Monday, April 9, 2012

खरीद नीति बदलें, निजी क्षेत्र को न्यो तें


सेना अध्यक्ष ने अपनी चिट्ठी में जो कमियां बताई है, वह बिल्कुल सही है। यह ऐसी कमी नहीं है कि हमें आज पता चला है। मीडिया और रक्षा विश्लेषक इन बातों को वरसों से उठाते आ रहे हैं लेकिन हमारी सरकार इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। हर सेना अध्यक्ष सेवा निवृत्ति से पहले सरकार को फौज के बारे में अपनी समीक्षा लिखकर भेजते हैं। हमारे वर्तमान सेनाध्यक्ष ने भी ऐसा ही किया है। मुझे लगता है कि यह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि हम अपनी फौज को चुस्त-दुरु स्त रखने पर कभी ध्यान नहीं देते। जब किसी प्रकार का संकट हमारे ऊपर आ जाता है, तब हम बुनियादी समस्याओं को सुलझाने में सक्रियता दिखलाते हैं। जब हमारी फौजों को जंग लड़ने की नौबत आएगी, तब हमारी नींद खुलेगी कि उन्हें किन चीजों की जरूरत है? जब हमें पानी पीना होता है, तभी हम कुंआ खोदते हैं। यह सोचना कि यह सरकार के संज्ञान में नहीं था और सेनाध्यक्ष ने कोई रहस्योद्घाटन किया है, बेबुनियाद है।
गरदन बचाने के फेर में लटकते हैं रक्षा सौदे हमारी तीनों फौजें सैनिक साजो-सामान की कमी से सालों से जूझ रही है। थल सेना को वाहन, तोप और गोला बारूद की कमी है। वायुसेना को लड़ाकू विमानों की कमी है तथा नौसेना को विमानवाहक पोत और पनडुब्बियों की कमी है। यह आधारभूत कमियां हैं। जब यह कमी इतने सालों में दूर नहीं हो पाई है तो उनकी दूसरी कमियों की क्या बात की जाए? इन सामानों की सरकारी खरीद में भी काफी देरी होती है। एक तो जो पण्राली अब तक चल रही है, उसमें निर्णय लेने में देरी स्वाभाविक है। लेकिन जब से बोफोर्स घोटाला सामने आया है, अधिकारी से मंत्री तक अपनी जवाबदेही लेने से बचने लगे हैं। इसलिए निर्णय लेने में देरी होती है और मामला खींचता चला जाता है। उनका सारा ध्यान इस पर रहता है कि कहीं सूचना के अधिकार कानून लागू होने के बाद स्पष्टीकरण देने में उनकी गरदन न फंस जाए। आज हमारे ढांचे में ईमानदारी की कमी है। अगर कोई ईमानदारी से काम भी करता है तो उस पर भी शक की तलवार लटकी होती है। आज रक्षा के लिए सरकारी खरीद से जुड़े लोगों को आपस में किसी पर भरोसा नहीं है। सब अपनी गरदन बचाने में लगे हैं। जब तक भ्रष्टाचार की बात है कि यह तो हरेक विभाग में हरेक सौदे के अंदर बढ़ता ही जा रहा है।
बढ़ती लागत और भ्रष्टाचार के रास्ते बंद हों इसलिए सरकारी खरीद नीति में आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है। आज सेना मुख्यालय को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी आवश्यकता की सामग्री सीधे खरीद सकें। वे सरकार को अपनी जरूरत बताते हैं। सरकार उन्हें कुछ विकल्प देती है, जिसे उन्हें पास करना होता है। इसके अलावा खरीदने का निर्णय सरकार और रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक निगम मिलकर लेते हैं। कई बार सरकार बाहर से खरीदने के बजाए अपने सार्वजनिक निगम से खरीदती है, जिसकी क्षमता, क्वालिटी अच्छी नहीं होती। सरकार द्वारा गठित की गई संस्था डीआरडीओ हमारी फौजों के लिए मानक और भरोसेमंद हथियार और वाहन बनाने में नाकाम रही है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह तेजी से खरीद प्रक्रिया बनाने के लिए नियमों में परिवर्तन करे और देश की ही निजी कंपनियों से सरकारी खरीद करे। जहां तक तकनीक की बात है तो हमारे देश की निजी कंपनियां काबिल हैं। अभी तो हाल यह है कि सरकार विदेश से सीधे खरीदने के बजाए रक्षा सार्वजनिक निगम के माध्यम से खरीदती है, जिससे लागत में भी इजाफा होता है और भ्रष्टाचार के नए रास्ते भी खुलते हैं।
टाट्रा ट्रक हम क्यों नहीं बना सकते हमें समीक्षा करनी चाहिए कि आखिर हम टाट्रा ट्रक क्यों नहीं बना पाए? इसका जिम्मेवार कौन है? डीआरडीओ की समीक्षा के लिए सरकार ने रामाराव समिति की रपट तैयार करवाई जिसे काफी मेहनत से बनाया गया था। उसमें इस बात की समीक्षा की गई थी कि डीआरडीओ में क्या कमियां और उसमें क्या सुधार करना चाहिए? लेकिन सरकार ने उस पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की। न ही सरकार ने उस रपट को संसद में रखकर समीक्षा किया है। तो रामाराव समिति और केलकर समिति की रिपोर्टे सरकार के पास हैं, जिनकी सिफारिशों पर सरकार को अविलंब अमल करना चाहिए। लेकिन सरकार न तो उन रिपोटरे का खुलासा करती है और न उन पर चर्चा ही। सरकार देश की निजी कंपनियों को क्यों नहीं रक्षा साजो-सामान बनाने के लिए मौका देती है? डीआरडीओ ने अभी तक एक भी क्वालिटी उत्पाद बनाया नहीं है जिसे हमारी फौजें इस्तेमाल कर सकें। होना तो यह चाहिए था कि डीआरडीओ देश की जरूरत भी पूरी करती और अपने उत्पादों का निर्यात भी। तकनीक और हथियार तो दूर की बात है, हमारा डीआरडीओ और दूसरे रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक निगमें फौज के लिए ढंग के जूते और कपड़े बनाने के लायक भी नहीं हैं। इसलिए हमारे पूरे ढांचे में परिवर्तन लाना जरूरी है। हमारे पड़ोसी चीन में यह दृढ़ता है कि वह अपनी फौज का आधुनिकीकरण कर सके और उनका ध्यान रख सके। हमारे देश में उस प्रकार की राजनीतिक दृढ़ता नहीं है। अगर हमने अपनी फौजों की समस्याओं का निदान नहीं किया और आधुनिकीकरण के दौर में पीछे रह गए तो इसके खतरनाक नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं।

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