भारतीय वायुसेना के बेड़े की ताकत में इजाफा करने आ रहा पहला मेड इन यूएसए विमान, सी-130जे सुपर हरक्यूलिस अगले सप्ताह 5 फरवरी को वायुसेना में शामिल होगा। भारत को सौंपे जा चुके इस विमान की अगवानी के लिए इसके नए घर हिंडन वायुसेना अड्डे में भी खास तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। त्वरित कार्रवाई बलों और स्पेशल फोर्सेज के लिए आ रहे इस नए विमान की जरूरतों की खातिर हिंडन वायुसेना अड्डे में भी कई बदलाव भी किए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक न केवल हिंडन वायुसेना अड्डे की हवाई पट्टी को सुधारा गया है बल्कि नए हैंगरों का भी निर्माण किया गया है। इस विमान को भारत लाने के लिए इन दिनों वायुसेना की एक टीम अमेरिका में है। यह टीम गत 16 दिसंबर 2010 को अमेरिका के अटलांटा में पहले विमान की डिलीवरी ले चुकी है। अमेरिकी वायुसेना इस विमान के लिए भारतीय वायुसेना के 18 पायलटों, नौ लोड मास्टर और नौ कॉम्बेट सिस्टम ऑपरेटरों को प्रशिक्षण भी दे रही है। वहीं विमानों की देखरेख के लिए 100 अन्य अधिकारियों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत ने अमेरिका के साथ छह विमानों की खरीद का अनुबंध 2008 में किया था । 95 करोड़ डॉलर के इस सौदे में शेष पांच विमान साल के अंत तक सौंपे जाने हैं। चार इंजन वाला सुपर हरक्यूलिस विशेष अभियानों के लिए भारतीय वायुसेना की क्षमताओं में खासा इजाफा करेगा। विमान में भारतीय वायुसेना की विशेष जरूरतों के लिहाज से कुछ बदलाव भी किए गए हैं। विमान न केवल हवा में ईधन लेने की क्षमता बल्कि उन्नत रडार और चेतावनी यंत्र भी मौजूद हैं। वायुसेना ने आतंकवादी घटनाओं में त्वरित कार्रवाई की जरूरतों और रणनीतिक नजरिए से सी-130जे को हिंडन के वायुसैनिक अड्डे में तैनात करने का फैसला किया है। इस कड़ी में वायुसेना हिंडन वायुसैनिक अड्डे को हर तरह के लड़ाकू और परिवहन विमानों के इस्तेमाल के लिए भी तैयार कर रही है।
Sunday, January 30, 2011
वायुसेना को अगले हफ्ते मिलेगा अमेरिकी विमान
भारतीय वायुसेना के बेड़े की ताकत में इजाफा करने आ रहा पहला मेड इन यूएसए विमान, सी-130जे सुपर हरक्यूलिस अगले सप्ताह 5 फरवरी को वायुसेना में शामिल होगा। भारत को सौंपे जा चुके इस विमान की अगवानी के लिए इसके नए घर हिंडन वायुसेना अड्डे में भी खास तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। त्वरित कार्रवाई बलों और स्पेशल फोर्सेज के लिए आ रहे इस नए विमान की जरूरतों की खातिर हिंडन वायुसेना अड्डे में भी कई बदलाव भी किए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक न केवल हिंडन वायुसेना अड्डे की हवाई पट्टी को सुधारा गया है बल्कि नए हैंगरों का भी निर्माण किया गया है। इस विमान को भारत लाने के लिए इन दिनों वायुसेना की एक टीम अमेरिका में है। यह टीम गत 16 दिसंबर 2010 को अमेरिका के अटलांटा में पहले विमान की डिलीवरी ले चुकी है। अमेरिकी वायुसेना इस विमान के लिए भारतीय वायुसेना के 18 पायलटों, नौ लोड मास्टर और नौ कॉम्बेट सिस्टम ऑपरेटरों को प्रशिक्षण भी दे रही है। वहीं विमानों की देखरेख के लिए 100 अन्य अधिकारियों को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि भारत ने अमेरिका के साथ छह विमानों की खरीद का अनुबंध 2008 में किया था । 95 करोड़ डॉलर के इस सौदे में शेष पांच विमान साल के अंत तक सौंपे जाने हैं। चार इंजन वाला सुपर हरक्यूलिस विशेष अभियानों के लिए भारतीय वायुसेना की क्षमताओं में खासा इजाफा करेगा। विमान में भारतीय वायुसेना की विशेष जरूरतों के लिहाज से कुछ बदलाव भी किए गए हैं। विमान न केवल हवा में ईधन लेने की क्षमता बल्कि उन्नत रडार और चेतावनी यंत्र भी मौजूद हैं। वायुसेना ने आतंकवादी घटनाओं में त्वरित कार्रवाई की जरूरतों और रणनीतिक नजरिए से सी-130जे को हिंडन के वायुसैनिक अड्डे में तैनात करने का फैसला किया है। इस कड़ी में वायुसेना हिंडन वायुसैनिक अड्डे को हर तरह के लड़ाकू और परिवहन विमानों के इस्तेमाल के लिए भी तैयार कर रही है।
पूर्वोत्तर मोर्चे पर पुख्ता तैयारी
उत्तर-पूर्व में सुरक्षा चुनौतियों पर लेखक की टिप्पणी...
अरुणाचल प्रदेश-तिब्बत सीमा पर विशेष चौकसी के लिए भारतीय सेना ने दो अतिरिक्त पर्वतीय डिवीजनें तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए यह बहुत महत्वपूर्ण कदम है। चीन के आक्रामक रुख और अरुणाचल प्रदेश पर उसके दावों के कारण यह कदम उठाना जरूरी हो गया था। इसके अलावा चीन के साथ म्यांमार की बढ़ती निकटता और वहां की अर्थव्यवस्था में चीनी निवेश भी इस फैसले का एक कारण हो सकता है। जो भी हो, इन पर्वतीय डिवीजनों का फैसला अत्यंत व्यावहारिक है और समूचे उत्तर-पूर्व की सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी भी। सामरिक लिहाज से यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है और नई दिल्ली इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती। इस बीच 20 नवंबर को भारत और चीन हिमालय सीमा के बारे में विवादों का सही और तर्कसंगत समाधान खोजने के लिए सहमत हो गए हैं। यह फैसला बीजिंग में चीनी स्टेट काउंसलर दाई बिंगो और भारतीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के बीच वार्ता के बाद लिया गया। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग लेई ने कहा कि चीन सीमा विवाद को भारत के साथ ईमानदार विचार-विमर्श से सुलझाने के लिए वचनबद्ध है और सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत के साथ मिलकर प्रयास करने का इच्छुक है। हमारे लिए एक बड़ा सवाल यह है कि क्या तिब्बत में चीन के बुनियादी ढांचे जैसा ढांचा हम अरुणाचल के भीतरी इलाकों में खड़ा कर पाएंगे। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो यह संभव है। सैनिकों को तमाम जरूरी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। उन्हें विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। जहां तक म्यांमार की बात है, इन दिनों यांगून के प्रति नई दिल्ली की सोच में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। पहले नई दिल्ली ने म्यांमार में पूरे जोश से लोकतंत्र की पैरवी की थी, जिससे जुंटा नाराज हो गई थी। नैतिक आधार पर यह रुख बदलती सामरिक जरूरतों से अलग था। लेकिन अब भारत अपनी सामरिक जरूरतों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। इसके दो कारण हैं: पहला, जुंटा को चीन की आर्थिक तथा सैन्य सहायता और दूसरा उत्तर-पूर्व के उग्रवादी संगठनों को म्यांमार में सुरक्षित पनाह मिलना। उदाहरण के लिए, उल्फा का केंद्रीय मुख्यालय म्यांमार में है। भारत म्यांमार में चीन के तेजी से बढ़ते प्रभाव को कम करना चाहता है और यह भी चाहता है कि वहां सक्रिय भारतीय उग्रवादी संगठनों के खिलाफ जुंटा कड़ी कार्रवाई करे। बांग्लादेश धीरे-धीरे भारत के करीब आता नजर आ रहा है। शेख हसीना सरकार ने बांग्लादेश की जमीन पर सक्रिय भारतीय उग्रवादी गुटों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शुरू की है। इस प्रकार, कट्टरपंथी जमीयत के समर्थन वाली खालिदा जिया सरकार की खुल्लमखुल्ला भारत-विरोधी नीतियों को उलट दिया गया है। इसका कोई संकेत नहीं है कि कुख्यात आइएसआइ ने अपनी आतंक की दुकान बंद कर दी है या नहीं। यह भारत के लिए चिंता की एक बड़ी बात है क्योंकि बांग्लादेश में आइएसआइ का एकमात्र उद्देश्य उत्तर-पूर्व से भारत को अस्थिर करना है। कोई नहीं जानता कि अगर ढाका में अगली बार खालिदा जिया सत्ता में आती हैं तो बांग्लादेश की विदेश नीति में किस प्रकार का परिवर्तन आएगा। चीन ने अरुणाचल प्रदेश में अपने आक्रामक अभियान को नहीं छोड़ा है और म्यांमार ने अपने क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव का स्वागत किया है। इन हालात से निपटने के लिए भारत को कूटनीतिक परिपक्वता दिखानी होगी। इसके लिए सशस्त्र सेनाओं को पूरी तरह सक्षम बनाना बेहद जरूरी है। इस लिहाज से असम के तेजपुर में उत्तर-पूर्व में भारतीय वायुसेना का पहला सुखोई बेस शुरू करना और चाबुआ मे ऐसा ही एक और केंद्र खोलने की प्रक्रिया शुभ संकेत है। राष्ट्र को सशस्त्र सेनाओं ने निराश नहीं किया है, लेकिन देश के राजनेताओ के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, January 28, 2011
चीनी घुसपैठियों की महिला मित्र पर बढ़ा संदेह
चीनी घुसपैठियों से दो दिन की पूछताछ के बाद खुफिया एजेंसियों का संदेह गिरफ्तार महिला ल्यु यांग पर बढ़ गया है। ल्युयांग ने जापान के एक विश्र्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए किया है। वह कई भाषाओं की जानकार है। इन भाषाओं को वह धारा प्रवाह बोल व समझ लेती है, लेकिन वह चीन में काम क्या कर रही है। इस बात की जानकारी खुफिया अधिकारी अभी तक हासिल नहीं कर सके हैं। गिरफ्तार चीनी घुसपैठियों में लिस्वो डांग व चेनरांग नेपाल में एक ऐसी चीनी कंपनी में काम कर रहे हैं जिसका मुख्यालय भारत में है। ल्यु यांग न तो इन दोनों की सहकर्मी है और न ही रिश्तेदार। ल्यु यांग से चेन रांग की मुलाकात शंघाई में हुई। मुलाकात कैसे हुई, इस बारे में वह जांच एजेंसियों को कुछ भी बताने के लिए तैयार नहीं है। गिरफ्तार चीनी नागरिकों को पुलिस रिमांड पर लेकर गोपनीय स्थान पर केंद्रीय खुफिया एजेंसियां गहन पूछताछ कर रही हैं। सूत्रों के मुताबिक खुफिया एजेंसियों को ल्यु यांग का आचरण शुरू से ही संदिग्ध नजर आता रहा है। उसके कार्य व्यवहार तथा पूछताछ के दौरान मिल रही जानकारी ने उस पर संदेह बढ़ा दिया है। सिर्फ चेनरांग से दोस्ती के आधार पर ल्यु यांग का नेपाल आना और फिर भारत में घुसना खुफिया एजेंसियों के गले नहीं उतर रहा है। इस बीच चीनी घुसपैठियों के पास से बरामद आयकर विभाग का पेनकार्ड फर्जी पाए जाने की चर्चा है। जिला पुलिस ने मामले की विवेचना रुपईडीहा थाना को सौंप रखी है। पिछले दिनों सीमा पर कैंपों की फोटोग्राफी करते समय एसएसबी के जवानों ने तीनों को धर-दबोचा था। चीन ने इनके जासूस होने की आशंका को खारिज करते हुए अपना नागरिक बताया था।
Wednesday, January 26, 2011
पाकिस्तान को अनदेखा न करें
सैन्य आधुनिकीकरण के मोरचे पर भारत की तुलना में पाकिस्तान आगे निकल रहा है। ऐसे में दोनों देशों के बीच के सैन्य संतुलन का अंतर भी कम रह गया है। दरअसल पाकिस्तान के सैन्य आधुनिकीकरण की प्रक्रिया चीन और अमेरिकी मदद पर केंद्रित है। इन देशों द्वारा पाकिस्तान को दिए गए हथियारों, विमानों, युद्धपोतों, घातक प्रक्षेपास्त्रों, गोला बारूद व अन्य रक्षा उपकरणों से उसकी सैन्य क्षमता बढ़ती जा रही है, जो भारत के लिए गहरी चिंता का विषय है। कुछ समय पूर्व भारतीय सेना के एक गोपनीय अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि पाकिस्तान व भारत के सैन्य संतुलन का अनुपात 1:1.3 रह गया है।
विगत दिसंबर में पाकिस्तान को अमेरिका से दो उन्नत एफ-16 लड़ाकू विमान प्राप्त हुए हैं। इससे पहले भी उसे 10 एफ-16 विमान प्राप्त हुए थे तथा छह और विमान उसे मिलने वाले हैं। ये विमान उसे आतंकवाद के खिलाफ जंग के लिए सहयोग के तौर पर मिल रहे हैं। इसमें लेजर गाइडेड बम किट, 12 टोही ड्रोन विमान एवं ऐसे उपकरण शामिल हैं, जो 1,000 पारंपरिक बमों को स्मार्ट बमों में तबदील कर देंगे। ये बम शत्रु के ठिकानों पर सटीक हमला करने में सक्षम हैं।
हथियारों की इस नई खेप से अगले वित्त वर्ष में पाकिस्तान को अमेरिकी सैन्य मदद 1.2 अरब डॉलर पहुंच जाएगी। इस साल यह मदद 70 करोड़ अमेरिकी डॉलर और पिछले साल 7.5 अरब डॉलर थी। हालांकि यह मदद उसे आतंकवाद से जंग के लिए दी जा रही है, लेकिन सर्वविदित है कि पाकिस्तान इसका उपयोग भारत के खिलाफ सैन्य तैयारियों में करता है।
पाकिस्तान ने अपनी हवाई सैन्य क्षमता में इजाफा करने के उद्देश्य से 2009 में चीन से जे-10 श्रेणी के 36 उन्नत लडा़कू जेट विमान खरीदने का 1.4 अरब डॉलर का समझौता किया था, जिसकी आपूर्ति शुरू होने वाली है। इस सौदे के समय यह भी तय हुआ था कि पाकिस्तान भविष्य में ऐसे और विमान खरीदेगा। इसके अलावा चीन के साथ मिलकर वह जेएफए-17 लड़ाकू विमान बना रहा है। अगले चार वर्षों में वह 250 जेएफ-17 विमान तैयार करेगा। पाकिस्तान को चीन पिछले तीन दशकों से विमानों की आपूर्ति कर रहा है। इस समय पाकिस्तानी सेना चीन निर्मित जेएफ-17, काराकोरम-8 जेट प्रशिक्षण विमान, एफ-7 सात पी.जी. व ए-56 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रही है। चीन के सहयोग से 1960 में इसलामाबाद में उड्डयन संयंत्र विकसित किया गया था, जहां अब टैंक, बख्तरबंद वाहनों एवं लड़ाकू विमानों की मरम्मत की जाती है।
पाकिस्तानी वायुसेना ने एयरबोर्न अर्ली वार्निंग ऐंड कंट्रोल एयरक्राफ्ट (अवाक्स) तकनीक से निर्मित पहला विमान आठ दिसंबर, 2009 को प्राप्त किया था। स्वीडन से भी वह ऐसे कुल तीन विमान खरीद रही है। इन विमानों से पाकिस्तानी वायुसेना अपनी सीमा में प्रवेश करने वाले सभी तरह के विमानों का पता लगा सकेगी और उसकी सैन्य निगरानी क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। स्वीडन की स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की सालाना रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि पाकिस्तान के पास 60 वॉरहेड्स हैं और बहुत कम समय में वह 100 परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि भारत के पास 60 से 70 वॉरहेड्स ही हैं। इस तरह पाकिस्तान परमाणु हथियारों के मामले में हमसे बढ़त हासिल कर चुका है।
अपनी नौसेना की ताकत बढ़ाने के लिए भी उसने अमेरिका से 6.5 करोड़ डॉलर में मैक्लनेरनी युद्धपोत खरीदा है, जिसमें पनडुब्बी को नष्ट करने की क्षमता है। उसने चीन से भी एफ-22 श्रेणी के चार युद्धपोत खरीदे हैं। इसके अलावा वह छह अत्याधुनिक परिवहन विमान सी-130 ई, समुद्री निगरानी के लिए पी-3 सी आरोयन विमान व एंटीशिप हारपून मिसाइलें तथा थलसेना को ताकतवर बनाने के लिए सेल्फ प्रोपेल्ड होवित्जर तोपों व एंटी टैंक मिसाइलों की खरीदारी अमेरिका से कर रहा है।
पाकिस्तान अपनी एटमी ताकत भी बढ़ा रहा है। अगर यही स्थिति रही, तो आने वाले दिनों में उसका सैन्य संतुलन भारत के बराबर होगा। गौरतलब है कि भारत से कमतर स्थिति में होने के बावजूद वह आक्रामक रवैया रखता है। ऐसे में भारत की तुलना में मजबूत स्थिति में होने पर उसकी आक्रामकता की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। क्या अब भी हम सजग होंगे?
Subscribe to:
Comments (Atom)