भारतीय सेना के लिए मौजूदा समय बेहद चुनौतियों से भरा है। कई चुनौतियां वास्तविकता के धरातल पर हैं तो कुछ भ्रामक आरोपों से भी बढ़ रही हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट को इसी मायने में एक बकवास माना जा सकता है, जो बिना किसी आधार के महज अनुमानों के आधार पर प्लांटेड की गई है। ऐसी बकवासों के बीच भारतीय सेना के सामने कुछ गंभीर चुनौतियां जरूर हैं। सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि हमारी क्षमता लगातार कम हो रही है जबकि देश के सामने संकट बढ़ता जा रहा है। पिछले कई दशकों से कश्मीर और उत्तर-पूर्व में सेना को संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है। थल सेना, वायुसेना और नौ सेना की क्षमता इन दिनों निम्नतम स्तर पर पहुंच चुकी है जबकि होना यह चाहिए कि हमें चुनौतियों को भांपते हुए अपनी सेना को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। इस मामले में भारत की लचर नीति को देखकर बीजिंग और इस्लामाबाद में खुशी छा जाती है। चीन भारत के साथ तीन बार सीमा पार से घुसपैठ कर चुका है और उसने तिब्बत में अपना सैन्य बेस भी बना लिया है। वह पाकिस्तान के साथ मिलकर भी भारत विरोधी हरकतों को शह देता है और अब उसने नेपाल के माओवादियों के साथ भी तालमेल बना लिया है। श्रीलंका में भी चीन को सहानुभूति मिल रही है।
चीन ने हड़पी हमारी जमीन चीन अभी भारत का करीब 7500 किलोमीटर हिस्सा हड़पा हुआ है। जैसे- जैसे दोनों देश की अर्थव्यवस्था विकास की ओर बढ़ रही है, वैसे- वैसे दोनों देशों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ रही है। इसकी वजह से भारत के तटीय इलाकों में भी संघर्ष बढ़ सकता है। इसे देखते हुए भारतीय नौ सेना को बड़े पैमाने पर आधुनिक बनाए जाने की जरूरत है। सेना को आधुनिक बनाए जाने का काम इसलिए भी अटका हुआ क्योंकि लालफीताशाही के जरिए इस दिशा में कोई काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है जबकि भारतीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत को अपनी रणनीतिक क्षमता बढ़ाए जाने की जरूरत है। भारत सरकार इस मसले पर गंभीरता से ध्यान नहीं दे रही है। लिहाजा, चीन अब काबुल के निकट तालिबानियों से भी संपर्क बढ़ा रहा है।
वायुसेना : विंटेज विमानों की सीरीज अगर भारत का किसी देश से युद्ध छिड़ता है तो मौजूदा समय में वायुसेना को 60 स्कैव्रेडन की जरूरत होगी जबकि अतिरिक्त तौर पर 45 स्कैव्रेडन की जरूरत अलग है। जबकि सरकार ने अभी 39.5 स्कैव्रेडन को मंजूरी दी हुई है, जिसे इस दशक में बढ़ाकर 42 करने को लेकर सरकार गंभीर है। बहरहाल, इनमें महज 28.5 स्कैव्रेडन ही युद्ध के लायक हैं। मिग-21 भी बेहद पुराना बन गया है। भारतीय वायुसेना में सुखोई को अगर छोड़ दें तो भारतीय वायुसेना के विमानों को आप विंटेज विमानों की सीरीज कह सकते हैं। जब एनडीए की सरकार सत्ता में थी तब भारत सरकार ने 40 मिराज 2000वी विमान खरीदने की बात की थी लेकिन यह अनुबंध हो नहीं पाया था क्योंकि जब इस पर अंतिम करार करने का वक्त आया था, तब उन्होंने सोचा था कि इस पर चुनाव के बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा। चुनाव में एनडीए की सरकार गिर गई और यूपीए सरकार ने इस अनुबंध को रद्द कर दिया। इसी प्रकार, इन फ्लाइट रेफूलर का सौदा तीन साल होने की बात हुई लेकिन बाद में वित्त मंत्रालय ने कहा कि वायुसेना जिन टैंकों की मांग कर रही है, वह बहुत महंगे हैं। अंतिम समय में 197 हेलिकाफ्टरों को खरीदने के समझौते को भी ठंढे बस्ते में डाल दिया गया। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की छवि को भी नुकसान हुआ है। खुद वायुसेना के अध्यक्ष सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार कर चुके हैं कि भारतीय वायुसेना के आधे से ज्यादा उपकरण अब किसी काम के नहीं हैं। ऐसे में भारतीय वायुसेना की जरूरत है कि इसे तुरंत आधुनिक बनाया जाए। दूसरी ओर, भारतीय सेना बीते 25 साल के दौरान अब तक 155 मिलीमीटर वाले गन को सेना में शामिल नहीं कर सकी है। करगिल युद्ध के दौरान भी हमें अच्छी बंदूकों की कमी महसूस हुई थी। भारतीय सेना में पिछले 60 सालों के दौरान उपकरणों को बदला नहीं गया है। टैंक और आईसीवी से रात में काम लेना मुश्किल है। रक्षा मंत्रालय अब तक थर्मल इमेजर फायर कंट्रोल सिस्टम और थर्मल इमेजर स्टैंड एलोन सिस्टम में किसी एक का विकल्प चुन नहीं सकी है जबकि पाकिस्तान की सेना के पास रात में काम करने लायक उपकरण समेत तमाम आधुनिक बंदूकें मौजूद हैं।
नौसेना के पास जरूरत की पनडुब्बियां नहीं भारतीय नौ सेना की स्थिति बेहद खराब है। हमारे पास नौ ऑपरेशनल पनडुब्बियां हैं जबकि हमारी जरूरत के मुताबिक 30 पनडुब्बियां हमारे बेड़े में होनी चाहिए। हमने फ्रांस से 12 पनडुब्बियों की खरीद के लिए बात जरूर की है लेकिन अभी तक सौदा नहीं हो पाया है। एक ओर भारत सरकार सेना को आधुनिक बनाने के मुद्दे पर लचर रुख अपना रही है तो दूसरी ओर दुनिया भर में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। पहले किसी उपकरण की तकनीक को बेहतर बनाने में एक दशक का समय लगता था, अब यह काम एक साल के अंदर हो जा रहा है। विकसित देशों की बात अगर छोड़ भी दें तो लीबिया और अफगानिस्तान जैसे देश भी तकनीक के इस्तेमाल पर भरोसा कर रहे हैं। भारत की युवा आबादी भी तकनीकी फ्रैंडली है लेकिन सरकार इस दिशा में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। भारत की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी सेना को आधुनिक बनाने की दिशा में जल्द कदम उठाने की जरूरत है। हमारी कोशिश सेना पर सवाल उठाने के बजाए उसे सशक्त बनाने की होनी चाहिए। यह देश की जरूरत है।
करगिल युद्ध के दौ रान भी हमें अच्छी बंदूकों की कमी महसूस हुई थी। भारतीय सेना में पिछले 60 सालों के दौ रान उपकरणों को बदला नहीं गया है। टैंक और आईसीवी से रात में काम लेना मुश्किल है। रक्षा मंत्रालय अब तक थर्मल इमेजर फायर कंट्रोल सिस्टम और थर्मल इमे जर स्टैंड एलोन सिस्टम में किसी एक का विकल्प चुन नहीं सकी है जबकि पाकिस्तान की सेना के पास रात में काम करने लायक उपकरण समेत तमाम आधुनिक बंदूकें मौजूद हैं
No comments:
Post a Comment