Monday, April 9, 2012

सेना की तै यारी और लाचारी


हमारी सेना में मुख्य तीन कमियां हैं, जो लम्बे समय से बनी हुई हैं और उनका त्वरित निदान करना बहुत ही जरूरी है। एक, तोपखाने में मुख्य तोपों की कमी। बोफोर्स तोपों की खरीद 1986 में हुई थी। उसके बाद से लम्बा अंतराल बीत गया है और नए तोपों की खरीद नहीं हुई है। किसी भी सेना के लिए तोपें उसका मुख्य हथियार होती हैं और उनकी कमी नहीं होने दी जानी चाहिए। दो, भारतीय सेना के पास टैंक का भी अभाव है। पुराने टैंकों के स्थान पर नए टैंक रखे जाने चाहिए। टैंकों की कमी की अनदेखी नहीं की जा सकती। तीसरे, पैदल सेना के पास रात में देख सकने वाले उपकरणों का अभाव। आतंकवादियों से लड़ाई खुले में नहीं बल्कि रिहाइशी इलाकों और जंगल में होती है। वे छिप कर वार करते हैं। जाहिर है इस तरह की लड़ाई के लिए हमारे पैदल सैनिकों के पास रात में दिखने वाला डिवाइस होना बहुत जरूरी है।
सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि सेना की हवाई सुरक्षा पण्राली 97 फीसद बेकार हो चुकी है?
आंकड़ों पर विवाद हो सकता है लेकिन लब्बोलुआब यही है। एयर डिफेंस की तकनीक में भी तत्काल नवीकरण की जरूरत है।
आपने कहा कि बोफोर्स तोपों की खरीद 1986 में हुई थी, फिर सेना की डिमांड के बावजूद तोपों की खरीद नहीं हुई, आखिर ऐसा क्यों? हथियारों की खरीद-फरोख्त में निरंतरता बहुत ही जरूरी है और इसका न हो पाना चिंता का विषय है। हमें यह पता करते रहना जरूरी है कि हमारे विरोधी के पास कौन-कौन से नए हथियार हैं और वह क्या नया करने जा रहा है? आर्मर इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी इंडस्ट्री है। लिहाजा हथियार निर्माता देशों और कम्पनियों के इंटरेक्शन भी बढ़े हैं। तहलकामामले के बाद से सरकारी हथियार खरीद के जिम्मेदार लोगों में सावधानी और चौकन्ना रहने के भाव आ गए हैं। वे इसलिए रक्षा सौदे करने से कतरा रहे हैं कि कहीं उन पर कमीशन लेने के आरोप न लग जाए। यही वजह है कि निर्णय लेने में अनावश्यक देरी होने लगी है। यह चिंता का विषय है। 1986 में बोफोर्स खरीदी गई थी। यह तोप उस वक्त की तकनीक की है। जाहिर है, आज की तकनीकी इससे भी उन्नत होगी।
तो क्या सेना के आधुनिकीकरण की योजना महज एक कल्पना है? सेना की तैयारी में सिविल ब्यूरोक्रेसी भी आड़े आ रही है। पे- कमीशन, पेंशन और अन्य मामलों में इनके रवैये को देखकर तो ऐसा ही लगता है। ये फौजियों पर हावी रहना चाहते हैं। सिविल ब्यूरोक्रेट्स सैन्य कामकाज पर अपना नियंतण्रऔर अंकुश रखना चाहते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि प्रजातंत्र में सरकार सवरेपरि है, न कि असैनिक अधिकारी।
चीन की तुलना में भारतीय सेना को आप किस मुकाम पर पाते हैं? भारतीय सेना अपने दो विरोधी देशों-पाकिस्तान और चीन की तुलना में पर्याप्त रूप से सक्षम है। पर्याप्त से मेरा अभिप्राय तादाद, रणकौशल और हथियारों से है। लेकिन यह एक ऐसा मामला है कि जिसमें निरंतर प्रयास और काम करते रहने की जरूरत है। हम हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे रह सकते। हमें अद्यतन तैयारी रखनी जरूरी है। निरंतरता नितांत आवश्यक है।

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