बाजारवाद का एक कुत्सित, लेकिन कामयाब फार्मूला यह है कि पहले दर्द तैयार करो फिर उसकी दवा बेचने भी निकल पड़ो। बात चाहे चिकित्सा के क्षेत्र की हो या कंप्यूटर तकनीक की, पहले वायरस फैलाओ फिर एंटी-वायरस का पैकेज खरीदने को मजबूर करो। नक्सल परिप्रेक्ष्य में लोगों का अपहरण किए जाने और फिर उनकी रिहाई के लिए उनके बिचौलियों द्वारा मोल-तोल किए जाने को भी इसी संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है। अपने पांच जवानों की रिहाई के बाद छत्तीसगढ़ अभी जरूर फौरी तौर पर कुछ राहत महसूस कर रहा हो, लेकिन प्रदेश, देश और लोकतंत्र के लिए नक्सल मुक्ति की राहें अभी काफी लंबी हैं। इस लंबी दूरी को तय करने में, लोकतंत्र के परिंदे को निर्बाध उड़ने में अभी काफी तन्मयता से वक्त लगाने की दरकार कायम है। इस मामले में छत्तीसगढ़ फतह के बाद स्वामी अग्निवेश जैसे पेशेवर मध्यस्थों का अगला निशाना बना है उड़ीसा। जहां के मलकानगिरि के जिलाधिकारी आरवी कृष्णा के अगवा किए जाने के बाद अब वहां भी इनकी पूछ-परख बढ़ गई है। विगत 25 जनवरी को नक्सलियों ने नारायणपुर से छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल (सीएएफ) के सदस्य रघुनंदन ध्रुव, रामाधार पटेल, टी एक्का, रंजन दुबे एवं मणिशंकर को अगवा कर लिया था। काफी जद्दोजहद के बाद अंतत: इन जवानों को वापस घर तक पहुंचाने में राज्य शासन को सफलता मिली। पूरे अठारह दिन तक चले इस प्रकरण में जवानों के परिवार वाले किस स्थिति से गुजरे होंगे, यह कल्पना की जा सकती है। खैर, इस रिहाई के बाद जहां स्वामी अग्निवेश समेत सभी समर्थकों द्वारा नक्सलियों की दरियादिली की जमकर तारीफ की गई, वहीं इस प्रायोजित मौके का लाभ उठाकर ऐसा प्रचारित किया गया कि नक्सली तो सहृदय हैं। शायद शासन ही उनकी कथित सहृदयता का लाभ नहीं उठा पा रहा है। आप कल्पना करें कि कोई व्यक्ति या संगठन अगर किसी का अपहरण कर ले और काफी दिनों के बाद उसे छोड़ भी दे तो क्या इससे वह सहृदय हो जाता है? क्या रिहा करने के बाद उसका अपराध खत्म हो जाता है। कोई सहृदय जमात क्या इस तरह लोगों के परिवार को सांसत में रखती है? निश्चित ही जिनके भी प्रयासों से उन जवानों की रिहाई हुई हो, वे सभी साधुवाद के पात्र हैं। लेकिन अगर मध्यस्थों तक पल-पल की खबर पहुंच रही थी, काफी दूर रहते हुए भी अगर उनका संपर्क जीवंत था और एक लंबी जद्दोजहद के बाद अगर जवानों को छोड़ा गया और जैसा कि पुराना अनुभव भी रहा है, उसके आधार पर अग्निवेश समेत सभी मध्यस्थों को पाक-साफ तो नहीं ठहराया जा सकता। रिहाई के बाद के कथित सद्भावनापूर्ण माहौल के अगले ही दिन जहां प्रदेश के दूसरे इलाके अंबिकापुर में नक्सलियों द्वारा जमकर उत्पात मचा, मारपीट करते हुए दर्जनों मशीनों को आग लगाकर राख कर दिया गया, वहीं इस अपहरण के प्रकरण के दौरान ही उड़ीसा-झारखंड सीमा पर एक महिला नक्सली होमगार्ड की उसके तीन साल के बेटे शिव समेत बेदर्दी से गला रेत कर हत्या कर दी। महिला की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने नक्सलवाद से नाता तोड़ लिया था। इस तरह की वारदातों की लंबी सूची रहते कोई पूर्वाग्रही ही नक्सलियों को सहृदय कह सकता है। जहां तक शासन का सवाल है तो जाहिर है कि किसी भी राज्य के लिए अपने नागरिकों की प्राण रक्षा से बढ़कर कोई प्राथमिकता नहीं हो सकती। उसके जीवन की रक्षा के निमित्त तात्कालिक या दीर्घकालिक जो भी निर्णय लेने पड़ें, वह स्वागतयोग्य होने चाहिए। जरूरत पड़ने पर लचीला रुख अपनाना भी उसके लिए उचित है, लेकिन रिहाई के बाद इसे बातचीत के लिए उपयुक्त अवसर के रूप में देखना सरासर माओवादियों के बिछाए जाल में फंसना साबित होगा। मध्यस्थों के बातचीत पर जोर देने का मतलब भी यही समझा जाना चाहिए कि दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही अपहरण की कारवाई को अंजाम दिया जाता है। जाहिर है सरकार के चौतरफा दबाव के कारण नक्सली बस्तर के इलाकों में कमजोर पड़े हैं। विशेषज्ञ यह बेहतर जानते हैं और खासकर उनके नीतिगत दस्तावेजों में भी यह दर्ज है कि जब भी वे कमजोर पड़ते हैं तो यह बातचीत या युद्धविराम की पेशकश, खुद को ताकतवर बनाने और दुश्मन को असावधान करने के लिए करते हैं। हालांकि एक लोकतांत्रिक समाज में किसी भी स्तर पर बातचीत से किसी भी सरकार या संस्था को क्या आपत्ति हो सकती है? लेकिन रणनीति के तहत इस तरह की पेशकश करने वाले समूहों की गतिविधियों पर पैनी नजर सतत बनाकर रखने, इनके जाल में किसी भी तरह से नहीं फंसने, सतत सावधान रहने की जरूरत तो है ही। क्रूरतम वारदातों को अंजाम देते हुए गुरिल्ला वार को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानने वाले समूहों ने अगर सीधे तौर पर अपने हृदय परिवर्तन का संदेश देना चाहा है तो आंख मूंदकर इन पर बिलकुल ही भरोसा नहीं किया जा सकता है। नक्सलियों से संवाद के पक्षधर और उनके पैरोकार अग्निवेश जैसे लोग जब यह तर्क देते हैं कि जब हर तरह के आतंकी समूहों को बातचीत की टेबल तक लाया जा सकता है तो आखिर नक्सलियों को क्यों नहीं? तो उनसे यह दो टूक पूछे जाने की जरूरत है कि वे केवल यह बता दें कि आखिर नक्सलियों की मांग क्या है? आखिर उनका सीधा मकसद क्या है? आप जिस भी आतंकी समूह को देखें, उन सभी का कुछ मकसद होता है। लेकिन सिर खपा देने के बावजूद आप इस सीधे सवाल का जबाब नहीं पा सकते हैं कि माओवादी क्यों गरीब आदिवासियों के बीच कहर बरपा रहे हैं? कुछ साल पहले छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक और नक्सली प्रवक्ता के बीच एक अखबार के माध्यम से लंबा विमर्श चला था। हर तरह की विद्वता के प्रदर्शन के बाद भी इस छोटे से सवालों का जबाब नहीं तलाशा गया कि छत्तीसगढ़ समेत देश के अन्य हिस्सों के नक्सल आंदोलन का आखिर लक्ष्य क्या है? आप कभी इनके दस्तावेजों पर गौर करेंगे तो कुछ अमूर्त-सी चीजों से आपका साबका पडे़गा। जैसे, शोषण विरुद्ध समाज, जनताना सरकार की स्थापना, वर्ग संघर्ष, संसदीय प्रणाली के प्रति अनास्था आदि-आदि तो अगर बात केवल छत्तीसगढ़ या किसी सूबाई सरकार की करें तो क्या यह किसी मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में है कि राज्य में संसदीय प्रणाली रहे या नहीं, इस पर बातचीत करें? यों तो देश में लोकतंत्र के औचित्य पर विमर्श करना किसी के भी अधिकार क्षेत्र में नहीं है, लेकिन चूंकि केंद्र ने भी माओवादी गतिविधियों को देश की आंतरिक सुरक्षा पर पैदा हुई सबसे बड़ी चुनौती के रूप में देखा है तो किसी भी तरह की बातचीत या उसके लिए माहौल तैयार करने की पहल केंद्र के द्वारा ही किए जाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के अपहरण प्रकरण के दौरान बातचीत के अलावा हालिया दोषी साबित हुए विनायक प्रकरण पर भी बिना नाम लिए काफी बातें हुई। ऐसा संदेश देने की बेजा कोशिश की गई कि शायद सरकार उस मुकदमे पर भी फिर से विचार करेगी तो इस संबंध में भी तथ्य यही है कि निचली अदालत से दोष सिद्ध होने पर न्यायालय के अलावा किसी भी संस्था खासकर राज्य को उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं रह जाता। सूचीबद्ध एवं दोषसिद्ध हुए आरोपों पर फैसला करने का अधिकार केवल ऊपरी अदालत का ही रह जाता है, जिसने इस मामले में देश के बड़े वकीलों द्वारा बचाव मे रखे गए पक्ष के बावजूद फिलहाल जमानत देना मुनासिब नहीं समझा है। तथ्य तो यह है कि अभियोजन पक्ष द्वारा चाहकर किसी मामले को वापस नहीं लिया जा सकता। यह तथ्य हाल ही में आरुषी मामले में पुन: साबित हुआ है, जब सीबीआइ द्वारा पेश क्लोजर रिपोर्ट भी न्यायालय ने मानने से सीधा इनकार करते हुए मुकदमे को चलाए रखने का आदेश दिया। उपरोक्त तथ्यों के आलोक में यह संदेह पैदा होने के तमाम कारण हैं कि हाल में कुछ कानूनी और जमीनी मात खाने के बाद नक्सली समूह और उन्हें वैचारिक आधार प्रदान करने वाले तत्वों द्वारा इस तरह की कारवाई हर स्तर पर बेजा दबाव बनाने की रणनीति के तहत ही की जा रही है। बात चाहे अपहरण कांड की हो या पूरी दुनिया में देश की न्याय प्रणाली को ही कठघरे में खड़ा करने की, हर स्तर पर छुपे हुए नक्सली जी-जान से आदिवासी क्षेत्रों को शतरंज की बिसात बना शह और मात का खेल जारी रखे हुए हैं। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ हर तरह के दबाव से मुक्त होकर शासन अगर न्यायिक से लेकर जमीनी स्तर तक अपने सभी प्रयासों को कायम रखे, तब ही निकट भविष्य में इस समस्या से पार पाया जा सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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