Monday, January 10, 2011

सेना की सद्भावना

भारतीय सेना की सराहनीय भूमिका पर लेखक की टिप्पणी……
उग्रवाद-प्रभावित उत्तरपूर्व में लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने में भारतीय सेना की भूमिका सराहनीय रही है और एक गतिशील लोकतंत्र में यह भूमिका सेना की जिम्मेदारियों के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती है। दुश्मन विदेशी ताकतों की मदद से इस क्षेत्र में उग्रवादी तत्व सक्रिय हैं और उग्रवाद-विरोधी अभियानों की रहनुमाई के लिए लाई गई सेना के सामने स्वयंभू मानवाधिकार समूहों के रूप में कई रुकावटें हैं। आम तौर से ये समूह विभिन्न भूमिगत संगठनों के प्रतिनिधि समूह हैं, लेकिन, सेना के जवानों ने अपनी छवि को धूमिल न होने देने का ध्यान रखा है। उदाहरण के लिए, आपरेशन सद्भावना भारतीय सेना की एक शानदार नागरिक पहल है, जिससे सेना की सामाजिक जिम्मेदारियों का अंदाजा लगता है। इस कार्यक्रम के तहत सेना गांवों में लोगों तक जाती है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में उनकी मदद करती है। इस कार्यक्रम का सबसे उल्लेखनीय पक्ष शिक्षा के क्षेत्र में इसका योगदान है। ऑपरेशन सद्भावना के परिणामस्वरूप कई कॉलेजों में नई लाइब्रेरियां और जिम दिखाई देने लगे हैं। यह तो एक खास मामला है। लेकिन आम तौर से, आपदा की संभावनाओं वाले उत्तरपूर्व में, खास तौर पर असम में, हर साल आने वाली बाढ़ के दौरान सेना आपदा प्रबंधन के काम में सबसे आगे होती है। अगर ऐसी स्थितियों से कारगर ढंग से निपटने के लिए सेना तैयार न हो, तो पता नहीं असम में कितने बड़े पैमाने पर विनाश हो। स्थानीय लोगों ने भीषण प्राकृतिक आपदाओं से उन्हें उबारने में सेना के प्रयासों की सदैव सराहना की है। राहत और बचाव कार्यों में मदद के लिए सेना को विशेष रूप से बुलाए जाने से ही सशस्त्र बलों की प्रभावशीलता और सरकार तथा लोगों के उनके प्रति विश्वास का अंदाजा होता है। उत्तरपूर्व के उग्रवाद-प्रभावित इलाकों में नागरिकों के साथ व्यवहार का सेना का रिकॉर्ड बहुत ही लोकतांत्रिक स्वरूप का है, क्योंकि वह सशस्त्र सेना विशेषाधिकार अधिनियम या एएफएसपीए के खिलाफ मचने वाले शोर का ध्यान रखने के साथ ही यह भी सुनिश्चित करती है कि उग्रवादी संगठनों के विरुद्ध चलाए जाने वाले अभियान उन तक ही सीमित रहें। इसकी चपेट में निर्दोष नागरिक न आएं। उत्तरपूर्व में उग्रवाद-विरोधी ऑपरेशनों की पेचीदगियां देखते हुए अगर इस देश में सशस्त्र सेनाएं लोकतंत्र के प्रति समर्पित न होतीं, तो पता नहीं कितना बड़ा दूसरा नुकसान होता। जो लोग, सशस्त्र सेनाओं पर एएफएसपीए के प्रावधानों का गलत फायदा उठाने का आरोप लगाते हैं, वे यह बात भूल जाते हैं कि ये मददगार प्रावधान हैं और जहां तक संभव होता है ध्यान रखा जाता है कि गंभीर उकसावे के बावजूद इनका दुरुपयोग न होने पाए। भारतीय सेना की पूर्वी कमान को उत्तरपूर्व की राजनीतिक पेचीदगियों का पूरा-पूरा अहसास है और उसने उग्रवादियों से आतंकवादी बने लोगों के लिए मशहूर इस क्षेत्र में नागरिकों की अपेक्षाओं के बारे में सैनिकों को संवदेनशील बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, लेकिन फिर भी कुछ इलाकों में तथाकथित उग्रवाद के लिए हमदर्दी मौजूद है। इस लिहाज से सेना की भूमिका की सराहना करनी होगी कि इस दुष्प्रचार के बावजूद कि सेना, उपनिवेशवादी नई दिल्ली का एक औजार है, वह लोगों का साथ दे रही है। उत्साहव‌र्द्धक बात यह है कि कुछ दिनों से उत्तरपूर्व में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो सेना की छवि को खराब करने की निहित स्वार्थों की कोशिशों के बावजूद, सेना के जन-समर्थक प्रयासों की सराहना कर रहे हैं। इससे सेना-जनता के संबंधों में मजबूती लाने में भारी मदद मिल सकती है। इससे हमारा लोकतंत्र भी मजबूत होगा। सेना इस महान मिशन के प्रति पूरी तरह से समर्पित है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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