Saturday, October 13, 2012

भारत सरकार और सामरिक हलकों में चीनी खतरे के बारे में डर




भारत सरकार और सामरिक हलकों में चीनी खतरे के बारे में डर बढ़ रहा है और यह सोच हावी होने लगी है कि भारत को इस उपमहाद्वीप तक ही सीमित रखकर चीन उसे घेरने और सीमित रखने की कोशिश कर रहा है। इस संभावित खतरे को देखते हुए भारत आंतरिक और वाह्य संतुलन को अपना रहा है, जिसके लिए जमीन और समुद्र, दोनों में वह अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है और पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। भारत के आंतरिक संतुलन की विविधता 2012-13 के 41 अरब रुपये के रक्षा बजट में झलकती है जो पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक है। 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद वहां हम खुद को बड़ी भूमिका में देख रहे हैं। भारत ने ताजिक सुरक्षा बलों के साथ संपर्क बढ़ाते हुए वहां एक सैन्य अस्पताल और लॉजिस्टिक डिपो बनाया है। मंगोलिया के साथ भी संबंध बढ़ाए हैं और वहां रडार प्रणालियां लगाई जा रही हैं जिनकी मदद से चीनी मिसाइल प्रक्षेपणों पर निगरानी रखी जा सकेगी। तजाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ भारत के संबंधों का प्रयोग चीन द्वारा हमारे खिलाफ पाकिस्तान के परोक्ष रूप में इस्तेमाल को कम करने के लिए किया जा सकेगा। सिंगापुर के साथ भारत के संबंधों का विशेष भूराजनीतिक महत्व है, क्योंकि सिंगापुर के रास्ते पूर्व से दक्षिण चीन सागर और पूर्व से मलक्का जलडमरू मध्य पहंुचना आसान है। इस प्रकार निकट सुरक्षा संबंधों से भारतीय नौसेना को दक्षिण चीन सागर में अपनी उपस्थिति दर्ज जताने में तो मदद मिलेगी ही, वह मलक्का जलडमरू मध्य को बंद करने की धमकी देने की स्थिति में भी आ जाएगा। भारत द्वारा चीन को समुद्री रूप से घेरने का अगला पड़ाव वियतनाम है। चीन के साथ विवादों का दोनों का इतिहास रहा है। भारत और जापान के बीच बढ़ते सुरक्षा संबंध चीन के लिए धर्म-संकट बने हुए हैं। चीनी रक्षामंत्री की हाल की यात्रा, कई मायनों में महत्वपूर्ण है। यह ऐसे समय में हुई है जब रक्षा आदान-प्रदान और संबंधों में तेजी आ रही है। दूसरे, बदलाव की कगार पर खड़े चीनी नेतृत्व में नई सरकार के साथ नए एजेंडे का रुख तय हो सकता है। पिछले एक साल में भारत-चीन रक्षा सहयोग में कई सकारात्मक बदलाव आए। चार सैन्य प्रतिनिधिमंडलों ने एक-दूसरे के सैन्य प्रतिष्ठानों के दौरे किए, जिनमें तिब्बत का दौरा भी शामिल था। प्रतिनिधिमंडल स्तर पर हाल ही में रक्षामंत्री एके एंटनी और चीनी रक्षामंत्री के बीच वार्ता में दोनों देशों ने परस्पर सैन्य अभ्यास फिर शुरू करने का फैसला किया, जो 2010 में रुक गए थे। यह सही समय है जब भारत को अपने सरोकारों को दृढ़ता से आगे रखना होगा। इनमें पाकिस्तान को चीन का समर्थन एक अहम मुद्दा होना चाहिए। आज भारत और चीन, दोनों को सैन्य शक्ति और पड़ोसी देशों की चिंताओं को समझना होगा। भारत जहां अपनी नीतियों में यथार्थपरक व्यावहारिकता ला रहा है वहीं चीन आदर्शवादी संतुलन बना रहा है। इस तरह दोनों देश अतीत के दबावों से मुक्त होने की कोशिश कर रहे हैं। सैन्य संदर्भ में युद्घ की संभावनाओं को खत्म करने के लिए झगड़े की जड़ को ही मिटाना होगा। अब जब दोनों पड़ोसी देश यथार्थवाद-आदर्शवाद के बेहतर मिले-जुले वातावरण में हैं तब विशिष्ट उपायों पर गौर किया जा सकता है। सीमा विवाद को अब अंतिम रूप से निपटाया जा सकता है, जिसमें दोनों पक्ष समझौतावादी रुख अपना सकते हैं, जो नए हालात को देखते हुए कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। अगर इन दो पेचीदा मुद्दों पर काम किया जाए तो 21वीं सदी का आगे का रास्ता अतीत की विवशताओं से मुक्त होगा और इससे एक स्थायी भविष्य का मार्ग प्रशस्त होगा। ऐसा होते ही पिछले 50 सालों से भारत-चीन संबंधों पर बुरी तरह हावी सैन्य परिदृश्य अर्थव्यस्था, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बड़े संदर्भ में संतुलित हो जाएगा। तब चीन और भारत मिलकर पंचशील के सिद्घांतों के जरिए दुनिया को सैन्य विवादों से दूर रखने का मार्ग दिखा सकेंगे। भारतीय उपमहाद्वीप के हालात पर अडनी ब्यूरो की टिप्पणी सुरक्षा की ¨चता


Dainik Jagran National Edition 12-10-2012  Pej -8  सुरक्षा

No comments:

Post a Comment