Sunday, January 30, 2011

पूर्वोत्तर मोर्चे पर पुख्ता तैयारी


उत्तर-पूर्व में सुरक्षा चुनौतियों पर लेखक की टिप्पणी...
अरुणाचल प्रदेश-तिब्बत सीमा पर विशेष चौकसी के लिए भारतीय सेना ने दो अतिरिक्त पर्वतीय डिवीजनें तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस क्षेत्र की संवेदनशीलता और सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए यह बहुत महत्वपूर्ण कदम है। चीन के आक्रामक रुख और अरुणाचल प्रदेश पर उसके दावों के कारण यह कदम उठाना जरूरी हो गया था। इसके अलावा चीन के साथ म्यांमार की बढ़ती निकटता और वहां की अर्थव्यवस्था में चीनी निवेश भी इस फैसले का एक कारण हो सकता है। जो भी हो, इन पर्वतीय डिवीजनों का फैसला अत्यंत व्यावहारिक है और समूचे उत्तर-पूर्व की सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी भी। सामरिक लिहाज से यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है और नई दिल्ली इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती। इस बीच 20 नवंबर को भारत और चीन हिमालय सीमा के बारे में विवादों का सही और तर्कसंगत समाधान खोजने के लिए सहमत हो गए हैं। यह फैसला बीजिंग में चीनी स्टेट काउंसलर दाई बिंगो और भारतीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के बीच वार्ता के बाद लिया गया। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता होंग लेई ने कहा कि चीन सीमा विवाद को भारत के साथ ईमानदार विचार-विमर्श से सुलझाने के लिए वचनबद्ध है और सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए भारत के साथ मिलकर प्रयास करने का इच्छुक है। हमारे लिए एक बड़ा सवाल यह है कि क्या तिब्बत में चीन के बुनियादी ढांचे जैसा ढांचा हम अरुणाचल के भीतरी इलाकों में खड़ा कर पाएंगे। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो यह संभव है। सैनिकों को तमाम जरूरी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। उन्हें विपरीत परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। जहां तक म्यांमार की बात है, इन दिनों यांगून के प्रति नई दिल्ली की सोच में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। पहले नई दिल्ली ने म्यांमार में पूरे जोश से लोकतंत्र की पैरवी की थी, जिससे जुंटा नाराज हो गई थी। नैतिक आधार पर यह रुख बदलती सामरिक जरूरतों से अलग था। लेकिन अब भारत अपनी सामरिक जरूरतों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। इसके दो कारण हैं: पहला, जुंटा को चीन की आर्थिक तथा सैन्य सहायता और दूसरा उत्तर-पूर्व के उग्रवादी संगठनों को म्यांमार में सुरक्षित पनाह मिलना। उदाहरण के लिए, उल्फा का केंद्रीय मुख्यालय म्यांमार में है। भारत म्यांमार में चीन के तेजी से बढ़ते प्रभाव को कम करना चाहता है और यह भी चाहता है कि वहां सक्रिय भारतीय उग्रवादी संगठनों के खिलाफ जुंटा कड़ी कार्रवाई करे। बांग्लादेश धीरे-धीरे भारत के करीब आता नजर आ रहा है। शेख हसीना सरकार ने बांग्लादेश की जमीन पर सक्रिय भारतीय उग्रवादी गुटों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई शुरू की है। इस प्रकार, कट्टरपंथी जमीयत के समर्थन वाली खालिदा जिया सरकार की खुल्लमखुल्ला भारत-विरोधी नीतियों को उलट दिया गया है। इसका कोई संकेत नहीं है कि कुख्यात आइएसआइ ने अपनी आतंक की दुकान बंद कर दी है या नहीं। यह भारत के लिए चिंता की एक बड़ी बात है क्योंकि बांग्लादेश में आइएसआइ का एकमात्र उद्देश्य उत्तर-पूर्व से भारत को अस्थिर करना है। कोई नहीं जानता कि अगर ढाका में अगली बार खालिदा जिया सत्ता में आती हैं तो बांग्लादेश की विदेश नीति में किस प्रकार का परिवर्तन आएगा। चीन ने अरुणाचल प्रदेश में अपने आक्रामक अभियान को नहीं छोड़ा है और म्यांमार ने अपने क्षेत्र में बढ़ते चीनी प्रभाव का स्वागत किया है। इन हालात से निपटने के लिए भारत को कूटनीतिक परिपक्वता दिखानी होगी। इसके लिए सशस्त्र सेनाओं को पूरी तरह सक्षम बनाना बेहद जरूरी है। इस लिहाज से असम के तेजपुर में उत्तर-पूर्व में भारतीय वायुसेना का पहला सुखोई बेस शुरू करना और चाबुआ मे ऐसा ही एक और केंद्र खोलने की प्रक्रिया शुभ संकेत है। राष्ट्र को सशस्त्र सेनाओं ने निराश नहीं किया है, लेकिन देश के राजनेताओ के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


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