Friday, October 26, 2012

चीन भारत के लिए सभी मोचरें पर चुनौतियां पेश कर रहा है



सन 1962 की लड़ाई के बाद पांच दशकों की इस अवधि में चीन से लगने वाली सीमा पर सामरिक चुनौतियां कम होने के बजाय बढ़ गई हैं। चीन भारत के लिए सभी मोचरें पर चुनौतियां पेश कर रहा है जिनके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कभी भी बड़ा खतरा बन सकता है। चीन आर्थिक तथा सैन्य तैयारी में भारत से काफी आगे है। तिब्बत में उसके सैन्य तंत्र में काफी इजाफा हुआ है। यहां पर चीन पहले की आठ डिवीजनों की तुलना में अब 32 डिवीजनों को बनाए रखने की स्थिति में है। इस इलाके में हवाई लड़ाकू विमानों व मिसाइलों के अड्डों की संख्या काफी बढ़ाई जा चुकी है। इन सभी अड्डों पर सेना की जरूरतों वाली लॉजिस्टिक क्षमताएं स्थापित की जा चुकी हैं। चीन तिब्बत में दुनिया के सबसे ऊंचे स्थान पर हवाई अड्डे का निर्माण करने की तैयारी में है जो रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिमालय क्षेत्र में छठा हवाई अड्डा होगा। यह नागकू प्रांत में 4436 मीटर ऊंचाई पर होगा। इस तरह यह हवाई अड्डा तिब्बत के क्वामदो प्रांत में स्थित बामदा हवाई अड्डे से 102 मीटर अधिक ऊंचा होगा। इसे 660 एकड़ में बनाया जाएगा। इस हवाई अड्डे का निर्माण कार्य अगले दो सालों में पूरा होने की उम्मीद है। इस पर 2805 करोड़ डॉलर खर्च होने की उम्मीद है। चीन ने तिब्बत में अपनी दक्षिणी सीमा पर परमाणु अस्त्र ले जाने में सक्षम प्रक्षेपास्त्रों की नई बैटरियां स्थापित की हैं। चीन अरुणाचल प्रदेश के निकट तिब्बत के नयिंगची क्षेत्र को भी विकसित करेगा। वह इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र बनाने के लिए 6 करोड़ 35 लाख डॉलर यानी लगभग साढ़े तीन अरब रुपये खर्च कर रहा है। यहां 22 संपन्न आदर्श गांवों का निर्माण करेगा। चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत बताता है। यह भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा विवाद का हिस्सा है। नयिंगची क्षेत्र में वनों की प्रचुरता है। इस क्षेत्र में पहाड़, नदियां और चारागाह भी हैं। इस योजना से जहां लोगों को रोजगार मिलेगा और उनकी आय बढे़गी वहीं सामरिक दृष्टि वह भारतीय सीमा के नजदीक रहेगा। चीन भारतीय सीमा से लगे इलाकों में तेज गति से ढांचागत सुविधाएं बढ़ा रहा है जिनमें सड़कों के अलावा रेल लाइनों का जाल व हवाई अड्डों की सुविधाएं शामिल हैं। गत वर्ष 14 दिसंबर को राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में रक्षा मंत्री ने बताया था कि तिब्बत और शिनझियांग स्वायत्त क्षेत्र में भारतीय सीमा के दूसरी ओर चीन ढांचागत विकास कर रहा है। इन सुविधाओं में छिंगई-तिब्बत रेलवे लाइन को आगे बढ़ाकर शिगाज व न्यंगजी तक ले जाने की योजना है। सड़कें और विमान सुविधाएं भी बढ़ाई जा रहीं हैं। चीन हिंद महासागर के सेशेल्स द्वीप पर अपना पहला विदेशी सन्य अड्डा खोल रहा है जिससे उसकी नौसेना को संसाधनों की आवश्यक आपूर्ति और अन्य सुविधाएं आसानी से मुहैया कराई जा सकें। इस उद्देश्य के लिए चीन ने सेशेल्स को दो वाई-12 सर्विलांस एयरक्राफ्ट उपलब्ध करवा रखे हैं। सैन्य अड्डे खोलना चीन की सामुद्रिक शक्ति बढ़ाने का एक हिस्सा है। इस सैन्य अड्डे की मदद से सेशेल्स अथवा दूसरे देशों के बंदरगाहों पर आपूर्ति और सहायता अभियानों में भी मदद पहुंचाई जा सकती है। चीन ने हिंद महासागर में अपनी पैठ पहले से ही मजबूत कर ली है। यह स्थिति भारत के लिए खतरे का संकेत है। चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह की सुविधाएं हासिल कर ली हैं। काराकोरम हाईवे का विस्तार किया जा चुका है। काराकोरम मार्ग चीन के शिनचियांग प्रांत को पाकिस्तान से जोड़ने के लिए बहुत पहले ही बनाया गया था। सैन्य सहयोग सुरक्षित रखने और समर्थन के लिए मालदीव व मारीशस के साथ चीन के बेहतर संबंध बन चुके हैं। म्यांमार, बांग्लादेश व श्रीलंका में भी उसके सैन्य ठिकाने हैं। (लेखक सैन्य विज्ञान विषय के प्राध्यापक हैं) चीन की बढ़ती ताकत पर डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव की टिप्पणी चीन की सामरिक चालें


Dainik jagran National Edition 27-10-2010 Shuraksha Pej -8

मिसाइलों की खरीद को मंजूरी



नई दिल्ली (एसएनबी)। भारत सरकार की सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने भारतीय सेना के लिए रूस से 10 हजार कौनक्रुज-एमएंटी टैंक मिसाइलों की खरीद को मंजूरी प्रदान कर दी है। इन मिसाइलों की कीमत एक हजार करोड़ रुपए है। रक्षा सूत्रों ने बताया कि सेना की इनफैंट्री बटालियनों के लिए इस प्रस्ताव पर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) ने अपनी मंजूरी प्रदान कर दी है। पिछले सप्ताह की सीसीएस की बैठक में सेना के टी-90 टैंकों के लिए दो हजार करोड़ रुपए कीमत की रूस से 10 हजार इनवारमिसाइलें और वायुसेना के लिए छह हजार करोड़ रुपए की 200 ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों को खरीदने का प्रस्ताव पारित हुआ था। उल्लेखनीय है कि टी-90 युद्धक टैंक भी रूस से ही खरीदे गए थे। ब्रह्मोस मिसाइलों का विकास भी भारत-रूस ने संयुक्त रूप से किया है। वायुसेना इन मिसाइलों का उपयोग सुखोई-30 एमकेआई युद्धक विमानों में करेगी। ये विमान भी रूस से क्रय किए गए हैं।
      rashtirya sahara National Edition 27-10-2012 Suraksha pej 9

Thursday, October 25, 2012

चीन सीमा पर वायुसेना के 1750 करोड़ के प्रोजेक्ट का बुरा हाल

ई दिल्ली (एसएनबी)। वर्ष 1962 में चीन की सेना अरुणाचल प्रदेश की सीमा से भारत में घुस आई थी। वह जंग देश हार गया था। युद्ध के 50 सालों में भी चीन से लगे पूर्वोत्तर क्षेत्र में सैन्य सुविधाओं की जिस तेज गति से स्थापना और विकास होना चाहिए था, वह नहीं हो सका है। आलम यह है कि वर्ष 2010 में पूर्वोत्तर सेक्टर के आठ हवाई पट्टिटयों का अपग्रेडेशन कर उन्हें वायुसेना के विमानों के उतरने के काबिल बनाने की 1750 करोड़ रुपये की परियोजना पर अभी तक 20 फीसद भी काम नहीं हो सका है। इसके पीछे वन विभाग की अड़गेबाजी बताई जा रही है। वायुसेना प्रमुख एयरचीफ मार्शल एनएके ब्राउन इस अतिमहत्वपूर्ण परियोजना की कछुआ चाल से काफी चिंतित हैं। चीन की कुदृष्टि अरुणाचल प्रदेश पर शुरू से ही है। वह इस प्रदेश को अपना अंग मानता है। अक्सर दावा भी करता रहता है। चीन ने अरुणाचल से लगी अपनी सीमा में शुरू से ही वृहद सैन्य सुविधाओं का विस्तार कर रखा है। 1962 में चीनी सेना जब अरुणाचल में घुस आई थी, तो उस वक्त भी उनका सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर काफी मजबूत था। लेकिन 1962 युद्ध के बाद भी चीन से लगे भारतीय भूभाग पर सैन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। योजनाएं-परियोजनाएं लालफीताशाही, अड़ंगेबाजी और लेटलतीफी की शिकार हैं। पूर्वोत्तर में चीनी खतरे को देखते हुए भारतीय वायुसेना ने अरुणाचल प्रदेश (ईस्टर्न सेक्टर) के आठ एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउन्ड्स (एएलजी) यानी कि हवाई पट्टियों (परिघाट, मेचुका, वेलांग, टूटिंग, जीरो, एलांग तथा विजय नगर) को अपग्रेड कर उन्हें वायुसेना के परिवहन और लड़ाकू विमानों के उतरने के काबिल बनाने की योजना बनाई है। यह एएलजी अभी तक हेलीकाप्टर उतरने के ही काबिल हैं। वर्ष 2010 में 1750 करोड़ रुपये की इस परियोजना को केंद्र सरकार ने हरी झंडी दे दी। इस पर निर्माण काम भी शुरू हो गया, लेकिन काम की गति बहुत धीमी रही। सूत्रों ने बताया कि हवाई पट्टियों के विस्तार और अपग्रेडेशन में वन विभाग और अन्य संबंधित विभागों की अड़ंगेबाजी तो आड़े आ ही रही है, इतनी अधिक ऊंचाई पर पहाड़ी दुर्गम क्षेत्र में निर्माण सामग्रियों के पहुंचने में भी भारी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। मैटेरियल की अनुपलब्धता और सरकारी अड़ंगेबाजी के चलते दो साल बीतने के बाद भी इस पर 20 फीसद काम भी पूरा नहीं हो सका है। वायुसेना प्रमुख पूर्वोत्तर में हवाई पट्टियों के अपग्रेडेशन की 1750 करोड़ की इस अहम परियोजना की गतिसे चिंतित हैं। इस बावत राष्ट्रीय सहाराके सवाल पर उन्होंने कहा कि अगर यही रफ्तार रहा तो चार-पांच साल और लग जाएंगे।
प्रोजेक्ट में अरुणाचल की आठ हवाई पट्टियों का हो रहा अपग्रेडेशन काम की धीमी गति से वायुसेना प्रमुख ब्राउन चिंतित

Saturday, October 20, 2012

ड्रैगन का खतरा अभी टला नहीं

ड्रैगन का खतरा अभी टला नहीं
नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत-चीन युद्ध के 50 साल बीत जाने के बावजूद देश की सीमाओं पर खतरा टला नहीं है। रक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर केंद्र सरकार ने आधारभूत ढांचे और तीनों सशस्र बलों के आधुनिकीकरण की दिशा में तत्काल कदम नहीं उठाए तो आने वाले समय में देश को इसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। भारत-चीन युद्ध के बाद चीन की सीमा पर तैनात किए गए लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) शंकर रायचौधरी ने एजेंसी से कहा, ‘वर्ष 1962 के युद्ध के बाद से देश में काफी बदलाव आया है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है। सरकारी हलकों में कहा जा रहा है कि भारत और चीन के बीच युद्ध का कोई खतरा नहीं है, जबकि ऐसा नहीं है।उन्होंने कहा, ‘वर्ष 1962 के पहले भी ऐसी ही स्थिति थी। हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा बीजिंग से नई दिल्ली तक गूंज रहा था, लेकिन दोनों देशों के बीच युद्ध हुआ। हमें यह कभी सोचना नहीं चाहिए कि अच्छे संबंधों की वजह से दुश्मन हमला नहीं करेगा। इसके बजाय हमें हालात को ऐसा बनाना चाहिए कि चीन हम पर हमला करने के बारे में सोच ही नहीं सके।’ (शेष पेज 2)
Rashtirya sahara National Edition 20-10-2012 Pej -1 Shuraksha

आजादी मिले अभी महज 14 साल ही हुए थे

गौरव कुमार भारत को आजादी मिले अभी महज 14 साल ही हुए थे कि चीन के साथ युद्ध ने भारत को असंतुलित कर दिया। 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारतीय सीमा पर विभिन्न मोर्र्चो से जिस तरह आक्रमण किया वह भारत के लिए सर्वथा अप्रत्याशित था। भारत न तो इस युद्ध के लिए तैयार था और न ही उसे इस हमले की आशंका थी, फिर भी भारतीय सेना का यह सकारात्मक पक्ष ही था जो 32 दिनों तक चले इस युद्ध में चीन को कड़ा जवाब देते रहे। 21 नवंबर को चीन ने भारत को पराजित कर दिया। नतीजतन हमारा महत्वपूर्ण भाग चीनी कब्जे में चला गया। आजादी की किशोरावस्था में ही हमने चीन का छिपा हुआ चेहरा देख लिया था, लेकिन अब हमारी तरक्की से प्रभावित चीन हमसे बेहतर संबंध बनाए रखना चाहता है। हाल ही में चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह भारत के साथ तमाम विवाद बातचीत से सुलझाने को प्रतिबद्ध है। हालांकि भारत को चीन की विस्तारवादी नीति का अनुभव 1950 से ही था। 1950 में चीन जिस तरह तिब्बत को अपने प्रभुत्व में रखने में सफल हुआ उसने भारत को चीनी नीतियों को समझने का अवसर प्रदान कर दिया था, लेकिन न जाने क्यों भारत सतर्क नहीं था। भारत यह भी न समझ सका कि जो चीन तत्कालीन शक्ति संपन्न रूस की जमीन हड़पने में नहीं हिचका, क्या उसकी नजर हमारी जमीन पर नहीं होगी। चीन की बढ़ती विस्तारवादी नीति का ही परिणाम था कि उसने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश का लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अपने हिस्से में मिला लिया था। मोतियों की माला की चुनौती चीन की रणनीति रही है कि वह भारत को चारों ओर से घेरकर उस पर दवाब बनाए। इसी का नतीजा है कि वह भारत के पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंध निरंतर बढाता जा रहा है। इस क्रम में वह भारत के चारों ओर एक घेरा बना चुका है, जिसे सामरिक विशेषज्ञों ने मोतियों की माला नाम दिया है। इसके तहत चीन ने पाकिस्तान में ग्वादर, म्यांमार में हियांगयी, अक्याब या सितवे, क्यून, मरगुई और कोको द्वीपों, बांग्लादेश के चटगांव, थाइलैंड के लाएम चबांग, कंबोडिया के सिहानूकविले, श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाहों का निर्माण किया है। इस परिप्रेक्ष्य में भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि वह अपनी संप्रभुता और सामरिक हितों की रक्षा कैसे करे। कहींहमारे सामने 62 के युद्ध जैसी एक और चुनौती तो नहीं है। वर्तमान में चीन की नीति आर्थिक हितों को प्रमुखता देने की है और वह इसी के लिए भारत को किसी भी कीमत पर आगे बढ़ने नहीं देना चाहेगा। दक्षिण एशिया में चीन हमेशा से शक्ति संपन्न रहना चाहता रहा है। चीन के साथ दक्षिण एशियाई देशों खास तौर पर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका के संबंधों ने नए समीकरणों को जन्म दिया है। भारत के साथ चीनी समीकरण को लेकर इस क्षेत्र में चीन की भूमिका हमारा ध्यान आकर्षित करती है। पिछले वर्ष तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने चीन की ओर से भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की बात भी स्वीकार की थी। उन्होंने यह माना कि वर्तमान में करीब 4000 चीनी सैनिक पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में मौजूद हैं। इस स्वीकृति ने भारत की चिंता बढ़ाई है। गौरतलब है कि पीओके में करीब 45 प्रतिशत भाग भारत के कब्जे में है, जबकि 35 फीसद पाकिस्तान के और शेष 20 प्रतिशत पर चीन का कब्जा है। इसमें वह हिस्सा भी शामिल है, जिसे पाकिस्तान ने 1963 में चीन को दे दिया था। चीन इस क्षेत्र में व्यापक निर्माण कार्य करा रहा है। दक्षिण चीन सागर को लेकर विवाद भी पुराना नहीं हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने को लेकर भी इनके बीच विवाद चर्चा में है। इसके अलावा भारत के पूर्वोत्तर भागों में चीन की घुसपैठ की घटनाओं ने भी दोनों के रिश्तों में तनाव पैदा किया है। चीन के लिए अहम है अर्थनीति भारत के पास अपनी संप्रभुता को गुटनिरपेक्षता के अहिंसात्मक विचार के साथ सुरक्षित रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। वैश्विक स्तर पर भारत के प्रति विश्वास का कारण भी यही है। दक्षिण एशियाई राजनीति में 1962 के भारत-चीन युद्ध और पाकिस्तान के साथ 1999 तक के कारगिल युद्ध ने भारत के प्रति इस विश्वास को कम किया है। विकास और आर्थिक नीति के संदर्भ में देखा जाए तो उसकी आर्थिक सफलता के पीछे यही नीति है कि वह भारत या किसी भी देश के साथ अपने आर्थिक संबंधो को राजनीतिक संबंधो से प्रभावित नहीं होने देता। निर्यात संकट के बावजूद चीन ने 2009 में 6 प्रतिशत वृद्धि दर प्राप्त की थी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जुलाई 2010 की अपनी रिपोर्ट में उसके प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण प्रकट किया था। अभी इस वर्ष उसका लक्ष्य 10 प्रतिशत वृद्धि दर प्राप्त करने का है। चीन के आर्थिक विकास को यदि भारत के साथ समन्वय बनाकर बढ़ाया जाए तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। दक्षिण एशिया में व्याप्त आतंकवाद, गरीबी, बेरोजगारी, ऊर्जा संकट, खाद्य संकट आदि के प्रति एक समन्वयात्मक दृष्टिकोण और सहयोग की आवश्यकता है। आपसी समन्वय की जरूरत चीन-भारत दोनों एक बड़ी आबादी वाले देश हैं। भारत कृषि प्रधान देश है तो चीन उत्पादक अर्थव्यवस्था वाला। खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा स्त्रोतों के प्रति साझा रणनीतिक सहयोग की संभावना है। नदी जल बंटवारे के विवाद को सुलझाते हुए ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति में इसका उपयोग साझी रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है। दक्षिण एशिया जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला क्षेत्र है। सभी सार्क सदस्यों को मिलकर कार्बन उत्सर्जन कम करने को प्रमुख मुद्दा बनाना होगा। चीन इसमें बेहतर सहयोग कर सकता है, क्योंकि वह कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में काफी आगे है। आज यह साफ हो चुका है कि 1962 और 1999 के युद्ध ने समस्याएं सुलझाई नहीं, बल्कि विवाद बढ़ाए ही हैं। दक्षिण एशियाई देशों के विवादों में बाहरी मध्यस्थता कम करने की कोशिश करते हुए अपनी क्षेत्रीय एकता को बढ़ाने की जरुरत है। 1962 के युद्ध के बाद से भारत- चीन का संबंध परस्पर गहरे अविश्वास के दौर से गुजर रहा है। तिब्बत के प्रति भारतीय नीति को भी चीनी संदेह की नजर से देखा जाता रहा है। चीन जिंगजिआन और तिब्बत का एकीकरण इन चाहता है। पाकिस्तान और नेपाल दोनों इस काम के लिए उसके प्रति क्षेत्रीय भावना का निर्माण कर सकते हैं। यह भी एक कारण है कि चीन इन दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को विस्तार देना चाहता है। इसलिए भारत को 1962 के युद्ध से सबक सीखते हुए आगे की रणनीति बनानी चाहिए। भारत को अपनी नीति में परिवर्तन लाते हुए चीन के प्रति प्रतिक्रियात्मक व पूर्वाग्रह आधारित दृष्टिकोण के बदले द्विपक्षीय संबंधों के प्रति उन्मुख होना होगा। साथ ही हमें ध्यान रखना होगा कि भारत-पाक रिश्तों और द्विपक्षीय वार्ता पर चीनी कारकों का प्रभाव न पड़े। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Dainik Jagran National Edition 20-10-2012 Pej-8 Shuraksha