Monday, April 9, 2012

मोच्रे पर डटी सेना की शत्रें


रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार की खबरों को देखते हुए खरीद पण्राली में मूल बदलाव लाने की आवश्यकता है। सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह द्वारा टाट्रा ट्रक सौदे में घूस की पेशकश के खुलासे ने यह जाहिर किया है कि रक्षा पण्राली की खामियां दुरुस्त नहीं की गई हैं। इसलिए यह खरीद पण्राली पर गंभीरता से और मौलिक सुधार का एक अवसर भी उपलब्ध कराता है। इस मसले के कई आयाम हैं और वे सभी अलग-अलग विश्लेषण के जरिये निष्कर्ष तक पहुंचने की जरूरत जताते हैं। सवाल किए जाते हैं कि रक्षा सौदे में दलाली या घूस की बात बार-बार क्यों उठती है?रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार में वह क्या खास बात है? भ्रष्टाचार कहां से होता है और यह होता कैसे है? अब इस क्योंका जवाब बड़ा पेचिदा है। इसके पीछे के कई कारण अन्य क्षेत्रों के भ्रष्टाचार से इस भिन्न बनाते हैं। मोनोपोसनिस्टिक कहा जाता है, जिसे आपूर्तिकर्ताओं की तरफ के बजाए खरीददार पक्ष का एकाधिकार चलता है। इसमें दोनों की मनमर्जी घातक हो सकती है। हालांकि इसमें अनिश्चितता और बाजार के सनकीपन के चलते आपूर्तिकत्र्ताओं की तादाद भी कम ही है जो आवश्यक रूप से खरीददार और विक्रेताओं के बीच अस्वास्थ्यकर संबंध बनाता है।
तब क्या उपाय किए जा सकते हैं? यह भ्रष्टाचार कैसेके सवाल को हमारे पास ला देता है लेकिन इसके पहले हम दिलचस्प सवाल भ्रष्टाचार कहांपर नजर डालें। तीन अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, जिनसे होकर किसी भी रक्षा सौदे को गुजरना होता है और वे तीनों बहु बाधाओं वाली और संशलिष्ट हैं। इनमें पहली प्रक्रिया तो प्राक्कलन की मांग, उसकी परख की मांग, प्रत्यालेखों की मांग और सबसे बढ़कर प्राथमिकता निर्धारण की मांग होती है। यह काम सेना मुख्यालय का होता है, जो काफी माथापच्ची के बाद यह तय करता है कि उपलब्ध वित्तीय संसाधनों में कौन-सी रक्षा सामग्री की तत्काल खरीदी जानी है। यह देखना अद्भुत है कि यह कितना अनिश्चयकारी हो सकता है। ..चूंकि किसी को भी खरीददारी नहीं करने पर दंडित नहीं किया जा सकता है, लिहाजा मोटी राशि केवल अपनी मांग को कायम रखने के एवज में दे दी जाती है; खासकर दोबारा ऑडर्र देने के मामले में। दूसरी प्रक्रिया तकनीकी है-जिसमें आम सैन्यकर्मी की गुणवत्तापूर्ण जरूरतों, खास आभियांत्रिकी की तैयारी, तकनीकी जांच-परख, उपयोगकत्र्ताओं द्वारा उसका अभ्यास, खरीददारी से पहले उस उपकरण का व्यावसायिक-आभियांत्रिक नजरिये से मूल्यांकन और ठेके के बाद की समस्त गतिविधियों : गुणवत्ता निरीक्षण, नियंत्रण और गुणवत्ता का आासन आदि सब कुछ आते हैं। विशुद्ध रूप से तकनीक से जुड़े होने के चलते न तो इसकी प्रक्रिया और न इसके अभ्यास की ऑडिट की जाती है और न पेशेवर छानबीन ही। तीसरी प्रक्रिया वास्तविक खरीददारी की आती है, जिसका सारा दायित्व रक्षा मंत्रालय और उसके घाघ बाबुओं पर होता है। सौदे पर मुहर लगाने के लिए यहां रेंट कलेक्टर से लेकर उसकी स्वीकृति देने वाली अफसरों की वरिष्ठता क्रम से एक व्यवस्थित श्रृंखला है। यह स्वीकृति देने वाली श्रृंखला इतनी जटिल और लम्बी है कि सौदे पर निर्णय प्रक्रिया में शामिल हरेक पदाधिकारी को लूट के माल में हिस्सा लेने के अवसर बढ़ जाते हैं। इसमें किसी स्तर पर किसी को भी प्रक्रिया में गतिरोध उत्पन्न करने या रद्दोबदल की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि यह प्रक्रिया खुद ही सबको कमाई का अवसर देती है। खरीद प्रक्रिया शुरू होने के पहले बोली लगाने वाले स्थापित रेंट कलेक्टरों की श्रृंखलाओं के साथ लेटर ऑफ क्रेडिट का पत्र खोलते हैं और सौदे के हरेक स्तर के पार करने के साथ-साथ हिस्सा अपने आप संबद्ध स्तर पर पहुंच जाता है। निर्णय करने वाली श्रृंखला का शीषर्स्थ मुख्य वसूलकत्र्ता-जो मंत्री, प्रधानमंत्री और इन दोनों का विस्त हो सकता है-रेंट का बड़ा हिस्सा लेता है। यह बात कम मायने रखती है कि रक्षा सौदे का ऑडर किसको मिला क्योंकि अंतिम स्वीकृति मिलने पर ही भुगतान किया जाता है न कि किसी के पक्ष में निर्णय लेने के लिए।
तब क्या उपाय किए जा सकते हैं? पहला, रक्षा खरीददारी के फैसले के लिए पूरे और स्पष्ट अधिकार वाले प्रतिनिधित्व दिए जाएं। भारी-भरकम हथियार पण्रालियों और स्टेशनों की खरीददारी में रक्षा मंत्रालय की भूमिका नियंत्रित किए जाएं। बजटधारकों की एक स्पष्ट वरिष्ठता अनुक्रम बनाया जाए ताकि वह बजट के दायरे में निर्दिष्ट परिणामों को हासिल करने के लिए जरूरी सभी फैसलों के प्रति जवाबदेह हो। दूसरा, खरीददारी की प्रक्रिया में प्रशासनिक नियंतण्रऔर प्रतिबंधों के बजाए नियंतण्रकी बजट-आधारित पद्धति अपनाते हुए उसे अपेक्षाकृत सरल बनाया जाए। तीसरा, निर्णय लेने वालों के मौजूदा विशेषाधिकार को घटाने के बजाए उसे और बढ़ाया जाए। सौदे के हर पहलुओं को परख करने और इसके बाद सभी के हित में कोई फैसला लेने के बारे में सक्षम लोगों के इस समूह पर भरोसा जताया जाए। बाद में इस निर्णय के बाबत भरोसा तोड़ने के लगने वाले आरोपों से बचाव की पूरी गारंटी दी जाए। चौथा, रक्षा सौदे के आपूर्तिकत्र्ता की तरफ से बिचौलिये का काम करने वाले और सौदा तय करने वालों में अंतर किया जाए और उन्हें पूर्व की वैधानिक पहचान दी जाए तथा फैसले लेने वालों तक उनकी मुक्त पहुंच सुनिश्चित की जाए और उनके साथ पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से संवाद किए जाएं। पांचवां, लेखा या परखविहीन आभियांत्रिकी आधारित सौदे के बजाए इन्हें विशिष्ट निष्पादन क्षमता के मापक पर कसे जाएं। इस स्वीकृत नियम के बारे में सक्षम आपूर्तिकर्ताओं को बताया जाए और उनके उत्पाद को अपने मानक पर आजमाया जाए; और छठा, रक्षा उत्पादन और रक्षा अनुसंधान को रक्षा विभाग के साथ जोड़ा जाए तथा रक्षा से संबंधित सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण किया जाए और आयुध कारखानों एवं रक्षा प्रयोगशालाओं को बड़ी प्राइवेट लिमिटेड कम्पनियों में रूपांतरित कर दिया जाए जो अपने बेहतर प्रदर्शन के लिए शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह हो; इससे केवल खरीददारीके फैसले के बजाए उपभोक्ता-अनुकूलता पर आधारित उद्योग बनाने की दिशा मिलेगी जिसमें बनाओ और खरीदोका नियम चलता है। हालांकि यह कुछ ज्यादा ही मौलिक एजेंडा प्रतीत हो सकता है लेकिन खरीद नीति- पद्धतियों में परिवर्तन के प्रयास अब तक असंभव रहे हैं, जो एक ईमानदार को फैसले लेने से रोक कर पूरी पण्राली को लकवाग्रस्त करते रहे हैं। 

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