Saturday, January 1, 2011

मौत के आंकड़े लाता रहा पूरा साल

अयोध्या विवाद पर जब लगभग 60 वर्ष से रुका हुआ फैसला 30 सितंबर 2010 को आया और तनाव के बावजूद पूरे देश में अमन चैन कायम रहा तो सुरक्षा से संबंधित कुछ आशाएं अवश्य बंधी थीं, लेकिन दिसंबर 2010 को जब अयोध्या की पृष्ठभूमि में ही आतंकियों ने बनारस के घाट पर बम विस्फोट किया तो यकीन हो गया कि देश की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति आज भी वैसी नहीं है, जैसी होनी चाहिए। यही वजह है कि इस पूरे साल जहां कश्मीर सुलगता रहा, वहीं माओवादी जगह-जगह पर सुरक्षाकर्मियों को अपना निशाना बनाते रहे। गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी भाषियों के विरुद्ध जहर के साथ गोलियां भी उगली जाती रहीं और हिंदी पट्टी में प्रतिष्ठा के नाम पर अभिभावक या बिरादरी के लोग क्रूरता का खेल खेलते रहे और जवां दिलों के दुश्मन बने रहे। कुल मिलाकर स्थिति यह रही कि अखबार की सुर्खियां मौत के आंकड़े देती रहीं और आम आदमी केंद्र से लेकर राज्य सरकारों की ओर टकटकी लगाए देखता रहा कि वह कब आंतरिक सुरक्षा की अपनी जिम्मेदारियां निभाएंगी। माओवादियों ने 2010 के शुरू होते ही अपनी बंदूकों से बारूद उगलना शुरू कर दिया था, जो पूरे साल बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की वन पट्टी में जारी रहा। फरवरी 2010 के दूसरे सप्ताह में माओवादियों ने ऑपरेशन ग्रीन हंट के विरोध में पश्चिमी मिदनापुर में 24 सुरक्षाकर्मियों की हत्या की और बिहार में 12 ग्रामीणों को मारा। नक्सली हिंसा से तंग आकर केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने माओवादियों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि अगर वे 72 घंटे तक हिंसा बंद कर दें तो केंद्र उनसे बातचीत करने के लिए तैयार हो जाएगा। इसके जवाब में माओवादियों के प्रमुख कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने कहा कि वे 72 घंटे की बजाय 72 दिन तक युद्ध विराम को तैयार हैं और वार्ता भी करेंगे, लेकिन न वार्ता हुई और न ही नक्सली हिंसा पर विराम लगा। हालांकि माओवादियों ने विख्यात लेखिका अरुंधति राय, तृणमूल कांग्रेस के विद्रोही सांसद कबीर सुमन और मध्य प्रदेश के पूर्व ब्यूरोक्रेट बीडी शर्मा को अपने और केंद्र सरकार के बीच मध्यस्थ बनाने का भी प्रयास किया। नक्सल समस्या से निपटने में केंद्र सरकार लगभग लाचार नजर आई और शायद यही वजह है कि उसने 15 फरवरी 2010 को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यह समस्या इतनी गंभीर है कि पुलिस और अ‌र्द्धसैनिक बलों का हर जवान अपने सिर पर कफन बांधकर चलता है। इसी साल दंतेवाड़ा में तो माओवादियों ने 76 सुरक्षाकर्मियों की भी हत्या की। अपने जबरदस्त ढांचे के चलते माओवादियों ने देश के कुल 625 जिलों में से 224 में अपना दबदबा कायम किया हुआ है। पुलिस के अनुसार उनके गढ़ में कोई सड़क सुरक्षित नहीं है। नक्सली खतरा इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि माओवादियों ने असम और मणिपुर में अपने पैर फैलाने के लिए जिला करबी अंगलोंग में सक्रिय यूपीडीएस और उत्तरी कछार में सक्रिय डीएचडी (दीमा हालम  दओगा) जैसे आतंकी संगठनों से हाथ मिला लिया है। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों की वजह से स्थितियां बद से बदतर होती रहीं। अप्रैल से लेकर जुलाई तक घाटी से पथराव, गोलीबारी, आगजनी, कफ्र्यू व बंद की ही खबरें आती रहीं। ऐसा लगा जैसे राज्य में सरकार नाम की कोई चीज ही न हो और कश्मीर फिर उसी काले दौर में लौट रहा हो, जो 1990 और 2002 के बीच था। दरअसल, चौतरफा नाकामियों से कश्मीर नासूर बनता जा रहा है। कश्मीर में हिंसा पर काबू पाना जितना जरूरी है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि भारत विरोधी भावनाओं को शांत किया जाए और विश्वास का जो अभाव है, उसे दूर किया जाए। हालांकि आज भूमंडलीकरण का दौर है और रोजगार व कारोबार के लिए सीमाएं अपना महत्व खोती जा रही हैं, लेकिन अपने देश में ऐसे लोगों या दलों की कमी नहीं है, जो निहित राजनीतिक स्वार्थो के लिए भाषा या क्षेत्रवाद की संकीर्णता का आज भी सहारा ले रहे हैं। यही कारण है कि जहां महाराष्ट्र में राज ठाकरे हिंदी भाषियों के विरुद्ध इस साल भी जहर उगलते रहे, वहीं असम में तो नवंबर को 19 हिंदी भाषियों की हत्या आतंकी संगठन एनडीएफबी ने की। आंतरिक सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि भाषायी व क्षेत्रीय संकीर्णता के अस्वीकार्य माहौल पर विराम लगाया जाए और यह तभी मुमकिन है, जब राज ठाकरे जैसे लोगों की विभाजक राजनीति पर लगाम लगाने की ईमानदाराना कोशिश की जाए।

No comments:

Post a Comment