Monday, February 14, 2011

दंतेवाड़ा के दंश से बाहर निकली सीआरपीएफ


केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने पिछले साल के दंतेवाड़ा कांड को भुला कर नक्सल विरोधी अभियान को नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया है। इसके मुताबिक राज्यों में तैनात केंद्रीय बलों को नक्सलियों के खिलाफ अभियान पर निकलने से पहले दिल्ली में बैठे अपने अफसरों से इजाजत नहीं लेनी होगी। बल्कि ऐसे अभियान की सारी बारीकियां वे राज्य पुलिस बल के साथ स्थानीय स्तर पर ही तय कर सकेंगे। पिछले साल अप्रैल में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के हमले के दौरान 76 जवानों के मारे जाने के बाद सीआरपीएफ ने हर बार ऐसे अभियान पर निकलने से पहले केंद्रीय कार्यालय से इजाजत को जरूरी कर दिया था। तब माना गया था कि इसका मकसद दरअसल यह तय करना है कि केंद्रीय बल बिना राज्य पुलिस की अच्छी साझेदारी के अपने स्तर पर ऐसे किसी अभियान पर नहीं निकलें। मगर सीआरपीएफ ने नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात अपनी सभी बटालियनों की कमान संभाल रहे अधिकारियों को यह साफ कर दिया है कि इस तरह के अभियानों के बाबत फैसले लेने के लिए वे पहले की तरह स्वतंत्र हैं। यानी राज्य पुलिस के एसपी और केंद्रीय बल के कमांडेंट अपने स्तर पर तात्कालिक रणनीति तय कर सकते हैं। सीआरपीएफ ने नक्सल क्षेत्र में कार्यरत अपने कर्मियों के लिए तय एसओपी (काम करने की मानक प्रक्रिया) में अब भी यह साफ तौर पर कहा है कि इन्हें ऐसे किसी भी अभियान पर जाने से पहले यह अच्छी तरह तय कर लेना चाहिए कि इसमें राज्य पुलिस की पर्याप्त साझेदारी हो। ऐसा स्थानीय स्थितियों, लोगों और इलाकों के बारे में पुलिस की बेहतर समझ की वजह से जरूरी बताया गया है। माना जाता है कि सीआरपीएफ के नए मुखिया विजय कुमार पिछले साल में पद संभालने के बाद से ही उन नियमों को बदलना चाहते थे। दंतेवाड़ा में हुए सीआरपीएफ के अब तक के सबसे बड़े नुकसान के बाद उन्हें भी कुछ समय तक इस मामले में इंतजार करने की सलाह दी गई थी। प्रधानमंत्री ने इस महीने की पहली तारीख को ही मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में नक्सलियों के खिलाफ साझा अभियान तेज करने की जरूरत बताई थी। राज्य सरकारें इन नियमों को साझा अभियान की राह में रोड़ा मान रही थीं।


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