सन 1962 की
लड़ाई के बाद पांच दशकों की इस अवधि में चीन से लगने वाली सीमा पर सामरिक
चुनौतियां कम होने के बजाय बढ़ गई हैं। चीन भारत के लिए सभी मोचरें पर चुनौतियां
पेश कर रहा है जिनके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह कभी भी बड़ा खतरा
बन सकता है। चीन आर्थिक तथा सैन्य तैयारी में भारत से काफी आगे है। तिब्बत में
उसके सैन्य तंत्र में काफी इजाफा हुआ है। यहां पर चीन पहले की आठ डिवीजनों की
तुलना में अब 32 डिवीजनों को बनाए रखने की स्थिति में है। इस
इलाके में हवाई लड़ाकू विमानों व मिसाइलों के अड्डों की संख्या काफी बढ़ाई जा चुकी
है। इन सभी अड्डों पर सेना की जरूरतों वाली लॉजिस्टिक क्षमताएं स्थापित की जा चुकी
हैं। चीन तिब्बत में दुनिया के सबसे ऊंचे स्थान पर हवाई अड्डे का निर्माण करने की
तैयारी में है जो रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिमालय क्षेत्र में छठा हवाई अड्डा
होगा। यह नागकू प्रांत में 4436 मीटर
ऊंचाई पर होगा। इस तरह यह हवाई अड्डा तिब्बत के क्वामदो प्रांत में स्थित बामदा
हवाई अड्डे से 102 मीटर अधिक ऊंचा होगा। इसे 660
एकड़ में बनाया जाएगा। इस हवाई अड्डे का निर्माण कार्य अगले दो सालों
में पूरा होने की उम्मीद है। इस पर 2805 करोड़
डॉलर खर्च होने की उम्मीद है। चीन ने तिब्बत में अपनी दक्षिणी सीमा पर परमाणु
अस्त्र ले जाने में सक्षम प्रक्षेपास्त्रों की नई बैटरियां स्थापित की हैं। चीन
अरुणाचल प्रदेश के निकट तिब्बत के नयिंगची क्षेत्र को भी विकसित करेगा। वह इस
क्षेत्र को महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र बनाने के लिए 6 करोड़
35 लाख डॉलर यानी लगभग साढ़े तीन अरब रुपये खर्च कर
रहा है। यहां 22 संपन्न आदर्श गांवों का निर्माण करेगा। चीन
अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत बताता है। यह भारत और चीन के बीच चल रहे सीमा
विवाद का हिस्सा है। नयिंगची क्षेत्र में वनों की प्रचुरता है। इस क्षेत्र में
पहाड़, नदियां और चारागाह भी हैं। इस योजना से जहां
लोगों को रोजगार मिलेगा और उनकी आय बढे़गी वहीं सामरिक दृष्टि वह भारतीय सीमा के
नजदीक रहेगा। चीन भारतीय सीमा से लगे इलाकों में तेज गति से ढांचागत सुविधाएं बढ़ा
रहा है जिनमें सड़कों के अलावा रेल लाइनों का जाल व हवाई अड्डों की सुविधाएं शामिल
हैं। गत वर्ष 14 दिसंबर को राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के
उत्तर में रक्षा मंत्री ने बताया था कि तिब्बत और शिनझियांग स्वायत्त क्षेत्र में
भारतीय सीमा के दूसरी ओर चीन ढांचागत विकास कर रहा है। इन सुविधाओं में
छिंगई-तिब्बत रेलवे लाइन को आगे बढ़ाकर शिगाज व न्यंगजी तक ले जाने की योजना है।
सड़कें और विमान सुविधाएं भी बढ़ाई जा रहीं हैं। चीन हिंद महासागर के सेशेल्स
द्वीप पर अपना पहला विदेशी सन्य अड्डा खोल रहा है जिससे उसकी नौसेना को संसाधनों
की आवश्यक आपूर्ति और अन्य सुविधाएं आसानी से मुहैया कराई जा सकें। इस उद्देश्य के
लिए चीन ने सेशेल्स को दो वाई-12 सर्विलांस
एयरक्राफ्ट उपलब्ध करवा रखे हैं। सैन्य अड्डे खोलना चीन की सामुद्रिक शक्ति बढ़ाने
का एक हिस्सा है। इस सैन्य अड्डे की मदद से सेशेल्स अथवा दूसरे देशों के बंदरगाहों
पर आपूर्ति और सहायता अभियानों में भी मदद पहुंचाई जा सकती है। चीन ने हिंद
महासागर में अपनी पैठ पहले से ही मजबूत कर ली है। यह स्थिति भारत के लिए खतरे का
संकेत है। चीन ने पाकिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह की सुविधाएं हासिल कर ली हैं।
काराकोरम हाईवे का विस्तार किया जा चुका है। काराकोरम मार्ग चीन के शिनचियांग
प्रांत को पाकिस्तान से जोड़ने के लिए बहुत पहले ही बनाया गया था। सैन्य सहयोग
सुरक्षित रखने और समर्थन के लिए मालदीव व मारीशस के साथ चीन के बेहतर संबंध बन
चुके हैं। म्यांमार, बांग्लादेश
व श्रीलंका में भी उसके सैन्य ठिकाने हैं। (लेखक सैन्य विज्ञान विषय के प्राध्यापक
हैं) चीन की बढ़ती ताकत पर डॉ. लक्ष्मी शंकर यादव की टिप्पणी चीन की सामरिक चालें
Dainik jagran National Edition 27-10-2010 Shuraksha Pej -8
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