Monday, February 28, 2011

बड़े सैन्य सौदों की आस में बढ़ा रक्षा बजट


 रक्षा सेनाओं को आधुनिक बनाने की तेज रफ्तार कवायदों और रक्षा मंत्रालय के खर्च रिकार्ड में हुए सुधार के बीच वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने देश के रक्षा बजट में 11 फीसदी से अधिक का इजाफा किया है। साल 2011-12 के लिए पेश आम बजट में रक्षा खर्च के नाम पर 2010-11 में घोषित एक लाख 47 हजार 344 करोड़ रुपये के मुकाबले इस बार एक लाख 64 हजार 415 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वहीं रक्षा खरीद की जरूरतों को पूरा करने के लिए बजट में रिकार्ड 69,199 करोड़ रुपये भी दिए गए हैं। रक्षा मंत्रालय के पूंजीगत बजट में हुई करीब 12 फीसदी की बढ़ोतरी कई बड़े सैन्य सौदों पर गति तेज होने का इशारा करता है। गत वर्ष की तुलना में पूंजीगत खर्च के लिए इस बार रिकार्ड नौ हजार करोड़ रुपये से अधिक आवंटित किए गए हैं। हालांकि, भारत के आसपास सुरक्षा हालात और आधुनिकीकरण की जरूरतों के मद्देनजर रक्षा बजट को सकल घरेलू उत्पाद की 2.5 फीसदी से अधिक ले जाने की मांग काफी समय से उठ रही है। उल्लेखनीय है कि रक्षा मंत्रालय को इसी साल 126 लड़ाकों विमानों के सौदे को भी फाइनल करना है। इसके अलावा तोप, मिसाइल, पनडुब्बी समेत कई सैन्य साजो-सामन के सौदे भी पाइपलाइन में है। यही वजह भी है कि पूंजीगत बजट में सबसे बड़े हिस्सा वायुसेना को दिया गया है। वायुसेना को एअरक्राफ्ट और इंजन के लिए 22 हजार करोड़ समेत 29 हजार 721 हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं। इस मद में सेना को 18 हजार 988 और नौसेना को 13 हजार 728 करोड़ रुपये दिए हैं। अगले वित्त वर्ष के लिए तटरक्षक बल को आधुनिक बनाने के लिए उसके खाते में बीते साल की तुलना में करीब 8 करोड़ रुपये अधिक दिए गए हैं। लोकसभा में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री मुखर्जी ने भरोसा दिलाया कि देश ही हिफाजत के लिए आवश्यक हर जरूरत को पूरा किया जाएगा। रक्षा जानकारों के मुताबिक सैन्य खर्च के रिकार्ड में बीते कुछ वर्षो में आई बेहतरी एक अच्छा संकेत है। रक्षा विशेषज्ञ सी. उदय भाष्कर के मुताबिक बीते वित्त वर्ष के बजट आवंटन और संशोधित बजट के आंकड़ों को देखें तो यह साफ हो जाता है कि रक्षा मंत्रालय ने सौ फीसदी से अधिक खर्च किया है। ऐसे में जरूरी है कि इस क्षमता को बनाए रखा जाए। बीत कुछ वर्षो में रक्षा मंत्रालय ने अपने बजट आवंटन खर्च का रिकार्ड काफी सुधारा है। मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 1998 से 2004 के बीच रक्षा मंत्रालय बजट आवंटन का करीब 20 फीसदी धन खर्च नहीं कर पाता था|

Monday, February 21, 2011

नक्सलवाद और बिचौलियों का राग


बाजारवाद का एक कुत्सित, लेकिन कामयाब फार्मूला यह है कि पहले दर्द तैयार करो फिर उसकी दवा बेचने भी निकल पड़ो। बात चाहे चिकित्सा के क्षेत्र की हो या कंप्यूटर तकनीक की, पहले वायरस फैलाओ फिर एंटी-वायरस का पैकेज खरीदने को मजबूर करो। नक्सल परिप्रेक्ष्य में लोगों का अपहरण किए जाने और फिर उनकी रिहाई के लिए उनके बिचौलियों द्वारा मोल-तोल किए जाने को भी इसी संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है। अपने पांच जवानों की रिहाई के बाद छत्तीसगढ़ अभी जरूर फौरी तौर पर कुछ राहत महसूस कर रहा हो, लेकिन प्रदेश, देश और लोकतंत्र के लिए नक्सल मुक्ति की राहें अभी काफी लंबी हैं। इस लंबी दूरी को तय करने में, लोकतंत्र के परिंदे को निर्बाध उड़ने में अभी काफी तन्मयता से वक्त लगाने की दरकार कायम है। इस मामले में छत्तीसगढ़ फतह के बाद स्वामी अग्निवेश जैसे पेशेवर मध्यस्थों का अगला निशाना बना है उड़ीसा। जहां के मलकानगिरि के जिलाधिकारी आरवी कृष्णा के अगवा किए जाने के बाद अब वहां भी इनकी पूछ-परख बढ़ गई है। विगत 25 जनवरी को नक्सलियों ने नारायणपुर से छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) के सदस्य रघुनंदन ध्रुव, रामाधार पटेल, टी एक्का, रंजन दुबे एवं मणिशंकर को अगवा कर लिया था। काफी जद्दोजहद के बाद अंतत: इन जवानों को वापस घर तक पहुंचाने में राज्य शासन को सफलता मिली। पूरे अठारह दिन तक चले इस प्रकरण में जवानों के परिवार वाले किस स्थिति से गुजरे होंगे, यह कल्पना की जा सकती है। खैर, इस रिहाई के बाद जहां स्वामी अग्निवेश समेत सभी समर्थकों द्वारा नक्सलियों की दरियादिली की जमकर तारीफ की गई, वहीं इस प्रायोजित मौके का लाभ उठाकर ऐसा प्रचारित किया गया कि नक्सली तो सहृदय हैं। शायद शासन ही उनकी कथित सहृदयता का लाभ नहीं उठा पा रहा है। आप कल्पना करें कि कोई व्यक्ति या संगठन अगर किसी का अपहरण कर ले और काफी दिनों के बाद उसे छोड़ भी दे तो क्या इससे वह सहृदय हो जाता है? क्या रिहा करने के बाद उसका अपराध खत्म हो जाता है। कोई सहृदय जमात क्या इस तरह लोगों के परिवार को सांसत में रखती है? निश्चित ही जिनके भी प्रयासों से उन जवानों की रिहाई हुई हो, वे सभी साधुवाद के पात्र हैं। लेकिन अगर मध्यस्थों तक पल-पल की खबर पहुंच रही थी, काफी दूर रहते हुए भी अगर उनका संपर्क जीवंत था और एक लंबी जद्दोजहद के बाद अगर जवानों को छोड़ा गया और जैसा कि पुराना अनुभव भी रहा है, उसके आधार पर अग्निवेश समेत सभी मध्यस्थों को पाक-साफ तो नहीं ठहराया जा सकता। रिहाई के बाद के कथित सद्भावनापूर्ण माहौल के अगले ही दिन जहां प्रदेश के दूसरे इलाके अंबिकापुर में नक्सलियों द्वारा जमकर उत्पात मचा, मारपीट करते हुए दर्जनों मशीनों को आग लगाकर राख कर दिया गया, वहीं इस अपहरण के प्रकरण के दौरान ही उड़ीसा-झारखंड सीमा पर एक महिला नक्सली होमगार्ड की उसके तीन साल के बेटे शिव समेत बेदर्दी से गला रेत कर हत्या कर दी। महिला की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने नक्सलवाद से नाता तोड़ लिया था। इस तरह की वारदातों की लंबी सूची रहते कोई पूर्वाग्रही ही नक्सलियों को सहृदय कह सकता है। जहां तक शासन का सवाल है तो जाहिर है कि किसी भी राज्य के लिए अपने नागरिकों की प्राण रक्षा से बढ़कर कोई प्राथमिकता नहीं हो सकती। उसके जीवन की रक्षा के निमित्त तात्कालिक या दीर्घकालिक जो भी निर्णय लेने पड़ें, वह स्वागतयोग्य होने चाहिए। जरूरत पड़ने पर लचीला रुख अपनाना भी उसके लिए उचित है, लेकिन रिहाई के बाद इसे बातचीत के लिए उपयुक्त अवसर के रूप में देखना सरासर माओवादियों के बिछाए जाल में फंसना साबित होगा। मध्यस्थों के बातचीत पर जोर देने का मतलब भी यही समझा जाना चाहिए कि दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही अपहरण की कारवाई को अंजाम दिया जाता है। जाहिर है सरकार के चौतरफा दबाव के कारण नक्सली बस्तर के इलाकों में कमजोर पड़े हैं। विशेषज्ञ यह बेहतर जानते हैं और खासकर उनके नीतिगत दस्तावेजों में भी यह दर्ज है कि जब भी वे कमजोर पड़ते हैं तो यह बातचीत या युद्धविराम की पेशकश, खुद को ताकतवर बनाने और दुश्मन को असावधान करने के लिए करते हैं। हालांकि एक लोकतांत्रिक समाज में किसी भी स्तर पर बातचीत से किसी भी सरकार या संस्था को क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन रणनीति के तहत इस तरह की पेशकश करने वाले समूहों की गतिविधियों पर पैनी नजर सतत बनाकर रखने, इनके जाल में किसी भी तरह से नहीं फंसने, सतत सावधान रहने की जरूरत तो है ही। क्रूरतम वारदातों को अंजाम देते हुए गुरिल्ला वार को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानने वाले समूहों ने अगर सीधे तौर पर अपने हृदय परिवर्तन का संदेश देना चाहा है तो आंख मूंदकर इन पर बिलकुल ही भरोसा नहीं किया जा सकता है। नक्सलियों से संवाद के पक्षधर और उनके पैरोकार अग्निवेश जैसे लोग जब यह तर्क देते हैं कि जब हर तरह के आतंकी समूहों को बातचीत की टेबल तक लाया जा सकता है तो आखिर नक्सलियों को क्यों नहीं? तो उनसे यह दो टूक पूछे जाने की जरूरत है कि वे केवल यह बता दें कि आखिर नक्सलियों की मांग क्या है? आखिर उनका सीधा मकसद क्या है? आप जिस भी आतंकी समूह को देखें, उन सभी का कुछ मकसद होता है। लेकिन सिर खपा देने के बावजूद आप इस सीधे सवाल का जबाब नहीं पा सकते हैं कि माओवादी क्यों गरीब आदिवासियों के बीच कहर बरपा रहे हैं? कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और नक्सली प्रवक्ता के बीच एक अखबार के माध्यम से लंबा विमर्श चला था। हर तरह की विद्वता के प्रदर्शन के बाद भी इस छोटे से सवालों का जबाब नहीं तलाशा गया कि छत्तीसगढ़ समेत देश के अन्य हिस्सों के नक्सल आंदोलन का आखिर लक्ष्य क्या है? आप कभी इनके दस्तावेजों पर गौर करेंगे तो कुछ अमूर्त-सी चीजों से आपका साबका पडे़गा। जैसे, शोषण विरुद्ध समाज, जनताना सरकार की स्थापना, वर्ग संघर्ष, संसदीय प्रणाली के प्रति अनास्था आदि-आदि तो अगर बात केवल छत्तीसगढ़ या किसी सूबाई सरकार की करें तो क्या यह किसी मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में है कि राज्य में संसदीय प्रणाली रहे या नहीं, इस पर बातचीत करें? यों तो देश में लोकतंत्र के औचित्य पर विमर्श करना किसी के भी अधिकार क्षेत्र में नहीं है, लेकिन चूंकि केंद्र ने भी माओवादी गतिविधियों को देश की आंतरिक सुरक्षा पर पैदा हुई सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखा है तो किसी भी तरह की बातचीत या उसके लिए माहौल तैयार करने की पहल केंद्र के द्वारा ही किए जाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के अपहरण प्रकरण के दौरान बातचीत के अलावा हालिया दोषी साबित हुए विनायक प्रकरण पर भी बिना नाम लिए काफी बातें हुई। ऐसा संदेश देने की बेजा कोशिश की गई कि शायद सरकार उस मुकदमे पर भी फिर से विचार करेगी तो इस संबंध में भी तथ्य यही है कि निचली अदालत से दोष सिद्ध होने पर न्यायालय के अलावा किसी भी संस्था खासकर राज्य को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं रह जाता। सूचीबद्ध एवं दोषसिद्ध हुए आरोपों पर फैसला करने का अधिकार केवल ऊपरी अदालत का ही रह जाता है, जिसने इस मामले में देश के बड़े वकीलों द्वारा बचाव मे रखे गए पक्ष के बावजूद फिलहाल जमानत देना मुनासिब नहीं समझा है। तथ्य तो यह है कि अभियोजन पक्ष द्वारा चाहकर किसी मामले को वापस नहीं लिया जा सकता। यह तथ्य हाल ही में आरुषी मामले में पुन: साबित हुआ है, जब सीबीआइ द्वारा पेश क्लोजर रिपोर्ट भी न्यायालय ने मानने से सीधा इनकार करते हुए मुकदमे को चलाए रखने का आदेश दिया। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह संदेह पैदा होने के तमाम कारण हैं कि हाल में कुछ कानूनी और जमीनी मात खाने के बाद नक्सली समूह और उन्हें वैचारिक आधार प्रदान करने वाले तत्वों द्वारा इस तरह की कारवाई हर स्तर पर बेजा दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही की जा रही है। बात चाहे अपहरण कांड की हो या पूरी दुनिया में देश की न्याय प्रणाली को ही कठघरे में खड़ा करने की, हर स्तर पर छुपे हुए नक्सली जी-जान से आदिवासी क्षेत्रों को शतरंज की बिसात बना शह और मात का खेल जारी रखे हुए हैं। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ हर तरह के दबाव से मुक्त होकर शासन अगर न्यायिक से लेकर जमीनी स्तर तक अपने सभी प्रयासों को कायम रखे, तब ही निकट भविष्य में इस समस्या से पार पाया जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Sunday, February 20, 2011

अंधेरे में भी देख सकेगा नया अजरुन टैंक


टैंक के नए संस्करण मार्क-2 का उत्पादन 2014 से होगा

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एक इकाई संग्राम वाहन अनुसंधान तथा विकास स्थापना (सीवीआरडीई), चेन्नई द्वारा अभिकल्पित एवं विकसित अजरुन टैंक के नए संस्करण मार्क-2 का उत्पादन वर्ष 2014 से शुरू करने की योजना पर रक्षा वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। पूरी संभावना है कि नए वर्जन के प्रथम चरण का परीक्षण इस साल जून तक,फिर दूसरा परीक्षण अगले साल तक हो सकेगा। इस मेन बैटिल टैंक (एमबीटी) का नया संस्करण ज्यादा मारक, ज्यादा स्वदेशी तथा रात के अंधेरे में भी देख सकने की क्षमता से युक्त होगा। रक्षा सूत्रों ने बताया कि अजरुन टैंक का जो वर्तमान संस्करण (मार्क-1) है उसमें जर्मन इंजन लगा है, लेकिन नए मार्क-2 वर्जन में भारतीय इंजन प्रयुक्त किया जाएगा। कहना न होगा कि नया अजरुन टैंक पहले से ज्यादा यानि कि तकरीबन 90 फीसद स्वदेशी होगा। अजरुन टैंक मार्क-2 में कुछ खास तब्दीलियां की जा रही हैं। प्रमुखत: मिसाइल फायरिंग क्षमता को और ताकतवर बनाया जा रहा है। यह एडवांस विस्फोटक रियेक्टिव आर्मर और बेहतरीन नाइट विजन उपकरण से भी लैस होगा। इसका गेयर बाक्स उच्चीकृत किया जाएगा, जो कि टैंक के संचालन को और सुचारु कर सकेगा। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि अजरुन टैंक मार्क-2 के प्रथम चरण का परीक्षण इस साल जून तक करने की तैयारी की जा रही है। दूसरे चरण का परीक्षण अगले साल की शुरुआत में हो सकेगा। इन दोनों चरणों के परीक्षण के दौरान सेना भी साथ रहेगी। दोनों परीक्षणों में कामयाब होने के बाद इनका उत्पादन 2014 से शुरू कर दिया जाएगा। माना जा रहा है कि अजरुन का नया संस्करण पहले से काफी हल्का भी होगा। मुख्य युद्धक टैंक अजरुन के लिए 25 मई 2009 का दिन मील का पत्थर साबित हुआ था, जब इस दिन भारी वाहन फैक्टरी, अवाड़ी में आयोजित समारोह में 16 अजरुन टैंकों को सेना को हस्तांतरित किया गया। इससे सेना में अजरुन टैंक के प्रथम रेजीमेंट की स्थापना का शुभारंभ हुआ। यह सेना द्वारा 124 टैंकों के लिए दिए गए आर्डर के निमित्त सप्लाई की शुरुआत थी। बाद में 17 मई 2010 को 124 अजरुन टैंकोें (मार्क-1) के नए आर्डर जारी किए, जो कि पहले से जारी इतने ही टैंकों (124) के अतिरिक्त हैं। इस तरह सेना के पास अजरुन टैंक (मार्क- 1) के दो रेजिमेंट होंगे। डीआरडीओ द्वारा स्वदेशी अजरुन टैंकों के विकास का काम वर्ष 1990 से शुरू किया गया था, जो कि 2000 तक चला। तकनीकी खामियों और नाकामियों से इस प्रोजेक्ट में काफी विलंब हुआ था और इसमें तकरीबन 80 सुधार किए गए।

Friday, February 18, 2011

अमेरिकी प्रस्ताव भारत ने किया नामंजूर


नौसेना हेलीकॉप्टर सौदे की खुली निविदा जारी होगीनई दिल्ली (एजेंसियां)। भ्ाारत ने 16 बहुपयोगी हेलीकॉप्टरों (एमआरएच) की आपूर्ति अमेरिका के विदेशी सैन्य सौदा माध्यम से करने के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया और अरबों डॉलर के इस सौदे के लिए खुली निविदा जारी करने का फैसला किया है।
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि अमेरिकी नौसेना ने नौसेना की 16 एमआरएच की जरूरतों को पूरा करने के लिए एमएच-60 ‘रोमियोअंतर सरकारी समझौते के तहत देने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उसे नामंजूर कर दिया गया।
विदेशी सैन्य सौदा (एफएमएस) के तहत खरीद अंतर-सरकारी समझौते के अनुसार होती है जहां बिना किसी वैश्विक निविदा जारी किए अमेरिकी सरकार सीधे उत्पाद देने का प्रस्ताव देती है। सूत्रों ने बताया कि सरकार के फैसले के बाद केवल दो कंपनियां मैदान में बचती हैं। एक अमेरिकी एस-70 ब्रावो और दूसरी यूरोपीय एनएच-90 जिनके उत्पादों का परीक्षण इस साल मार्च के बाद शुरू किया जाएगा। अपने पुराने पड़ते सीकिंग बेड़े को हटाने के लिए नौसेना को एमआरएच की तत्काल जरूरत है। सीकिंग को 1970 में शामिल किया गया था। इस बेड़े में 40 सी किंग हेलीकाप्टर थे लेकिन दुर्घटनाओं के बाद इनकी संख्या 30 रह गई है। बहुपयोगी हेलीकॉप्टर (एमआरएच) की प्राथमिक भूमिका पनडुब्बी रोधी और सतह रोधी युद्ध को अंजाम देने की होगी जबकि उसकी दूसरी भूमिका तलाशी और बचाव, मालवाहक और आपात निकासी की होगी। 16 एमआरएच के लिए आरंभिक आरएफपी 2006 के शुरूआत में जारी की गई थी लेकिन दो साल बाद निविदाओं को रद्द कर दिया गया था। बाद में सितंबर 2008 में उसे दोबारा जारी किया गया। निविदा के मुताबिक, ठेका पाने वाली कंपनी को 46 महीनों के भीतर तीन चरणों में पहले एमआरएच की आपूर्ति करनी होगी। मौजूदा ठेका पूरा हो जाने के बाद नौसेना के पास 44 अन्य हेलीकॉटरों का आर्डर देने का विकल्प होगा। अनुबंध में प्रावधान है कि ठेका पाने वाली कंपनी को ठेके की 30 फीसदी राशि भारतीय रक्षा उधोग में निवेश करनी होगी।


चीनी सेना का आधुनिकीकरण खतरनाक!


चीन की सेना के आधुनिकीकरण पर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए रक्षा मंत्री एके एंटनी ने बुधवार को कहा कि भारत को अपनी रक्षा तैयारियों की व्यापक समीक्षा करने की जरूरत है। एंटनी ने कहा कि भारत को अपनी सुरक्षा चुनौतियों से निपटने में चौकस रहने की भी जरूरत है। एंटनी ने एशियाई सुरक्षा सम्मेलन के इतर संवाददाताओं से कहा कि चीन की सशस्त्र सेना का आधुनिकीकरण और उसका बढ़ता सैन्य खर्च गंभीर चिंता का विषय है, लेकिन हम अनावश्यक रूप से चिंतित नहीं हैं क्योंकि अब हमें भी अपने सशस्त्र बलों को आधुनिक और मजबूत करने की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि हमें अपनी क्षमताओं और बुनियादी सुविधाओं को और मजबूत करना होगा और हम ऐसा कर रहे हैं। सरकार भी सीमावर्ती क्षेत्रों में सशस्त्र बलों को और आधुनिक करने के साथ बुनियादी सुविधाओं को और मजबूत कर रही है। चीन ने जब से भारत के साथ अपनी सीमा पर मिसाइल तैनात करना और अपनी सैन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना शुरू किया है, तब से भारत ने भी वहां अपनी सड़क और हवाई क्षेत्र की बुनियादी सुविधाओं में सुधार लाना शुरू कर दिया है। भारत सु-30 एमकेआई विशेष विमानों के चार दस्ते खरीदने की प्रक्रिया में है और सेना की दो माउंटेन डिवीजन स्थापित कर रहा है। मंत्री ने कहा कि सशस्त्र बलों की क्षमताओं की समीक्षा एक जारी और सतत प्रक्रिया है और रक्षा तैयारियों को नियमित तौर पर देखा जा रहा है और यदि कोई खामी पाई जाती है तो उसे खत्म किया जाएगा। जब एंटनी से पूछा गया कि क्या भारतीय सैन्य आधुनिकीकरण चीन की तुलना में धीमी गति से चल रहा है तो उन्होंने कहा कि हम अपने सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण किसी अन्य देश के आधुनिकीकरण को दिमाग में रखकर नहीं कर रहे। हम हमारे आसपास उत्पन्न सुरक्षा परिदृश्य की व्यापक समीक्षा के आधार पर अपने बलों का आधुनिकीकरण कर रहे हैं। भारत, अमेरिका और जापान के बीच त्रिपक्षीय मालाबार अभ्यास को लेकर चीन की आपत्ति की खबरों पर रक्षा मंत्री ने कहा कि मालाबार अभ्यास 15 साल पहले शुरू हुआ था और हम इसे हर साल करते हैं। इसमें किसी देश विशेष के खिलाफ कुछ नहीं है। यह हमारी नौसेना की क्षमताओं को बढ़ाने के लिए है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के दो सबसे बड़े देशों के तौर पर भारत और चीन को जलवायु परिवर्तन और व्यापार जैसे समान मुद्दों पर सहयोग का स्तर बढ़ाने की जरूरत है।


अगली पीढ़ी की पनडुब्बी के लिए तैयार नौसेना


इस वर्ष 50 हजार करोड़ के पनडुब्बी टेंडर जारी किए जाएंगे
नौसेना इस वर्ष के अंत तक 50 हजार करोड़ रुपए मूल्य के अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के लिए वैश्विक स्तर पर टेंडर आमंत्रित करेगी। नौसेना प्रमुख एडमिरल निर्मल वर्मा ने पनडुब्बी विषय पर आयोजित एक सेमिनार से इतर संवाददाताओं को बताया- ‘‘सरकार ने प्रोजेक्ट 75 इंडियाको मंजूरी प्रदान कर दी है जो छह पनडुब्बियों की अगली खेप है। इस समय हम रिक्वेस्ट फोर इनफोरमेशन (आरएफआई) प्रक्रि या को अपना रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि इस वर्ष के भीतर हम टेंडर जारी करने में सक्षम होंगे।’’ प्रोजेक्ट 75 इंडिया स्कोर्पीन पनडुब्बी परियोजना का अगला चरण है जिनमें से छह पनडुब्बियों का निर्माण मझगांव डाकयार्ड लिमिटेड (एमडीएल) द्वारा किया जा रहा है। इसके लिए फ्रांसीसी कंपनी डीसीएनएस के साथ 20 करोड़ रुपए का करार हुआ है। पनडुब्बियों की घटती संख्या के कारण नौसेना अगले 10-12 साल में 12 से अधिक पनडुब्बियां शामिल करने पर विचार कर रही है। मुंबई में स्कोर्पीन पनडुब्बी के निर्माण में देरी के मद्देनजर इन योजनाओं को झटका लगा है। भावी पनडुब्बियों की क्षमताओं के बारे में नौसेना प्रमुख ने कहा-‘‘यह इस दृष्टि से अलग होगा कि हम गुणात्मक जरूरतों को ध्यान में रख कर चल रहे हैं। बेहतर सेंसरों के साथ इसमें उच्च स्तर की डिटेक्शन रेंज तथा काम्बेट मैनेजमेंट सिस्टम होगा।’’
नौसेना प्रमख ने कहा कि पनडुब्बियों के लिए वह एयर इंडिपेंडेंट प्रोप्लशन (एआईपी) पण्राली को अपनाएंगे जो पानी के भीतर अधिक समय तक उनकी क्षमता को बढ़ाएगी। पनडुब्बियों में अगली पीढ़ी की हथियार पण्राली के बारे में वर्मा ने कहा कि नौसेना मिसाइल के साथ ही आधुनिक तारपीडो के इस्तेमाल की योजना बना रही है जिन्हें स्कोर्पीन पनडुब्बियों पर तैनात किया जा रहा है। श्रीलंकाई नौसेना द्वारा भारतीय मछुआरों को निशाना बनाए जाने के संदर्भ में उनकी सुरक्षा संबंधी सवाल पर नौसेना प्रमुख ने कहा- ‘‘श्रीलंका के राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान भी यह मुद्दा उठा था। इसका समाधान संयुक्त कार्य समूह द्वारा किए जाने की संभावना है और यही इसे सुलझाने का रास्ता है।’’
अमेरिका और जापान की नौसेनाओं के साथ भारत के आगामी अभ्यासों के बारे में चीन द्वारा चिंता जताए जाने के बारे में उन्होंने किसी प्रकार की जानकारी होने से इनकार किया। उन्होंने कहा-‘‘आपको यह बात ध्यान में रखनी होगी कि ये अभ्यास पहली बार नहीं हो रहे हैं। ऐसी किसी चिंता की मुझे जानकारी नहीं है।’’ सालाना ट्रोपेक्स अभ्यास के बारे में एडमिरल ने कहा कि सेना और वायुसेना के अलावा नौसेना पहली बार इस अभ्यास में शामिल होगी।

Monday, February 14, 2011

जल्द ही एके 47 से लैस होगी रेलवे पुलिस


माओवादियों और आतंकवादियों के खतरे के मद्देनजर रेलवे अपने सुरक्षाकर्मियों के लिए 6,000 एके 47 राइफलों के अलावा बुलेट प्रूफ जैकेट और हेलमेट जैसे महत्वपूर्ण साजो सामान खरीद रही है, ताकि ट्रेनों और स्टेशनों की हिफाजत की जा सके। रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि हम बुल्गारिया से 6,000 पूर्ण स्वचालित एके 47 राइफल खरीदने की प्रक्रिया में हैं। इस खरीदारी के लिए गृहमंत्रालय को रकम की अदायगी की जा रही है। एके 47 राइफल के साथ बुलेट प्रूफ जैकेट, हेलमेट और वाकीटॉकी रेलवे पुलिस बल के विशेष कर्मियों को मुहैया किए जाएंगे, जो लग्जरी ट्रेनों और संवेदनशील स्टेशनों की हिफाजत करेंगे। रेलवे माओवाद की समस्या के अलावा पैलेस ऑन व्हील, डेक्कन क्वीन, महाराजा एक्सप्रेस जैसी अपनी लग्जरी ट्रेनों पर आतंकवादी हमले के खतरे का सामना कर रही है। इन ट्रेनों में ज्यादातर विदेशी पर्यटक सफर करते हैं। अधिकारी ने बताया कि चूंकि इन लग्जरी ट्रेनों के ज्यादातर यात्री विदेशी होते हैं, इसलिए उनके साथ होने वाली कोई अप्रिय घटना पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचती है। इन ट्रेनों की हिफाजत के लिए राज्य सरकारों के साथ हमें एक मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करनी होगी। जम्मू और कश्मीर जैसे आतंकवाद प्रभावित इलाकों, माओवाद प्रभावित इलाकों और पूर्वोत्तर क्षेत्र में रेलवे पुलिस बल के जवानों को एके 47 राइफलों से लैस किया जाएगा। अधिकारी ने बताया कि एके 47 राइफलों से न सिर्फ मनोबल बढ़ेगा बल्कि रेलवे के सुरक्षाकर्मियों की क्षमता में भी बढ़ोतरी होगी। सरकार रेलवे पुलिस बल, बीएसएफ, सीआरपीएफ के लिए 20,000 एके 47 राइफलें खरीद रही है। यह खरीदारी वैश्विक स्तर पर एक निविदा प्रक्रिया के जरिए की जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि हथियारों की आपूर्ति से पहले यहां का एक दल बुल्गारिया गया था। रेलवे समंवित सुरक्षा प्रणाली के तहत 200 स्टेशनों के लिए सीसीटीवी, दरवाजानुमा मेटल डिटेक्टर, सामान जांच प्रणाली और हाथ में पकड़े जाने वाले मेटल डिटेक्टर खरीद रही है। संवेदनशील स्टेशनों पर सुरक्षा भी बढ़ाई जा रही है।


दंतेवाड़ा के दंश से बाहर निकली सीआरपीएफ


केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने पिछले साल के दंतेवाड़ा कांड को भुला कर नक्सल विरोधी अभियान को नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया है। इसके मुताबिक राज्यों में तैनात केंद्रीय बलों को नक्सलियों के खिलाफ अभियान पर निकलने से पहले दिल्ली में बैठे अपने अफसरों से इजाजत नहीं लेनी होगी। बल्कि ऐसे अभियान की सारी बारीकियां वे राज्य पुलिस बल के साथ स्थानीय स्तर पर ही तय कर सकेंगे। पिछले साल अप्रैल में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के हमले के दौरान 76 जवानों के मारे जाने के बाद सीआरपीएफ ने हर बार ऐसे अभियान पर निकलने से पहले केंद्रीय कार्यालय से इजाजत को जरूरी कर दिया था। तब माना गया था कि इसका मकसद दरअसल यह तय करना है कि केंद्रीय बल बिना राज्य पुलिस की अच्छी साझेदारी के अपने स्तर पर ऐसे किसी अभियान पर नहीं निकलें। मगर सीआरपीएफ ने नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात अपनी सभी बटालियनों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को यह साफ कर दिया है कि इस तरह के अभियानों के बाबत फैसले लेने के लिए वे पहले की तरह स्वतंत्र हैं। यानी राज्य पुलिस के एसपी और केंद्रीय बल के कमांडेंट अपने स्तर पर तात्कालिक रणनीति तय कर सकते हैं। सीआरपीएफ ने नक्सल क्षेत्र में कार्यरत अपने कर्मियों के लिए तय एसओपी (काम करने की मानक प्रक्रिया) में अब भी यह साफ तौर पर कहा है कि इन्हें ऐसे किसी भी अभियान पर जाने से पहले यह अच्छी तरह तय कर लेना चाहिए कि इसमें राज्य पुलिस की पर्याप्त साझेदारी हो। ऐसा स्थानीय स्थितियों, लोगों और इलाकों के बारे में पुलिस की बेहतर समझ की वजह से जरूरी बताया गया है। माना जाता है कि सीआरपीएफ के नए मुखिया विजय कुमार पिछले साल में पद संभालने के बाद से ही उन नियमों को बदलना चाहते थे। दंतेवाड़ा में हुए सीआरपीएफ के अब तक के सबसे बड़े नुकसान के बाद उन्हें भी कुछ समय तक इस मामले में इंतजार करने की सलाह दी गई थी। प्रधानमंत्री ने इस महीने की पहली तारीख को ही मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में नक्सलियों के खिलाफ साझा अभियान तेज करने की जरूरत बताई थी। राज्य सरकारें इन नियमों को साझा अभियान की राह में रोड़ा मान रही थीं।