Thursday, February 10, 2011

सेना की कानूनी व्यवस्था के पेच


देश के जनमानस में पवित्र नदी गंगा और भारतीय सेना की पवित्रता इस प्रकार समाई हुई है कि उनके बारे में प्रदूषण व भ्रष्टाचार जैसे शब्दों को सुनकर बहुत पीड़ा होती है, जिसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। आम भारतीय सोचते हैं कि उनके सब पापों को धोने की क्षमता गंगा में है। उसी प्रकार हम यह भी सोचते हैं कि बाहरी आक्रमण, प्राकृतिक आपदा या कानून-व्यवस्था में व्यवधान आने पर सेना हमारी सुरक्षा करेगी। परंतु एक के बाद एक सामने आ रहे घोटाले सेना की इस छवि को कलंकित कर रहे हैं। इससे हमारे सैनिकों के मनोबल पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
सेना में एक कहावत मशहूर है, ‘जब परिस्थितियां बहुत मुश्किल हो, तब मजबूत लोग ही उसे संभाल सकते हैं।सेना को ऐसे ही मजबूत लोगों की दरकार है। हाल ही में सेना में पहली बार एक तीन सितारा लेफ्टिनेंट जनरल पी के रथ को दोषी ठहराया गया तथा उन्हें सजा भी सुनाई गई। इससे उम्मीद बंधी है कि हमारी सेना अपना खोया गौरव पुन: प्राप्त कर सकेगी। परंतु यह सोचने की बात है कि जनरल रथ ने सुकना की कीमती जमीन, जिसकी कीमत 350 करोड़ रुपये आंकी गई है, बगैर रक्षा मंत्रालय की अनुमति के कैसे एक निजी संस्था के नाम कर दी? सेना ने उनकी वरिष्ठता में सिर्फ दो वर्ष की कमी और 15 साल की पेंशन में वरिष्ठता में कमी करने का फैसला किया है। इतने बड़े घोटाले के लिए मुकर्रर की गई यह सजा क्या पर्याप्त है? इस सजा का प्रभाव केवल इतना होगा कि ज्यादा से ज्यादा उनके पेंशन में एक से दो हजार रुपये कम होंगे।
सेना में सैनिक संपदा विभाग है, जो सेना की भू-संपदा की देखभाल सीधे रक्षा मंत्रालय की देखरेख में करता है। इसमें किसी अधिकारी को कोई निर्णय लेने का अधिकार ही नहीं है। दरअसल इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए हमें सेना की कानून प्रणाली को समझना होगा। सेना में आपराधिक मामलों की जांच करने, उनका संज्ञान लेने तथा उस पर फैसला देने का अधिकार सेना के कानून से तय होता है। केवल हत्या और दुष्कर्म के मामलों में सिविल पुलिस की मदद ली जाती है। सवाल यह है कि बदलते दौर में सेना के अधिकारी विशेषज्ञ किस्म का यह काम करने में क्या सक्षम हैं? क्या इस सबके लिए उनके पास पूरे संसाधन हैं? असलियत में ऐसा नहीं हो पाता, इसलिए बहुत सारे अपराध सेना में कभी खुल ही नहीं पाते।
हमने सेना का कानून अक्षरश: अंगरेजों से लिया है तथा 1947 से आज तक इसका आधुनिकीकरण नहीं हुआ है। जबकि ब्रिटेन में यह कानून बदला जा चुका है। इस कारण यहां कभी-कभी छोटे अपराधों में अपराधी को ज्यादा सजा हो जाती है और कभी निर्दोष व्यक्ति अकारण लंबी शारीरिक यातनाओं से गुजरता है। अभी तक देश कुख्यात सांबा जासूसी कांड को नहीं भूला है, जिसने बीती सदी के सत्तर के दशक में देश में भूचाल ला दिया था। उस प्रकरण में करीब 25 लोगों को लंबी सजाएं तथा शारीरिक यातनाओं से गुजरना पड़ा था। प्रभावित अधिकारियों और जवानों की पत्नियों द्वारा जगजीवन राम की कोठी के सामने भूख हड़ताल करने के बाद ही उन्हें कानूनी मदद मिल पाई थी।
ब्रिटेन में सिविल कोर्ट से एक सेवारत लॉर्ड कोर्ट मार्शल की बेंच पर बैठता है। परंतु हमारी सैन्य अदालतों में ऐसा नहीं हैं। यहां सैन्य अदालतों का गठन सेना के अधिकारी ही करते हैं। ब्रिटेन में लॉर्ड इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाता है, जिस कारण अपराध की जांच भी ठीक प्रकार से होती है तथा उसका संज्ञान भी लिया जाता है, क्योंकि उनको भय रहता है कि सुनवाई में सिविल कोर्ट का लॉर्ड इन खामियों को पकड़ लेगा। दूसरी ओर, हमारे यहां कई ऐसे उदाहरण हैं, जब बड़े घोटालों में लिप्त या महिलाकर्मियों से छेड़छाड़ करने वाले सैन्य अधिकारियों को एक दिन भी जेल में नहीं रहना पड़ा।
कानून साक्ष्यों के आधार पर सजा देता है। देखने में आया है कि कानूनी ज्ञान के अभाव में सेना के अधिकारी कोर्ट ऑफ इनकॉयरी स्तर पर उचित साक्ष्य नहीं जुटा पाते। ऐसे समय जब हमारे तीन-तीन पूर्व सेनाध्यक्षों पर विभिन्न मामलों में शक किया जा रहा है, क्या हमारी सेना की न्यायिक व्यवस्था पूरा न्याय कर पाएगी? सेना को गंगा की तरह पवित्र बनाने के लिए जरूरी है कि उसके कानून में बदलाव हो, ताकिअपराधी सजा पा सकें। वरना आदर्श सोसाइटी या सुकना घोटालों की पुनरावृत्ति को रोका नहीं जा सकेगा।

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