टैंक के नए संस्करण मार्क-2 का उत्पादन 2014 से होगा
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एक इकाई संग्राम वाहन अनुसंधान तथा विकास स्थापना (सीवीआरडीई), चेन्नई द्वारा अभिकल्पित एवं विकसित अजरुन टैंक के नए संस्करण मार्क-2 का उत्पादन वर्ष 2014 से शुरू करने की योजना पर रक्षा वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। पूरी संभावना है कि नए वर्जन के प्रथम चरण का परीक्षण इस साल जून तक,फिर दूसरा परीक्षण अगले साल तक हो सकेगा। इस मेन बैटिल टैंक (एमबीटी) का नया संस्करण ज्यादा मारक, ज्यादा स्वदेशी तथा रात के अंधेरे में भी देख सकने की क्षमता से युक्त होगा। रक्षा सूत्रों ने बताया कि अजरुन टैंक का जो वर्तमान संस्करण (मार्क-1) है उसमें जर्मन इंजन लगा है, लेकिन नए मार्क-2 वर्जन में भारतीय इंजन प्रयुक्त किया जाएगा। कहना न होगा कि नया अजरुन टैंक पहले से ज्यादा यानि कि तकरीबन 90 फीसद स्वदेशी होगा। अजरुन टैंक मार्क-2 में कुछ खास तब्दीलियां की जा रही हैं। प्रमुखत: मिसाइल फायरिंग क्षमता को और ताकतवर बनाया जा रहा है। यह एडवांस विस्फोटक रियेक्टिव आर्मर और बेहतरीन नाइट विजन उपकरण से भी लैस होगा। इसका गेयर बाक्स उच्चीकृत किया जाएगा, जो कि टैंक के संचालन को और सुचारु कर सकेगा। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि अजरुन टैंक मार्क-2 के प्रथम चरण का परीक्षण इस साल जून तक करने की तैयारी की जा रही है। दूसरे चरण का परीक्षण अगले साल की शुरुआत में हो सकेगा। इन दोनों चरणों के परीक्षण के दौरान सेना भी साथ रहेगी। दोनों परीक्षणों में कामयाब होने के बाद इनका उत्पादन 2014 से शुरू कर दिया जाएगा। माना जा रहा है कि अजरुन का नया संस्करण पहले से काफी हल्का भी होगा। मुख्य युद्धक टैंक अजरुन के लिए 25 मई 2009 का दिन मील का पत्थर साबित हुआ था, जब इस दिन भारी वाहन फैक्टरी, अवाड़ी में आयोजित समारोह में 16 अजरुन टैंकों को सेना को हस्तांतरित किया गया। इससे सेना में अजरुन टैंक के प्रथम रेजीमेंट की स्थापना का शुभारंभ हुआ। यह सेना द्वारा 124 टैंकों के लिए दिए गए आर्डर के निमित्त सप्लाई की शुरुआत थी। बाद में 17 मई 2010 को 124 अजरुन टैंकोें (मार्क-1) के नए आर्डर जारी किए, जो कि पहले से जारी इतने ही टैंकों (124) के अतिरिक्त हैं। इस तरह सेना के पास अजरुन टैंक (मार्क- 1) के दो रेजिमेंट होंगे। डीआरडीओ द्वारा स्वदेशी अजरुन टैंकों के विकास का काम वर्ष 1990 से शुरू किया गया था, जो कि 2000 तक चला। तकनीकी खामियों और नाकामियों से इस प्रोजेक्ट में काफी विलंब हुआ था और इसमें तकरीबन 80 सुधार किए गए।
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