दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना का भीतरी हाल कमोबेश ठीक वैसा ही है, जैसा कि देश के अधिकतर सरकारी उपक्रमों का है। फर्क बस इतना है कि सेना एक अनुशासित संगठन होने के नाते, वहां की रोजमर्रा की समस्याएं, आकंठ भ्रष्टाचार और बुराइयां सामान्यत: सामने नहीं आतीं और कड़े अनुशासन के बल पर दबा-छिपा दी जाती हैं। लेकिन देश को आखिर कब तक मुगालते में रखा जा सकता है? सेना के भ्रष्टाचार को लेकर जो कुछ भी बातें, इन दिनों (या समय-समय पर) सामने आ रही हैं, वह गंदगी को ढकने का ही प्रतिफल है। हास्यास्पद यह है कि हम सैन्य ताकत में उस चीन से बराबरी करने का मंसूबा पाले हुए हैं, जहां सैन्य बलों में भ्रष्टाचार न के बराबर है। चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और समयबद्ध विकास के प्रेरणास्पद तथ्य को हम यह कहकर खारिज कर देते हैं कि वहां लोकतंत्र नहीं है। इसलिए वह तरक्की कर रहा है। यानि कि हम मान बैठे हैं कि लोकतांत्रिक शासन पण्राली में भ्रष्टाचार लाजिमी है..और मानवाधिकार के नाम पर क्षम्य भी है। मानवाधिकार और लोकतंत्र के नाम पर हमें सशस्त्र बलों में भी भ्रष्टाचार स्वीकार्य हो चला है। यही थल सेना की सबसे बड़ी त्रासदी है। 1962 में चीन ने जब भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र पर आक्रमण किया था और अरुणाचल के रास्ते असम तक घुस आया था, तो हमारे सैनिकों के पांव में जूते नहीं, चप्पलें थीं। हाथों में बंदूकों के स्थान पर लाठियां। हम बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि अब 1962 वाली स्थिति नहीं रही..हमारी सेना भी स्ट्रांग हो गई है और सैनिक मजबूत। लेकिन यह नहीं सोचते कि 1962 वाला चीन नहीं रह गया है।
आत्मघाती सोच हमारी सेना ने तब से अब तक जितनी तरक्की की है उससे 10 गुनी अधिक प्रगति चीनी सेना ने की है यानी यह बेमेल दुश्मनी जितनी/जैसी पहले थी, वैसी अब भी है। फर्क इतना है कि पहले से कहीं ज्यादा हमारी सरकारें इस बात को लेकर आस्त हो गई हैं कि चीन भारत पर आक्रमण नहीं करेगा। इसके पीछे दो तर्क दिए जाते हैं- एक यह कि भारत चीन के लिए बड़ा बाजार है, जिससे उसके आर्थिक हित जुड़े हुए हैं और दूसरे कि चीन के लिए भारत कोई मुद्दा नहीं है; उसकी चुनौती और तैयारी अमेरिका को लेकर है। दक्षिण चीन सागर के तटवर्ती देश जिनसे चीन की लम्बे समय से ठनी हुई है, वहां अमेरिका का दबदबा भी चीन के लिए तनाव का सबब है। भारतीय रणनीतिकारों के लिए चीन को लेकर ये सारे तर्क और सोच आत्मघाती है। यही वजह है कि हमारी सैन्य तैयारियों और बहुत ही तेजी से बदलती होती सैन्य तकनीक के साथ तालमेल बैठाने के प्रति न तो कोई राष्ट्रवादी जुनून ही बन पा रहा है और न ही इसको लेकर कोई युद्धस्तर की तैयारी। बस सब कुछ वैसे ही चल रहा है जैसे कि देश चल रहा है, अपनी गति से। कोई जल्दबाजी नहीं है। प्यास लगने पर कुंआ खोदने वाली कहावत सेना में भी सच है।
सेना के आधुनिक न होने की वजहें यह सच है कि सैन्य साजो-सामान और हथियार खरीदकर कोई भी देश दुनिया में ताकत नहीं बन सकता। लेकिन पड़ोसी देश की कुत्सित मानसिकता, साम्राज्यवादी सोच और आक्रमणकारी इतिहास को देखते हुए हमें उसके प्रतिरोध की तैयारी रखनी ही होगी। यह देश में गहरे जड़ जमा चुकी लालफीताशाही और भ्रष्टाचार का ही नतीजा है कि हमारी सेना ‘अपडेट’ नहीं है। राजीव गांधी के शासनकाल में स्वीडन से खरीदी गई बोफोर्स तोपों की खरीद में कथित दलाली को लेकर मची हाय-तौबा ने बाद की सरकारों को ऐसे डरा दिया कि सेना में उसके बाद कोई बड़ी खरीद नहीं हुई। कुछ सौदे हुए भी हैं तो वह भ्रष्टाचार के आरोपों की जद में है। इसलिए, जो भी रक्षा मंत्री होता है, वह बेदाग निकल जाना चाहता है। उसकी पूरी कोशिश यही होती है कि यथास्थिति बनी रहे। बिना बवाल के उसका कार्यकाल निकल जाए। उनके बाद जो आएगा वह देखेगा। अभी कौन- सा युद्ध होने जा रहा है। इस तरह की सोच और डर ने सेना के आधुनिकीकरण का बेड़ा गर्क किया हुआ है।
बजट का उपयोग नहीं हो रहा आलम यह है कि पिछले (2011-12) वित्तीय वर्ष में आम बजट में जो धनराशि सेना को खरीद के लिए सरकार ने आवंटित किया था, उसमें से तकरीबन तीन हजार करोड़ रुपए खर्च न हो पाने के चलते सरकार को वापस कर दिए गए हैं। ऐसा पूर्व के वर्षो में भी होता रहा है। सरकार पर्याप्त पैसा दे रही है, जिसका समयबद्ध उपयोग नहीं होता रहा है। सामानों की खरीद में इतनी गैरजरूरी पेचिदगियां पैदा कर दी गई हैं कि खरीद के लिए प्रक्रिया शुरू करने और उसे विदेशी कम्पनी को ऑर्डर होने में कम से कम चार-पांच साल तो निकल ही जाते हैं। इतने में तो वे सैन्य उपकरण और हथियार आउटडेटेट हो चुके होते हैं या उनसे परिवर्धित तकनीक वाले उपकरण प्रतिद्वंद्वियों के पास पहुंच चुके होते हैं और जब तक वे उपकरण या हथियार भारत के पास पहुंचते हैं। लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) एम एम लखेड़ा कहते हैं कि सेना के ज्यादातर हथियार और उपकरण 10-12 सालों में जंग लगकर खराब हो जाते हैं क्योंकि उनका उपयोग नहीं होता। ऐसे में उन्हें तत्काल बदलने की जरूरत होती है। अगर अचानक उनके इस्तेमाल की जरूरत पड़ जाए वे कामयाब नहीं होंगे और सेना को ऐन मौके पर दगा दे देंगे। लेकिन दुर्भाग्यवश, इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। किसी को कोई जल्दी ही नहीं है। सब कुछ यथावत है। प्रत्येक 10 साल में सैन्य उपकरणों और हथियारों की बिल्कुल नई तकनीक और खेप दुनिया के ताकतवर देशों के पास मौजूद होती है लेकिन हमारे पास नहीं। यह एक ऐसी समस्या है, जिस पर युद्धस्तर पर लगने की जरूरत है। यह मजबूत राजनीतिक इच्छा शक्ति और राष्ट्रीय सोच से ही संभव हो सकेगा। हथियारों की खरीद को लालफीताशाही से जब तक मुक्त नहीं किया जाएगा, बजट में आवंटित धन वैसे ही वापस होता रहेगा।
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