सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह के प्रधानमंत्री को लिखे गोपनीय पत्र, जिसमें चीन की रक्षा तैयारियों की तुलना में हमारी कमतर क्षमताओं का खुलासा किया गया है, को लेकर देश में भय व्याप्त गया है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि हमें क्यों भयग्रस्त होना चाहिए? जनरल के खत से प्रभावित हमारे बहुत से विश्लेषकों ने चीन से युद्ध का परिदृश्य लगभग अपरिहार्य बना दिया है। अब जरा 2008 में लौटें। तब समझा जाता है कि रक्षा मंत्री एके एंटनी ने दो मोचरे पर संभावित युद्ध की तैयारी के बाबत सेना को औपचारिक निर्देश जारी कर दिया था। इसके बाद नवम्बर 2011 में पूर्व रक्षा मंत्री और सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने संसद में कह दिया था कि ‘चीन हम पर जल्दी ही हमला करने वाला है।’
इस भय के तथ्य स्पष्ट हैं। चीन ने अपने रक्षा बजट को 2011 के 91.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़ाकर 106.4 बिलियन डॉलर कर दिया है। पिछले दशक से हरेक वित्तीय वर्ष में बढ़ोतरी होते-होते यह 12 फीसद तक पहुंच गई है। इस रकम का उपयोग वह क्रूज और बलास्टिक मिसाइल बेड़े को बढ़ाने, नई डेंग फेंग-21डी की तैनाती करने वाला है, जो प्रशांत महासागर में अमेरिका के जंगी जहाजों के लिए पहला गंभीर खतरा होने जा रहा है। इसने पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों के लिए एक प्रतिमान बनाए हैं और एक विमानवाहक जहाज अपनी सेना में शामिल किया है। चीनी सेना के शक्तिशाली होने की तैयारी से यह साफ नहीं होता कि इससे भारतीय को डरने की जरूरत है। यहां समझना होगा कि भारत चीन के मुख्य खतरनाक देशों में शामिल नहीं है। चीन की 18 समूहों वाली सेना के आठ समूह तो दक्षिण-पूर्वी समुद्र सीमा के लिए है, इसमें शामिल सैनिकों को ताईवान से युद्ध के नजरिये से प्रशिक्षित और लैस किया गया है। इस बात की पुष्टि अमेरिकी रक्षा मंत्रालय भी करता है। कोरियाई देशों में, चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) परंपरागत से लेकर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल करने लायक बड़ी जंग के हालात देखता है, जो उसकी सीमा पर लाखों की तादाद में शरणार्थियों की उमड़ी भीड़ का कारण बन सकता है। उसकी सेना को आवश्यक रूप से शिनज्यिांग प्रांत में उग्रवाद और अशांत तिब्बत से जूझना है। उसे चीनी व्यापार के रास्ते को अबाध करना है और हाई सी में ऊर्जा भंडारों की निगरानी करनी है। इनमें से हरेक खतरा प्रमुखता से अमेरिका को है, जो वि की एकमात्र शक्ति है। चीन को भारत से न डरने की जो दूसरी वजह है, वह यह कि खतरा केवल बारूद से नहीं बनता लेकिन उसके प्रचार से भी होता है। चीनी पनडुब्बी से खतरे का हौवा सबक देने वाला है। पांच साल पहले अमेरिकी विश्लेषक 2011 तक पनडुब्बियों के मामले में चीन के आत्मनिर्भर होने की भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन चीन के नौसैनिक शक्ति के मंसूबे से चिंतित रूस ने उसमें उपयोग में आने वाली खास तरह की प्रौद्योगिकी की आपूर्ति ही रोक दी और इस बीच अमेरिका ने अपनी पनडुब्बियों की तादाद दोगुनी कर ली। गत वषर्, अमेरिका ने चीनी सेना के बारे में अनुमान लगाया था कि वह परमाणु मारक क्षमता से लैस पांच पनडुब्बी प्राप्त कर लेगी, उनमें से तीन 091 हॉन-वर्ग के जहाज वष्रात तक बेड़े में शामिल हो जाएंगी। इसके अलावा, डीजल पर चलने वाली 50 पनडुब्बियां हैं, जिनमें से ज्यादातर कबाड़ हो चुकी हैं और कुछ प्रायोगिक बलास्टिक-मिसाइल पनडुब्बियां हैं। अमेरिकी नौ सेना के पास 53 लड़ाकू पनडुब्बियां, चार मिसाइल निर्देशित पनडुब्बियां और 14 बलास्टिक-मिसाइल नौकाएं समेत कुल 71 हैं। इसमें उसके यूरोपीय संघ और जापान, कोरिया और आस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों की नौसैन्य क्षमता शामिल नहीं है।
62 की हार का वेवजह डर इतने के बावजूद, चीन पर अविास में भारतीय आग्रहों के लाल होने की वजह हमेशा ही 1962 की लड़ाई में सद्भावना की कीमत के रूप में मिली पराजय रही है। वास्तव में यह लड़ाई इसका शानदार उदाहरण है कि केवल हथियारों के बलबूते जंग नहीं जीती जा सकती। रक्षा मंत्रालय के दिए ब्योरे पर डॉ पीबी सिन्हा और कर्नल एए अथाले की लिखी किताब हिस्ट्री ऑफ द कनफिलिक्ट विद चाइना, 1962 में कहा गया है, ‘हम जानते हैं कि चीनी हथियारों, उपकरण संयोजन और प्रशिक्षण में भारतीयों से बेहतर पड़ते थे। लेकिन यह सर्वोच्चता केवल आंशिक थी। यह अपने आप में ही विजेता होने की निर्णायक नहीं है।’
भारतीय वायुसेना जो चीन के मुकाबले में बेहतर है, उस जंग में पंगु इसलिए हो गई क्योंकि तत्कालीन सोवियत संघ ने अनबन के कारण बिना कल-पुज्रे के ही हमें छोड़ दिया था। हालांकि भारत ने अपनी हवाई क्षमता का विकल्प जिन वजहों से नहीं चुना उनमें एक यह डर भी शामिल था कि ऐसा करने से जवाबी हमले ज्यादा होने लगेंगे। तब भारत में अमेरिकी राजदूत जॉन गॉलब्रिथ भी हवाई हमले के विरुद्ध लॉबिंग कर रहे थे, उन्हें भय था कि उनका देश क्यूबा में परमाणु मिसाइल तैनाती के मुद्दे पर सोवियत संघ से उलझ जाएगा और इस तरह उसे युद्ध में कूदना पड़ जाएगा। हालांकि डॉ सिन्हा और कर्नल अथाले तब वायु मुख्यालय में तैनात अभियान के तत्कालीन निदेशक एस सी दीवान के 1988 में दिए गए तकरे से सहमत नहीं है कि हवाई हमले का सीमित ही उपयोग होता तब उत्तर-पूर्व के जंगलों से बढ़ रही थल सेना को कवर देना पड़ता। पहले दोनों लेखकों का स्पष्ट मानना है कि ‘जंग में वायुसेना के इस्तेमाल से चीन के सैन्य संचालन के डैने टूट जाते और हमारी सेना को पहाड़ों से होकर चीन में घुसने में रास्ता मिल जाता।’ किसी भी रूप में सबक वही है, बेहतर का मतलब मैदान मारना नहीं होता।
इतिहास दोहराना चीन के लिए क्यों है नामुमकिन जब मुलायम सिंह आसन्न चीनी हमले को देख रहे थे तो अध्येयता डॉ कांति वाजपेयी ने कई ठोस सैन्य कारण गिनाते हुए बताया था कि 1962 क्यों नहीं दोहराया जा सकेगा। उन्होंने कहा, ‘अव्वल तो भारतीय वायुसेना को नेस्तनाबूद करना चीन के लिए संभव नहीं होगा, जो उसके सैन्य तंत्र की जीत के लिए आवश्यक होगा। फिर हिमालय की चोटियों पर आक्रामक मुद्रा में सेना की मौजूदगी, हिन्द महासागर में भारत से मुठभेड़ कर सकने की चीनी नौसेना की सीमित क्षमता, तिब्बत की स्वायत्तता को लेकर आंतरिक उपद्रव छिड़ने के आसार और इन सबसे बढ़कर परमाणु युद्ध की आशंका।’ वाजपेयी का स्पष्ट निष्कर्ष है कि ‘भारत और चीन के बीच जंग संभव नहीं है जब तक कि दोनों एक दूसरे को भड़काने, वास्तविकताओं के खराब आकलन पर आधारित आचरण करने पर आमादा न हो जाएं; तिस पर भी परमाणु हथियारों और हवाई क्षमता वाले देश के साथ, युद्ध में जाना बेहद जोखिमपूर्ण होगा।’
दरअसल, इस शंका से निजात मुश्किल है कि भारत 1962 की लड़ाई लड़ने की कोशिश कर रहा है। हमारी सेना उसी धुरी पर तैनात है और उसकी रणनीतिक जुबान वही की वही है। भारत को अगर चीनी की उभरती सैन्य शक्ति पर गंभीर प्रतिक्रिया देनी है तो उसके अपने खुफिया और सैन्य प्रतिष्ठानों को चीनी को ज्यादा अध्ययन करना है। हमारे विविद्यालय, खुफिया संस्थान और सैन्य प्रतिष्ठान; हर जगह अपने अहम पड़ोसियों तक की भाषाओं को पढ़ने वाले लोगों की कमी है; ऐसे में उनके रणनीतिक दस्तावेजों को समझना तो दूर की बात है। भारत को ज्यादा हार्डवेयर की जरूरत है। यह सोचने की भी कि हमें कैसे हार्डवेयर की जरूरत है और इसका बेहतर उपयोग कैसे किया जाए?
(साभार : दि हिन्दू)
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