Thursday, October 18, 2012

चीन का छल-कपट





चीन का छल-कपट अक्टूबर, 1962 में चीनी आक्रमण के समय मैं एक अमेरिकी विश्वविद्यालय में शोध कर रहा था। चीनी हमले के बाद मैं अमेरिका के जिन भी शैक्षिक और सामाजिक संगठनों के कार्यक्रमों में गया, मुझसे बार-बार एक ही प्रश्न पूछा गया कि क्या भारत सो गया था? क्या उसे इस बात की आशंका नहीं थी कि चीन कभी भारत पर चढ़ाई कर सकता है? पीछे मुड़कर देखने से लगता है कि तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ धोखा किया था। पंडित नेहरू एक भावुक व्यक्ति थे। उनका मत था कि जिस प्रकार भारत का शोषण अंग्रेजों ने किया था उसी प्रकार चीन का शोषण अन्य पश्चिमी उपनिवेशवादियों ने किया था। अत: जब एशिया के इन दो महान देशों को स्वतंत्रता मिल जाएगी तब वे स्वाभाविक रूप से मित्र बन जाएंगे। परंतु वह भूल गए कि चीन सदा से विस्तारवादी देश रहा है। चीन का एक ही उद्देश्य रहा कि किस तरह पड़ोसी देशों की जमीन हड़पी जाए। इस संदर्भ में चीन ने हमेशा अपने पड़ोसियों के साथ धूर्तता का व्यवहार किया है। भारत के साथ चीन ने शुरू से धोखेबाजी का रवैया अपनाया। चीन के तत्कालीन प्रधानमत्री चाउ एन लाई ने पंडित नेहरू को झांसा देकर कहा कि सैकड़ों वर्षो से चीन और भारत निकटतम मित्रों की तरह रहे हैं। चीन में बौद्ध धर्म तो भारत से ही गया है। अत: वे सदियों पुरानी इस मित्रता को और भी मजबूत बनाएंगे। चीन ने रूस जैसे मजबूत पड़ोसी देश की जमीन हड़पने में भी गुरेज नहीं किया। बाद में रूस के आंख दिखाने के बाद चीन ने जमीन वापस की। परंतु अन्य छोटे देशों की जमीन तो वह सदा के लिए हड़प ही गया। तिब्बत भारत का मित्र देश था। वहां भारत की छोटी रेल चलती थी, भारत का पोस्ट ऑफिस, भारत की पुलिस तथा सेना थी। 1950 में चीन ने रातोंरात तिब्बत को हड़प लिया था। पंडित नेहरू ने जब इसका विरोध किया तो चाउ एन लाई ने उन्हें आश्वासन दिया कि चीन तिब्बत की स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखेगा। यह तर्क पंडित नेहरू के गले नहीं उतरा, किंतु तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें खून का घूंट पीना पड़ा। भारत-चीन भाई-भाई का नारा देने के कुछ ही समय बाद चीन ने अपना असली रूप दिखा दिया। शुरू में बार-बार सीमा उल्लंघन के बाद अचानक चीन ने भारत की सीमा पर लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक 38 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया। पंडित नेहरू ने चीन के गलत रवैये पर चीनी नेताओं को बार-बार आगाह किया। जवाब में चाउ एन लाई ने कहा कि यह सीमाओं को लेकर मुगालता है। दोनों देशों के बीच पश्चिम के देश गलतफहमी पैदा कर रहे हैं। बहुत जल्द हम मिल-बैठकर इन गलतफहमियों को दूर कर लेंगे। वैसे भी जिस क्षेत्र की बात पंडित नेहरू करते हैं वह तो बंजर पहाड़ी क्षेत्र है, जहां घास तक नहीं उगती है। पंडित नेहरू चाउ एन लाई की धूर्तता को फिर भी नहीं समझ सके। जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तब नाराज होकर उन्होंने चाउ एन लाई को एक पत्र लिखा और कहा कि चीनी सैनिकों ने हजारों वर्ग मील भारतीय जमीन को अपने कब्जे में कर लिया है। दोनों देश निकटतम मित्र हैं और दोस्ती का यह तकाजा है कि चीन जल्दी से जल्दी इस क्षेत्र को खाली कर दे। अब चाउ एन लाई ने अपना छद्म चोला उतार फेंका। उन्होंने कहा कि यह विवादित क्षेत्र तो हमेशा से चीन का अंग रहा है। चाउ एन लाई के धोखे पर पंडित नेहरू भड़क गए और उन्होंने यह आदेश दे दिया कि चीनी फौज को भारतीय सीमा से खदेड़ दिया जाए। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बारे मे कई रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं। संसद में भी सरकार ने श्वेतपत्र जारी किया था। अब यह स्पष्ट है कि तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ने हमेशा पंडित नेहरू को चीन की मंशा के बारे मे दिग्भ्रमित किया, जिसके कारण भारत अपनी सुरक्षा के पुख्ता और ठोस उपाय नहीं कर सका। दरअसल, भारत को आशंका नहीं थी कि चीन जैसा मित्र देश उस पर चढ़ाई भी कर सकता है। इस घटना को आज 50 वर्ष हो गए। चीन ने भारत की हड़पी हुई हजारों किलोमीटर जमीन का एक इंच भाग भी वापस नहीं किया। प्रश्न यह है कि क्या हमने 1962 के चीनी आक्रमण से कोई सबक सीखा है? अब तो चीन के साथ-साथ पाकिस्तान भी हमारा शत्रु है और दोनों दुश्मन मिले हुए हैं। अब खतरा केवल चीन या पाकिस्तान की ओर से ही नहीं, बल्कि चीन और पाकिस्तान की ओर से साझा है। किसी भी एक देश से युद्ध छिड़ने की स्थिति में भारत को दोनों देशों के साथ जंग की तैयारी रखनी होगी। एक बार फिर 1962 जैसे हालात बन रहे हैं। जिस तरह 62 के युद्ध से पहले चीन भारतीय सीमा का बार-बार उल्लंघन करने लगा था, कमोबेश यही हालात पिछले कुछ वर्षो से फिर पैदा हो रहे हैं। पिछले पांच वर्षो के दौरान चीन सैकड़ों बार भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुका है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का तकाजा है कि व्यापार और सांस्कृतिक मामलों में हम चाहे जितने निकटतम मित्र हों, चीन के धूर्ततापूर्ण इतिहास को देखते हुए हमें सतर्क रहना होगा और सुरक्षा के ठोस उपाय करने होंगे। जो लोग फिर से हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा लगाते हैं हमें उनसे दूर ही रहना होगा। (लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)
Dainik Jagran Nation Edition 18-10-2012  Shuraksha Pej -8

No comments:

Post a Comment