्रिक्स शिखर सम्मेलनमें भाग लेने नई दिल्ली आए थे। हालांकि न्यूयार्क अवस्थित हडसन फैयरफैक्स ग्रुप के मनोहर त्यागराज कहते हैं, ‘जनरल का यह खुलासा चीनियों का शायद ही चौंकाएं। इसलिए कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा है, जो चीनियों को मालूम नहीं है।नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित रक्षा प्रदर्शनी में भाग लेने आए ब्रिटेन के जनरल डायनॉमिक्स के वरिष्ठ प्रबंधक ऐंड्रयू बोयले कहते हैं,‘भारत को धीरज रखने की जरूरत है। इसका कारोबार थोड़ा कठिन है। वे चीजों को अपने मुताबिक तय करते हैं। वह फैसले लेने में वक्त लेते हैं लेकिन यह बेशुमार क्षमताओं वाला मुल्क है।
(लॉस एंजिल्स टाइम्स की रिपोर्ट)

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