आज अरब देशों में उथल-पुथल मची है। सत्ता परिवर्तन की लहर दौड़ रही है। मिस्र में होस्नी मुबारक का तख्ता कब पलट जाए, कुछ ठिकाना नहीं। यमन, सीरिया और जॉर्डन में भी असंतोष है। इन देशों में अगर जनता के असंतोष के कारणों का विश्लेषण किया जाए तो मुख्य रूप से चार बातें उभरकर सामने आती हैं-बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता और एक परिवार की तानाशाही हुकूमत। सवाल यह उठता है कि क्या ऐसा भारत में भी हो सकता है? सच तो यह है कि उपरोक्त चार में से तीन कारण भारत में भी मौजूद हैं। सबसे बड़ा फर्क यह है कि हमारे देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है और लोगों के पास अपनी नाराजगी व्यक्त करने के अनेक माध्यम हैं। प्रेस स्वतंत्र है, जो जब तब सरकार को आड़े हाथों लेती रहती है। स्टिंग ऑपरेशन द्वारा लोगों की पोल खोलती रहती है। न्यायपालिका भी अपनी तरफ से सरकार पर अंकुश लगाती रहती है। हर पांच वर्ष बाद चुनाव होते हैं, इसमें जनता को सरकार बदलने का मौका मिलता है। ये सब सेफ्टी वॉल्व का काम करते हैं। काइरो जैसे प्रदर्शन भारत में होने की संभावना फिलहाल नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सरकार हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाए। देश के एक बहुत बड़े वर्ग में व्यवस्था के प्रति असंतोष है, आक्रोश है। यही कारण है कि आज नक्सल आंदोलन देश के 200 से भी अधिक जनपदों में फैल चुका है और उसका हर वर्ष विस्तार होता जा रहा है। सरकार अपनी तरफ से आर्थिक विकास की योजनाएं चलाती रहती है, परंतु उनका लाभ सबसे गरीब तबकों को नहीं मिल रहा है। मनरेगा के तहत एक लाख बारह हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं परंतु इसका कितना रुपया अधिकारियों, ठेकेदारों और बिचौलियों के जेब में गया, कुछ ठिकाना नहीं। एक तरफ अरबपतियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, दूसरी तरफ गरीबी रेखा के नीचे देश की करीब 50 प्रतिशत आबादी जी रही है। आर्थिक असमानता एक भयावह स्थिति तक पहुंच रही हैं। भ्रष्टाचार के बारे में जितना भी लिखा जाए कम है। ऐसा लगता है कि सभी विभाग के लोग देश की संपत्ति लूटने में लगे हैं। इतिहास में नादिरशाह और तैमूर द्वारा दिल्ली की लूट का वर्णन मिलता है। इन विदेशियों ने तो कुछ ही दिनों तक लूट मचाई और उसके बाद खजाना लेकर चले गए। आज तो जो पार्टी कुर्सी पर बैठती है उसके कर्णधार शायद यह समझते हैं कि उन्हें अगले पांच वर्ष तक लूटने का लाइसेंस मिल गया। हर प्रदेश में कमोबेश यही हाल है। भयंकर भ्रष्टाचार के दृष्टांत उजागर होते हैं, दबाव पड़ता है तो दिखावे के लिए कुछ कार्रवाई हो जाती है। राष्ट्रमंडल भ्रष्टाचार पर सरकार अभी भी पैर घसीट रही है। स्पेक्ट्रम घोटाले में बड़ी मशक्कत के बाद ए. राजा को किसी तरह गिरफ्तार किया गया। इन सब कार्रवाइयों में भी इतना विलंब हुआ है कि दोषी व्यक्तियों को अपने विरुद्ध सुबूत मिटाने का भरपूर अवसर मिल गया। विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में बराबर हल्ला मच रहा है। भारत में इतना काला धन है कि इससे सारे देश में अगले 150 वर्ष तक प्राथमिक शिक्षा का खर्च वहन किया जा सकता है। जिन लोगों का पैसा है उनका नाम उजागर करने में और पैसा देश में वापस लाने में सरकार को केवल दिक्कतें ही दिखाई पड़ती हैं, जबकि अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन अपना बहुत-सा काला धन विदेशों से लाने में सफल हो चुके हैं। हसन अली के बारे में कहा जाता है कि उस पर 50 हजार करोड़ रुपये का टैक्स बकाया है। न तो हसन अली से यह रुपया वसूला जाता है और न ही उसे गिरफ्तार किया जाता है, आखिर क्यों? कुछ वर्ष पहले मैंने भारत सरकार और बाद में उत्तर प्रदेश सरकार को भ्रष्टतम अधिकारियों की सूची दी थी। मैंने लिखा था कि कई अधिकारी ऐसे हैं जिनके पास 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति है। उस समय मुझे लगा था कि कहीं मैंने ज्यादा तो नहीं लिख दिया। हाल ही में मध्य प्रदेश में एक आइएएस दंपति पकड़े गए जिनके पास 300 करोड़ से भी ज्यादा की संपत्ति मिली। क्या नेता क्या अधिकारी,
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