Tuesday, April 3, 2012

राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल


वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने 2012 के अपने केंद्रीय बजट मे रक्षा खर्च के लिए 1.93 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया, जो सकल घरेलू उत्पाद का 1.9 प्रतिशत है। आवंटित कुल 1,93,407 करोड़ रुपये में से 1,13,829 करोड़ रुपये राजस्व (शुद्ध) खर्च के लिए थे और 79,578 करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के लिए, जिसमें आधुनिकीकरण से संबंधित खर्चे शामिल हैं। बढ़े हुए आवंटन से इस साल होने वाले सौदों को पूरा किया जा सकेगा। ये सौदे हैं- 126 मध्यम बहु-उद्देश्यीय लड़ाकू विमान, 197 हल्के यूटिलिटी हेलीकॉप्टर तथा सेनाओं के तीनों अंगों के लिए दूसरे हथियार तथा प्रणालियां। भारत अगले पांच से दस सालों में रक्षा खरीद पर सौ अरब डॉलर से अधिक खर्च करने की सोच रहा है। बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने कहा कि यह वृद्धि मौजूदा जरूरतों के आधार पर की गई है और रक्षा संबधी देश की अन्य जरूरतों को सरकार पूरा करेगी। केंद्रीय बजट में रक्षा आवंटन को कुल परिव्यय के अनुपात या सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि चीन के बढ़ते आक्रामक रुख को देखते हुए देश की सुरक्षा और रक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए देखना होगा। आवंटन में पर्याप्त वृद्धि के पीछे हमारे लाल पड़ोसी द्वारा उत्पन्न चुनौतियों के मद्देनजर सेनाओं के तेजी से आधुनिकीकरण की जरूरत महसूस की जा रही है। यह तब ही संभव हो सकता था अगर नवीनतम और उन्नत सैन्य उपकरण खरीदे जाएं, जिनमें लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां और तोपखाने शामिल हैं। वृद्धि की जरूरत चीन के 2012-13 के 106.4 अरब डॉलर के सैन्य बजट में 112 प्रतिशत बढ़ोतरी के कारण भी जरूरी हो गई थी। एशियाई क्षेत्र में चीन सबसे बड़ी सैन्य ताकत है और वह अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के प्रयास कर रहा है। इस साल के लिए 106 अरब डॉलर के आवंटन के चलते वह भारत के लिए असली खतरा बन जाएगा। जब 2015 तक यह खर्च दोगुना हो जाएगा तब कोई भी देश, यहां तक कि भारत भी उसकी बराबरी करने का सपना भी नहीं देख पाएगा। चीन का सैन्य खर्च दुनिया में दूसरे स्थान पर है। सबसे अधिक रक्षा खर्च अमेरिका का है। पिछले दशक में चीन का रक्षा खर्च लगातार बढ़ा है। दिलचस्प बात यह है कि जब चीन अपने रक्षा खर्च में तेजी से वृद्धि कर रहा है, तब अमेरिका के रक्षा बजट में करीब 380 अरब डॉलर की कमी आई है। दरअसल, चीन को अपने रक्षा खर्च में इतनी अधिक वृद्धि करने की जरूरत नहीं है, क्याोंकि उसे अपने पड़ोसियो से खतरा नहीं है। आज सैन्य संतुलन चीन के पक्ष में है, लेकिन इराक और अफगानिस्तान में व्यस्तताओं के चलते अमेरिका के चीन के सैन्य सुदृढ़ीकरण की ओर से आंखें मूंदे रहने के कारण उसकी हिम्मत बढ़ी है। आने वाले वर्ष में सैन्य खर्च में चीन द्वारा की गई वृद्धि को भारत ने गंभीरता से लिया है, क्योंकि उत्तर की ओर से खतरा किसी दूसरी दिशा के मुकाबले अधिक गंभीर है। और फिर भारत को नुकसान पहंुचाने के इरादे से जिस प्रकार वह बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल की मदद कर रहा है, वह भी चिंता की बात है। इसे नेपाल सरकार के ताजा फैसले के आलोक में देखना होगा जिसके तहत दूसरे देशों की सेनाओं में गोरखाओं की भरती पर रोक लगा दी गई है। अभी 25,000 से अधिक नेपाली भारतीय सेना की सात गोरखा राइफल्स में सेवारत हैं। इसके अतिरिक्त, भारतीय अ‌र्द्धसैनिक बलों और पुलिस बलों में भी करीब 20,000 गोरखा हैं। नेपाल सरकार में माओवादियों के बढ़ते प्रभाव और उस पर चीन सरकार के हावी होने को देखते हुए आसानी से नतीजा निकाला जा सकता है कि वहां फैसलों को कौन प्रभावित कर रहा है। इसलिए चीन की ओर से वास्तविक खतरे और उसके लगातार बढ़ते जाने के मद्देनजर भारत को चीन के रक्षा बजट में तीव्र वृद्धि को गंभीरता से लेना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) बजट में रक्षा आवंटन पर वाईसी हलन की टिप्पणी 

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